विकासशील देशों के विकास में स्त्रियों की भूमिका।

विकासशील देशों के विकास में स्त्रियों की भूमिका 
                              अथवा
कृषि एवं औद्योगिक विकास में महिलाओं के योगदान का विवेचना कीजिए।

विकास में स्त्रियों की भूमिका(Role of Women in Development)
समाज का चाहे कोई भी क्षेत्र हो स्त्रियों के योगदान की भूमिका सर्वत्र रही है। इतिहास साक्षी है कि समाज के उदविकास के साथ हर एक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में स्त्रियों ने समान योगदान दिया है। आज तृतीय विश्व में वे अपने देश के विकास और समस्याओं के लिए समान रूप से सहभागी ही नहीं वरन् प्रयत्नशील भी हैं। आज स्त्रियां सामाजिक पुनर्रचना, विकास एवम् नव संस्कृति के निर्माण में अहम भूमिका निर्वाह कर रही हैं। घरेलू काम, बच्चों के जन्म और लालन-पालन के गुरुतर दायित्व के साथ वे सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन करने में पीछे नहीं है। स्त्री शिक्षा के फलस्वरूप उनका विवेक, क्षमता और क्षमताएं विकसित हुई हैं। समानता का अधिकार तथा कानूनी संरक्षण ने उनकी गरिमा और सामाजिक प्रतिष्ठा को नए आयाम दिए हैं। स्त्रियों की दशा सुधारने और शिक्षा के प्रभाव के कारण आम स्त्रियों का पदार्पण जीवन के सभी क्षेत्रों में हो गया है। वे आज अध्यापक, प्रशासक, नर्स, डॉक्टर, कुशल श्रमिक, मैकेनिक, इंजीनियर, विधायक, सांसद, मंत्री, विदुषी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता आदि हैं। आज विकास की प्रत्येक प्रक्रिया में उनका योगदान है।

विकासशील देशों या तीसरे विश्व के देशों में कृषि एवं औद्योगिक विकास में स्त्रियों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण रही है जिसकी विवेचना संक्षेप में करना आवश्यक होगा-

