राजनीतिक प्रक्रिया में नारी की भूमिका की विवेचना कीजिए।

राजनीतिक प्रक्रिया में नारी की भूमिका की विवेचना कीजिए। (Discuss the role of women in political process.)
                                                 अथवा
स्वतन्त्रता से पूर्व एवं पश्चात् राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागेदारी की समीक्षा कीजिये।(Give an assessment of the participation of Indian Women in political field during pre and post Independence.)
उत्तर- राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागेदारी (Women Participation in Political Field)
पर्याप्त काल तक स्त्रियों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया। 18 सितम्बर, 1917 को भारतीय स्त्रियों के प्रतिनिधि मण्डल ने प्रथम बार भारत मन्त्री माण्टेग्यू से मिलकर स्त्री अधिकारों की मांग प्रस्तुत की। परन्तु जब कोई नतीजा नहीं निकला तो स्त्री प्रतिनिधिमण्डल ने अपने अधिकारों की माँग के समर्थन में एक प्रतिवेदन इंग्लैण्ड भेजा। 1919 में द्वैध शासन विधान में महिला मताधिकार प्रदान करने की सुविधा दी गई। इसके अनुसार 1926 में मद्रास व्यवस्थापिका के चुनाव में स्त्रियों को वोट डालने का अधिकार मिला।
राजनीतिक आन्दोलन में भाग लेने के साथ-साथ वैधानिक क्षेत्र में भी महिलाओं के प्रतिनिधित्व में वृद्धि हुई। ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ में बेगम शहनवाज तथा श्रीमती राधाबाई सुब्रायन ने भाग लिया तथा महिला मतदाता संख्या में वृद्धि करने की माँग की। सन् 1931 के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गाँधी जी के साथ सरोजिनी नायडू ने भाग लेकर महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया। सन् 1935 के अधिनियम के द्वारा विधानसभाओं में स्त्रियों के लिये स्थान सुरक्षित किए गए।
सन् 1937 में 6 प्रान्तों में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बने जिनमें एक बड़ी संख्या में महिलाएँ विधानसभाओं की सदस्य चुनी गई। उत्तर-प्रदेश के मंत्रि मण्डल में श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित प्रथम महिला मन्त्री थी। श्रीमती अनुसूयाबाई केन्द्रीय प्रान्त की तथा श्रीमती लक्ष्मीबाई उड़ीसा विधानसभा की उपाध्यक्ष चुनी गई। इसी प्रकार श्रीमती रेणुका रे एवं श्रीमती राधाबाई सुब्रायन केन्द्रीय विधानसभा की सदस्या बनी। सन् 1937 में कुल 80 स्त्रियां विधानसभा की सदस्या बनी। उल्लेखनीय है कि 1937 के चुनावों से पूर्व ही सन् 1926 में महिलाओं को प्रान्तीय विधानसभाओं के चुनाव लड़ने का अधिकार प्रदान किया गया था। परिणामस्वरूप मद्रास, बम्बई, पंजाब व केन्द्रीय प्रान्तों ने इस दिशा में शीघ्र कदम उठाए। इस दौरान विधायक पद हेतु चुनाव लड़ने वाली प्रथम महिला उम्मीदवार श्रीमती कमलादेवी चट्टोपाध्याय थीं। यद्यपि वह पराजित हुई किन्तु विजयी उम्मीदवार से उनके वोटों का अन्तर पर्याप्त न्यून था। श्रीमती चट्टोपाध्याय ने 4976 के मुकाबले 4461 वोट प्राप्त किये थे। तत्पश्चात् ‘भारतीय महिला परिषद’ के दबाव डालने पर मद्रास सरकार ने विधान सभा में एक महिला को नामजद किया। इसके परिणामस्वरूप डॉ० मुथुलक्ष्मी रेड्डी प्रथम महिला विधायक बनी।
