स्वातंत्र्यकरण से क्या तात्पर्य है ? स्वतंत्रता का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके पक्ष बताइए।

                                       स्वातंत्र्यकरण
                                    (Liberalization)
स्वातंत्र्यकरण ‘Liberalization’ का हिंदी रूप है । स्वातंत्र्यकरण को स्वतंत्रता की प्राप्ति व उसे अक्षुण्ण रखने की प्रक्रिया कहकर परिभाषित किया जाता है ।
स्वतंत्रता का अर्थ (Meaning of Liberty)- स्वतंत्रता मनुष्य जीवन की नैसर्गिक भावना है । मनुष्य में जन्म से ही स्वतंत्रता की प्रवृत्ति पाई जाती है । “मनुष्य जन्म से ही स्वतंत्रता उत्पन्न होता है ।”
‘स्वतंत्रता’ शब्द का प्रयोग विभिन्न रूपों में किया गया है तथा इसके भिन्न-भिन्न अभिप्राय हैं । स्वतंत्रता के संबंध में अनेक भ्रांतिपूर्ण धारणाएं प्रचलित हैं । उदाहरण के लिए, एक साधारण मनुष्य स्वतंत्रता शब्द का अर्थ कुछ कार्य शक्ति समझता है । लिवर (Lieber) के मतानुसार, “स्वतंत्रता शब्द का अर्थ है ‘इच्छा करने तथा कार्य की शक्ति, जो इच्छा बिना किसी आंतरिक या बाह्म प्रभाव के ही है । ”
इसका अभिप्राय यह है कि समाज में रहते हुए व्यक्ति पर किसी भी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए ।


गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उपरोक्त सभी प्रकार की पूर्ण (Absolute) अथवा अनियंत्रित (Unrestricted) स्वतंत्रता का सम्पूर्ण मनुष्यों के द्वारा भोग किया जाना कठिन ही नहीं, असम्भव है । इस प्रकार की स्वतंत्रता को समाज में निमंत्रण देकर दास्ता को निमंत्रण देना है । यदि प्रत्येक मनुष्य अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र हो तो समाज में शक्ति के आधार पर शासन होगा, शक्ति ही न्याय होगी और पाशविक शक्ति अधिकार का रूप धारण कर लेगी । इस प्रकार, पूर्ण स्वतंत्रता का अर्थ निर्बलों का शक्तिशाली व्यक्तियों के द्वारा शोषण होगा ।

मानव स्वभाव (Human Nature)- ‘स्वतंत्रता’ शब्द के अर्थ को समझने के लिए मानव स्वभाव की दो विशेषताओं पर ध्यान देना होगा-

(i) प्रथम, हर व्यक्ति अपनी इच्छानुसार बिना किसी दूसरे से आदेश दिए हुए कार्य करना चाहता है ।
(ii) दूसरे, इसके साथ ही वह सामाजिक भी है और समाज में रहना चाहता है । इस प्रकार, स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थों में मनुष्य के स्वभाव की इन दोनों विशेषताओं का ही समावेश होना आवश्यक है । निष्कर्षत: अधिकतम स्वतंत्रता जो एक व्यक्ति समाज में रहते हुए प्राप्त कर सकता है, जैसा कि मानव अधिकारों की घोषणा (1789) में व्यक्त किया गया है- वह निम्न प्रकार से है-

‘सब कार्यों को करने की वह शक्ति जिससे किसी दूसरे को ठेस न पहुंचे ।’
विश्लेषण (Analysis)- डाॅ० अप्पादोराय के मतानुसार स्वतंत्रता की आधुनिक धारणा का विश्लेषण करने से निम्न दो बातें स्पष्ट होती हैं –
(i) व्यक्ति स्वतंत्रता चाहता है, अर्थात व शासन और व्यक्ति दोनों तरफ से अपने विचार, भाषा और कार्यों पर कम से कम नियंत्रण पसंद करता है ।
(ii) स्वतंत्रता का अर्थ साथ ही साथ बंधनों को स्वीकार करना भी है, जिससे सभी को समान स्वतंत्रता मिल सके और समान समाजिक अवसरों की प्राप्ति हो सके ।
स्वतंत्रता के दो पक्ष (Two Aspects of Liberty)- आधुनिक धारणा के अनुसार स्वतंत्रता के निम्नलिखित दो पक्ष हैं –

