लोकतंत्र से आप क्या समझते है ? इसके आधारभूत सिद्धांत

लोकतंत्र से आप क्या समझते है ? इसके आधारभूत सिद्धांत
                                         अथवा
प्रजातंत्र का अर्थ बताइए तथा इसके आधारभूत सिद्धांत की आलोचना कीजिए ।
                                         अथवा
लोकतंत्र की परिभाषा कीजिए । तथा इसकी प्रकृति आधारभूत सिद्धांतों का वर्णन कीजिए ।

प्रजातंत्र का अर्थ तथा परिभाषाएं
(Meaning and Definition of Democracy)
लोकतंत्र शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘डेमोक्रेसी’ (Democracy) का हिंदी रूपांतर है । डेमोक्रेसी शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिल कर बना है डेमोस (Demos) + क्रेटिया (Kratia) जिनका अर्थ है जनता तथा शक्ति अर्थात् “जनता की शक्ति” । अतः प्रजातंत्र का अर्थ प्रजा के हाथों में शक्ति से है ।
19वीं शताब्दी में लोकतंत्र का परम्परागत सिद्धांत एक आदर्श के रूप में उभरा । इसलिए यह धारणा कायम हुई कि यह सिद्धांत एक आदर्श व्यक्ति, आदर्श राज्य, आदर्श समाज और आदर्श अर्थनीति का समर्थन करता है तथा यह जनता का जनता के लिए तथा जनता द्वारा शासन है ।
अब्राहम लिंकन के अनुसार, “लोकतंत्र शासन वह शासन है जिसमें शासन जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए हो ।”
ब्राइस के अनुसार, “लोकतंत्र शासन का वह प्रकार है जिसमें राज्य के शासन की शक्ति किसी विशेष वर्ग या वर्गों में निहित न होकर संपूर्ण जनसमुदाय में निहित है ।”
सीले के अनुसार, “लोकतंत्र वह शासन है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का एक भाग हो ।”
डायसी के शब्दों में, “लोकतंत्र शासन का वह प्रकार है जिसमें शासक समुदाय संपूर्ण राष्ट्र का अपेक्षाकृत एक बड़ा भाग हो ।”
जी० सरटोरी की दृष्टि में, “लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था उसे कहते हैं जो शासन को उत्तरदाई एवं नियंत्रणकारी बनाती है तथा दूसरी प्रभावकारिता मुख्यत: इसके नेतृत्व की योग्यता तथा कार्यशीलता पर निर्भर रहती है ।”
लिप्सेट की राय में, “लोकतंत्र की परिभाषा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के रूप में दी जा सकती है जहां सरकारी पदाधिकारियों को बदलने के नियमित संवैधानिक अवसर उपलब्ध हों तथा एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था हो जहां जनसंख्या का अधिकतर भाग, राजनीतिक शक्ति की प्राप्ति के संघर्ष में लगे लोगों को चुनकर प्रमुख निर्णयों को प्रभावित करें ।”
मेकफरसन का विचार है कि “लोकतंत्र सरकारों को चुनने तथा शक्ति प्रदान करने की या किसी दूसरे प्रकार से कानून बनाने तथा राजनीतिक निर्णय लेने की एक विधि मात्र है ।”
शुम्पीटर के शब्दों में, “लोकतंत्रीय पद्धति राजनीतिक निर्णय लेने की एक ऐसी संस्थात्मक व्यवस्था है जिसमें व्यक्तियों को जनता के मतों के लिए प्रतियोगितात्मक संघर्ष के माध्यम से निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त होती है ।”

 

परिभाषाओं का सार
(Gist of Definitions)

1. संविधानवाद के मूल तत्वों का समावेश- जैसे, मूल अधिकारों की गारंटी, प्रतिनिधि सरकार को बनाए रखना, विधि का शासन तथा संवैधानिक राज्य का होना ।

2. निर्वाचन पद्धति से जनता के द्वारा सरकार का चुना जाना अर्थात् राजसत्ता का जनता में निहित होना ।

3. राजनीतिक समानता एवं एक व्यक्ति, एक मत (one man, one vote) ।

4. सरकार के बनाने, कार्य करने तथा रखरखाव में जनता द्वारा अधिक से अधिक भाग लेना ।

5. सभी निर्णयों को डिबेट तथा वाद-विवाद के बाद लेना ।

6. बहुमत के सिद्धांत को मान्यता एवं नीतियों को बहुमत की इच्छा द्वारा निर्धारित करना ।

7. लोकहितकारी राज्य की मान्यता एवं निर्मित सरकार समाज के सभी वर्गों के हित के लिए है ।

