गांधी जी के राजनीतिक दर्शन के मूल सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।

गांधी जी के राजनीतिक दर्शन के मूल सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।
                                    अथवा
महात्मा गांधी के राजनीतिक दर्शन की प्रासंगिकता की जांच कीजिए।
                                    अथवा
महात्मा गांधी के राजनीतिक विचारों का वर्णन कीजिए।
                                     अथवा
महात्मा गांधी के राजनीतिक दर्शन संबंधी विचारों की विवेचना कीजिए।
                                     अथवा
महात्मा गांधी के राजनीतिक चिंतन का मूल्यांकन कीजिए।
                                     अथवा
गांधीवाद पर एक निबंध लिखिए।
‌                                      अथवा
गांधीवाद के मूल तत्वों की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
गांधी जी का राजनीतिक दर्शन(Political Philosophy of Gandhiji)
गांधी जी के राजनीतिक दर्शन की पृष्ठभूमि (Background of the Political Philosophy of Gandhiji) – गांधी जी का वास्तव में कोई भी राजनीतिक दर्शन नहीं था। उन्होंने राजनीति के संबंध में कोई भी निश्चित सिद्धांत प्रतिपादित नहीं किया है, न कोई राजनीतिक दर्शन ही विशेष रूप से उनकी कृपा का पात्र रहा है। उन्होंने स्वयं कहा है, गांधीवाद जैसी कोई भी चीज मेरे दिमाग में नहीं है। मेरा यह कोई प्रयत्न भी नहीं है।” उन्होंने अन्यत्र कहा था, “मैंने किसी भी नए सत्य का आविष्कार नहीं किया है बल्कि सत्य को जैसा मैं जानता हूं उसी के अनुसार चलने का और लोगों को बताने का प्रयत्न करता हूं। हां कतिपय प्राचीन सत्य सिद्धांतों पर नया प्रकाश डालने का दावा मैं अवश्य ही करता हूं।” इन शब्दों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गांधीवाद कोई नया राजदर्शन नहीं था। उन्होंने राजनीति को नैतिकता की छत्र-छाया में पनपाने का स्वप्न संजोया था।
गांधी जी के राजदर्शन के आधारभूत तत्व(Fundamental Elements of Gandhiji’s Political Philosophy)
गांधी जी के राजदर्शन के मूलभूत तत्व उनके जीवन दर्शन के मूलभूत तत्वों पर आधारित थे जो निम्नलिखित थे-
1. ईश्वर में श्रद्धा (Faith in God) – गांधी जी ईश्वर में श्रद्धा और आस्था रखते थे। ईश्वर में श्रद्धा व आस्था रखे बिना हम अपने किसी भी कार्यक्रम में उन्नति नहीं कर सकते हैं। गांधी जी ने कहा है, “ईश्वर में आस्था रखे बिना कोई भी व्यक्ति सच्चा सत्याग्राही बनने का स्वप्न पूरा नहीं कर सकता है।”
2. व्यक्ति के उच्चतम गुणों में विश्वास (Faith in the Highest Qualities of the Man) – प्रत्येक व्यक्ति में कुछ ने कुछ देविक गुणों का समावेश पाया जाता है। व्यक्ति चाहे कैसा ही दुर्गुणी हो किन्तु उसमें कुछ न कुछ दैविक गुणों का समावेश सदैव ही पाया जाता है। उन दैविक गुणों की अभिव्यक्ति उचित अवसर आने पर कर सकता है। व्यक्ति के सद्गुणों का अंश प्रेम पूर्वक व्यवहार द्वारा प्रभावित हो सकता है। कोई व्यक्ति कितना ही दूषित स्वभाव का हो या समाज विरोधी कार्य करता हो, वह किसी भी प्रेम पूर्वक व्यवहार के प्रभाव में आकर अपने दुर्गुणों का त्याग कर सकता है और इस प्रकार उसमें पाया जाने वाला सद्गुणों का अंश परिलक्षित होने लगता है।
