राजनीतिक दल-बदल हमारी संसदीय प्रणाली के सुगम संचालन में एक प्रमुख बुराई के रूप में उदित हुआ है। भारत में दल-बदल के प्रमुख कारण क्या है? स्पष्ट कीजिए।

राजनीतिक दल-बदल हमारी संसदीय प्रणाली के सुगम संचालन में एक प्रमुख बुराई के रूप में उदित हुआ है। भारत में दल-बदल के प्रमुख कारण क्या है? स्पष्ट कीजिए।
                              अथवा
भारतीय राजनीति में दल-बदल एवं गुटबंदी की समीक्षा कीजिए।
                              अथवा
टिप्पणी लिखिए- ‘भारतीय राजनीति में दल बदल’
                              अथवा
सन् 1967 से दल-बदली बाढ़ आपके विचार से किन कारणों से हुई है? इस बीमारी को दूर करने के लिए क्या उपाय किये जा रहे हैं?
                              अथवा
दल-बदल से आप क्या समझते हैं? दल-बदल के कारण बताइए।

दल-बदल और उसका विकास(Defection and Its Development)
‘चव्हाण समिति’ ने दल-बदल की परिभाषित करते हुए लिखा है, “यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के सुरक्षित चुनाव चिन्ह पर संसद के किसी सदन या किसी राज्य या संघीय क्षेत्र की विधानसभा या विधान-परिषद् का सदस्य निर्वाचित होने के बाद स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल के प्रति अपनी निष्ठा का परित्याग करता है अथवा उस राजनीतिक दल से संबंध-विच्छेद करता है और उसका यह कार्य उसके दल के किसी सामूहिक निर्णय का परिणाम नहीं है, तो यह माना जा सकता है कि उसने दल-बदल किया है।”
चौथे आम चुनाव के बाद कई राज्यों में किसी दल विशेष को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ अतः संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं। विधायकों को इससे व्यक्तिगत रूप में अवसर मिला कि वे उस मोर्चे या दल में सम्मिलित हों जिसमें उन्हें मंत्री-पद या अन्य कोई लाभ की जगह मिलने की आशा हो। हर दल इस स्पर्धा में लग गया कि वह अन्य दल के विधायकों को अधिकतम संख्या में तोड़कर अपना बहुमत प्रदर्शित करे और सरकार बनाएं। इससे दल-बदल और प्रति दल-बदल दोनों ही शीघ्रता से हुए।
दल-बदल की प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ती ही गई। सन् 1957-67 के दशक में 542 दल-बदल की घटनाएं हुई। 1967 में 438 सदस्यों ने दल-बदल किया। 1967-73 की अवधि में 2,700 विधायकों ने विभिन्न स्वार्थों से दल-बदल किया। इनमें से 15 मुख्यमंत्री बने तथा 212 को मंत्रीपद प्राप्त हुए। संपूर्ण देश में दल-बदलुओं की संख्या 4,000 हो गई।
व्यापक दल-बदल के कारण छ: राज्यों में सरकारें बिगड़ी और बनीं, छः राज्यों में राष्ट्रपति शासन घोषित करना पड़ा और चार राज्यों में विधानसभाएं भंग कर पुनः चुनाव कराए गए। सबसे अधिक दल-बदल बिहार में हुआ, जहां 84 विधायकों ने दल बदले। मध्य प्रदेश में 66 विधायकों ने दल बदले और उत्तर प्रदेश में 63 ने।

