भारतीय स्त्रियों की प्रमुख समस्याएं क्या हैं ?इनके समाधान हेतु अपने सुझाव दीजिए ।

भारतीय स्त्रियों की प्रमुख समस्याएं क्या हैं ?इनके समाधान हेतु अपने सुझाव दीजिए ।                                       अथवा भारतीय समाज में स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं की विवेचना कीजिए । … Read more

Categories PG

भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति ।

भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति ।                                            अथवा विभिन्न कालों में भारतीय स्त्रियों की सामाजिक प्रस्थिति ।               … Read more

Categories PG

19वीं शताब्दी में स्त्रियों की स्थिति में आए परिवर्तनों

19वीं शताब्दी में स्त्रियों की स्थिति में आए परिवर्तनों का उल्लेख करें अथवा ‘स्त्री अधिकार’ तथा ‘नारीवाद’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें ।   स्त्री अधिकार                                         … Read more

Categories PG

टावनी ने सामाजिक लोकतंत्र की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, उसकी व्याख्या कीजिए ।

टावनी ने सामाजिक लोकतंत्र की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, उसकी व्याख्या कीजिए ।                                                    अथवा क्या आप टावनी के इस … Read more

Categories PG

सामाजिक लोकतंत्र पर टाॅनी गौसलैंड के विचार ।


                                                    सामाजिक लोकतंत्र पर गोसलैंड के विचार
                                                 (Ideas of Gosland on Social Democracy)
टाॅनी गोसलैंड ने अपनी पुस्तक “समाजवाद का भविष्य” मैं प्रतिनिधि लोकतंत्र की समस्याओं का उल्लेख किया है । उसका कहना है कि “केवल ऐसा नहीं है कि विभिन्न समूहों का ही समाज में विकास होता है बल्कि इन समूहों से संबंधित समस्याएं और भी हैं जैसे- अवरोहण में असहिष्णुता, अत्यधिक अनुपालन और बहिष्कृत करने के लिए अपनी अंतिम शक्ति का निरंकुशता से प्रयोग करना आदि । इन समस्याओं के कारणों का उल्लेख करते हुए वह लिखता है कि पहला कारण यह है कि मतदाताओं का उद्देश्य अपने निजी हितों को प्राप्त करना होता है । इसलिए लोकतांत्रिक ढंग से निर्णय लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि मतदाता समस्याओं के बारे में सोच समझकर नैतिकता या सामाजिक आवश्यकताओं के आधार पर मतदान करते हैं । दूसरा कारण यह है कि सत्ता की समानता को सुरक्षित रखने के लिए अकेला लोकतंत्र ही पर्याप्त नहीं है । जे० एस० मिल ने अपनी पुस्तक “आन लिबर्टी” में ऐसी समस्या के संबंध में लिखा है कि “स्वशासन तथा जनता की सत्ता अथवा शक्ति जैसे शब्द सच की अभिव्यक्ति नहीं करते क्योंकि जो व्यक्ति सत्ता का प्रयोग करते हैं वे सदैव वही लोग नहीं होते और आश्वासन का अर्थ स्वयं के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति की सरकार नहीं होता बल्कि प्रत्येक की सबके द्वारा सरकार होता है ।”
गोसलैंड ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया परिणामों को प्रभावित करने का अवसर तो प्रदान करती है परंतु उन प्रभावों के उपयोग का नहीं । ये दोनों बातें अलग-अलग हैं । इससे निष्कर्ष निकलता है कि लोकतंत्र का विस्तार सरकार पर व्यक्तियों के नियंत्रण को बढ़ाने के बजाय कम करता है । यह एक प्रकार से विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तुलना में धमकी के समान है । गोसलैंड का कहना है कि सामाजिक क्षेत्र में लोकतंत्र का विस्तार समाज द्वारा स्वीकार किए गए परिणामों की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है । अतः यह मानना पड़ेगा कि लोकतंत्र का विस्तार सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए अकेला पर्याप्त नहीं है । केवल उन नीतियों को लोकतांत्रिक कहा जा सकता है जो नैतिक सिद्धांतों के अनुकूल हों तथा जिनका निर्माण लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के द्वारा हुआ हो ।

Read more

Categories PG

स्वातंत्र्यकरण से क्या तात्पर्य है ? स्वतंत्रता का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके पक्ष बताइए।

                                       स्वातंत्र्यकरण
                                    (Liberalization)
स्वातंत्र्यकरण ‘Liberalization’ का हिंदी रूप है । स्वातंत्र्यकरण को स्वतंत्रता की प्राप्ति व उसे अक्षुण्ण रखने की प्रक्रिया कहकर परिभाषित किया जाता है ।
स्वतंत्रता का अर्थ (Meaning of Liberty)- स्वतंत्रता मनुष्य जीवन की नैसर्गिक भावना है । मनुष्य में जन्म से ही स्वतंत्रता की प्रवृत्ति पाई जाती है । “मनुष्य जन्म से ही स्वतंत्रता उत्पन्न होता है ।”
‘स्वतंत्रता’ शब्द का प्रयोग विभिन्न रूपों में किया गया है तथा इसके भिन्न-भिन्न अभिप्राय हैं । स्वतंत्रता के संबंध में अनेक भ्रांतिपूर्ण धारणाएं प्रचलित हैं । उदाहरण के लिए, एक साधारण मनुष्य स्वतंत्रता शब्द का अर्थ कुछ कार्य शक्ति समझता है । लिवर (Lieber) के मतानुसार, “स्वतंत्रता शब्द का अर्थ है ‘इच्छा करने तथा कार्य की शक्ति, जो इच्छा बिना किसी आंतरिक या बाह्म प्रभाव के ही है । ”
इसका अभिप्राय यह है कि समाज में रहते हुए व्यक्ति पर किसी भी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए ।

Read more

Categories PG

यह कहना कहां तक सत्य है कि कानून स्वतंत्रता का रक्षक है।

                                प्रस्तावना                             (Introduction) स्वतंत्रता और कानून के मध्य पारस्परिक संबंध पर्याप्त वाद-विवाद का विषय रहा है। … Read more

Categories PG

ऐतिहासिक भौतिकवाद की विवेचना करते हुए कार्ल मार्क्स के आर्थिक नियतिवाद का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।

मार्क्स के इतिहास की आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए । अथवा ऐतिहासिक भौतिकवाद की विवेचना करते हुए कार्ल मार्क्स के आर्थिक नियतिवाद का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । मार्क्स का इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धांत (Marx’s Theory of Economic Interpretation of History) मार्क्स … Read more

Categories PG