3. सत्य (Truth) – सत्य का अर्थ ‘सद्भाव’ है जिसका सदैव ही अस्तित्व बना रहता है और असत्य का अर्थ ‘न होना’ है जिसका कोई भी अस्तित्व नहीं है और जो अस्तित्वहीन है उसकी विजय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है अतएव गांधी जी सत्य की विजय पर ही सदैव जोर देते रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को मन, वचन तथा कर्म से सत्य का आचरण करना चाहिए।
4. अहिंसा (Non- Violence) – अहिंसा का अर्थ केवल न मारना ही नहीं। व्यापक अर्थ में अहिंसा का अर्थ किसी भी व्यक्ति को मन, वचन तथा कर्म से हानि न पहुंचाना है। गांधी जी की अहिंसा केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं थी वास्तविक अंहिसा का अर्थ समस्त जीवधारियों के प्रति प्रेम की भावना रखना है। इसी भावना के आधार पर गांधी जी ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों का निर्माण किया है।

 

गांधी जी के राजदर्शन के प्रमुख सिद्धांत(Main Principles of Gandhiji’s Political Philosophy)
उक्त विचारों के आधार पर गांधी जी ने अपने राजनीतिक दर्शन के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । ये निम्न प्रकार हैं-
1.राजनीति तथा धर्म का संबंध (Relations between Politics and Religion) – राजनीति धर्म से प्रभावित होती है। उनके शब्दों में, “धर्महीन राजनीति कोई वस्तु नहीं है। राजनीति धर्म की अनुचरी है। धर्महीन राजनीति एक फांसी के रूप में है जो आत्मा का विनाश कर देती है।” किंतु धर्म के सम्बन्ध में भी गांधी जी का दृष्टिकोण संकुचित नहीं था। राजनीतिक क्षेत्र में धार्मिक भावना का अर्थ शोषितों, पतितों एवं दुखियों का कष्ट निवारण करना है। राज्य को चाहिए कि वह शोषित वर्ग, श्रमिक वर्ग, निर्धन वर्ग तथा दलित वर्ग के दुखों का हनन करके उनका कल्याण करे।
2. साध्य एवं साधन की पवित्रता (Purity of Means and Ends) – व्यक्ति को उच्च आदर्शों की प्राप्ति करनी चाहिए किंतु साथ ही साध्य की उच्चता के अनुरूप ही साधन भी उच्च ही होने चाहिए। गांधी जी इस सिद्धांत में विश्वास बिल्कुल नहीं करते हैं कि हमें अपने साध्य को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक प्रकार के साधनों को अपनाने में संकोच नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार उच्च साध्य की प्राप्ति के लिए साधन भी उच्च रखने चाहिए। इस प्रकार गांधी जी साध्य एवं साधन की एकरूपता में विश्वास करते थे।
3. समाज सेवा (Social Service) – व्यक्ति समाज सेवा करके ही अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। व्यक्ति तथा समाज का संबंध अभिन्न है। व्यक्ति का जीवन एक सामाजिक जीवन है और समाज तथा व्यक्ति का संबंध एक पवित्र एवं अटूट संबंध है। व्यक्ति पर समाज का एक बड़ा ऋण है जिससे व्यक्ति समाज की सेवा करके उऋण हो सकता है। अतएव व्यक्ति को समाज की सेवा करना अनिवार्य है।
4. व्यावहारिकता पर बल (Emphasis on Practicability) – गांधी जी आदर्शवाद तथा यथार्थवाद दोनों में ही समान रुप से विश्वास करते हैं। हमारे आदर्श किसी भी काम के नहीं हैं यदि हम उनका क्रियात्मक रूप में प्रयोग नहीं कर सकते हैं।
5. दर्शन की सर्वव्यापकता (The Philosophy is all Comprehensive) – गांधी जी अपने राजदर्शन को संकीर्ण या राष्ट्रीय दृष्टि से नहीं देखते हैं। उनका कहना है कि, “मेरा राजदर्शन किसी एक विशेष राष्ट्र या समुदाय के लिए नहीं है अपितु वह संपूर्ण संसार के लिए है। इस प्रकार गांधी जी के राजदर्शन से संबंधित सिद्धांत में सर्वव्यापकता पायी जाती है।”
