उदारवादी विचारधारा का विकास कब हुआ था?

उदारवादी विचारधारा का विकास कब हुआ था?

(1) राजनीतिक क्षेत्र में उदारवाद की स्थापना(Liberalism in Politics) – 16 वीं और 17 वीं शताब्दियों में राष्ट्रीय राज्यों के शासकों ने निरंकुश शक्तियां ग्रहण कर ली । जनता शासकों के विरुद्ध हो गई। इस प्रकार धर्म के क्षेत्र में उदारवाद पनप चुका था उसने राजनीतिक उदारवाद का रूप ग्रहण कर लिया। इंग्लैंड में जनता राज्य के देवी अधिकारों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। जेम्स प्रथम शासनकाल संसद और राजा के मध्य संघर्ष का कला था। उसके पुत्र चार्ल्स प्रथम जनता को प्राणदंड दिया। 1649 से 1660 तक इंग्लैंड में गणतंत्रीय शासन रहा, परंतु 1660 मैं पुनः राजतंत्र स्थापित किया। 1688 मैं इंग्लैंड में एक गौरवपूर्ण क्रांति हुई। इसमें रक्तपात नहीं हुआ। तत्कालीन शासक जेम्स द्वितीय जनता के विरोध से भयभीत होकर फ्रांस भाग गया। इंग्लैंड में वैध और सीमित राजतंत्र स्थापित हुआ। इंग्लैंड के नए शासकों में विलियम एक अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर करके स्वीकार कर लिया कि वे संसद की अनुमति के अभाव में न्याय कर लगाएंगे और न धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करेंगे। जाॅन लॉक को राजनीतिक उदारवाद का जन्मदाता माना जाता है। उसने अपने ग्रंथों में नागरिकों के तीन अधिकारों की विशेष रूप से स्थापना की –

* जीवन का अधिकार
* स्वतंत्रता का अधिकार तथा
* संपत्ति का अधिकार।

जाॅन लाॅक ने उदारवाद के दो रूपों पर विशेष बल दिया-

(a) राजनीतिक उदारवाद (Political Liberalism) – राजनीतिक उदारवाद के अंतर्गत उसने जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों का प्रतिपादन किया।

(b) आर्थिक उदारवाद(Economic Liberalism) – आर्थिक उदारवाद के रूप में वह संपत्ति के अधिकार का समर्थक था। लाॅक के अनुसार राजा एक ‘ ट्रस्टी’ है । राजा जनता का ‘विश्वासपात्र सेवक’ है, जब तक अपने पद पर आरूढ़ रहेगा तब तक जनता उसे चाहेगा ।
फ्रांस और अमेरिका में इसी तरह के विचारों की प्रधानता थी । लॉक, टाॅमस पेन, जैफरसन और मेडिसन के विचारों का अमेरिका की क्रांति पर विशेष प्रभाव पड़ा । फ्रांस में रूसो, वाल्टेयर, मांटेस्क्यू और दिदरो ने राजा के दैवी अधिकारों का खंडन किया ।
स्पेन में एक लिबरल पार्टी स्थापित की गई । यह पार्टी लगभग उन्हीं अधिकारों की मांग कि थी जो 1791 के संविधान द्वारा फ्रांसीसियों को प्रदान किए गए थे । जर्मनी में कुछ विचारों ने संसदीय संस्थाओं की स्थापना पर बल दिया 1848 की क्रांति के बाद वहां उदारवादी आंदोलन का अंत हो गया ।

(2) आर्थिक उदारवाद तथा पूंजीवाद (Economic Liberalism and Capitalism) – विद्वानों के अनुसार उदारवाद और पूंजीवाद एक – दूसरे के पर्यायवाची हैं । हैरोल्ड लास्की के अनुसार उदारवाद ने पूंजीवाद का समर्थन किया है । एडम स्मिथ , माल्थस और रिकॉर्डो आदि विचारक , ‘लेसेज फेयरे’ (Lassez Faire) अहस्तक्षेप नीति के समर्थक थे । उन्होंने उदारवाद को धार्मिक अथवा राजनीतिक क्षेत्रों तक ही सीमित रखकर उसके आर्थिक पक्ष पर बल दिया।
एडम स्मिथ (1723 – 90) तथा माल्थस (1766-1843) के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र प्राकृतिक द्वारा संचालित होते हैं , उसी प्रकार आर्थिक जगत में कुछ निश्चित और प्राकृतिक नियम हैं । उसका मुख्य आर्थिक नियम हैं –

प्रतियोगिता अर्थात संपदा का नियम (Law of competition),
मांग व पूर्ति का नियम (Law of demand and supply),
सुबह का सिद्धांत (Principle of consumption),
लागत का नियम (Principal of cost).

