विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रताओं का वर्णन कीजिए। तथा स्वतंत्रताओं की क्या मर्यादाएं हैं ? ये मर्यादाएं क्यों आवश्यक हैं।

विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रताओं का वर्णन कीजिए। तथा स्वतंत्रताओं की क्या मर्यादाएं हैं ? ये मर्यादाएं क्यों आवश्यक हैं।

प्रस्तावना(Introduction)
राजनीतिशास्त्र के विचारकों ने स्वतंत्रता के अनेक रूपों का प्रतिपादन किया है। मोंटेस्क्यू (Montesquieu) का कथन है कि स्वतंत्रता शब्द के अतिरिक्त और कोई दूसरा शब्द नहीं है, जिसके इतने विभिन्न अर्थ होते हैं और जिसने मनुष्य के मस्तिष्क पर इतनी अधिक छाप छोड़ी है।

स्वतंत्रता के भेद(Kinds of Liberty)
वस्तुत: स्वतंत्रता के सभी अभिप्रायों को समझकर स्वतंत्रता शब्द का वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । इन कारण स्वतंत्रता के विभिन्न भेदों का ज्ञान अपरिहार्य है । साधारणतया, स्वतंत्रता शब्द का प्रयोग राजनीतिक विचारकों द्वारा अग्रलिखित छ: अर्थों में किया जाता है-
1. प्राकृतिक स्वतंत्रता,
2. नागरिक स्वतंत्रता,
3. राजनीतिक स्वतंत्रता,
4. आर्थिक स्वतंत्रता,
5. नैतिक स्वतंत्रता तथा
6. राष्ट्रीय स्वतंत्रता ।


इनका वर्णन निम्न प्रकार है-
1. प्राकृतिक स्वतंत्रता (Natural Liberty)- प्राकृतिक स्वतंत्रता का अर्थ साधारणतया मनुष्य के द्वारा स्वेच्छाचारितापूर्वक कार्य करने की असीमित स्वतंत्रता से लिया जाता है । जनसाधारण के अनुसार प्राकृतिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति की जिस कार्य को जिस रूप में करने की इच्छा हो उसको उसी प्रकार पूरा करने की शक्ति । यह तर्क दिया जाता है कि राज्य की स्थापना से पहले व्यक्ति जिस स्वतंत्रता का उपभोग कर रहा था, वह प्राकृतिक स्वतंत्रता थी । समझौतावादी सिद्धांत (Social Contract Theory) के समर्थकों का मत है कि मानव समाज के विकास में एक ऐसी अवस्था थी जबकि राज्य जैसी कोई संस्था नहीं थी । उस अवस्था को वे प्राकृतिक अवस्था (State of Nature) कहते हैं । इस अवस्था में स्थित कानून को वे प्राकृतिक कानून (Law of Nature) के नाम से संबोधित करते हैं । उस प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति के कुछ अधिकार थे, जिनका वह असीमित प्रयोग करता था । उन प्राकृतिक अधिकार और शक्तियों को प्राकृतिक स्वाधीनता के नाम से पुकारा जाता है । यह तर्क दिया जाता है कि, “व्यक्ति जन्म से स्वतंत्र है, परंतु समाज ने उस पर बंधन लगा दिया हैं ।” अमेरिका के स्वाधीनता घोषणा पत्र ( Declaration of American Independence) में कहा गया है कि व्यक्ति जन्म से समान और स्वतंत्र है । इस प्रकार स्वतंत्रता प्रकृति की देन है, समाज की नहीं । समाज तो व्यक्ति की उन प्राकृतिक स्वतंत्रताओं पर बंधन लगाता है ।
आलोचना (Criticism)- डॉ० आशीर्वादम (Dr. Ashirvatham) ने कहा है कि “प्राकृतिक स्वतंत्रता की धारणा जंगली जीवन की स्वतंत्रता का ही दूसरा नाम है । डॉ० विबासी के अनुसार, “यद्यपि इस प्रकार की प्राकृतिक स्वतंत्रता का समर्थन विभिन्न लेखों में प्रकट है, तथापि इस प्रकार की स्वतंत्रता कभी अस्तित्व में रही होगी, यह संदेहास्पद है ।” उन्होंने अपने कथन को निम्न आधारों पर प्रस्तुत किया है-