6. स्वतंत्रता पर गांधी जी के विचार (Gandhiji on Liberty) – गांधी जी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष बल देते थे। व्यक्ति को उसके विकास का पूरा-पूरा अवसर मिलना चाहिए। व्यक्ति को राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक तीनों प्रकार की ही स्वतंत्रताएं मिलनी चाहिए।
7. लोकतंत्र पर गांधीजी के विचार (Gandhiji on Democracy) – गांधीजी लोकतंत्र शासन प्रणाली के पक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत करते थे, जिसका वर्णन निम्नलिखित है-
(क) लोकतंत्र की शासन व्यवस्था के लिए राजकीय सत्ता का विकेंद्रीयकरण होना आवश्यक है।
(ख) लोकतंत्र हिंसात्मक साधनों द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है क्योंकि लोकतंत्र की भावना का संबंध हृदय से है, वह बलपूर्वक नहीं लादी जा सकती। उन्होंने लिखा है, “लोकतंत्र बलवती उपायों द्वारा विकसित नहीं हो सकता। लोकतंत्र की भावना बाहर से नहीं लादी जा सकती है वह तो भीतर से आती है।”
(ग) वही लोकतंत्र उत्तम है जिसमें प्रत्येक नागरिक को शासन की आलोचना करने की स्वतंत्रता हो।
(घ) संसदात्मक प्रणाली में प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद् व्यर्थ है । इसका कारण यह है कि मंत्रिमंडल के सदस्यों में सच्ची ईमानदारी का अभाव पाया जाता है क्योंकि उनको तो केवल अपनी कुर्सी बनाए रखने का ही ध्यान रखना पड़ता है ।
(ड) गांधीजी ने अपने लोकतंत्र में निर्वाचनों तथा प्रतिनिधित्व का समर्थन किया है। उन्होंने लिखा है, “स्वराज्य से मेरा अर्थ उन वयस्क स्त्री-पुरूषों की अधिकतम संख्या की निश्चित अनुमति द्वारा भारत का शासन करने से है जो या तो भारत में उत्पन्न हुए हों या बस गए हों, जिन्होंने शरीर श्रम द्वारा राज्य की सेवा की हो और उन्होंने मतदाताओं की सूची में अपना नाम लिखाने का कष्ट किया।”
(च) चुनावों के प्रति गांधी जी का विचार अच्छा न था। उनका विचार था कि चुनावों के द्वारा एक शोषणकारी वर्ग जन्म लेता है जिसके द्वारा व्यक्ति का नैतिक पतन कर दिया जाता है। उन्होंने ‘हिंदू स्वराज्य’ में लिखा था, “सदस्यगण अपने राजनीतिक दल को बिना विचारे ही मत प्रदान करते हैं।” उनका तथा कथित अनुशासन उनको ऐसा करने को बाध्य करता है। यदि अपवाद के रूप में कोई व्यक्ति अपना स्वतंत्र मत प्रदान कर दे तो तब उसको स्वधर्म त्यागी समझा जाता है।
(छ) ग्रामों के संगठन को वहां के निवासियों के अनुकूल ही होना चाहिए। उनका कहना था कि, “गांवों का संगठन वहां के निवासियों की इच्छानुकूल हो और प्रत्येक ग्रामीण स्त्री-पुरुष को वयस्क मताधिकार भी प्राप्त हो।” ग्रामों द्वारा जिले के प्रबंधक वर्ग का निर्वाचन, जिले के प्रबंधक वर्ग द्वारा प्रांत के प्रबंधकों का निर्वाचन और प्रांत के प्रबंधकों द्वारा राष्ट्रपति का निर्वाचन होना चाहिए।
(ज) निर्वाचन में खड़े होने वाले व्यक्तियों की अर्हताएं विशेष रूप से कठोर होनी चाहिए। सार्वजनिक पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को वेतन ग्रहण नहीं करना चाहिए।
(झ) शरीर श्रम को मताधिकार का आधार मानना आवश्यक है क्योंकि शरीर श्रम पर आधारित मताधिकार राजनीति में शरीर श्रम के आदर्श की प्रतिष्ठा करता है।
(ट) विरोधी के दृष्टिकोण का सदैव सम्मान करना चाहिए, चाहे हम उसके अनुसार आचरण ना कर सकें। ऐसा करना ही स्वस्थ सार्वजनिक जीवन की कसौटी है।

 

