यह कहना कहां तक सत्य है कि कानून स्वतंत्रता का रक्षक है।

                                प्रस्तावना
                            (Introduction)
स्वतंत्रता और कानून के मध्य पारस्परिक संबंध पर्याप्त वाद-विवाद का विषय रहा है। राज्य का आदेश व्यक्ति के व्यक्तित्व के स्वतंत्र विकास में बाधक है या साधक, इसके संबंध में दो भिन्न मत हैं –

प्रथम मत : स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी (First View: Liberty and Law Contrary to Each Other)- कुछ विद्वानों का मत है कि स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं । इस संबंध में कतिपय विचार निम्न प्रकार व्यक्त किए गए हैं –
(i) डायसी ( Diecy) – डायसी (Diecy) का कथन है कि, “एक की अधिकता होने पर दूसरे में कमी आ जाती है
(ii) विलियम गोडविन (William Godwin)- विलियम गोडविन (William Godwin) का विचार है कि ‘कानून अधिक घातक प्रकृति की उत्पादन संस्था है ।”
व्यक्तिवादी (Individualists), अराजकतावादी (Anarchists) तथा सिण्डिकलवादी (Syndicalists) इसी विचार का समर्थन करते हैं ।
(iii)व्यक्तिवादी(Individualists)- व्यक्तिवादी कानून को व्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोधी समझते हैं । उनके अनुसार जैसे-जैसे राज्य अपने कार्य – क्षेत्र को विस्तृत करता जाएगा, व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित होती जाएगी । अतः व्यक्तिवादी राज्य को एक आवश्यक बुराई (Necessary evil) समझते हैं जिसको केवल पुलिस के कार्य करने चाहिए।

(iv) अराजकतावादी (Anarchists)- अराजकतावादी विचारकों का मत है कि व्यक्ति उसी समय स्वतंत्रता की श्वास लेगा जबकि राज्य समाप्त हो जाएगा । राज्य की प्रत्येक आज्ञा को वे स्वतंत्रता का शत्रु समझते हैं । वे इस प्रकार के अराजकतावादी समाज की स्थापना करने के पक्ष में हैं जिसमें राज्य का कोई स्थान नहीं होगा । उसी समय व्यक्ति को वे अवस्थाए पूर्णरूप से प्राप्त हो सकेंगी, जिनमें वह अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकेगा ।
(v) साम्यवादी (Communists) – साम्यवादी भी राज्य को शोषण का एक माध्यम समझते हैं ।
इस प्रकार एक वर्ग की विचारधारा के अनुसार कानून व्यक्ति के जीवन को बन्धनों में लपेट देता है । कानून उसको कभी-कभी अपनी इच्छा के विरुद्ध भी कार्य करने पर बाध्य कर देता है । कानून व्यक्ति को राज्य का दास बना देता है ।


द्वितीय मत: कानून स्वतंत्रता का संरक्षक (Second View :Law, tha Protector of Liberty)- द्वितीय विचारधारा के अनुसार, कानून स्वतंत्रता का सबसे बड़ा संरक्षक है । स्वतंत्रता का आधार ही कानून है । स्वतंत्रता और कानून परस्पर विरोधी नहीं हैं ।

(i) लॉक (Locke) – लॉक का कथन है, ‘कानून अपने सही अर्थ में किसी स्वतंत्र और बुद्धिमान प्रतिनिधि के सच्चे हित को सीमित नहीं करता वरन् उसको निर्देश देता है ।….अतः इस संबंध में चाहे जितनी भूल हो, कानून का लक्ष्य स्वतंत्रता का उन्मूलन या उस पर प्रतिबंध लगाना नहीं है, अपितु उसको सुरक्षित तथा विस्तृत करना है ।’
(ii) आदर्शवादी (Idealists)- आदर्शवादी विचारकों के अनुसार व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता राज्य की आज्ञाओं को पालन करने में ही निहित है । हीगल (Hegal) का विचार है कि व्यक्ति राज्य की आज्ञाओं का पालन करते रहकर ही अपने वास्तविक व्यक्तित्व को प्राप्त कर सकता है ।

स्वर्णिम मध्य मार्ग (Golden Mien)- वस्तुत: पूर्णरूप से न तो इस बात को स्वीकार किया जा सकता है कि कानून का विस्तार स्वतंत्रता को संकुचित करता है और न ही इस कथन को प्रत्येक कानून स्वतंत्रता का मित्र है । इन दोनों विचारों में अतिश्योक्ति है । सत्यता दोनों के मध्य निहित है ।