(i) असंभव (Impossible)- उपरोक्त प्राकृतिक प्रकार की स्वतंत्रता समाज में संभव ही नहीं है।
(ii) पाश्विक शक्ति (Brutal Force)– वास्तव में सामाजिक समझौतावादी विचारक जिसको प्राकृतिक स्वतंत्रता के नाम से संबोधित करते हैं,वह प्राकृतिक स्वतंत्रता के स्थान पर प्राकृतिक शक्तियां हैं जिनका आधार पार्श्विक शक्ति (Brutal Force) है । व्यक्ति प्राकृतिक स्वतंत्रताओं के साथ जन्म नहीं लेता, परंतु वे उसकी प्राकृतिक शक्तियां होती हैं ।
(iii) अराजकता (Anarchy)- निरंकुश स्वाधीनता का प्रयोग समाज में संभव नहीं है । निरंकुश स्वतंत्रता केवल अराजकता है । प्राकृतिक स्वतंत्रता तो केवल उन्हीं को प्राप्त हो सकती है जो शक्तिशाली है, नि
निर्बल व्यक्तियों के लिए तो यह दास्ता का दूसरा रूप है ।
(iv) समाज द्वारा नियंत्रित (Controlled By Society)- राजनीतिक विचार से स्वतंत्रता केवल समाज में ही प्राप्त हो सकती है जो उसके द्वारा नियंत्रित एवं व्यवस्थित होती है ।

महत्व (Importance) – प्राकृतिक स्वतंत्रता सिद्धांत (Principle of Natural Liberty) भ्रमात्मक होते हुए भी महत्वपूर्ण है ।यह इस ओर संकेत करता हैं कि व्यक्ति की कुछ स्वाभाविक शक्तियां हैं एवं व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास उन शक्तियों के विकास पर निर्भर है । समाज का यह कर्तव्य है कि उनको उचित विकास का पूर्ण अवसर प्रदान करे ।

2. नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberty)- नागरिक स्वतंत्रता का तात्पर्य व्यक्ति की उन स्वतंत्रताओं से जिन्हें व्यक्ति समाज अथवा राज्य में रहते हुए उसके सदस्य होने के नाते प्राप्त कर सकता है । नागरिक स्वतंत्रता हमें समाज में प्राप्त होती है ।
गेटेल (Gettell) के अनुसार “नागरिक स्वतंत्रता उन अधिकारों और विशेषाधिकारों को कहते हैं जिनको राज्य अपने नागरिकों के लिए उत्पन्न करता है ।”
नागरिक स्वतंत्रता उन समस्त अधिकारों एवं अवसरों का योग है जो राज्य का कानून व्यक्तियों को प्रदान करता है तथा जो राज्य की संपूर्ण शक्ति के द्वारा सुरक्षित भी रखे जाते हैं । नागरिक स्वतंत्रता निरंकुश (Absolute) अथवा अपरिमित (Unlimited) नहीं हो सकती । नागरिक स्वतंत्रता का उद्देश्य सभी व्यक्तियों को समान अवसर और अधिकारों को प्रदान करना है । नागरिक स्वतंत्रता का स्रोत राज्य है । राज्य कानून की सहायता से इन स्वतंत्रताओं को उत्पन्न करता है तथा सुरक्षित रखता है ।