कृषि क्षेत्र में योगदान- तीसरे विश्व के अफ्रीकी और एशियाई देशों की ग्रामीण कृषि पद्धतियों में कृषि उत्पादन में स्त्रियों की महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका है । अफ्रीका के देशों में स्त्रियां लगभग वे सभी कृषि कार्य करती हैं जो कृषि क्षेत्र में करने पड़ते हैं । ईस्टर बोसरुप के अनुसार अफ्रीकी स्त्रियां कृषि का कार्य 70% से 80% भाग स्वयं करती है । जहां अफ्रीकी स्त्रियां जीविका कृषि में योगदान देती हैं वहीं थोड़ी बहुत कम भूमिका नकद दाम की खेती के उत्पादन में करती हैं । एशिया के देशों में स्थिति बिल्कुल विपरीत है । वहां स्त्रियां प्रमुख रूप से नकद दाम की फसलों (जैसे- गन्ना, कपास, चाय, तंबाकू की खेती आदि) का उत्पादन अधिक करती हैं और थोड़ा बहुत घरेलू फसलों के उत्पादन में अपना योगदान देती है । उदाहरण के लिए श्रीलंका और कम्यूचिया में स्त्रियां कपास, गन्ना, तंबाकू, चाय आदि के खेतों में लगने वाली संपूर्ण श्रम-शक्ति का 50% भाग होती हैं । मलेशिया और भारत में इनका योगदान 40%और पाकिस्तान तथा फिलीपाइन्स में 35% है । दोनों महाद्वीपों के देशों में इसका अंतर का मुख्य कारण दोनों महाद्वीपों में कृषि के विभिन्न तरीके हैं । अफ्रीकी देशों में खेती के बदलाव के कारण जीविका की आवश्यकता की पूर्ति के लिए थोड़ी कम-श्रम लागत प्रति इकाई भूमि से काम चला लिया जाता है, जो स्त्रियों को जीविका के लिए कृषि कार्य संपन्न कर लेने हेतु समर्थ बना देती है । जबकि पुरुष नकद दाम की फसलों के खेतों में काम करने धन कमाने में जुटे हैं । एशिया के घने जनसंख्या वाले क्षेत्रों में अफ्रीकी देशों की तुलना में अधिक श्रम लागत की आवश्यकता प्रति इकाई छोटे भू-खंडों पर काम श्रम लागत लगाना जीविका आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपर्याप्त होता है । परिणाम यह होता है कि पूरा परिवार अक्सर नकद दाम वाली कपास, गन्ना, चाय, तंबाकू आदि के खेती वाले क्षेत्र की ओर चला जाता है ताकि सभी योग्य शरीर वाले परिवार के सदस्य इनमें कार्य करके अपने जीवन-निर्वाह हेतु आय अर्जित कर सकें । एशिया और अफ्रीका के देशों में प्रायः ग्रामीण क्षेत्र में स्त्रियां घर के बाहर और भीतर पुरुषों की अपेक्षा अधिक लंबे समय तक कार्य करती हैं ।
विकासशील देशों में कृषि क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्त्रियों को अपने कार्यों को संपन्न करने में भारी बोझ उठाने का मुख्य कारण वह कार्य अक्षमता है, जो कि पूंजी और तकनीकी के उपलब्ध होने की वजह से उत्पन्न हो रही है । दुर्भाग्य है कि स्त्रियों की इस अक्षमता को दूर करने तथा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए अभी तक कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए । अधिकांशतः सभी कार्यक्रम कृषि क्षेत्र के पुरुष कामगारों और कृषकों की कार्यक्षमता की वृद्धि की ओर लक्ष्य कर चलाए गए हैं । जहां तक देखा जाए विकास में स्त्रियों का योगदान पुरुषों की अपेक्षा कम नहीं है फिर भी पुरुषों को उनके कार्य के लिए महत्व दिया जाता है, उनका मूल्यांकन किया जाता है और उन्हें आधुनिक उत्पादन के तौर-तरीके तथा तकनीकों को सिखाया जाता है जबकि स्त्रियों को परंपरागत कृषि पर ही निर्भर रहने दिया जाता है । इस प्रकार श्रम उत्पादकता के इस अंतर के परिणामस्वरूप एक बहुत बड़ी श्रम-शक्ति की अवहेलना करके विकास कार्य की प्रगति में उनके योगदान को नजर-अंदाज किया जा रहा है जो निश्चित रूप से विकास के प्रतिकूल है ।
औद्योगिक क्षेत्र में योगदान- एशियायी और अफ्रीकी देशों में सस्ते श्रम के कारण स्त्रियों को उपनिवेशवासियों ने औधोगिक क्षेत्र में अनुकूल श्रमिकों के रूप में कार्य करने हेतु लगाया । ग्रामीण क्षेत्र में उन्हें चाय और कहवा के बागानों में लगाया गया तो औधोगिक क्षेत्र में कल कारखानों, खदान में सामान लाने ले जाने, बोझा ढोने, कच्ची सामग्री की सफाई, बिनाई आदि कार्यों को करने में लगाया गया । एशियायी देशों में उधोग धन्धों का विकास अफ्रीकी देशों की तुलना में बहुत पहले हुआ इसलिए यहां स्त्रियों का औद्योगिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक योगदान रहा है । एशियाई देशों में उधोग धन्धों की गति के फलस्वरूप स्त्रियों को अनेक आधुनिक लधु एवं घरेलू उद्योगों में लगाया गया । सिलाई, कढ़ाई, छपाई, खिलौने बनाने, बुनाई तथा उपभोक्ता सामान तैयार करने तथा बीड़ी-माचिस, कागज आदि उधोग में स्त्रियों को श्रमिकों के रूप में लगाया गया । शिक्षा के प्रचार के कारण स्त्रियां कुशल श्रमिक तथा औद्योगिक संस्थानों में लिपिकीय वर्ग में भी कार्य करने लगी हैं ।
वैसे स्त्रियों को शिक्षा के अवसर बहुत कम मिलते हैं, इसलिए उन्हें रोजगार के भी बहुत कम अवसर मिलते हैं और यही कारण है कि उन्हें जो भी रोजगार या जीविका का साधन मिलता है वे उसे विवश होकर अपना लेती हैं । इसलिए पुरुषों की अपेक्षा उन्हें निम्न मजदूरी मिलती है । विचारणीय बात यह है कि कृषि क्षेत्र में उनके पास भूमि-पूंजी और तकनीकी का अभाव रहता है और यह कमियां उनकी उत्पादन कार्य दक्षता और कुशलता को घर और घर के बाहर दोनों ही जगहों में समाप्त कर देती हैं । इसका सीधा प्रभाव राष्ट्र के आर्थिक विकास पर पड़ता है जिसके प्रतिकूल परिणाम होते हैं ।
स्पष्ट है कि यदि राष्ट्र के विकास में स्त्रियों का योगदान सही तरीके से लेना हो तो उनकी दशा एवं स्तर सुधारने के लिए प्रयास करने होंगे । इन प्रयासों में शिक्षा प्रसार, शिक्षा और रोजगार के अवसर सुलभ कराने के साथ ही उत्पादन के साधनों में सुधार कराने होंगे । इन सब साधनों में स्त्रियों की आवश्यकता और आय-वृद्धि दोनों ही संभव हैं, जो विकास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं ।