कानून, स्वतंत्रता के लिए पूर्व-शर्त (Law, Pre-condition for Liberty)- जिन व्यक्तियों का यह विचार है कि कानून स्वतंत्रता का हनन करता है,वे वास्तव में स्वतंत्रता और कानून के वास्तविक रूप से परिचित नहीं हैं । समाज में नियमों के अभाव में स्वतंत्रता संभव नहीं है । अनियंत्रित स्वतंत्रता के प्रदान करने पर समाज की शांति और व्यवस्था नष्ट हो जाएगी । शक्ति अधिकार होगा और अधिकार शक्ति नहीं रह पाएगा । अतः समाज में सार्वजनिक स्वतंत्रता के अस्तित्व हेतू कुछ सामाजिक बंधनों को स्वीकार करना अपरिहार्य होगा । वास्तव में कानून उन अवस्थाओं को उत्पन्न करता है तथा स्थिर रखता है, जिनके अभाव में स्वतंत्रता असंभव है । निम्नलिखित तीन प्रकार से कानून स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण शर्त है-
(i)स्वतंत्रता की आक्रमण से रक्षा (Protection of Liberty Against Attack)- कानून किसी व्यक्ति की स्वाधीनता की दूसरे व्यक्ति के आक्रमण से रक्षा करता है । उदाहरण के लिए कानून के अनुसार किसी व्यक्ति की कोई दूसरा व्यक्ति हत्या नहीं कर सकता । ऐसे कानून स्वतंत्रता के विरोधी नहीं अपितु सहायक हैं ।
(ii) स्वतंत्रता हेतु आवश्यक अवसर प्रदान करना (To Provide with Necessary Opportunities for Liberty)- कानून व्यक्ति को ऐसे सामाजिक अवसर प्रदान करता है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास की आवश्यकता शर्तें हैं । जैसे अनिवार्य शिक्षा संबंधी कानून, व्यवस्था संबंधी कानून आदि ।

(iii) मूल अधिकार प्रदाता (Giver of Fundamental Rights)- कानून व्यक्ति के मूल अधिकारों को जन्म देता है तथा उनको सुरक्षा भी प्रदान करता है । अमेरिका और भारत आदि देशों के संवैधानिक कानून (Constitutional Laws) व्यक्ति की lस्वतंत्रता की तत्कालीन शासन के आक्रमण से रक्षा करते हैं ।
उचित सीमा (Proper Limits)- इस विवेचना का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रत्येक प्रकार का कानून स्वतंत्रता का पोषक होता है । यदि प्रतिबंध उचित सीमा को पार कर जाए तो कानून स्वतंत्रता का हनन भी कर सकता है । जो कानून व्यक्तियों की क्रियाशील शक्तियां को कुण्ठित करते हैं वे वास्तव में व्यक्ति की स्वतंत्रता के विरोधी होते हैं । उदाहरण के लिए भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ब्रिटिश सरकार के द्वारा अनेक ऐसे कानून निर्मित किए गए थे जिन्होंने व्यक्तियों के भाषण, लेखन, घूमने-फिरने इत्यादि की स्वतंत्रताओं को समाप्त कर दिया था ।

कसौटी (Criterion) – वस्तुत: यह बात कि कानून स्वतंत्रता का पोषक होगा या शोषक इस बात पर निर्भर करती है कि कानून का क्या स्वरूप है और किस प्रकार के शासन द्वारा निर्मित है । एक निरंकुश, स्वेच्छाचारी एवं अत्याचारी शासक के द्वारा निर्मित अधिकार कानून व्यक्तियों की स्वतंत्रताओं के विरोधी हो सकते हैं । इसके विपरीत, यदि कानून का उद्देश्य जनता का कल्याण है तथा जनता के द्वारा स्वयं या उसके प्रतिनिधियों द्वारा निर्मित किए गए हैं तो वे स्वतंत्रता की अवस्थाओं को उत्पन्न करने के साथ-साथ स्थिर भी रख सकते हैं । प्रो० रिशी (Prof, Ritche) के अनुसार, ‘स्वतंत्रता का स्वीकारात्मक रूप मानव के आत्मा-विकास का अवसर है । यह विकास राज्य के नियमों के द्वारा ही संभव है । सार्वजनिक हितों को दृष्टि में रखते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कुछ प्रतिबंध आवश्यक हैं, परंतु यह प्रतिबंध निष्पक्ष रुप से लगाए जाने चाहिए तथा समाज भी उनको उचित समझता हो ।”
वर्तमान मनोवृत्ति (Present Tendency)- वर्तमान में प्राय: राज्यों की यह मनोवृत्ति बढ़ती जा रही है की संप्रभुता या विधि और स्वतंत्रता का संतोषजनक समन्वय हो सके जिससे नागरिकों का अत्यधिक कल्याण हो और साथ ही साथ राज्य की नींव: सुदृढ़ रहे ।यह मनोवृत्ति प्रजातंत्र एवं लोकप्रिय शासन में विशेष रूप से पाई जाती है । वहां नागरिकों को अधिक से अधिक अधिकार राज्य द्वारा प्राप्त होते हैं, वहां जनता के हाथों में ही संप्रभुता और स्वतंत्रता दोनों निहित रहती हैं, जिसमें व्यक्ति को पूर्ण विकास करने का अवसर मिलता है और राज्य को भी किसी विद्रोह की आशंका नहीं रहती है । संप्रभुता और स्वतंत्रता के समन्वय के लिए प्रजातंत्र ही सर्वोत्तम शासन प्रणाली मानी गई है । क्योंकि संसार के अधिकतर देशों में प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली है, अतः यह कहा जा सकता है कि स्वातंत्र्यकरण निरंतर विस्तार व वृद्धि की ओर अग्रसर है ।

 

 

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