स्वतंत्र भारत में स्त्रियों की स्थिति एवं विकास में उनकी भूमिका की विवेचना कीजिए तथा विकास में स्त्रियों की सहभागिता बढ़ाने हेतु उपाय या सुझाव बताइए ।

स्वतंत्र भारत में स्त्रियों की स्थिति एवं विकास में उनकी भूमिका की विवेचना कीजिए तथा विकास में स्त्रियों की सहभागिता बढ़ाने हेतु उपाय या सुझाव बताइए ।
                                                                        अथवा
20 वीं शताब्दी में स्त्रियों की दशा पर एक निबंध लिखिए ।

स्वतंत्र भारत में स्त्रियों की स्थिति एवं विकास में उनकी भूमिका
(Status of Women in Free India and Their Role in Development)
स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद पिछले करीब 50 वर्षों में स्त्रियों की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है । अब उनकी स्थिति में काफी सुधार हुआ है । आज स्त्रियां आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दासता से निकलकर स्वतंत्र जीवन का विकास करने की सभी सुविधाएं प्राप्त कर रही हैं । डाॅ० श्रीनिवास के अनुसार, “पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण तथा जातीय गतिशीलता ने स्त्रियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति को उन्नत करने में काफी योग दिया है ।” वर्तमान में स्त्रियों की स्थिति और विकास में उनकी भूमिका को निम्नांकित क्षेत्रों में देखा जा सकता है –

1. पारिवारिक तथा वैवाहिक स्थिति – हमारी पुरानी व्यवस्था के अनुसार स्त्री को परिवार और विवाह के क्षेत्र में कोई अधिकार नहीं थें । वर्तमान काल में विवाह के क्षेत्र में सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं और वे इन अधिकारों का अधिक से अधिक उपयोग करने के पक्ष में होती जा रही हैं । हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के द्वारा स्त्रियां अब किसी भी जाति के पुरुष ‌से विवाह कर सकती हैं और वैवाहिक जीवन कष्टप्रद होने पर वे कभी भी तलाक (Divorce) दे सकती हैं । हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के आधार पर स्त्रियां संपत्ति की अधिकारिणी हो गई हैं । इसके अतिरिक्त परिवारों में स्त्रियों का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है । स्त्रियों की चेतना के कारण ही आज संयुक्त-परिवारों के स्थान पर एकाकी परिवार (Nuclear families) की संख्या में वृद्धि हो रही है । इन परिवारों में स्त्रियों को सम्मानपूर्ण और अधिकारयुक्त वातावरण मिला है । परिवार में स्थिति अब बिना वेतन की नौकरानी की तरह नहीं है बल्कि एक मित्र, संरक्षक और सहयोगी की है ।

2. शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति- स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में स्त्रियों ने शिक्षा के क्षेत्र में काफी उन्नति की है । शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति होने से स्त्रियों में चेतना जागृत हुई है । उन्होंने अनेक संगठनों के द्वारा स्त्रियों को उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराया है । आज स्त्रियां राजनीति, विज्ञान, व्यवसाय, साहित्य और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं । कई स्त्रियां मानसिक रूप से पुरुषों से प्रतियोगिता करके अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं । प्रशासन के सबसे महत्वपूर्ण पदों पर भी स्त्रियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है ।

3. आर्थिक क्षेत्र में निर्भरता- स्त्रियां आर्थिक रूप से अब पुरुषों पर पहले की तरह आश्रित नहीं हैं । एक ओर शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति होने से स्त्रियां आर्थिक क्षेत्र में काम करने के योग्य हो गई हैं और दूसरी ओर संयुक्त परिवारों के शोषन के स्थान पर स्वयं जीविका उपार्जित करना अधिक अच्छा समझने लगी हैं । आज सभी क्षेत्रों में जीविका अर्जित करने वाली स्त्रियों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है । कुछ विभागों में तो पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों ने अधिक सफलता प्राप्त की है । आर्थिक जीवन में निर्भर होने के कारण स्वतंत्र विचारों को और अधिक प्रोत्साहन मिला । इसमें पर्दा प्रथा का तो प्रश्न ही नहीं उठता । हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अनुसार पिता की संपत्ति में पुत्री को भी अपने भाई के समान ही अधिकार प्राप्त करने का अधिकार है । इस प्रकार संयुक्त परिवारों में स्त्रियों का शोषण करना अब संभव नहीं रह गया है ।

4. राजनीतिक जीवन- स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व स्त्रियों की राजनीतिक स्थिति भी बहुत निम्न थी । स्त्रियों को मत देने का अधिकार नहीं था और न वे किसी पद के लिए उम्मीदवार हो सकती थीं । सन् 1937 में इस क्षेत्र में स्त्रियों को कुछ अधिकार दिए गए लेकिन ये बहुत सीमित थे । राजनीतिक क्षेत्र में मत देने का अधिकार आज महिलाओं को मिल चुका है ।अब उन्हें लोकसभा, विधानसभा, विधान परिषद् और राज्य सभा में स्थान प्राप्त हो चुके हैं । केंद्रीय और राज्यमंत्री मंडलों में भी उन्हें समुचित प्रतिनिधित्व प्राप्त है । पी० सी० एस० और आई० ए० एस० तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने तथा सभी सरकारी पदों पर काम करने का उन्हें अधिकार है । इससे स्पष्ट है कि आज राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं ।