(i) निषेधात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty)- प्रथम निषेधात्मक स्वतंत्रता जिसका तात्पर्य स्वतंत्रता पर प्रतिबंध मात्र का अभाव है, अर्थात व्यक्ति के विकास के लिए पूर्ण स्वाधीनता, जिस पर न तो किसी शासन का प्रतिबंध हो और न किसी सामाजिक व्यवस्था अथवा शक्ति का हस्तक्षेप हो । सीले (Seeley) के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ ‘प्रतिबंधों की अनुपस्थिति’ (Absence of restraint) है अर्थात ऐसे समस्त प्रतिबंध जो व्यक्ति के नैतिक, भौतिक और मानवीय विकास में बाधा डालते हैं, वे सब स्वतंत्रता के विरोधी हैं । उन प्रतिबंधों को समाप्त करना ही स्वतंत्रता की प्राप्ति है ।

प्रो० लास्की (Prof. Laski) के शब्दों में, “स्वतंत्रता से मेरा अभिप्राय उन सामाजिक शर्तों पर लगे प्रतिबंधों के अभाव से है, जो आधुनिक सभ्यता में व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण हैं ।” इस प्रकार “स्वतंत्रता अति शासन की विरोधी है ।”
उपरोक्त विचार इस बात को प्रकट करते हैं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे समस्त बंधनों से मुक्त हो जो उसके व्यक्तित्व के विकास में बाधक हैं । अराजकतावाद (Anarchism) स्वतंत्रता के इस पक्ष पर अधिक बल देता है । कुछ विद्वानों की राय में मनुष्य निषेधात्मक स्वतंत्रता का उपभोग राज्य के जन्म से पूर्व प्राकृतिक अवस्था (State of nature) में करता था, जहां प्रत्येक व्यक्ति को छूट थी कि वह जो चाहे करे । इसकी पुष्टि में रूसो (Rousseau) ने लिखा है कि “सामाजिक अनुबंधन से मनुष्य ने अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता तथा अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने के असीमित अधिकार को खो दिया ।”

आलोचना (Criticism)- वास्तव में निषेधात्मक स्वतंत्रता कोई स्वतंत्रता नहीं है, आधुनिक राजनीतिज्ञों ने स्वतंत्रता के इस पक्ष को अस्वीकार कर दिया है । एक शक्तिवान व्यक्ति अपनी शक्ति के बल पर अन्य निर्बल व्यक्तियों का अपनी इच्छानुसार उपयोग कर सकता है जिससे उन व्यक्तियों की स्वतंत्रता का अपहरण अवश्य होगा । एक व्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता दूसरे की असीमित स्वतंत्रता से अवश्य टकरायेगी जिसके परिणामस्वरूप सबकी प्राकृतिक स्वतंत्रता नष्ट हो जाएगी । अस्तु, यह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं हो सकती ।
(ii) स्वीकारात्मक स्वतंत्रता (Positive Liberty)- निषेधात्मक या नकारात्मक(Negative) होने के साथ-साथ स्वतंत्रता का स्वीकारात्मक (Positive) रूप है । यह विचार कि प्रतिबंधों से मुक्त ही स्वतंत्रता है मिथ्या पूर्ण है । जिस प्रकाश अंधकार का अभाव और सौंदर्य गुप्ता कुरूपता का अभाव न होकर उससे कुछ अधिक होता है, उसी प्रकार वास्तविक स्वतंत्रता ‘प्रतिबंधों के अभाव’ से अधिक किसी और वस्तु की कामना करती है और वह वस्तु ‘अवसर की उपस्थिति’ (Presence of Opportunity) है ।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वास्तविक स्वतंत्रता उसी समय संभव हो सकती है जबकि राज्य उन समस्त अवस्थाओं को प्रदान करें, जो व्यक्ति के पूर्ण व्यक्तित्व के विकास की आवश्यक शर्तें हैं । लास्की (Laski) के अनुसार, स्वतंत्रता का अभिप्राय ‘उस वातावरण की रक्षा करने से है जिसमें मनुष्य को अपना सर्वोत्तम स्वरूप (Best self) प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो । इस प्रकार स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति को वे अधिकार प्राप्त हों तथा राज्य उन अवस्थाओं को बनाए जो उसके मानवीय, भौतिक एवं नैतिक विकास तथा सुख की आवश्यक शर्ते हैं । मैकेनी (Mc. Kechine) के अनुसार, स्वतंत्रता सब प्रतिबंधों का अभाव नहीं होती वर्ण तक नहीं प्रतिबंधों का अभाव नहीं होती, वरन् तर्कहीन संबंधों के स्थान पर तर्क पूर्ण वंदना की स्थापना करना है । डॉ० बर्नस (Dr. Burns) के अनुसार, स्वतंत्रता एक व्यक्ति की अपने प्राकृतिक उत्थान की शक्ति तथा अपने विकास की योग्यता को कहते हैं ।
उपरोक्त परिभाषाएं स्वतंत्रता के स्वीकारात्मक रूप पर प्रकाश डालती हैं । इस प्रकार स्वतंत्रता का तात्पर्य प्रतिबंधों के अभाव के साथ-साथ व्यक्ति को ऐसे अधिकार एवं अवसरों के उपलब्ध होने से भी है, जिनकी सहायता से वह अपने जीवन को अधिक श्रेष्ठ बना सकता है ।


