सामाजिक लोकतंत्र पर टाॅनी गौसलैंड के विचार ।


                                                    सामाजिक लोकतंत्र पर गोसलैंड के विचार
                                                 (Ideas of Gosland on Social Democracy)
टाॅनी गोसलैंड ने अपनी पुस्तक “समाजवाद का भविष्य” मैं प्रतिनिधि लोकतंत्र की समस्याओं का उल्लेख किया है । उसका कहना है कि “केवल ऐसा नहीं है कि विभिन्न समूहों का ही समाज में विकास होता है बल्कि इन समूहों से संबंधित समस्याएं और भी हैं जैसे- अवरोहण में असहिष्णुता, अत्यधिक अनुपालन और बहिष्कृत करने के लिए अपनी अंतिम शक्ति का निरंकुशता से प्रयोग करना आदि । इन समस्याओं के कारणों का उल्लेख करते हुए वह लिखता है कि पहला कारण यह है कि मतदाताओं का उद्देश्य अपने निजी हितों को प्राप्त करना होता है । इसलिए लोकतांत्रिक ढंग से निर्णय लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि मतदाता समस्याओं के बारे में सोच समझकर नैतिकता या सामाजिक आवश्यकताओं के आधार पर मतदान करते हैं । दूसरा कारण यह है कि सत्ता की समानता को सुरक्षित रखने के लिए अकेला लोकतंत्र ही पर्याप्त नहीं है । जे० एस० मिल ने अपनी पुस्तक “आन लिबर्टी” में ऐसी समस्या के संबंध में लिखा है कि “स्वशासन तथा जनता की सत्ता अथवा शक्ति जैसे शब्द सच की अभिव्यक्ति नहीं करते क्योंकि जो व्यक्ति सत्ता का प्रयोग करते हैं वे सदैव वही लोग नहीं होते और आश्वासन का अर्थ स्वयं के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति की सरकार नहीं होता बल्कि प्रत्येक की सबके द्वारा सरकार होता है ।”
गोसलैंड ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया परिणामों को प्रभावित करने का अवसर तो प्रदान करती है परंतु उन प्रभावों के उपयोग का नहीं । ये दोनों बातें अलग-अलग हैं । इससे निष्कर्ष निकलता है कि लोकतंत्र का विस्तार सरकार पर व्यक्तियों के नियंत्रण को बढ़ाने के बजाय कम करता है । यह एक प्रकार से विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तुलना में धमकी के समान है । गोसलैंड का कहना है कि सामाजिक क्षेत्र में लोकतंत्र का विस्तार समाज द्वारा स्वीकार किए गए परिणामों की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है । अतः यह मानना पड़ेगा कि लोकतंत्र का विस्तार सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए अकेला पर्याप्त नहीं है । केवल उन नीतियों को लोकतांत्रिक कहा जा सकता है जो नैतिक सिद्धांतों के अनुकूल हों तथा जिनका निर्माण लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के द्वारा हुआ हो ।

1950 के लगभग कुछ विद्वानों ने यह अनुभव किया कि टावनी द्वारा विकसित किए गए सामाजिक लोकतंत्र का सिद्धांत उन परिस्थितियों की उचित व्याख्या नहीं करता जिनमें सामाजिक लोकतंत्र का निर्माण होता है । उन्हीं विद्वानों में से गौसलैंड भी एक है, जिन्होंने बताया कि टावनी का सिद्धांत सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण में आर्थिक सत्ता के स्वामित्व तथा असमान वितरण-प्रणाली पर आवश्यकता से अधिक बल देता है और राजनीतिक प्रजातंत्र द्वारा उस असमानता को दूर करने पर कम महत्व देता है । गौसलैंड के मतानुसार जनता को सार्वजनिक मताधिकार प्रदान किए जाने के साथ-साथ ही “पूंजीवाद के प्रजातांत्रिक बिखराव” (tha democratic repudiation of capitalism) की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है ।
निम्नलिखित बातों से पता चलता है-

1. राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व से निजी व्यवसायों में जनता के हितों को बढ़ावा मिला ।

2. सीधी कार्यवाही द्वारा जनता के हित के नाम पर व्यवसाय पर सामाजिक नियंत्रण स्थापित हुआ ।

3. ट्रेड यूनियन्स को सरकार के द्वारा बहुत सुगमताएं प्रदान की गई ।

4. आर्थिक नीति में ‘कीन्सीयन-क्रान्ति’ द्वारा सबको नौकरी का मिलना भी एक महत्वपूर्ण तथ्य था ‌।

 

गौसलैंड का विश्वास है कि पूर्ण रोजगार व्यवस्था तथा निर्वाचकों के प्रति सरकार का अपनी नीतियों के लिए उत्तरदाई होना वर्तमान समाज में युद्ध के पूर्व के समाज से बिल्कुल भिन्न था । एक प्रकार से यह व्यवसाई वर्ग से आर्थिक सत्ता का पृथक्करण था ।

गौसलैंड के विचार में एक अधिक सामाजिक लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए यह परंपरावादी समाजवादियों के दृष्टिकोण में क्रांतिकारी परिवर्तन था । पूर्ण रोजगार व्यवस्था, लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना तथा कानूनी सुविधाओं ने ट्रेड यूनियंस को अपने सदस्यों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त सत्ता प्रदान कर दी ।

टावनी तथा गौसलैंड के दृष्टिकोण में उद्देश्य संबंधी अंतर नहीं है बल्कि उन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु पूर्व-दशाओं के बारे में अनुमानों में अंतर है । गोसलैंड की सामाजिक प्रजातंत्र की बनावट संबंधी विचारधारा टावनी की विचारधारा से बिल्कुल अलग है । सामाजिक लोकतंत्र के सिद्धांत को ‘सामाजिक’ एवं ‘लोकतंत्र’ दोनों की ओर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है ।
गौसलैंड ने इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया है कि गरीबी तथा आर्थिक असुरक्षा दोनों ही व्यक्ति के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाती हैं । इनकी समाप्ति के लिए उसे स्वतंत्रता मिलनी चाहिए जो भौतिक सुविधाओं के प्रदान करने से तथा सत्ता के केंद्रीकरण को समाप्त करने से प्राप्त हो सकती है ।

सामाजिक प्रजातंत्र की प्राप्ति के बारे में दोनों विद्वानों के दृष्टिकोणों में पर्याप्त अंतर है । गौसलैंड यह मानकर चलता है कि ‘अदृश्य हाथ’ की रचना निजी हितों को लक्ष्य में बदल देती है । टावनी इसमें विश्वास नहीं करता । उसके अनुसार प्राकृतिक अधिकार अंत में राजनीतिक तथा सामाजिक यथार्थ बन जाते हैं । इस प्रकार टावनी की विचारधारा गोसलैंड की अपेक्षा अधिक सही है ।

निष्कर्ष- एक सच्चे सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण के लिए सामुदायिक सदस्यता की भावना का पाया जाना अत्यंत आवश्यक है । सामान्य हितों की प्राप्ति प्रजातांत्रिक व्यवस्था द्वारा ही संभव है परंतु प्रजातंत्रीय प्रक्रिया तथा समाज द्वारा स्वीकृत हितों की प्राप्ति के बीच संबंध स्पष्ट नहीं है । निष्कर्ष रूप में, सामाजिक प्रजातंत्र के निर्माण की समस्या का संबंध समाज को अधिक प्रजातंत्रीय बनाना नहीं है बल्कि इसका ध्येय प्रजातंत्र को अधिक सामाजिक बनाना है ।

 

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