विकासशील देशों में स्त्रियों की स्थिति एवं उपलब्धियां (Status and Achievement of Women in Developing Countries)
आज विकासशील देशों में स्त्रियां विकास प्रक्रिया में थोड़ा-बहुत योगदान अवश्य दे रही हैैं किंतु सामान्य स्तर पर इन देशों में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति कई क्षेत्रों में निम्न बनी हुई है । इस स्थिति के कारण विकासशील देशों में महिलाओं की विशिष्ट समस्याएं भी उत्पन्न हुई है जो अग्र प्रकार हैं-

1. विकासशील देशों में महिला-निरक्षरता बहुत ज्यादा मिलती है । कई देशों में जैसे भारत, अल्जीरिया, ट्यूनीसिया, सीरिया, ईरान एवं सऊदी अरब में तो महिला-निरक्षरता 75% या अधिक है ।

2. स्कूली शिक्षा में सभी स्तरों पर लड़कियों का प्रतिशत निम्न स्तरीय ही मिलता है । विशेष रूप से भारत, ईरान एवं सऊदी अरब में । उच्च शिक्षा में सामान्य तौर पर के सभी विकासशील देश निम्न स्तर पर ही मिलते हैं ।

3. इन देशों की कुल श्रम शक्ति में स्त्रियों का प्रतिशत निम्न मिलता है । श्रम शक्ति में कहीं-कहीं तो स्त्रियां 10% से भी निम्न स्तर पर हैं जैसे- सीरिया, या संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव आदि । केनिया, नाइजीरिया, भारत आदि मध्यम स्थिति में हैं ।

4. कई विकासशील देशों में उच्च व्यवसाय पेशों में महिलाओं का प्रतिशत बहुत कम मिलता है । ट्यूनीसिया, भारत आदि देशों में तो 15% ही है ।

5. कई विकासशील देशों जैसे नेपाल, मालदीप, भारत, क्यूबा, ईरान, आदि में लड़कियों का विवाह कम आयु में हो जाता है, फलस्वरूप बहुत ही जल्दी वे प्रजनन की स्थिति में आ जाती हैं । यहां प्रति महिला प्रजनन की दरें उच्च स्तरीय होती हैं । कहीं-कहीं तो एक स्त्री औसत 5 से 8 तक बच्चों को जन्म देती है, जिससे उसका पूरा शेष जीवन-बच्चों के पालन-पोषण में घर-गृहस्थी में ही व्यतीत हो जाता है ।

