फासीवाद से आप क्या समझते हैं? फासीवाद के प्रमुख सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए।

फासीवाद से आप क्या समझते हैं ? फासीवाद के प्रमुख सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए।
                              अथवा
फासीवाद के मूलभूत सिद्धांतों की विवेचना कीजिए।
                              अथवा
फासीवाद की प्रमुख विशेषताएं या तत्व क्या हैं ?
फासीवाद का जन्म (Origin of Fascism)
फासीवाद फासिस्टवाद का उदय द्वितीय महायुद्ध के उपरांत इटली में हुआ। इसका नेता मुसोलिनी था। वस्तुत: फासिस्टवाद परिस्थितियों का परिणाम था। इस सिद्धांत की कोई सुनिश्चित धारायें नहीं कही जा सकती हैं। परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसमें नवीन धाराओं का समावेश कर लिया जाता है।
फासीवाद का अर्थ (Meaning of Fascism)
फ़ासिज़्म (Fascism) शब्द की उत्पत्ति इटैलियन भाषा के ‘फैसियो’ (Fascio) शब्द से हुई है जिसका अर्थ है, ‘लकड़ियों का गठ्टा’। बंधी हुई लकड़ियां शक्ति, अनुशासन तथा एकता का प्रतीक होती हैं। तात्पर्य यह है कि फासिस्टवाद एकता, शक्ति तथा अनुशासन का प्रतीक है। द्वितीय महायुद्धकाल में मुसोलिनी के नेतृत्व में इटली ने ‘लड़कियों के समूह तथा कुल्हाड़ी’ का प्रतीक अपनाया जो प्राचीनकाल में रोम का प्रतीक था। कुल्हाड़ी राज्य सत्ता का प्रतीक थी तथा लकड़ियों का समूह एकता के महत्व को प्रदर्शित करता है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन मुसोलिनी ने साम्यवाद से देश की रक्षा करने के लिए किया था।
प्रो० बन्र्स के शब्दों में, “इटली का फासिस्टवाद एक ऐसा सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन है जिसका उद्देश्य राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था का पुनर्गठन है।”
प्रो० सेबाइन के अनुसार, “फासिस्टवाद विभिन्न स्त्रोतों के लिए गए उन विचारों का योग है जो परिस्थिति की आवश्यकताओं के अनुसार एकत्रित किए गए हैं।”
मुसोलिनी ने कहा , ” फासिस्टवाद वास्तविकता पर आधारित है। हम निश्चित और वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति करना चाहते हैं । हमारा कार्यक्रम कार्य करना है केवल बातें करना नहीं।”
फासिस्टवाद का नारा था – “एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता।”
फासीवाद के स्रोत (Sources of Fascism)
फासीवाद के कोई निश्चित स्रोत नहीं हैं । इस विचारधारा के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं-
(A) हीगल के आदर्शवाद का प्रभाव (Impact of the Idealism of Hegal) – हीगल के आदर्शवाद से फासिस्टवाद ने यह ग्रहण किया है कि राज्य ही सर्वोपरि हैं, राज्य में ही व्यक्ति की स्वतंत्रता है तथा राज्य के आदर्शों का पालन सहर्ष करना चाहिए, क्योंकि यही श्रेयस्कर है।
(B) नीत्शे का प्रभाव (Influence of Neetzsche)- नीत्शे ने तानाशाही की शिक्षा दी। अति मानव (Super Man) का पाठ भी इसी दार्शनिक ने पढ़ाया । अति मानव(Super Man) को शासन करने का स्वाभाविक अधिकार होता है तथा धर्म एवं नैतिकता आदि की भावनाओं में बंधन नहीं होता।
(C) रोम के दृष्टिकोण का प्रभाव (Influence of Roman Approach) – रोम के जीवन के प्रति दृष्टिकोण से अनुशासन, विश्वास तथा कार्य को महत्व देना आदि तत्वों का समावेश हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार स्वतंत्रता, संदेश तथा तर्क का कोई महत्व नहीं है। इनके द्वारा साम्यवादियों की नास्तिकता और उच्छृंखलता तथा लोकतंत्र की कुव्यवस्था तथा अराजकता को प्रोत्साहन दिया जाता है।
फासीवाद के मूलभूत सिद्धांत या तत्व (Fundamental Principles or Elements of Fascism)
प्रारंभ में सैद्धांतिक पक्ष की अपेक्षा व्यावहारिक पक्ष अधिक महत्वपूर्ण था। मूसोलिनी का विचार था कि विचारधारा अथवा मत की अपेक्षा अनुशासन का कार्य में कहीं अधिक महत्व है। वस्तुत: सिद्धांतों के प्रतिपादन के मुकाबले में व्यावहारिक पक्ष की प्रधानता इस विचार की विशेषता है। यह तर्क की अपेक्षा अनुभूति तथा विश्वास को महत्व देता है। फासिस्टवादी आंदोलन का लक्ष्य था एक नवीन मानव सभ्यता का निर्माण करना जो प्राचीन रोमन तथा यूनानी संस्कृति एवं आधुनिक सभ्यता का समन्वित रूप हो। फासीवाद परम्परागत भावनाओं पर आधारित राष्ट्रीय चरित्र को पवित्र एवं दैवी मानता है। इस प्रकार यह विचारधारा व्यवहारवादी-प्रतिक्रियावादी सिद्धांत तथा वास्तविकता पर आधारित है। इस विचारधारा के मूलभूत तत्वों का संक्षेप में विवरण संभव है-