महत्व (Importance)- इन स्वतंत्रताओं का महत्व व्यक्ति के लिए अत्यधिक है । ये स्वतंत्रताए व्यक्ति को वे अवसर (Opportunity) प्रदान करती हैं तथा उन बाधाओं को दूर करती हैं जो व्यक्ति के पूर्ण व्यक्तित्व के विकास की आवश्यक शर्तें हैं ।
बार्कर (Barker) का कथन है कि “मानव चेतना स्वतंत्रता को उत्पन्न करती है, स्वतंत्रता अधिकारों को सम्मिलित करती है और अधिकार राज्य की मांग करते हैं ।
प्रकार (Kinds)- नागरिक स्वतंत्रता स्वीकारात्मक (Positive) तथा नकारात्मक (Negative) दोनों ही प्रकार की हो सकती है । गैटिल (Gettell) का कहना है, ‘इसमें कार्य करने की स्वतंत्रता तथा हस्तक्षेप से उन्मुक्ति दोनों ही सम्मिलित होते हैं ।’ नागरिक स्वतंत्रता जिसको राज्य जन्म देता है तथा रक्षा करता है, उसे निम्नलिखित दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैं-
1. सरकार के विरूद्ध व्यक्ति की स्वतंत्रता ।
2. व्यक्ति की व्यक्ति से व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा व्यक्तियों के समुदाय से स्वतंत्रता । शासन से व्यक्ति की स्वतंत्रता राज्य के द्वारा सुरक्षित होती है । शासन राज्य की इच्छाओं को व्यवहारिक रूप देने का साधन-मात्र (means) है ‌। राज्य शासन के अधिकार और शक्तियों का उल्लेख करता है तथा उनके ऊपर सीमा भी लगाते है ।

नियम (Rules)- वे नियम जो शासन के संगठन को निश्चित करते हैं, निम्न बातों को प्रकट करते हैं-
(i) शासन के क्या अधिकार हैं ।
(ii) शासन किन कार्यों को कर सकता है ।
(iii) कौन-कौन से ऐसे क्षेत्र हैं जहां शासन व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता ।
(iv) व्यक्ति को शासन के विरुद्ध क्या अधिकार और सुरक्षायें प्राप्त हैं ।
उपरोक्त नियम राज्य के आधारभूत कानून (Fundamental Laws) कहलाते हैं ।

स्वतंत्रता की रक्षा (Protection of Liberty)- विभिन्न देशों में नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा अग्र प्रकार होती है-
(i) लिखित संविधान (Written Constitution)- जिस देश का संविधान लिखित होता है वहां व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा संविधान की लिखित शर्तों के द्वारा होती है । उदाहरणार्थ अमेरिका और भारत के संविधान में व्यक्तियों के मूल अधिकारों का वर्णन करके उनको सुरक्षा देने का प्रयत्न किया गया है ।
(ii) अलिखित संविधान (Unwritten Constitution)- जहां संविधान लिखित नहीं होता है वहां व्यक्ति की स्वतंत्रताओं की रक्षा रिती-रिवाज, परंपरा और अभिसमयों द्वारा होती हैं, जैसा कि ग्रेट ब्रिटेन में है ।
शासन के विरुद्ध व्यक्ति के अधिकारों को विशेषकर एक प्रजातंत्रीय राज्य में अत्यधिक महत्व है । यदि व्यक्ति के अधिकारों को कानून से सुरक्षित न रखा जाए तो व्यक्ति के अन्य वैयक्तिक अधिकारों का कोई महत्व नहीं रह जाता । लास्की (Laski) का मत है कि, स्वतंत्रता उस समय तक वास्तविक नहीं हो सकती जब तक कि सरकार को उत्तरदाई न ठहराया जाए और जब वह अधिकारों का अतिक्रमण करती है उस समय अवश्य ही इससे जवाब-तलब करना चाहिए ।”
(iii) व्यक्तिगत स्वतंत्रता(Personal Liberty)- वे अधिकार जो राज्य व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों अथवा व्यक्तियों के समुदाय के विरुद्ध देता है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता कहलाते हैं । समाज में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें व्यक्ति अन्य व्यक्तियों का हस्तक्षेप पसंद नहीं करता । उन क्षेत्रों में किए गए कार्यों का प्रभाव भी व्यक्तिगत होता है । राज्य व्यक्ति को ऐसे क्षेत्रों में अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता का अधिकार देता है । निम्नलिखित महत्वपूर्ण अधिकारों को राज्य निश्चित और लागू करता है ।
(i) शारीरिक स्वतंत्रता (Freedom of the Person)
(ii) विधि के समक्ष समानता (Equality of before the Law)
(iii) निजी संपत्ति की सुरक्षा (Security of Private Property)
(iv) विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Opinion and Expression)
(v) विवेक की स्वतंत्रता (Freedom of Conscience)
डॉ० आशीर्वादम (Dr. Ashirvatham) का कथन है कि “नागरिक स्वतंत्रता शारीरिक और मानसिक दबाव के विरुद्ध संरक्षण है, चाहे वह दबाव किसी व्यक्ति की ओर से हो या राज्य की ओर से । वैयक्तिक स्वतंत्रता भी इसमें सम्मिलित है ।”


