राज्य और समाज के संबंध में मार्क्स के सिद्धांत का वर्णन कीजिए ।

राज्य और समाज के संबंध में मार्क्स के सिद्धांत का वर्णन कीजिए ।
अथवा
मार्क्स के ‘समाजवादी राज्य’ तथा ‘साम्यवादी समाज’ विषय विचारों पर प्रकाश डालें ।
अथवा
“राज्य पूंजीपति वर्ग की कार्यकारिणी समिति है ।” मार्क्स के इस कथन की व्याख्या कीजिए ।

राज्य के संबंध में मार्क्स के विचार
(Views Of Marx Regarding State)
मार्क्स राज्य के संबंध में निम्नलिखित बातें लिखता है-
1. राज्य एक शोषक संस्था के रूप में-  राज्य किसी भी युग में सब वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सका है । राज्य उन लोगों का संगठन है जिनका उत्पादन के साधनों पर सदैव ही नियंत्रण रहा है और इस दृष्टि से राज्य उन लोगों पर अपना नियंत्रण अथवा अधिकार रखता है, जिनके पास उत्पादन के साधनों का अभाव है । राज्य शोषक वर्ग की एक संस्था है जो अन्य निर्बल तथा साधनहीन व्यक्तियों का शोषण करता है । राज्य सर्व-कल्याण को अपना उद्देश्य समझने वाला समुदाय न कभी रहा है और न कभी रहेगा। एंजिल्स का कथन है कि, “राज्य एक वर्ग द्वारा एक दूसरे वर्ग के दमन का एक यंत्र है ।”
2. पूंजीपति के हितों का रक्षक- पूंजीपतियों को सुरक्षा की आवश्यकता होती है । और राज्य द्वारा संगठित पुलिस, कानून तथा न्याय विभाग आदि की स्थापना केवल पूंजीपतियों के हितों में ही की जाती है । पूंजीपति वर्ग इन सभी साधनों से श्रमिक वर्ग के हितों का दमन करता है और श्रमिकों का शोषण करता है । इस संबंध में एंजिल्स का लेख है, “पूंजीवादी राज्य श्रमिकों के विद्रोह के विरुद्ध एक प्रहरी के रूप में खड़ा है ।”
3. राज्य वर्ग भेद पर आधारित- राज्य की उत्पत्ति केवल उस समय होती है जब समाज में वर्गों का जन्म होता है । विभिन्न वर्गों के संघर्ष के कारण अंत में राज्य का जन्म होता है । सबल वर्ग निर्बल वर्ग पर अधिकार कर लेता है और राज्य का उदय होता है । राज्य सदैव ऐसा संगठन रहा है और सदैव ऐसा ही रहेगा । जिसके द्वारा प्रधान आर्थिक वर्ग दूसरे आर्थिक वर्गों के ऊपर शासन करता है और उनका शोषण करता है ।
4. जन हित का विरोधी- राज्य जनता के हितों का विरोधी है । उसका आधार दमनकारी शक्ति है । उसका उद्देश्य जनहित अथवा लोकहित के कार्य भी नहीं हो सकता है ।
5. राज्य केवल कष्टदायक- राज्य सदैव कष्टदायक रहा है और रहेगा । राज्य तो निर्धनों, श्रमिकों तथा अन्य असहाय लोगों को कष्ट देने का एक मात्र साधन है । मार्क्स ने लिखा है, “राज्य का बल एक ऐसी चक्की है जो वर्ग को पीस डालती है ‌। लोकतंत्रीय राज्य भी इसी कष्टकारी चक्की का रुप है और राजतंत्र भी यही है ।” मार्क्स के शब्दों में, ” राज्य का उद्देश्य प्रधान वर्ग को अधीनस्थ वर्गों का शोषण करने, अपनी संपत्ति की रक्षा करने तथा उसे चुनौती देने वाले समस्त विचारों को कुचलने की शक्ति प्रदान करता है ।”
6. राज्य एक बुराई के रूप में – राज्य एक आवश्यक बुराई है । मार्क्स ने अपने इस कथन में अमेरिका के कुछ विद्वानों से प्रेरणा ली थी । अमेरिका के विद्वानों का कहना है कि प्रारंभिक अवस्था में मनुष्य नियमों का पालन करता है परंतु यह व्यवस्था एक सामुदायिक भावना पर आधारित थी । उसमें सभी व्यक्ति बराबर थे और एक के द्वारा दूसरे के शोषण का कोई प्रश्न नहीं था ।