विकासशील देशों में स्त्रियों की उक्त विशेषताओं के कारण वे विकास-प्रक्रिया में कोई योगदान देने की न तो क्षमता रखती हैं न आकांक्षा ही । दुर्भाग्य से मुस्लिम देशों में स्त्रियों की स्थिति बहुत ही शोचनीय है । बंगला देश और पाकिस्तान की स्त्रियां सार्वजनिक रूप से खेलों में भाग नहीं ले सकती । शासकीय-अशासकीय सेवाओं और उच्च शिक्षा से उन्हें आज भी दूर रखा जा रहा है । संयुक्त राष्ट्र संघ के 1988 के एक अध्ययन के अनुसार पाकिस्तान एवं बंगलादेश में स्त्रियों की स्थिति सबसे खराब है।
विकासशील देशों की उपलब्धियां- अंतर्राष्ट्रीय महिला दशक (1975 -1985) के शुभारंभ के साथ ही समूचे विश्व में और विशेषकर विकासशील देशों में भी स्त्रियों की विकास में भूमिका पर ध्यान केंद्रित हुआ ।
सन् 1977 में तेहरान (ईरान) में एक विशेषज्ञ समूह समिति गठित हुई जिसका कार्य एशिया एवं पैसेफिक क्षेत्र की महिलाओं की आधारभूत आवश्यकताओं को पहचान कर एक प्रभावी कार्यक्रम प्रस्तुत करना था । यह कार्यक्रम आधारभूत रूप में कृषि एवं ग्रामीण समुदायों की महिलाओं की आर्थिक आवश्यकताओं के संदर्भ में रहा है ।
बगदाद में 1979 में ‘गुट-निरपेक्ष’ एवं अन्य विकासशील देशों की स्त्रियों के विकास में भूमिका पर एक परिषद् गठित हुई जिसने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है । इस प्रतिवेदन में पहली बार विकासशील देशों की स्त्रियों की विकास में भूमिका पर विशेष चर्चायें सम्मिलित की गई ।
रोम (1979) में ‘कृषि सुधार एवं ग्रामीण विकास’ में महिलाओं की स्थिति पर, विएना (1979) में ‘विज्ञान एवं तकनीकी’ पर, कोपेनहेगन (1980) में फिर, महिला दशक, समता विकास एवं शांति पर, रोम (1981) में कृषि एवं ग्रामीण विकास योजनाओं में महिलाओं को सम्मिलित करने और हवाना (क्यूबा) में 1981 में फिर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ बैठक में स्त्रियों के विकास के योगदान की वृद्धि करने के प्रयास कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए ।
महाबलेश्वर (भारत) में 1981 में तथा अंतरराष्ट्रीय श्रम-संगठन, बैंकॉक (1983) में भविष्य की ओर अभिमुख व्यूह रचनाएं प्रस्तुत हुई । टोक्यो, जापान (1984), बैंकॉक (1984), जेनेवा (स्विटजरलैंड) में 1984 एवं 1985 में विश्व स्तर की बैठकें सम्पन्न हुई । भारत में (नई दिल्ली, 1985) गुट-निरपेक्ष एवं अन्य विकासशील देशों की परिषद् सम्मेलन में तो विकास में स्त्रियां-दस्तावेज भी प्रस्तुत हुए । इसके बाद भी स्त्रियों की जाग्रति एवं विकास में उनकी भूमिका पर अनेक अध्ययन होते रहे हैं ।
विकासशील देशों के विकास में महिलाओं के योगदान पर केवल एक दशक में ही इतना ध्यान केंद्रित हुआ है, जितना कि किसी अन्य दशक में नहीं हुआ था । इसका प्रमुख कारण केवल यही रहा है कि अब समूचे विश्व में यह अनुभव होने लगा है कि स्त्रियों को विकास से पृथक् रखा ही नहीं जा सकता । स्त्रियों को विकास प्रक्रिया से वंचित रखा गया हो तो वह ‘अधूरा’ विकास ही सिद्ध होगा । भारत में भी विगत एक दशक से यही मान्यता रही है ।

 

 

 

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