विकासशील देशों में पर्यावरण और विकास-संबंधी समस्याओं के कारणों का वर्णन कीजिए।

विकासशील देशों में पर्यावरण और विकास-संबंधी समस्याओं के कारणों का वर्णन कीजिए।

विकासशील देशों में पर्यावरण एवं विकास-संबंधी समस्याएं(Environmental and Developmental Problems in Developing Countries)
विकासशील देशों में पर्यावरण एवं विकास-संबंधी समस्याएं दिन-पर-दिन गहराती जा रही हैं । बहुत-से विशेषज्ञों की धारणा है कि पर्यावरण -संरक्षण और विकास प्रक्रिया एक- दूसरे के समानुपाती नहीं हैं । उनका मानना है कि इन दोनों के बीच संघर्ष होंगे और यदि पर्यावरण के प्रति मोह पैदा किया गया तो आर्थिक विकास धीमा पड़ जाएगा । विशेषज्ञों के दूसरे दल ने इस बहस को पूर्णतः भ्रामक ठहरा दिया है । दुनिया के अधिकतम लोगों ने भी यह मान लिया कि पर्यावरण की सुरक्षा के बिना विवेकपूर्ण, संतुलित तथा उचित आर्थिक विकास असंभव होगा । अब वैकल्पिक प्रक्रिया की ऐसी मांग जोर पकड़ती जा रही है, जिसमें कहा जा रहा है कि पर्यावरण के प्रति सामंजस्य स्थापित किया जाए । यह एक विश्वव्यापी समस्या है जिसके रहते पर्यावरण की सुरक्षा मात्र एक सपना दिखाई पड़ता है । तीसरे दुनिया के अत्यंत पिछड़े देशों में पर्यावरण का पतन बड़ी तीव्र गति से होता जा रहा है, जबकि अमीर देशों ने दूर-दृष्टि के बाणों का निशाना गरीब देशों पर साधते हुए उनके प्राकृतिक भंडारों पर हमला बोल दिया है तथा अपने भंडारों को भविष्य के लिए सुरक्षित कर लिया है । पर्यावरण धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है ।
विकासशील देशों में पर्यावरण एवं विकास संबंधी समस्याओं के प्रमुख तथ्य निम्न प्रकार हैं-
1. विकासशील देशों में पर्यावरण शनै:- शनै: प्रदूषित होता जा रहा है । प्रति मिनट 14 हेक्टेयर उष्ण कटिबंधीय वनों को उजाड़ दिया जाता है जो कि विश्व के पूरे जंगल के क्षेत्र का प्रतिवर्ष लगभग 1% बैठता है । हर वर्ष सिंचाई के अधीन इतनी ही जमीन खारेपन और पानी भरे रहने के कारण बर्बाद हो जाती है ।
2. अधिकतर विकासशील देशों में हवा, पानी और भूमि का प्रदूषण दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है । विकसित देशों ने तथा उन विकासशील देशों ने, जिनके पास वृत्तीय साधन उपलब्ध हैं, ऐसे कार्यक्रम चलाए हैं तथा ऐसे मापदंड अपने-अपने संविधानों में लागू किए हैं कि प्रदूषण की क्रिया अत्यंत धीमी पड़ गई है ।
3. बिगड़ते पर्यावरण के कारण बहुत से रोगों में बढ़ोत्तरी हो रही है । उत्तरी-अफ्रीका के देशों में सिस्टोसोमियासिस रोग तेजी से फैल रहा है । जापान में जानलेवा मस्तिष्क शोध की बीमारी फैल रही है । जापानी मस्तिष्क शोध एक दिमागी बुखार है जो कि इस बीमारी से ग्रस्त हर दूसरे व्यक्ति को मार देता है । अब इस भयानक बीमारी की भारत की ओर बढ़ने की जानकारी मिली है । उल्लेखनीय है कि उधोगों द्वारा उत्पन्न हुए प्रदूषण से रोग को फैलाने वाले मच्छर अधिक पनपे । मच्छरों के प्रजनन के लिए सबसे उत्तम माध्यम प्रदूषित जल होता है ।
4. पीने के पानी की प्रतिकूल व्यवस्था तथा विभिन्न प्रकारु के निर्माण कार्यों में जल-विकास की पर्याप्त सुविधा न होने के कारण बहुत से देशों में फाइलेरिया रोग की बाढ़ आ गई है । भारत में मलेरिया के रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है ।
5. एक रिपोर्ट के अनुसार पीने के साफ पानी की कमी और सफाई की कमी के फलस्वरुप विकासशील देशों में प्रतिदिन कम से कम 16,000 बच्चे दस्त की बीमारी से मर जाते हैं । यदि सफाई की व्यवस्था हो और पीने का पानी प्रदूषण से मुक्त रखा जाए तो इन 16,000 बच्चों की लज्जाजनक मौतों को रोका जा सकता है ।
6. ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि विकासशील देशों में सिगरेट की खपत बढ़ने के साथ-साथ शताब्दी होने से पहले ही सिगरेट से उत्पन्न कैंसर महामारी के रूप में फैल जाएगा । इस समय विकासशील देश विकसित देशों की अपेक्षा स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति कुछ ही डालर व्यय कर रहे हैं । सिगरेटों द्वारा महामारी फैलने की दशा में विकसशील देशों के पास आवश्यक चिकित्सा संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए जनशक्ति और वृत्तीय साधन नहीं रहेंगे ।
7. अमीर देशों की अमीरी ने गरीबों के लिए संकटों की जो लंबी श्रृंखला पैदा की है, उसमें एक संकट और सम्मिलित है- हरित क्रांति की प्रौद्योगिकी का संकट । औद्योगिकरण पर अपना शिकंजा मजबूत करने के बाद एक नई प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण कर हमारी खेती-बाड़ी को भी उन्होंने अपने हाथ में ले लिया है । अब खेती में गरीबों के लिए अधिक रोटी पैदा करने का मोह देकर जीवनाशक दवाइयों का इतना अंधाधुंध प्रयोग आरंभ कर दिया गया है इन देशों के खेतों में प्रदूषण की अभूतपूर्व समस्या खड़ी हो गई । ये सब रसायन कैंसरोत्पादक होते हैं तथा इनके उपयोग के साथ ही विकासशील देशों में कैंसर एक महत्वपूर्ण बीमारी बन गई है । विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा लगाए गए एक अनुमान के अनुसार दुनिया के आठ करोड़ कैंसर रोगियों में से 5 करोड रोगी विकासशील देशों के हैं ।
8. शताब्दियों से विश्व की नदियां पीने के पानी का स्रोत रही हैं और तटीय मछेरों की भारी जनसंख्या को जीवित रखने के काम आती रही हैैं किन्तु वर्तमान विकास की प्राणघाती पद्धति से ये नदियां रसायनों और सूक्ष्म जीवियों के प्रदूषण से त्रस्त हो गई हैं, जिस कारण विकासशील देशों के बहुत से भागों में मत्स्य क्षेत्र पूरी तरह से समाप्त हो चुके हैं तथा उन क्षेत्रों में बेकार पड़े मछेरे, जो इन नदियों के बिना साफ किए हुए पानी को पीने के काम में लाते हैं, ऊंची मृत्यु-दर से ग्रसित हो गए हैं
कुछ पश्चिमी विशेषज्ञों और राजनीतिज्ञों ने यह तर्क दिया है कि गरीबों की यदि मूलभूत जरूरतों को किसी तरह पूरा कर दिया जाए तो पर्यावरण की समस्याओं को रोका जा सकता है । इन लोगों का ऐसा मानना है कि विश्व-व्यापी समस्याओं का कारण लगभग सभी मामलों में अमीरों द्वारा जरूरत से ज्यादा की जाने वाली खपत है, न कि गरीबों द्वारा की जाने वाली जरूरत से बहुत कम खपत । यदि विकास की ऐसी परिभाषा स्वीकार करें जिसमें जरूरत से अधिक भौतिक सामग्री इकट्ठा न की जाए तथा पर्यावरण को स्वस्थ और संतुलित रूप में रखा जाए तो विकासशील देशों की अपेक्षा विकसित कहे जाने वाले देश अधिक तेजी से अविकसित होंगे, क्योंकि उनकी मांगें उनके पर्यावरण के साधनों से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं तथा अब वे एक सी आर्थिक प्रक्रिया को फैला रहे हैं जो तीसरी दुनिया के विकास को भी रोक रही है । तीसरे दुनिया का वर्तमान संकट तो पूरे विश्व के संकट का लक्षण मात्र है । नई संस्कृति (जिसका उदय दूसरे महायुद्ध के बाद हुआ) काली छाया पूरे विश्व पर मंडरा रही है । इस विश्व-व्यापी संकट को तभी नियंत्रित किया जा सकता है जब वर्तमान संस्कृति को नष्ट कर दिया जाए और उसका स्थान एक नया विश्व आर्थिक पर्यावरण ले ले, जिसमें समानता का सिद्धांत निहित हो और जो विविध पारिस्थितिकी तंत्रों को और उन पर निर्भर रहने वाले समाजों को बिना किसी बाहरी अतिक्रमण के पनपने दें, तभी संतुलित आर्थिक विकास संभव हो सकेगा ।

 

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