3. राजनीतिक स्वतंत्रता(Political Liberty)- राजनीतिक स्वतंत्रता के संबंध में अप्पादोराई का कथन है कि “इसका सार यह है कि सरकार के निर्णयों से बाध्य प्रत्येक व्यक्ति को उन निर्णयों के निर्माण तथा पुनर्निर्माण में भाग लेने का अधिकार है ।’ लास्की (Laski) के अनुसार राजनीतिक स्वतंत्रता ‘राज्य के कार्य में सक्रिय भाग लेने की शक्ति है ।’ लीकाक (Leacock) के अनुसार, “राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ संवैधानिक स्वतंत्रता (Constitutional Liberty) है, जिसका अर्थ है कि वे अपने शासन को अपनी इच्छानुसार चुन सकें जो कि उनके प्रति उत्तरदाई होगा ।”
इस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता एक प्रकार से प्रजातंत्र (Democracy) की पर्यायवाची है । यह व्यक्ति को एक साथ शासक और शासित दोनों ही बना देती है । राजनीतिक स्वतंत्रता सर्वोच्च राजसत्ता (Sovereignty) तथा स्वतंत्रता (Liberty) के मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास करती है ।
राजनीतिक अधिकार (Political Rights) – राजनीतिक स्वतंत्रता व्यक्ति को मुख्य रूप से निम्नलिखित राजनीतिक अधिकार प्रदान करती है-

(i) स्वयं निर्वाचित होने का अधिकार,
(ii) अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करने का अधिकार,
(iii) राज्य के नियमों के अनुसार उचित योग्यता होने पर सरकारी नौकरी पाने का अधिकार,
(iv) सरकार की आलोचना करने का अधिकार, (v) जनता को यह अधिकार कि वह उन विषयों का उचित ज्ञान प्राप्त कर सके जो सार्वजनिक महत्व के हैं ।
स्वरूप(Nature)- उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि राजनीतिक स्वतंत्रता केवल प्रजातांत्रिक राज्य में ही संभव हो सकती है तथापि राजनीतिक स्वतंत्रता का महत्व एक साधन के रूप में ही है । राजनीतिक स्वतंत्रता का उद्देश्य नागरिक स्वतंत्रता को सुरक्षा देना है । डाॅ० विबासि का मत है कि आरंभ में जब व्यक्ति ने स्वतंत्रता की मांग की तो उसने नागरिक स्वतंत्रता की मांग की, परंतु उसे यह स्पष्ट हो गया कि बिना शासन के ऊपर अधिकार स्थापित किए नागरिक स्वतंत्रता संभव नहीं हो सकती । इस प्रकार उसे राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग करने की आवश्यकता प्रतीत हुई । गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के शब्दों में, “राजनीतिक स्वतंत्रता को ‘स्वयं में साध्य के रूप में’ समझकर प्राप्ति नहीं करना चाहिए ।इसकी प्राप्ति करने में एक उच्च नैतिक उद्देश्य, जो कि मानवता का विकास है, की प्राप्ति होना चाहिए और इसकी प्राप्ति नागरिकों को प्रतिभाशाली बनाने में सहायक होनी चाहिए ।” राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति एक बड़े कार्य का केवल प्रारंभ होने के समान है जो कि व्यक्ति के नागरिक अधिकारों को सुरक्षा देकर उसको यह अवसर प्रदान करती है कि वह अपनी निजी शक्तियों का पूर्ण विकास कर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके ।
शर्तें (Conditions)- लास्की (Laski) के अनुसार स्वतंत्रता की सार्थकता हेतु निम्नलिखित दो शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है-
(i) व्यापक शिक्षा (Universal Education)- शिक्षा के प्रदान करने में जाति, धर्म, रूप-रंग आदि का कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए । सब व्यक्तियों को राज्य में उचित शिक्षा का पूर्ण अवसर प्राप्त होना चाहिए ।
(ii) ईमानदार और स्वतंत्र प्रेस (Honest and Independent Press)- प्रेस इस प्रकार का हो जो ज्ञान और सूचना का साधारण जनता में प्रसार करता हो । जनता सार्वजनिक समस्याओं के प्रति अपनी धारणा प्रेस के द्वारा तथ्यों के आधार पर ही बनाती है । यदि समाचार पत्रों के तथ्य निष्पक्ष हैं तो जनता का दृष्टिकोण भी अधिक स्वतंत्र एवं विचारशील होगा । इसके विपरीत यदि समाचार-पत्र पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण अपना कर समाचारों तथा अन्य तथ्यों को एक विकृत रूप में प्रस्तुत करेंगे तो उससे जनता का मस्तिष्क भी विकृत तथा पक्षपातपूर्ण बन जायेगा ।


4. आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Liberty)- डाॅ० विबासी का मत है कि “राजनीतिक स्वतंत्रता के अभाव में नागरिक स्वतंत्रता अपना महत्व को देती है । उसी प्रकार आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता लुप्त हो जाती है ।” जिस प्रकार नागरिक स्वतंत्रता के उपभोग के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है, उसी प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता के उपभोग हेतु आर्थिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है ।
कुछ विचारकों के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता व्यर्थ है । साम्यवादी इसी तर्क के आधार पर पूंजीपति राष्ट्रों को प्रजातंत्रीय स्वीकार नहीं करते । इस सम्बन्ध में कोल (Cole) का मत है कि, “राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना से पूर्व आर्थिक स्वतंत्रता स्थापित होनी चाहिए, जिसके अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता एक दिखावा मात्र है ।”

आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ (Meaning of Economic Liberty)- आर्थिक स्वतंत्रता से तात्पर्य निम्न प्रकार है-
(i) आर्थिक सुरक्षा (Economic security)- आर्थिक स्वतंत्रता से तात्पर्य आर्थिक सुरक्षा से होता है । लास्की के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि, “किसी व्यक्ति को अपनी रोजी कमाने के लिए उचित अवसर एवं सुरक्षा का होना ।”
(ii) अभाव और भय से स्वतंत्रता (Freedom from Want and Fear)- एक ऐसे व्यक्ति से जिसके समक्ष निरन्तर रोजगार रोटी और रोजगार की समस्या रहती है, यह आशा करना कि वह स्वतंत्र अवसरों या अधिकारों का उपयोग कर सकता है, निराधार है । आर्थिक स्वतंत्रता व्यक्ति को आर्थिक सामग्री के अभाव से मुक्त देना चाहिए ।
(iii) उधोग में प्रजातंत्र की स्थापना करना (Establishing Democracy in Industry)- इसका अर्थ यह है कि एक श्रमिक अपने श्रम को बेचने वाला तथा आज्ञाओं को प्राप्त करने वाला ही न होकर वस्तुओं का निर्णायक भी है । उसका अपना निजी व्यक्तित्व है और उसे अपने जीवन की अवस्थाओं को निश्चित करने का पूर्ण अधिकार है ।
महत्त्व (Significance) – पूंजीवादी शोषण के युग में प्रजातांत्रिक देशों में यद्यपि नागरिकों को नागरिक और राजनीतिक अधिकार (स्वतंत्रता) प्राप्त हैं, तथापि उनका जीवन स्तर ऊपर नहीं उठ पाया । इसी कारण श्रमिकों ने यह मांग प्रस्तुत की कि औद्योगिक जीवन का संगठन इस प्रकार का होना चाहिए जिसमें पूंजीपति उनका शोषण न कर सकें और उन्हें उनके ‘श्रम का उचित पारिश्रमिक मिल सके ।’ आर्थिक स्वतंत्रता ऐसी स्वतंत्रता है जिससे गला घोटने वाली प्रतियोगिता और असम्बध्द उद्योगों का अंत हो जाता है तथा उत्पादन और व्यापार के ऐसे कृतिम विधानों की समाप्ति हो जाती है, जिससे मजदूरों का नैतिक पतन होता है । इस स्वतंत्रता में ऐसी सुखकर औद्योगिक पध्दति का विकास होगा जिसमें प्रत्येक व्यक्ति वही उत्पन्न करेगा जिसके लिए वह सर्वाधिक योग्य है और समाज को जो कुछ वह उत्पन्न करेगा उसकी आवश्यकता होगी ।