प्रजातंत्र विभिन्न रूपों में
(Democracy In Different Forms)
1. प्रजातंत्र शासन के रूप में (Democracy in the Form of Govt.)- प्रजातंत्र उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें जनता स्वयं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समूची जनता के हित की दृष्टि से शासन करती है । इसमें सरकार एक साधन मात्र होती है । सरकार का उद्देश्य सार्वजनिक हितों की रक्षा करना होता है तथा सरकार जनता के प्रति उत्तरदाई होती है ।
2. प्रजातंत्र राज्य के रूप में (Democracy as Form of state)- राज्य के रूप में प्रजातंत्र का तात्पर्य उस राज्य से होता है जिसमें राजसत्ता जनता में निहित होती है और उसका उपयोग जनता अपनी इच्छा की सरकार का रुप निर्धारित करके करती है ।
3. प्रजातंत्र समाज के रूप में (Democracy in the Form of Society)- समाज के रूप में प्रजातंत्र से तात्पर्य उस समाज से है जिसमें सब व्यक्ति समान समझे जाते हैं । जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, संपत्ति का भेदभाव नहीं होता और सबको समान अवसर प्राप्त होते हैं । इस प्रकार समानता प्रजातंत्र का आधार है ।
4. प्रजातंत्र नैतिकता के रूप (Democracy as a Moral Principle)- नैतिकता के रूप में प्रजातंत्र मनुष्यों को वास्तविक ज्ञान कराता है । वह बराबरी के नैतिक सिद्धांत पर आधारित है ।
5. आर्थिक प्रजातंत्र (Economic Democracy)- सच्चे प्रजातंत्र के लिए राजनीतिक समानता ही पर्याप्त नहीं है । वास्तविक समानता से तात्पर्य आर्थिक समानता से होना चाहिए । प्राय: देखा जाता है कि राजनीतिक प्रजातंत्र आर्थिक अल्पतन्त्र में परिवर्तित हो जाता है क्योंकि राजनीतिक राजसत्ता आर्थिक सत्ताधारी व्यक्तियों के हाथ में रहती है । अतः यह मानना पड़ेगा कि समाजवाद द्वारा ही एक सच्चे तथा सार्थक प्रजातंत्र का निर्माण किया जा सकता है ।
आधुनिक काल में लोकतंत्र का जो परंपरागत सिद्धांत विकसित हुआ है मूलतः एक राजनीतिक अवधारणा है किंतु विस्तार से उसके अंतर्गत सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र भी समाहित हो जाते हैं । अब जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन लोकतंत्र कहलाता है । लोकतन्त्रीय शासन में जनता की सहभागिता होती है । वह अपने शासकों को स्वयं चुनती है । बहुमत से चुने गए लोगों के हाथों में शासन सूत्र होता है और अल्पमतीय लोग विरोधी दल के रूप में सरकार पर नियंत्रण रखते हैं । इस प्रकार विचारों के आदान-प्रदान द्वारा शासन में निर्णय लिए जाते हैं ।

प्रजातंत्र की विशेषताएं
(Characteristics of Democracy)

प्रजातंत्र शासन में निम्नलिखित विशेषताएं पाए जाते हैं-

1. प्रभु शक्ति जनता के हाथों में पाए जाती है ।

2. सरकार का निर्माण समस्त जनता द्वारा होता है अतएव सरकार में समस्त जनता का प्रतिनिधित्व होता है ।

3. सरकार जनता के प्रति उत्तरदाई होती है । जनता सरकार को अपदस्थ कर सकती है यदि सरकार अपने दायित्वों का पालन करने में असफल हो ।

4. समस्त नागरिकों को समान समझा जाता है और समानता के सिद्धांत का ही अनुकरण किया जाता है ।

5. लोकतंत्र शासन बहुमत पर आधारित है । निर्वाचित सदस्य उस समय तक ही कार्य कर सकते हैं जब तक बहुमत उनके पक्ष में रहे ।

6. योग्यता पर विशेष बल दिया जाता है, जो व्यक्ति जिस योग्य होता है, उसको उसी के अनुसार पद प्रदान किया जाता है ।

7. धन एवं सम्पत्ति के समान वितरण पर विशेष बल दिया जाता है ।

8. स्थानीय संस्थाओं के विकास के साथ-साथ व्यक्तित्व के विकास पर विशेष बल दिया जाता है ।

प्रजातंत्र के आधारभूत तत्व का सिद्धांत
(Basic Elements or Principles of Democracy)

पीटर एच० मरकल (Peter H. Merkl) ने प्रजातंत्र के निम्नलिखित चार तत्वों या सिद्धांतों का वर्णन किया है-

1. विचारों के आदान-प्रदान (Exchange of Views) द्वारा शासन- लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाए जिसमें स्वतंत्र रूप से विचारों का आदान-प्रदान किया जा सके और प्रत्येक विषय की अच्छाइयों एवं बुराइयों का सूक्ष्म अध्ययन करके उसके समाधान के लिए सहमति प्राप्त कर ली जाए । लोकतंत्रीय शासन का आधार यही सहमति होती है ।
जहां तक विचारों के आदान-प्रदान का प्रश्न है यह दो स्तरों पर होता है-
प्रथम, विधान सभाओं में जहां वाद-विवाद द्वारा किसी समस्या की तह तक पहुंचा जाता है । द्वितीय जनता द्वारा इन समस्याओं पर समाचार पत्रों, रेडियो, टेलीविजन द्वारा अपने विचारों को व्यक्त करना । जन सभाओं में भी विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा इन समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए जाते हैं और इस प्रकार शासन द्वारा लिए गए प्रत्येक निर्णय में समस्त जनता हिस्सा लेती है ।