इन विचारों के मुख्य मान्यताएं इस प्रकार थीं –
राज्य आर्थिक क्रियाकलाप में हस्तक्षेप न करे । मुनाफे की दर, मजदूरी की दर, कार्य करने के घंटे, वस्तुओं का आयात या निर्यात आदि को राज्य प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलने दे। इससे व्यक्ति और राष्ट्र की संपदा में वृद्धि होगी । व्यक्ति ऐसे कार्य करेंगे जो उन वस्तुओं में अपना श्रम व पूंजी लगाएंगे जिनमें उन्हें अधिक से अधिक लाभ मिले।

(3) उदारवाद का परिशोधन (Revision of the Liberal Theory)- 'लेसेज फेयरे' का सिद्धांत श्रमिकों व सर्वसाधारण जनता के लिए दुखदाई बन गया। सकारात्मक उदारवादियों यथा, बेंथम, मिल तथा टी. एच. ग्रीन ने उदारवाद का परिशोधन किया। बेंथम ने 'अधिकतम लोगों के सुख' को अपना मानदंड माना । देश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन लाने के लिए राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक था । राज्य के कानून स्वतंत्रताओं में अधिक नहीं बल्कि सहायक हैं । कानून , शिक्षा , राजनीति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में कानूनो के माध्यम से ही सुधार लाना चाहा था ।
जाॅन स्टुअर्ट मिल (J.S.Mill) ने उदारवाद का समर्थन किया । उसने विचारों की अभिव्यक्ति, कार्यों की स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक प्रणाली का समर्थन किया । आर्थिक क्षेत्र में राज्य के व्यापक हस्तक्षेप का विरोध किया परंतु उसका मत था कि श्रमिकों स्त्रियों और बच्चों की अवस्था में सुधार लाने के लिए राज्य को हस्तक्षेप करना पड़ेगा ।
उदारवाद में व्यापक संशोधन का श्रेय राजनीतिक - विचारक टी. एच. ग्रीन को प्राप्त है । ग्रीन के अनुसार स्वतंत्रता 'प्रतिबंधों का अभाव' नहीं है । राज्य को कानून के द्वारा न्यूनतम मजदूरी व श्रमिकों के कार्य करने के घंटे निर्धारित करने चाह। प्रो. सेवा इन शब्दों में, उदारवादी दर्शन को ग्रीन की सबसे महत्वपूर्ण देन थी सामूहिक कल्याण को ही व्यक्ति के कल्याण का साधन माना है ।"
(4) लोकहितकारी राज्य की स्थापना (Establishment of a Welfare Statc)- 1917 में रूस साम्यवादी क्रांति हुई । क्रांति के पश्चात लेनिन के समर्थकों ने राज्य के माध्यम से देश को आर्थिक और सामाजिक प्रगति की ओर अग्रसर किया । रूस की आशातीत आर्थिक समृद्धि ने पश्चिम के उदार लोकतंत्रीय देशों को प्रभावित किया । 'लेसेज फेयरे' सिद्धांत के स्थान पर 'लोकहितकारीराज्य' का आदर्श पनप रहा था । सर्वत्र यह मान्यता प्रचलित थी कि राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप के अभाव में सुधार नहीं हो सका । अतः शिक्षा व स्वास्थ्य की सुविधाएं जुटाने तथा श्रमिकों की अवस्था में सुधार लाने के लिए राज्यों ने कानून बनाएं । इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, स्वीडन और डेनमार्क लोकहितकारी राज्यों के सर्वोत्तम उदाहरण हैं । इस प्रकार उदारवाद का संशोधन किया गया ।

(5) उत्तरोत्तर वृद्धि के द्वारा परिवर्तन लाने का सिद्धांत (The Concept of Incremental Change) – आधुनिक उदारवादी देशों में ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का सिद्धांत अपनाया है । यदि पूंजीपति व्यक्तिगत लाभ की भावना से प्रेरणा प्राप्त करते हैं, परंतु साथ ही मजदूरों को भी संतुष्ट रखने की नीति अपनाते हैं । पश्चिम के उदारवादियों का यह मान्यता है कि –
(A) पूंजीपति अपने मुनाफे में श्रमिकों को भाग दें ।
(B) पूंजीपति मजदूरों को बोनस दें ।
(C) उनके लिए शिक्षा और आवास की सुविधाएं जुटाएं,
(D) श्रमिकों को बीमारी, बेकारी और दुर्घटना की स्थिति में आर्थिक सहायता दें ।
(E) श्रमिकों के लिए सामूहिक बीमे की योजनाएं चालू की जाएं ।