स्वतन्त्रोत्तर भारत में वैधानिक क्षेत्र में महिलाओं की भागेदारी का सर्वप्रथम उदाहरण संविधान निर्माण में उनकी सक्रिय भूमिका से प्राप्त होता है। संविधान निर्माण में भाग लेने वाली प्रमुख महिलाएँ निम्नलिखित थीं- सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृतकौर, हंसा मेहता, सुचेता, दुर्गाबाई, रेणुका रे, कमला चौधरी, पूर्णिमा बैनर्जी, मालती चौधरी एवं अम्मू स्वामीनाथन । शनै:शनैः प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर भी महिलाएँ आरूढ होती चली गई। सन् 1951 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IA.S) में नियुक्ति पाने वाली प्रथम भारतीय महिला कुमारी अन्ना जॉर्ज थीं।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद ग्राम पंचायतों से लेकर राज्य सभा, विधानसभाओं एवं संसद तक स्त्रियों ने सफलतापूर्वक कार्य करके दिखाये। राजकुमारी अमृतकौर, डॉ. सुशीला नैय्यर, लक्ष्मी मेनन, नन्दिनी सत्पथी, सुशीला रोहतगी, जहां आरा, श्रीमती चन्द्रशेखर, डॉ० सरोजिनी माहेश्वरी, तारकेश्वरी सिन्हा, रामदुलारी सिन्हा, कुमुदबेन जोशी, मोहसिना किदवई, शीला कौल, श्रीमती सुषमा स्वराज, सुश्री उमा भारती, वसुन्धरा राजे सिन्धिया, अम्बिका सोनी आदि महिलाओं ने केन्द्रीय केबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री एवं उपमन्त्री के रूप में कार्य किया। राज्यपाल के रूप में विजयलक्ष्मी पण्डित, ज्योति वेंकटाचलम, सरोजिनी नायडु एवं शारदा मुखर्जी के नाम उल्लेखनीय हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री एवं राज्य मंत्रियों के रूप में भी महिलाओं की एक बड़ी संख्या है। लोकसभा एवं विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
उपरोक्त महिलाओं के अतिरिक्त श्रीमती इन्दिरा गाँधी सन् 1966 में स्वतन्त्र भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनी। सन् 1972 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से पुरस्कृत किया गया तथा बी० बी० सी० की इन्टरनेट न्यून सर्विस के सर्वेक्षण अनुसार ‘वूमेन ऑफ दि मिलेनियम’ घोषित किया गया। भारत की ‘प्रथम महिला मुख्यमन्त्री’ सुचेता कुपलानी थीं जिन्होंने 1963 ई॰ में उत्तर-प्रदेश की महिला मुख्यमन्त्री का पद संभाला। देश की ‘प्रथम महिला मंत्री’ होते का गौरव डॉ० सुशीला नैय्यर को प्राप्त है जो कि तत्कालीन प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री (1964-66) के मंत्रिमण्डल में ‘स्वास्थ्य एवं नगर नियोजन मंत्री’ थी। संसद एवं विधान सभा की सदस्यता एवं राजनीतिक क्षेत्र में अन्य महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होने वाली अन्य प्रमुख भारतीय महिलाओं के नाम इस प्रकार हैं- विजय राजे सिंधिया, सुश्री जयललिता, श्रीमती सुषमा स्वराज, श्रीमती सोनिया गाँधी, शीला दीक्षित, सुमित्रा महाजन, श्रीमती मेनका गाँधी, मायावती, नजमा हेपतुल्ला, श्रीमती वसुन्धरा राजे सिन्धिया, सुश्री उमा भारती, गिरिजा व्यास, अम्बिका सोनी आदि । इस प्रकार उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वर्तमान भारत में स्त्रियों की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दशा में तीव्रता से परिवर्तन आ रहे हैं। वे पूर्व के समान परतन्त्रता की बेड़ियों में नहीं जकड़ी हुई हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वे सक्रियता से भाग ले रही हैं। उनमें आत्मविश्वास, आत्म-निर्भरता, स्वतन्त्रता तथा राजनीतिक चेतना का पर्याप्त विकास हो रहा है।

 

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