2. बहुमत का शासन (Majority Rule)- इस सिद्धांत के अनुसार वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रतिनिधियों का निर्वाचन होता है । सभी वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेद-भाव के संसद और अन्य निकायों के लिए प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार दिया जाता है ।
शासन के विभिन्न स्तरों पर सभी निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं । व्यवस्थापिका सभाओं में, कैबिनेट में, समितियों में यहां तक की न्यायालय की बैंचों में भी बहुमत से निर्णय लिए जाते हैं, जो वैध और मान्य होते हैं । इस प्रकार ‘बहुमत के शासन’ का सिद्धांत बहुमत की बुद्धिमत्ता को स्वीकार करता है ।

3. अल्पमत के अधिकारों की मान्यता (Recognition of Minority Rights)- लोकतंत्रीय शासन का यह प्रमुख सिद्धांत है कि अल्पमत के लोगों के अधिकारों को मान्यता प्राप्त होती है । प्रत्येक देश में जाति, भाषा, धर्म और संस्कृति के आधार पर अनेक अल्पसंख्यक लोग होते हैं जिन्हें संवैधानिक संरक्षण भी प्राप्त होता है । इस प्रकार लोकतंत्र की मान्यता है कि जब तक अल्पसंख्यकों के हितों की वैधानिक व्यवस्था नहीं की जाती तब तक लोकतांत्रिक राजनीति का स्वस्थ विकास नहीं हो सकता ।

4. संवैधानिक शासन (Constitutional Government)- लोकतंत्रीय शासन संवैधानिक होता है । जनता द्वारा निर्मित संविधान के आधार पर ही शासन चलाया जाता है ।
लोकतंत्र शासन में अनेक संस्थाएं विभिन्न प्रक्रियाओं, विधियों एवं व्यवस्थाओं के द्वारा जनता की इच्छा को कार्यान्वित करती हैं जिसमें असंख्य लोक सेवक विभिन्न स्तरों पर कार्य करते हैं । वे पूर्व निर्धारित प्रशासकीय प्रक्रिया के अनुसार अपना कार्य करते हैं । देश का सारा प्रशासन कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत चलता है ।
उपरोक्त सिद्धांतों के अतिरिक्ति प्रजातंत्र के निम्नलिखित सिद्धांत और है-

5. समानता का सिद्धांत (Principal of Equality)- समानता का सिद्धांत लोकतंत्र की आधारशिला है । बिना सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समानता के लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती । सामाजिक समानता से तात्पर्य धर्म भेद, जाति भेद, रंग भेद या लिंग भेद आदि को समाप्त करने से है । भारत में छुआछूत समाप्त कर दी गई है तथा ‘सर्वधर्म संभाव’ को मान्यता दी गई है । राजनीतिक समानता से तात्पर्य सबको समान रूप से शासन में भाग लेने का अधिकार प्राप्त होना है । सभी को निर्वाचन में चाहे वह कोई धनवान हो या निर्धन, शिक्षित हो या अशिक्षित, उच्चवर्ग का हो या निम्न वर्ग का समान रूप से खड़े होने तथा मत देने का अधिकार प्राप्त होता है । आर्थिक समानता की दृष्टि से लोग कोई भी धंधा करने के लिए स्वतंत्र हैं । धनी वर्ग को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है । इसके साथ ही दुर्बल वर्ग के विकास के लिए विशेष प्रबंध भी किए जाते हैं ।

6. स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है (Freedom is the Soul of Democracy)- स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है । सच्चे लोकतंत्र के लिए भाषण की स्वतंत्रता, समुदाय बनाने की स्वतंत्रता तथा प्रेस की स्वतंत्रता का होना नितांत आवश्यक है । लोकतंत्र में जनता को अपने शासकों की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त होता है । इतना ही नहीं, जनता चुनाव के अवसर पर उन्हें हटाकर शासन की बागडोर उनके हाथ से लेकर दूसरों के हाथ में दे सकती है । वास्तव में, लोकतंत्र में शासन और शासित में भेद नहीं किया जाता ।

7. लोकमत पर आधारित (Based on Pubilc Opinion)- लोकतंत्र में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कानून बनाते हैं । वे सदैव अपने मतदाताओं की इच्छाओं का ध्यान रखते हैं । विधान मंडल में सभी सदस्य जन प्रतिनिधि होते हैं । स्वाभाविक रूप में वे सब एक ही ध्येय की पूर्ति के लिए क़ानून बनाते हैं । और वह है जनता का हित । दूसरे, कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदाई होती है । अतः मंत्रिमंडल ऐसा कोई कार्य नहीं करता जो जनता के प्रतिनिधियों की इच्छा के विरुद्ध हो । इस प्रकार लोकतंत्र लोकमत पर आधारित होता है ।

 

 

 

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