हित व दवाव समूह से आप क्या समझते हैं? इनकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये।

हित व दवाव समूह से आप क्या समझते हैं? इनकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये।
What do you understand by Interest and Pressure groups. Discuss their main characteristics.

उत्तर- दबाव की राजनीति(Politics of Pressure) आधुनिक प्रजातान्त्रिक पद्धति में सामान्य हित की पूर्ति के अतिरिक्त राज्य को कुछ कार्य विशिष्ट हितों के लिये भी करने पड़ते हैं। विशिष्ट हित अपने पक्ष में कार्य कराने के लिये राज्य और प्रशासन पर दबाव डालते हैं। इसे दबाव की राजनीति कहा जाता है। दबाव प्रायः विशिष्ट संगठनों के माध्यम से डाला जाता है। जो अराजनीतिक समुदाय होते हैं, उन्हें, दबाव समूह कहा जाता है।

हित व दबाव-समूह (Interest and Pressure Groups)

वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया में हित व दबाव-समूहों का एक विशिष्ट स्थान है। किसी समय इस प्रकार के समूहो (लाबीज) को धोखा, भ्रष्टाचार और बुराई का प्रतीक मानते हुए लोकतन्त्र की जड़ों को कमजोर करने वाला माना जाता था और बड़ी घृणा और हेय दृष्टि से देखा जाता था परन्तु वर्तमान स्थिति इसके विपरीत हो गयी है, क्योंकि आधुनिक लोकतन्त्र में इनका महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया है, कि इन्हें ‘एक आवश्यक बुराई’ मानते हुए लोकतन्त्र का सहयोगी माना जाने लगा है। इसका कारण यह है कि राजनीतिक दल समस्त वर्गीय हितों का प्रतिनिधित्व न कर पाने के कारण जनता और शासन के मध्य की कड़ी नहीं रहे हैं, अतः वर्गीय हितों का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से दलीय प्रणाली के साथ ही साथ हित-समूह व दबाव-समूह 1 विकसित हुए हैं। ये समूह एक गैर-सरकारी एवं अराजनीतिक संगठन होते हुए भी इतने सक्रिय हैं कि शासकीय निर्णय की प्रक्रिया इनसे पूर्णतः प्रभावित होती है, अतः वर्तमान में राजनीति केवल राज्य और शासन का ही विज्ञान नहीं रह गया है, वरन् हित व दबाव-समूहों को भी इसके अध्ययन के क्षेत्र में सम्मिलित किया जाने लगा है। वर्तमान राजनीति में हित व दबाव-समूहों तथा संगठित समूहों के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए डॉ० जे० सी० जौहरी ने लिखा है, “आधुनिक राजनीतिक प्रक्रिया में हित व दबाव और संगठित समूहों तथा इनकी तकनीकों के अध्ययन का विशिष्ट महत्त्व है। इनके अध्ययन में उन अन्र्तनिहित शक्तियों व प्रक्रियाओं पर, जिसके माध्यम से संगठित समाजों में विशेषकर लोकतान्त्रिक समाजों में राजनीतिक शक्ति का संचालन और प्रयोग होता है, प्रकाश पड़ता है।”

प्रायः हित-समूह और दबाव-समूह को एक समान मानते हुए एक ही नाम ‘दबाव समूह’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है, क्योंकि जब समान हित वाले लोग अपने हितों की रक्षा के उद्देश्य से संगठित हो जाते हैं, तो इस प्रकार का संगठन ‘हित-समूह’ होता है और जब ये हित-समूह अपनी उद्देश्य पूर्ति हेतु राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय होकर शासन को प्रभावित करने लगते हैं, तो ‘दबाव समूह’ बन जाते हैं। इस सम्बन्ध में जी० एन० मसालदान ने लिखा है कि “जब हित-समूह अपने हितों के लिये सक्रिय रूप से शासन पर दबाव डालते हैं तब उनका स्वरूप दबाव समूह का हो जाता है।” परन्तु अधिकांश विद्वान इन दोनों के सूक्ष्म से अन्तर को कोई महत्त्व नहीं देते हुए, दोनों को एक ही मानते हैं और ‘हित-समूह’ या ‘दबाव-समूह’ दोनों ही नामों से पुकारते हैं।