मार्क्स के अनुसार राज्य की समाप्ति की प्रक्रिया
(The End of tha State According to Marx)
मार्क्स का दृढ़ विश्वास था की सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना से पूंजीवाद का विनाश अवश्य होगा । जिनके द्वारा बुर्जुग वर्ग ने सामंतवादी दुर्गों को गिराया था । आर्थिक नियंत्रण के द्वारा ज्यों-ज्यों पूंजीपतियों की संख्या घटेगी त्यों- त्यों बड़े-बड़े उद्योग धंधों का विनाश होगा और छोटे-छोटे उद्योग धंधे समाप्त हो जाएंगे, तब छोटे-छोटे पूंजीपति श्रमिक वर्ग में भर्ती हो जाएंगे । धीरे-धीरे श्रमिकों की संख्या बढ़ जाएगी और वे संगठित होकर अधिक वेतन और अधिक सुविधाओं के लिए आंदोलन करेंगे और यह आंदोलन धीरे-धीरे ऐसा उग्र रूप धारण करेगा कि पूंजीपतियों का अंत हो जाएगा और उत्पादन के सभी साधनों पर सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य स्थापित हो जाएगा किंतु यह उसी अवस्था में संभव हो सकता है जबकि सर्वहारा वर्ग सशस्त्र संघर्ष के लिए सदैव तैयार रहे ।
पूंजीपतियों का अंत करने के उपरांत समाज में सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद स्थापित होगा और उस समय तक बना रहेगा जब तक कि उत्पादन के साधनों पर मध्यम वर्ग नियंत्रण रहेगा ।

सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद का स्वरूप- मार्क्स का कहना था कि पूंजीवादी समाज के अंत के बाद जब तक राज्य का विनाश न हो एक संक्रांति काल आएगा जिसमें सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद स्थापित हो जाएगा ।

सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद में निम्नलिखित विशेषताएं होंगी-
(क) राज्य की शक्ति श्रमिक वर्ग में निवास करेगी और यह श्रमिक वर्ग उस सत्ता का बलपूर्वक प्रयोग करेगा । कहीं ऐसा न हो कि उनके पूर्व का शासक वर्ग उनसे राज्य सत्ता ही छीन न ले ।
(ख) उस अधिनायकवाद में श्रमिक वर्ग के प्रतिनिधि उत्पादन के साधनों पर अपना अधिकार करेंगे और अपने विरोधियों का बलपूर्वक दमन करेंगे ।
(ग) सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद में बहुमत की इच्छा को शासन का आधार माना जाएगा जिसमें निर्वाचनों के लिए सार्वभौमिक मताधिकार के अधिकार को मान्यता प्रदान की जाएगी ।
(घ) अधिनायकवाद किसी भी ऐसे दल के हाथों में सत्ता का केंद्रीयकरण नहीं करेगा जो अपनी इच्छा को अन्य नागरिकों पर बलपूर्वक लादने का प्रयास करे ।
(ड़) यह अधिनायकवाद बल प्रयोग द्वारा ऐसे किसी दल का विरोध करेगा जो श्रमिक वर्ग की सरकार को हटाने का प्रयास करे ।

राज्य की संपत्ति (Property of the State)- मार्क्स का कहना है कि श्रमिक वर्ग का राज्य सत्ता पर अधिकार हो जाएगा राज्य सर्वहारा वर्ग के कल्याण का एक समाज बन जाएगा । उस दशा में शासन के विभिन्न अंगों का स्वरूप लोकतंत्रीय होगा और पुलिस को सेवक समझा जाएगा । राज्य की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी क्योंकि एक वर्गहीन समाज की स्थापना हो जाएगी और राज्य की बिल्कुल आवश्यकता नहीं रहेगी ।
सर्वहारा वर्ग के राज्य के कार्य या प्रमुख नीतियां(Programmes and Policy of Marxian Socialistic State)- मार्क्स ने सर्वहारा वर्ग के राज्य की कल्पना की है उसके कार्य भी बतलाए हैं जो कि निम्नलिखित हैं-
(1) यह राज्य व्यक्तिगत संपत्ति का अपहरण करेगा ।
(2) जो व्यक्ति राज्य के बाहर चले जाएंगे उनकी संपत्ति पर राज्य का अधिकार होगा ।
(3) भूमि की उपजाऊ शक्ति में वृद्धि करना तथा यातायात के साधनों पर नियंत्रण करना एवं पूंजीवादी शक्तियों का विनाश करना सर्वहारा वर्ग राज्य के विशिष्ट कार्य होंगे ।
(4) यह राज्य साम्यवादी सिद्धांतों का प्रचार करेगा और कुटुंब की समाप्ति करके धीरे-धीरे राज्य की भी समाप्ति करेगी ।
(5) सर्वहारा वर्ग के राज्य में ऐसे सभी व्यक्तियों को काम करने के लिए बाध्य किया जाएगा जो काम कर सकते हैं । यह राज्य उत्तराधिकार के अधिकारों को भी समाप्त करेगा ।