5. सामाजिक जीवन- स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से स्त्रियों में सामाजिक जागृति की एक नई लहर उत्पन्न हो गई है । स्त्रियां जो कभी घर से बाहर नहीं निकलती थीं, अब अनेकों महिला संगठनों मनोरंजन समितियों और सुधार संगठनों की सदस्य बन रही हैं । हिंदू स्त्रियों ने पर्दे का लगभग पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया है । अधिकांश शिक्षित महिलाएं अब न तो व्यवहार के रूढ़िवादी तरीकों को धर्म का अंग समझती हैं और न ही ऐसे व्यवहारों की शिक्षा अपनी संतानों को देना अच्छा समझती है । इसी जागरूकता के फलस्वरूप रूढ़ीवादी कर्मकांडों और अनुष्ठानों का महत्व धट रहा है ।

विकास में स्त्रियों की सहभागिता बढ़ाने हेतु उपाय (सुझाव)
(Suggestions to Increase tha Participation of Women in Development)
भारत में समाज व राष्ट्र के विकास में स्त्रियों की सहभागिता एवं सहयोग को अधिकाधिक बढ़ाने के लिए निम्नांकित उपाय अपनाएं जा सकते हैं-

(1) स्त्रियों के गृह कार्यों और बाहर के कार्यों का पुनर्निर्धारण किया जाए और उन्हें घर से बाहर के कार्य अधिकाधिक सौंपे जाएं ।

(2) स्त्री शिक्षा का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार किया जाए जिससे उनके लिए अधिकारों के प्रति चेतना पैदा होगी और वे स्वयं अपने हक के लिए संघर्ष कर पाएंगी । पाठ्यक्रम को परिवर्तित एवं संशोधित करके इस प्रकार का बनाया जाए कि वह स्त्रियों के जीवन से संबंधित हो ।

(3) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उन्हें सहभागी बनाने के लिए जिला स्तर पर ऐसी योजनाएं बनाई जाए जिनमें स्त्रियों को पूर्णकालिक एवं अंशकालिक कार्य प्राप्त हो सकें ।

(4) इस प्रकार के शैक्षणिक केंद्रों की स्थापना की जाए जो महिलाओं को नई आर्थिक जिम्मेदारियों एवं परंपरागत कार्यों के निर्वाह की शिक्षा दे सकें । ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे केन्द्र महिलाओं को कृषि के नवीन तरीकों, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन एवं कुटीर उद्योगों का प्रशिक्षण दें तो नगरों में नवीन व्यवसायों एवं बड़े उद्योगों के सहायक उधोगों का ।

(5) इस प्रकार की सहकारी समितियों की स्थापना की जाए जो स्त्रियों को सभी प्रकार के उत्पादन कार्यों में तथा उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं को बाजार में बेचने एवं उन्हें गृह कार्य में सहायता देकर रोजगार के लिए समय देने में सहायता प्रदान करें ।

(6) स्त्रियों के उपभोक्ता आंदोलन को प्रोत्साहन दिया जाए ।

(7) राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों की सहभागिता बढ़ाने के लिए इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाऐं जो उन्हें अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागृत करें तथा हमारी राजनीतिक व्यवस्था के बारे में ज्ञान प्राप्त करें । स्त्रियों को राजनीति में भाग लेने के लिए, चुनाव लड़ने एवं निर्णय को प्रभावित करने के लिए प्रोत्साहित करें ।

(8) सामाजिक क्षेत्र में इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाएं जो स्त्रियों को राष्ट्रीय उद्देश्यों, बदलते हुए मूल्यों एवं आधुनिक समाज की आवश्यकताओं एवं उनकी भूमिका का ज्ञान कराएं ।

(9) स्त्रियों और पुरुषों के लिए समान नागरिक संहिताओं, नियमों एवं वेतन के लिए संगठित आंदोलन चलाया जाए ।

(10) सरकार तथा ऐच्छिक संगठन मिलकर राष्ट्रीय विकास में स्त्रियों का सहयोग प्राप्त करने के लिए उन्हें संगठित करें । विश्वविद्यालय एवं स्त्री संगठन स्त्रियों के दायित्व के संदर्भ में अनुसंधान कार्यों का संचालन करें, स्त्रियों में जागृति के लिए संचार के नवीन साधनों का प्रयोग किया जाए ।

निष्कर्ष (Conclusion)- इस प्रकार हम देखते हैं कि वर्तमान भारत में स्त्रियों की दशा में तीव्रता से परिवर्तन आ रहे हैं । वे पूर्व के समान परतंत्रता की बेड़ियों में नहीं जकड़ी हुई हैं । जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वे सक्रियता से भाग ले रही हैं । उनमें आत्म-निर्भरता, स्वतंत्रता तथा राजनीतिक चेतना का पर्याप्त विकास हो रहा है । सरकार द्वारा बनाए हुए अनेक कानूनों ने उनकी स्थिति को और सुदृढ़ बना दिया है । अब वे पूर्णतया पुरुषों पर निर्भर नहीं है । प्रशासनिक पदों पर अनेक स्त्रियां अत्यंत कुशलता से कार्य कर रही हैं । लेकिन दूसरी और आज भी स्त्रियां अनेक दुखों और कष्टों का सामना कर रही हैं । दहेज-प्रथा आज भी प्रचलित है, आए दिन सुनने में आता है कि बहुऐं उनके मायके से धन न लाने के लिए जलाई जा रही हैं । कई जगह आज भी बाल-विवाह हो रहे हैं । यह सब हो रहा है, पारित कानूनों के बावजूद भी । अतः कानून से अधिक जरूरत है सामाजिक चेतना की, अन्त: करण के परिवर्तन की और आर्थिक स्थिति के सामान्य होने की ।

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