8. गांधीजी के अपराध और जेल संबंधी विचार (Gandhiji’s Views on Crime and Jail) – गांधीजी के अनुसार, “अपराध अन्य किसी व्याधि की भांति ही रोग है और वह वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है।” अतएव अपराधी को दंड देना मात्र ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उसका सुधार भी होना आवश्यक है । कारागार को ‘सुधार गृह’ में परिवर्तित कर देना चाहिए जिससे कि उसमें अपराधी को छोटे-छोटे उद्योग-धंधों में प्रशिक्षित कर दिया जाए और वह जेल से छूट जाने के बाद सामान्य लोगों की भांति आजीविका कमा कर अपना जीवन यापन कर सकें।
9. पुलिस तथा सेना के संबंध में विचार (Views on Police and Army) – गांधीजी ने जिस भावी समाज की कल्पना की है उसमें पुलिस का रूप अग्र प्रकार से होगा-
(क) पुलिस के सदस्य अहिंसा वादी होंगे।
(ख) पुलिस के सदस्य जनता के सेवक होंगे।
(ग) पुलिस के पास हथियार होंगे किंतु उनका प्रयोग बहुत कम किया जाएगा।
(घ) पुलिस कर्मचारी सुधारक के रूप में कार्य करेंगे और उनका पुलिस सम्बन्धी कार्य लुटेरों तथा डाकुओं का दमन करने तक ही सीमित रहेगा।
(ड) आत्म-रक्षा के लिए प्रत्येक देश को अपनी सेना तैयार रखनी चाहिए किंतु जहां तक हो सके ऐसे अहिंसात्मक नीति से ही शत्रु का सामना करना चाहिए।
10. न्याय तथा न्यायालयों से संबंधित विचार (Views on Justice and Courts) –
(क) न्याय का कार्य संबंधीत पक्षों द्वारा निर्वाचित पंचायतों द्वारा करना चाहिए।
(ख) वकील केवल झगड़ा बढ़ाने वाले होते हैं । उनके शब्दों में, “वकीलों का स्वार्थ झगड़े बढ़ाने में ही है।”
(ग) अदालतें अनुपयोगी हैं । अदालतें सत्ताधारी लोगों ने अपनी सत्ता की स्थापना करने के लिए स्थापित की हैं।
(घ) गांधीजी के आदर्श समाज में अपराधों की संख्या घटेगी और अदालतों में न्याय भी सस्ते होंगे और झगड़ों का फैसला भी शीघ्र ही हो जाएगा।
11. गांधीजी के राज्य संबंधी विचार ( Gandhiji’s Views on State) – गांधीजी ने राज्य के सम्बन्ध में निम्नलिखित विचार व्यक्त किए हैं-(क) राज्य अनैतिक संस्था है । राज्य की दबाव डालने की प्रवृत्ति है और इसी कारण राज्य नैतिकता की दृष्टि से घातक है।
(ख) राज्यविहीन लोकतंत्र एक आदर्श समाज व्यवस्था है।
(ग) एक ऐसे राज्य को आदर्श राज्य माना जा सकता है जिसमें जनता अपना शासन स्वयं ही कर सके और पड़ौसियों के लिए भी किसी भी प्रकार का विध्न उपस्थित न करे।
(घ) ग्रामीणों तथा नागरिक समुदायों में स्वसंगठित एवं स्वशासित संस्थाएं होनी चाहिए।
(ड) राज्य जनता के कल्याणकारी साधनों में से एक साधन है।
(च) व्यक्ति को राज्य के केवल उचित एवं न्याय पूर्ण आदेशों का ही पालन करना चाहिए।
(छ) राज्य के अधिकतर कार्य ऐच्छिक संस्थाओं द्वारा संपन्न किये जाने चाहिए।
12. विश्व शांति (World Peace) – गांधीजी विश्व शांति के समर्थक थे। उन्होंने सत्य अहिंसा का मार्ग अपनाकर विश्व शांति का पाठ पढ़ाया था। उनका कहना था कि सत्य और अहिंसा के तरीकों को अपनाकर अंतर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करना चाहिए। युद्धों से विश्व शांति स्थापित नहीं होगी। केवल सत्य और अहिंसा के बल पर विरोधियों के हृदय पर विजय प्राप्त करके ही विश्व शांति के स्वप्न को पूरा किया जा सकता है।
गांधीजी के सत्याग्रह पर वर्णन करते हुए स्टेनले जोन्स ने बताया, गांधीजी सैनिकों के कवच को विदीर्ण कर रहे थे और हृदय तथा अंत:करण पर आघात कर रहे थे तथा एक महान राष्ट्र उलट कर प्रहार कर रहा था। परन्तु उसकी अंतरात्मा पर जो चोट पड़ रही थी, उससे वह कराह रहा था।”