हित व दबाव समूह का अर्थ और परिभाषा (Meaning and Definition of Interest and Pressure Groups)

व्यक्तियों के ऐसे समूह को दबाव समूह कहा जाता है, जो किसी कार्यक्रम के आधार पर निर्वाचकों को प्रभावित नहीं करते, परन्तु जिनका सम्बन्ध विशिष्ट मामलों से होता है। ये राजनीतिक संगठन नहीं होते और न ही चुनावों में अपने प्रत्याशी खड़े करते हैं, परन्तु इनका उद्देश्य अपने सदस्यों के विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं व्यावसायिक हितों की रक्षा करना होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ये समूह शासन पर नियन्त्रण करने हेतु कोई प्रयत्न किये बिना ही प्रशासकीय और संसदीय, दोनों ही प्रकार के पदाधिकारियों कोई इस प्रकार से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं कि वे उनके हितों के अनुकूल ही कार्य करने के लिए बाध्य हो जाएँ। इस प्रकार दबाव समूह अपने हितों के अनुकूल कानून-निर्माण करने और अपने हितों

के विरोधी विधेयकों को वापस कराने या पारित न होने देने तक के प्रयास करते हैं, परन्तु ये तब ही सक्रिय होते हैं, जब इसके हितों को खतरा होता है, अन्यथा ये निष्क्रिय बने रहते हैं। इसीलिए इन्हें ‘अज्ञात साम्राज्य’ कहा जाता है। विभिन्न विचारकों ने ‘दबाव समूह’ को निम्नलिखित रूपों में परिभाषित किया है-

हर्मर जेंग्लर — ” दबाव समूह ऐसे व्यक्तियों का संगठित समूह है, जो अपने सदस्यों को औपचारिक रूप से सरकारी पदों पर आसीन कराये बिना सरकारी निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करता है।”

माइरन वीनर — ” दबाव समूह का अभिप्राय स्वेच्छा से संगठित एक ऐसे समूह से होता है, जो शासकीय ढाँचे से बाहर रहकर शासकीय अधिकारियों के निर्वाचन, मनोनयन तथा सार्वजनिक नीति के निर्माण एवं क्रियान्वयन को (अपने हित में) प्रभावित करने का प्रयास करता है।”
पीटर औडिगार्ड- “दबाव समूह ऐसे लोगों का औपचारिक संगठन है, जिनमें एक अथवा अधिक सामान्य उद्देश्य अथवा स्वार्थ होते हैं और जो घटनाओं के क्रम को, विशेष रूप से सार्वजनिक नीति के निर्माण और शासन को इसलिए प्रभावित करने का प्रयास करते हैं कि वे अपने हितों की रक्षा एवं वृद्धि कर सकें।”
प्रो० एम० जी० गुप्ता-“दबाव समूह वास्तव में एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा सामान्य हित वाले व्यक्ति सार्वजनिक मामलों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। इस अर्थ में ऐसा कोई भी सामाजिक समूह, जो प्रशासकीय और विधायी, दोनों ही प्रकार से निर्णय-कत्र्ताओं को सरकार पर नियन्त्रण करने हेतु कोई प्रयास किये बिना ही, प्रभावित करना चाहता है, तो वह दबाव समूह कहलायेगा ।”

हित. व दबाव समूह की प्रमुख विशेषताएं (Main Characteristics of Interest and Pressure Groups)
उपर्युक्त पारिभाषिकः विश्लेषण के आधार पर हित व दबाव समूह की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) गैर-सरकारी संगठन (Non-Government Organisation) – दबाव-समूह गैर-सरकारी और पूर्णतः निजी संगठन (Private Organization) होते हैं, जो कुछ स्वार्थी और भ्रष्टाचारी उद्योगपतियों, व्यापारियों, अधिकारियों, श्रमिकों और समाज के प्रभावशाली लोगों द्वारा मनमाने ढंग से संगठित कर लिए जाते हैं। इनका कोई संवैधानिक आधार नहीं होता।