स्वतंत्रता के नकारात्मक (Negative) तथा स्वीकारात्मक (Positive) रूप को अध्ययन करने पर तीन बातें प्रकट होती हैं-
1. सामाजिक बंधनों को स्वीकार करते हुए व्यक्ति को अधिक से अधिक प्रतिबंधों से मुक्त होनी चाहिए ।
2. समस्त व्यक्तियों के लिए स्वतंत्रता समान हो ।
3. स्वतंत्रता का तात्पर्य व्यक्ति को ऐसे अवसरों तथा अधिकारों को प्रदान करने से है, जो उसके भौतिक मानवीय एवं नैतिक विकास की आवश्यक शर्तें हैं । गैटेल (Gettell) का मत है “समाज में स्वतंत्रता नकारात्मक होने के साथ-साथ स्वीकारात्मक भी है ।” स्वतंत्रता का अर्थ “प्रतिबंधों का अभाव ही नहीं वरन ‘अवसरों की प्राप्ति’ भी है ।

राज्य की संप्रभुता और व्यक्ति की स्वतंत्रता (Sovereignty of State and Liberty of Individual)- जन साधारण में व्याप्त सामान्य धारणा यह है कि संप्रभुता और व्यक्ति की स्वतंत्रता दो विरोधी विचार हैं । इनमें किसी प्रकार का सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकता । संप्रभुता और स्वतंत्रता एक नदी के दो तक हैं जो एक दूसरे से कभी नहीं मिल सकते, इस पर व्यक्तिवाद की विचारधारा आधारित है । उसके अनुसार राज्य एक आवश्यक बुराई है और राज्य के प्रत्येक कार्य से व्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण होता है । इसके विपरीत, समाजवाद की धारणा है राज्य को अत्यधिक सत्ता का प्रयोग करना चाहिए और सामूहिक हित के लिए राज्य का व्यक्ति के ऊपर अधिक से अधिक नियंत्रण रहना चाहिए ।
राज्य की संप्रभुता और व्यक्ति की स्वतंत्रता निम्न शीर्षकों के अंतर्गत और अधिक स्पष्ट रूप से विवेचना की जा सकती है-
(i) अति की स्थिति (State of Excess)- राज्य की वैध दृष्टि से असीमित तथा निरपेक्ष सत्ता संप्रभुता कहलाती है । दूसरी और व्यक्ति की अपनी इच्छानुसार बिना किसी प्रतिबंध के कार्य करने की रूचि स्वतंत्रता कहलाती है । इस प्रकार, संप्रभुता और स्वतंत्रता दोनों निरंकुश भावनाएं हैं जो परस्पर विरोधी हैं । वस्तुत: इन दोनों का असीमित ही मात्रा में प्रयोग करना असंभव है । गेटेल (Gettell) का कथन है ‘संप्रभुता को अंतिम सीमा तक ले जाने पर वह अराजकता में बदल जाती है । इसी प्रकार स्वतंत्रता को अंतिम सीमा तक ले जाने पर वह अराजकता में बदल जाती है, जिससे संप्रभुता नष्ट हो जाती है ।’
(ii) समन्वय(Synthesis)- इस प्रकार संप्रभुता और स्वतंत्रता का सीमित प्रयोग ही दोनों में समन्वय स्थापित कर सकता है । इस आधार पर स्वतंत्रता संप्रभुता पर निर्भर करती है । स्वतंत्रता का वास्तविक उपभोग राज्य-संप्रभुत्व के अंतर्गत ही संभव है । संप्रभुता के अभाव में स्वतंत्रता नष्ट हो जाएगी ।