दल बदल के कारण (Causes of Defection)- दल बदल के प्रमुख कारक अग्र प्रकार थे-
(1) प्रथम, कांग्रेस की आंतरिक गुटबंदी रही। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार में उच्च कांग्रेसी नेता अपने अनुयायियों को लेकर दल से चले गए।
(2) दल-बदल का दूसरा मुख्य कारण धन तथा सत्ता का लालच था। प्रायः विधायकों को अपने दल में फूट के लिए रिश्वत दी गई, मंत्रिपद या अन्य लाभ के पद का लालच दिया गया तथा प्रकार से पुरस्कृत करने का लाभ दिया गया।
(3) दल-बदल की बीमारी को जन्म देने में कांग्रेस का भी योगदान है। 1963 के चुनाव के बाद जब राज्य विधानसभाओं में कांग्रेस की शक्ति कम हो गई, तो कांग्रेस के संसदीय बोर्ड ने 27 फरवरी, 1967 को एक निर्णय लिया जिसके अनुसार कांग्रेस किसी भी राज्य में साझे- मंत्रिमंडलों में सम्मिलित नहीं हो सकती थी। इसी निर्णय से निर्दलीय विधायकों को कांग्रेस में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया। कांग्रेस का आशय स्पष्ट था कि वे कांग्रेस में सम्मिलित होने का निश्चय करें और पुरस्कार स्वरूप सत्ता में भाग लें। इससे प्रेरणा लेकर विरोधी दलों ने भी सत्ता प्राप्त करने के लिए यही मार्ग अपनाया।
(4) दल-बदल करने वालों में कुछ ऐसे भी लोग थे जो सत्ता या धन के लालच से नहीं, बल्कि वैचारिक मतभेद के कारण अपने दल से अलग हुए थे और उनका यह कदम अनुचित नहीं कहा जा सकता था।
(5) जब उत्तर प्रदेश में मध्यावधि चुनाव हुए तो दल-बदलुओं द्वारा निर्मित भारतीय क्रांति दल को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। मध्यावधि चुनाव में दल-बदल विधायकों को सभी राज्य में कुल कितने मत मिले उतने सभी विरोधी दलों को सम्मिलित रूप से भी नहीं मिले थे।
(6) 1977 में विपक्षी दलों के मिलन द्वारा जनता पार्टी का जन्म हुआ और कांग्रेस की शक्ति क्षीण हुई। वह सत्तारूढ़ दल से विरोधी दल बन गई। जुलाई 1979 में जनता पार्टी में दल-बदल का क्रम चला तो जनता सरकार के प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई को त्याग-पत्र देना पड़ा, केंद्र में कोई भी दल बहुमत में नहीं रह गया। राष्ट्रपति को संसद भंग करके नये चुनाव का आदेश देना पड़ा। हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल तो पूरे मंत्रिमंडल के साथ ही जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस (आई) में चले गए।

दल-बदल विरोधी कानून (Anti- Defection Act)- 30 जनवरी, 1985 को लोकसभा ने संविधान के 52 वें संशोधन के रूप में दल बदल विरोधी कानून पारित किया। इस कानून की प्रमुख व्यवस्थाएं निम्न प्रकार हैं-
(1) सदस्यता का स्वेच्छापूर्वक परित्याग (Resignation from Membership Willingly)- यदि कोई सदस्य अपने दल की सदस्यता का स्वेच्छा से परित्याग कर देता है तब वह लोकसभा का सदस्य न रह सकेगा।
(2) दल के विपरीत आचरण (Voting Against Party)- यदि कोई सदस्य उस राजनीतिक दल, जिसका कि वह सदस्य है, के निर्देश के विपरीत सदन में मतदान करता है अथवा मतदान नहीं करता है और यदि उसने इस कार्य की अपने दल से पूर्व-अनुमति प्राप्त नहीं की है तब वह संसद या विधानसभा का सदस्य नहीं रह सकेगा।
(3) अन्य दल की सदस्यता ग्रहण करना (To Accept Membership of Other Parties)- यदि कोई सदस्य बिना किसी राजनीतिक दल के प्रत्याशी के रूप में चुना जाता है तथा चुनाव के पश्चात् वह किसी दल की सदस्यता ग्रहण कर लेता है तब वह सदन का सदस्य न रह सकेगा।
(4) अपवाद (Exception)- पर यदि कोई सदस्य यह दावा करता है कि उसने तथा कतिपय अन्य सदस्यों ने, जो उसी दल के सदस्य हैं, मिलकर एक ग्रुप बना लिया है जिसकी सदस्य संख्या मूल विधायी दल की 1/3 से कम नहीं है तब उन्हें प्रथम दो आधारों पर सदन की सदस्यता से निष्कासित नहीं माना जाएगा।

Leave a Comment