(1) राष्ट्र सर्वोपरि है (State is the Supreme)- राष्ट्र दैवी व्यक्तित्व है। राज्य राष्ट्र का राजनीतिक रूप मात्र है। राज्य का अपना व्यक्तित्व है जो व्यक्तियों के व्यक्तित्व से पृथक तथा श्रेष्ठतम है। नागरिकों का कर्तव्य है कि उच्चतम संस्था राज्य के समक्ष वे पूर्ण रूप से आत्म समर्पण कर दें। राज्य के आदेशों का पालन नैतिक कर्तव्य समझ कर करें। राष्ट्रीय राज्य ही लक्ष्य है। अतः राष्ट्र ही सर्वोपरि है।
(2) राज्य के बाहर कुछ नहीं (Nothing is outside the State) – फासिस्टवादी विचारक राज्य की निरंकुश प्रभुसत्ता में विश्वास रखते हैं। राज्य नैतिक अथवा वैज्ञानिक दृष्टियों से व्यक्ति का पूर्ववर्ती है। व्यक्ति का सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास राज्य में रहकर ही होता है। राज्य से बाहर वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या राज्य के परे कुछ भी नहीं है। मुसोलिनी राज्य को एक आध्यात्मिक सत्ता के रूप में मान्यता देता है। उसकी दृष्टि में राज्य व्यक्तियों की रक्षा करने के निमित्त पहरेदार मात्र नहीं है। निर्देशकों की परिषद् की भांति राज्य कल्याणमय वातावरण निर्माण के लिए भी नहीं है। राज्य का ध्येय राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक संगठन की प्राप्ति है।
(3) व्यक्ति साधन मात्र (Individual only Means) – फासिस्टवाद व्यक्तिवाद, उदारवाद और समाजवाद के विपरीत सामूहिक कल्याण में विश्वास रखता है। इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति साधन मात्र है। समाज साध्य है। समस्त अधिकार समाज के हैं। व्यक्ति का कर्तव्य है कि अपने को सामाजिक हित में विलीन कर दे। सामाजिक हित में व्यक्ति का बलिदान नगण्य है।
(4) राज्य एक विशाल सामाजिक निगम (State, a Vast Social Corporation) – फासिस्टवादी विचारधारा के अनुसार राज्य एक विशाल निगम है। अन्य सभी निगम राज्य के अंतर्गत आते हैं। राज्य शेष सभी निगमों के पारस्परिक संबंधों को निर्धारित करता है। सभी निगम राज्य द्वारा नियंत्रित हैं तथा उसके आधीन हैं। राष्ट्रीय संसद का निर्माण निगमों के प्रतिनिधियों द्वारा होगा। वह व्यवस्था व्यक्ति के व्यक्तित्व में पूर्णत: सहायक होगी।
(5) राज्य का नियंत्रण (Control of the State) – सामाजिक व आर्थिक जीवन राज्य द्वारा नियंत्रित होना चाहिए। आर्थिक क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वामित्व होना चाहिए। सामाजिक एवं आर्थिक विकास में व्यक्तिगत संपत्ति आवश्यक तथा प्राकृतिक अधिकार है। उत्पादन व नियंत्रण पर पूर्ण रूप से राज्य का नियंत्रण होना चाहिए। श्रमिकों का हड़ताल करना तथा पूंजीपतियों की तालाबंदी सर्वथा अनुचित है।
(6) युद्ध की अनिवार्यता (Inevitability of War) – शांति कायरता तथा वाह्य आडम्बर का प्रतीक है। सामाजिक विकास के लिए युद्ध अनिवार्य है। राज्य का विस्तार युद्ध द्वारा ही संभव है। यदि राज्य का विस्तार नहीं होगा तो राज्य का स्वाभाविक विनाश हो जाएगा। अतः राज्य का विस्तार राज्य के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो गया है।
(7) राज्य शक्ति पर आधारित (State Bass of Farce) – राज्य का आधार शक्ति है, इच्छा नहीं। राज्य में विरोध तथा आलोचना से शासन कार्य में बाधा उत्पन्न हो जाती है। तर्क तथा विवाद द्वारा विरोध को नष्ट किया जा सकता है। अत: शक्ति के आधार पर ही राज्य अपनी एकता बनाए रखता है।
(8) लोकतंत्र, उदारवाद तथा समाजवाद का विरोध (Opposition of Democracy, Liberalism and Socialism) – फासिज्म उदारवाद तथा समाजवाद का विरोधी है। आर्थिक कल्याण की समाजवाद का लक्ष्य है। फासिस्टवादी विचारकों की दृष्टि में यह पशुता का प्रतीक है क्योंकि भौतिकवादी जीवन से सभ्यता तथा संस्कृति विनष्ट हो जाएगी। लोकतंत्र भी व्यर्थ ही है क्योंकि प्रशासन की क्षमता कुछ ही व्यक्तियों में पाई जाती है। इस प्रकार वह लोकतंत्र का विरोध और कुलीनतंत्र का समर्थन करता है।
(9) बुद्धि का विरोध (Opposition of Reason) – फासिस्टवाद बुद्धिवाद और विवेकशीलता का विरोध करता है, इसका कारण यह है कि इस आंदोलन का कोई सैद्धांतिक आधार न था । यह आंदोलन व्यवहारवादी और प्रयोगवादी ही था।
(10) केवल एक ही दल की तानाशाही (Dictatorship of One Party Only) – फासीवाद केवल एक ही दल की स्वेच्छाचारिता में विश्वास करता है। दल के नेता का ही अनुसरण करना उसका एकमात्र सिद्धांत है। फासीवादी विचारधारा का सिद्धांत है कि अधिनायकवादी दल के अतिरिक्त अन्य सभी दलों को कुचल दिया जाए। फासीवाद का नारा था – ‘एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता।’

 

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