(2) संगठन का स्वरूप अनिश्चित (Indefinite Form of Organization)- दबाव-समूह का कोई संवैधानिक आधार न होने के कारण इनका संगठनात्मक स्वरूप भी निश्चित नहीं होता। इसीलिये ये संगठित या असंगठित और औपचारिक भी हो सकते हैं। इनके स्वरूप के बारे में टुमेन ने कहा है, “यह आवश्यक नहीं है कि सब समूहों के संगठन का स्वरूप औपचारिक ही हो।”

(3) अराजनीतिक संगठन (Non-Political Organization) – दबाव-समूह न तो राजनीतिक संगठन होते हैं, और न ही शासन-सत्ता पर अधिकार करने का ही उनका लक्ष्य होता है। शासकीय एवं राजनीतिक ढांचे से बाहर रहकर ही अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु, अपनी गतिविधियों द्वारा राजनीतिक ढाँचे और शासकीय नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े नहीं करते, परन्तु अन्य प्रत्याशियों को जिताने में उनकी सहायता करते हैं तथा अपनी हित-साधना करने वाली प्रत्येक राजनीतिक गतिविधि से सम्बद्ध रहते हैं।
(4) सुनिश्चित एवं सीमित उद्देश्य (Fixed & Limited Object)– दबाव समूहों के अपने हितों में वृद्धि करने से सम्बन्धित कुछ निश्चित उद्देश्य होते हैं। इनके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खतरा उत्पन्न होने पर ही ये राजनीति में सक्रिय होते हैं, अन्यथा निष्क्रिय हो जाते हैं।

(5) ऐच्छिक एवं सीमित सदस्यता (Desirable & Limited Membership) – दबाव समूहों की सदस्यता अनिवार्य नहीं होती। केवल वे लोग ही इनके सदस्य बनते हैं, जिन्हें इनके द्वारा अपने विशेष हितों की पूर्ति की आशा होती है। इस प्रकार इनका उद्देश्य
राष्ट्रीय हित न होकर वर्गीय हित होता है, जिसके कारण इनकी सदस्यता सीमित होती है।

(6) कार्यकाल-अनिश्चित (Term Indefinite)- दवाव-समूह का कार्यकाल निश्चित नहीं होता, क्योंकि ये समूह अपने विशेष उद्देश्यों की पूर्ति या हितों की रक्षा के लिए संगठित होते हैं और लक्ष्य की पूर्ति के पश्चात् इनके स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं।

(7) सर्वव्यापकता (Universality)- दबाव-समूहों को आधुनिक लोकतन्त्र का तो पक्ष-पोषक एवं सहयोगी माना ही जाता है अतः लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था में तो इनका होना अनावश्यक है परन्तु राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप कैसा भी क्यों न हो, ये प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में पाये जाते हैं। यहाँ तक कि निरंकुश और साम्यवादी राजनीतिक व्यवस्था में भी इनका अस्तित्व पाया जाता है, परन्तु इस प्रकार की व्यवस्थाओं में इनकी गतिविधियाँ गुप्त और सीमित रहती हैं।

(8) उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग (Use of Right and Wrong Means)- दबाव-समूहों का उद्देश्य अपने निजी हितों की पूर्ति करना होता है, जिसके लिए वे उचित-अनुचित, वैधानिक अवैधानिक, नैतिक-अनैतिक तथा शान्तिपूर्ण-अशान्तिपूर्ण आदि सभी प्रकार के साधनों का गुप्त रूपसे या सार्वजनिक रूप में प्रयोग करते हैं। इन साधनों के द्वारा दबाव-समूह सरकार को भ्रष्ट करने का भी प्रयास करते हैं।

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