विभिन्न प्रकार के आर्थिक अधिकार (Economic Rights of Various Kinds)- आर्थिक स्वतंत्रता का यह भी अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को कार्य करने का, उचित वेतन पाने का, आराम करने का अधिकार है जो राज्य द्वारा उनको प्रदान किया जाना चाहिए । इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जब तक व्यक्ति को ये आर्थिक अवसर उपलब्ध नहीं होते वह अपने जीवन के महत्व को नहीं समझ सकता और न ही वह समाज और राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकता है । ट्राॅनी (Tawney) के शब्दों में, “आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ ऐसी आर्थिक विषमता का अभाव है, जिसका उपयोग आर्थिक दबाव के रूप में किया जा सके । लास्की (Laski) के अनुसार, “आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है उद्योगों के क्षेत्र में प्रजातंत्र की प्रतिष्ठा ।”

5. नैतिक स्वतंत्रता (Moral Freedom)- नैतिक स्वतंत्रता में इस बात पर बल दिया जाता है कि वह व्यक्ति जो नैतिक दृष्टि से स्वतंत्र नहीं है, अन्य स्वतंत्रताओं का उचित प्रकार से भोग नहीं कर सकता । नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ व्यक्ति की उस मानसिक स्थिति से होता है, जिसमें वह अनुचित लोभ, लालच के बिना अपना सामाजिक जीवन व्यतीत करने की योग्यता रखता है । डॉ० आशीर्वादम (Dr. Ashirvatham) ने नैतिक स्वतंत्रता के रूप की व्याख्या की है । उनके शब्दों में “यदि मैं विश्वव्यापी अहं (Universal I) को हर व्यक्ति में देखता हूं, यदि मैं स्वयं स्वार्थहीन हूं और यदि प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का सम्मान मेरे हृदय में है तो मेरी नैतिक स्वतंत्रता अवश्य ही पूर्ण है ।” वह व्यक्ति नैतिक स्वतंत्रता की दृष्टि से दास है जो अपने विवेक के विरुद्ध कार्य करने पर विवश होता है । नैतिक स्वतंत्रता पर अन्य विचारकों व दार्शनिकों के विचार निम्न प्रकार हैं-
(i) काण्ट (Kant) के अनुसार, “व्यक्ति की विवेकपूर्ण इच्छा शक्ति ही उसकी वास्तविक स्वतंत्रता है ।”
(ii) ग्रीन (Green), बोसाकें (Bosanquet) आदि ने व्यक्ति की नैतिक स्वतंत्रता पर बल दिया है । उनके अनुसार इसी नैतिक स्वतंत्रता के विकास में व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास निहित है ।
(iii) हीगल (Hegel) ने राज्य को नैतिकता का श्रेष्ठतम रूप माना है । उसके अनुसार व्यक्ति नैतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति अपने व्यक्तित्व को राज्य के व्यक्तित्व में समाकर ही प्राप्त कर सकता है ।
(iv) ग्रीन (Green) ने राज्य को एक नैतिक संस्था माना है । उसके विचार में राज्य उन अवस्थाओं को उत्पन्न कर सकता है, जिनमें रहकर व्यक्ति अपना नैतिक विकास कर सके । प्रजातंत्रीय शासन में जनता सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रताए प्राप्त करने पर भी उस समय तक अपना उत्थान नहीं कर सकती जब तक की उसका नैतिक स्तर ऊंचा न हो ।