मार्क्स के अनुसार समाजवादी समाज का स्वरूप (The Nature of Socialistic Society According to Marx)
(1) उत्पादन के सभी साधनों पर तथा अन्य सभी वस्तुओं पर राज्य का ही पूर्ण नियंत्रण होगा ।
(2) समस्त स्वस्थ नागरिक कोई न कोई कार्य करेंगे ।
(3) कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कोई ऐसा कार्य नहीं करेगा जिससे अन्य व्यक्तियों का अहित हो । जो भी लाभ होगा वह सभी व्यक्तियों में समान रूप से विभाजित किया जाएगा ।
(4) आदर्श समाज एक वर्गहीन समाज होगा जिसमें मालिक और श्रमिक का कोई भेदभाव नहीं होगा और न ही कोई किसी का शोषण ही कर सकेगा ।
(5) उत्पादन के सभी कार्य एक निर्धारित योजना के अनुसार किए जाएंगे और सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं की यथा संभव पूर्ति की जाएगी ।

राज्य और समाज के संबंध में मार्क्स के सिद्धांत की आलोचना (Criticism of the Views of Marx Regarding State and Society)
(1) मार्क्स ने राज्य की परिभाषा करते हुए बल प्रयोग पर अधिक जोर दिया है जबकि राज्य की परिभाषा में राजनैतिक अधिकारों और दायित्वों को मौलिक स्थान मिलना चाहिए ।
(2) मार्क्स के अनुसार राज्य की स्थापना का उद्देश्य बल प्रयोग द्वारा शासक वर्ग की स्थिति को बनाए रखना है और जनसाधारण के ऊपर अत्याचार करता है । मार्क्स की यह विचारधारा सत्य नहीं है ।
(3) मार्क्स अपने अधिनायकवाद के विचार में विरोध का बलपूर्वक दमन करता है किंतु उसका यह विचार लोकतंत्र की भावना के प्रतिकूल है, क्योंकि लोकतांत्रिक समाज में हितों के संघर्ष को समाप्त करने के लिए वैधानिक प्रक्रियाओं को ही मान्यता प्रदान की है यद्यपि यह सत्य है कि शासक वर्ग सदैव ही संकीर्ण स्वार्थों से मुक्त नहीं रहा है तथा अनेक अवसरों पर उसने वर्ग- विशेष के हितों की सिद्धि का प्रयास किया है, तथापि केवल इन्हीं उदाहरणों का आश्रय लेकर राज्य के संपूर्ण सिद्धांत का निर्माण कर देना एक ऐसी ही बात है जैसा कि चोरों, डाकूओं, हत्यारों आदि के पाप- कर्मों के आधार पर मनुष्य के स्वभाव के सिद्धांत की रचना करना ।
(4) मार्क्स की यह मान्यता कि साम्यवादी समाज में राज्य की आवश्यकता नहीं होगी, भ्रमपूर्ण है और साथ ही साथ यह भी निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता कि राज्य स्वयं ही विलुप्त हो जाएगा।
(5) मार्क्स का कहना है कि सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद भी अपने अधिकारों के संघर्ष का त्याग कर देगा किंतु उसका यह कथन भी व्यवहारिकता की दृष्टि से अमान्य है क्योंकि कोई भी व्यक्ति या समुदाय अथवा संगठन अपनी शक्ति का त्याग स्वेच्छा से नहीं करना चाहता।
(6) मार्क्स ने एक बार वर्गहीन समाज की कल्पना की है किंतु उसकी यह कल्पना कभी भी क्रियान्वित नहीं हो सकती क्योंकि समाज का कोई ऐसा युग नहीं रहा है।
(7) मार्क्स की यह धारणा, कि राज्य- परिवर्तन हिंसा द्वारा ही हो सकता है, पूंजीवादी राज्य के स्थान पर समाजवादी राज्य की स्थापना का मार्ग क्रांति ही है उपयुक्त नहीं है । वर्तमान समय में बिना हिंसा के शांतिपूर्ण उपायों से ही राज्यों में समाजवादी कानून बनाए जाते रहे हैं तथा अनेक राज्यों में समाजवाद पूर्ण अहिंसक रूप से ही तेजी से विकसित होता जा रहा है ।

 


		

Leave a Comment