मार्क्स वैज्ञानिक समाजवाद का जनक है । इस कथन की आलोचनाएं ।

“मार्क्स वैज्ञानिक समाजवाद का जनक है ।” इस कथन की आलोचनाएं ।

मार्क्स वैज्ञानिक समाजवाद का जनक है (Marx is tha Father of Scientific Socialism)

मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद का अर्थ है (Meaning of the Scientific Materialism of Marx) –  मार्क्स से पूर्व बहुत से ऐसे विद्वान हुए हैं जिन्होंने समाज में प्रचलित बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई है और अपने अथक प्रयास से उन बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया है तथापि उन विचारों का अपना कोई व्यवहारिक कार्यक्रम नहीं था अतएव वे अपने सिद्धांतों एवं विचारों को कोई क्रियात्मक रूप नहीं दे सकते थे । इसलिए उन विचारों को राजनीति के क्षेत्र में स्वप्नलोकीय विचार के नाम से पुकारा गया है । इसके विपरीत मार्क्स ने अपने समाजवादी विचारों को क्रमबद्ध रूप से लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया । उसने लोगों को बतलाया कि उसके विचारों को किस प्रकार के कार्यक्रम द्वारा कार्य रूप में परिणित किया जा सकता है । मार्क्स की श्रम निष्ठा तथा उसकी क्रमबद्ध काय प्रणाली के कारण ही मार्क्स के समाजवाद को वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है । वास्तव में मार्क्स से पूर्व किसी भी विचारक ने अपने विचारों को इस प्रकार की क्रमबद्ध पद्धति में किसी के सामने नहीं रखा । उसके कार्यक्रम का आधार वैज्ञानिक पद्धतियों के अनुसार था । इसलिए विद्वानों ने मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कहा है ।

कथन के पक्ष में तर्क (Arguments in support of the Statement)
जो विद्वान मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कहते हैं वे अपने पक्ष में अग्रलिखित तर्क उपस्थित करते हैं-
1. वैज्ञानिक कार्यक्रम का अनुसरण- मार्क्सवादी समाजवाद को प्रायः सर्वहारा समाजवाद तथा वैज्ञानिक समाजवाद के नाम से पुकारा जाता है । मार्क्स ने अपने समाजवाद को वैज्ञानिक इस कारण कहा है कि यह इतिहास के अध्ययन पर आधारित है । इसके पूर्व साइमन, फोरियर तथा ओवन का समाजवाद वैज्ञानिक न था क्योंकि वह इतिहास पर आधारित न होकर केवल कल्पना पर आधारित था । मार्क्स ने जिस पद्धति का अनुसरण किया वह वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है । उसकी पद्धति क्रमबद्ध है । उसने क्रांतिकारी कार्यक्रम को इस वैज्ञानिक ढंग से रखा है एक घटना दूसरी घटना से पूर्ण रुप से संबंध है । इस प्रकार मार्क्सवाद के सभी सिद्धांत एक दूसरे पर आधारित हैं ।

2. वैज्ञानिक सिद्धांतों की भांति खोज- मार्क्स ने अपने सिद्धांतों का विकास उसी प्रकार किया, जिस प्रकार एक वैज्ञानिक प्राकृतिक क्षेत्र में अपने सिद्धांतों का विकास तथा उनकी खोज करता है ।

3. सामाजिक विश्लेषण- मार्क्स से पूर्व अनेक समाज सुधारक हुए जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों तथा समस्याओं का अध्ययन किया किंतु मार्क्स सर्वप्रथम विचारक था जिसने सामाजिक कुरीतियों तथा समस्याओं के अध्ययन के साथ-साथ वैज्ञानिक की भांति उनका सामाजिक विश्लेषण भी किया ।

4. कार्य पद्धति का अनुसरण- एक वैज्ञानिक की सफलता उसकी कार्य पद्धति पर निर्भर होती है । केवल सिद्धांतों का ज्ञान प्राप्त करना मात्र ही वैज्ञानिक के लिए सब कुछ नहीं है । वैज्ञानिक की सफलता उस समय तक संभव नहीं जब तक कि वह अपने विचारों को कार्य रूप में परिणित करने का कोई कार्यक्रम न बना ले । मार्क्स ने अपने विचारों का एक क्रमबद्ध रीति से प्रतिपादन किया और साथ ही साथ एक कुशल वैज्ञानिक की भांति लोगों को उस कार्य पद्धति के विषय में भी बतलाया जिसका अनुसरण करके विचारों को कार्य रूप में परिणित किया जा सकता था ।

5. परिस्थितियों के ज्ञान की प्राप्ति- मार्क्स अपने विचारों से संसार में परिवर्तन लाने का पक्षपाती था किंतु उसने साथ ही साथ उन युक्तियों एवं परिस्थितियों का वर्णन किया है कि जिनके द्वारा वह परिवर्तन लाया जा सकता है, जिसका वह पक्षपाती था । मार्क्स उन परिस्थितियों से परिचित था जिनके द्वारा वह संसार में अपने विचारों के अनुकूल परिवर्तन ला सकता है । वेपर के शब्दों में, “मार्क्स की गणना विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक दार्शनिकों में होनी चाहिए । उसने विश्व को न केवल एक नवीन क्रांतिकारी विचारधारा प्रदान की और उस विचारधारा के द्वारा विश्व के इतिहास की दिशा तक परिवर्तित कर दी ।” एंजिल्स ने लिखा है, मार्क्स सबसे प्रथम क्रांतिकारी था । जीवन में उसका वास्तविक उद्देश्य किसी न किसी तरह पूंजीवादी समाज तथा उसकी राज संस्थाओं को समाप्त करना तथा सर्वहारा वर्ग को स्वतंत्र करना था और वह यह भी बताना चाहता था कि वह किन परिस्थितियों में अपनी मुक्ति प्रदान कर सकता है ।”

6. विचारों को सिद्धांत पर आधारित करना- मार्क्स ने अपने प्रत्येक विचार को किसी न किसी सिद्धांत पर आधारित किया था । एक सच्चे वैज्ञानिक की भांति मार्क्स सिद्धांतों का प्रेमी था । वह अपने सिद्धांतों के आधार पर ऐसे जटिल प्रश्नों के उत्तर दे सकता था जो उससे पहले ही संसार के बड़े से बड़े दिमागों पर छाए हुए थे ।

7. सत्यता पर आधारित- मार्क्स का दर्शन सत्यता पर आधारित है । वह पूर्ण एवं संतुलित है और शक्तिशाली भी है । इस दर्शन का अध्ययन करने से मनुष्य को संसार के संबंध में एक उत्तम दृष्टिकोण बनाने का अवसर मिल सकता है ।

8. मानव सेवा- मार्क्स के हृदय में दलितों, पीड़ितों और शोषितों की सहायता करने की तीव्र है रूपी प्रज्वलित अग्नि धधक रही थी और वह केवल बातों से नहीं वरन् कामों से उनके लिए कुछ करना चाहता था ।

 

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