6. राष्ट्रीय स्वतंत्रता (National Liberty)- वास्तविकता यह है कि जब तक राष्ट्रीय स्वतंत्रता नहीं है उस समय तक उस राष्ट्र की जनता के नागरिक, सामाजिक अथवा आर्थिक अधिकारों का कोई अस्तित्व नहीं है । अन्य समस्त प्रकार की स्वतंत्रताओं की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता अपरिहार्य है । राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ है कि एक राजनीतिक संगठन में स्थित जनता दूसरे राज्यों के हस्तक्षेप से के बिना अपने शासन का रूप निर्धारित करने में स्वतंत्र हो । भाषा, धर्म, संस्कृति, नस्ल, ऐतिहासिक परंपरा आदि की एकता पर आधारित राष्ट्र का यह अधिकार है कि वह स्वतंत्र राज्य का निर्माण करे तथा अन्य किसी राज्य के अधीन न हो । राष्ट्रीय स्वतंत्रता राज्य प्रभुता पर बल देती है । राज्य सार्वभौमिकता पूर्ण हो । राज्य को बाह्य प्रभुत्व (External Sovereignty) प्राप्त हो, जिसका अर्थ है उसे बाह्य नियंत्रण से स्वतंत्रता प्राप्त हो तथापि राष्ट्रीय स्वतंत्रता भी असीमित अथवा उच्छृंखल नहीं हो सकती है । वह अन्य राष्ट्रों की सम्मान राष्ट्रीय स्वतंत्रता से सीमित है ।


7. धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Liberty)- धार्मिक स्वतंत्रता के द्वारा मानव किसी भी धर्म का अनुययी बन सकता है और किसी भी प्रकार की उपासना कर सकता है । उसके इस कार्य में कोई बाधा नहीं पड़नी चाहिए । मध्य युग में मानव को इस प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी । धर्म के नाम पर मानव में बड़े-बड़े अत्याचारों को सहन किया । आधुनिक युग में सभी प्रमुख देशों ने मानव को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की है । केवल वे ही राष्ट्र मानव को धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित रखते हैं, जिनके राज्य का मूल आधार धार्मिक है ।
भारत के संविधान ने भारत राज्य को धर्म निरपेक्ष राज्य (Secular State) घोषित किया है । भारत राज्य की दृष्टि में समस्त धर्म समान हैं और राज्य के समस्त कर्मचारियों को भी उसने इस दिशा में पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है ।


8. सांस्कृतिक स्वतंत्रता (Cultural Liberty)- सांस्कृतिक स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि मानव को अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के विकास की स्वतंत्रता प्राप्त हो ‌। जिन देशों के मानव को शिक्षा प्राप्त करने, भाषा व साहित्य को पढ़ने और सीखने तथा उसके विकास की पूर्ण सुविधा प्राप्त होती है, उन देशों के मानव को सांस्कृतिक स्वतंत्रता प्राप्त है । जिन देशों की अधिकांश जनता अशिक्षित हो, वहां इस प्रकार की सुविधा प्राप्त नहीं होती है । यह स्वतंत्रता अल्पसंख्यक वर्ग (Minority) के लिए विशेष महत्वपूर्ण है । राज्य को अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की रक्षा का ध्यान रख कर उनको यह स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए ।

 

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