(iii) व्यक्तियों की स्वतंत्रता की परस्पर निर्भरता (Interdependence of the Liberty of People)- वर्तमान सभ्य समय में प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्वतंत्रता की इच्छा है । तथा वह अपनी समस्त स्वतंत्रताओं को पूर्ति नहीं कर सकता । यदि कोई व्यक्ति पूर्ण स्वतंत्रतापूर्वक, समाज के अन्य व्यक्तियों के हितों की उपेक्षा कर अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करना चाहे तब इस बात की पूर्ण संभावना है कि उसकी स्वतंत्रता से अन्य व्यक्तियों को क्षति पहुंचे । इस प्रकार अन्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता से उसे आघात या क्षति पहुंच सकती हैं । ‘क’ , ‘ख’ आदि की स्वतंत्रता से ‘क’ को क्षति पहुंच सकती हैं । यदि ‘क’ अपनी स्वतंत्रता का आंतरण ‘ख’ ‘ग’ आदि के हितों को दृष्टिगत रखे बिना करता है तो निश्चित ही उनको कुछ क्षति पहुंच सकती है । ऐसी अवस्था में संघर्ष हो जाएगा और समाज में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी । परिणामत: समस्त व्यक्तियों की स्वतंत्रता नष्ट हो जाएगी । वे पुन: अराजकता या प्राकृतिक अवस्था में पहुंच जाएंगे ।
(iv) राज्य संप्रभुत्व की आवश्यकता(Necessity of the state Sovereignty)- उपरोक्त स्थिति में पहुंचने से बचाना अपरिहार्य है । इसके लिए एक ऐसी सत्ता की आवश्यकता है जो समाज के विभिन्न सदस्यों में सद्भावना, एकता और सामंजस्य स्थापित कर सके तथा उनकी स्वतंत्रताओं पर कुछ प्रतिबंध रख सके जिससे समाज का प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को बिना आघात पहुंचाए अपनी इच्छानुसार कार्य कर सके और अपने जीवन स्तर को ऊंचा उठा सकें । राज्य-संप्रभुत्व ही वह सत्ता है जो इन कार्यों को पूरा कर सकती है । राज्य की सदस्यता अनिवार्य होती है । उसके आदेशों का पालन प्रत्येक व्यक्ति को करना पड़ता है । सामूहिक कल्याण को ध्यान में रखते हुए राज्य प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ नियंत्रण रखता है जिससे अन्य व्यक्तियों को कुछ क्षति न पहुंचे और वे अपनी स्वतंत्रताओ से, जो राज्य द्वारा मान्य होती हैं, समुचित लाभ उठा सकें ।
इस प्रकार, संप्रभुता और स्वतंत्रता दो विरोधी भावनाएं न होकर एक दूसरे की पूरक हैं । प्रो० हाॅकिंस ने लिखा है कि “व्यक्ति जितनी ही अधिक स्वतंत्रता की इच्छा रखेगा, उतना ही अधिक उसे अपने आपको अधिकार सत्ता के अधीन रखना होगा ।” लास्की ने सीमित स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए कहा है कि “व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ सीमित नियंत्रण उसके सुख की अभिवृद्धि करते हैं । विलोबी (Willoughby) का मत है कि “स्वतंत्रता इसलिए रह पाती है, क्योंकि उसके साथ नियंत्रण भी है ।”

 

 

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