ऐतिहासिक भौतिकवाद की विवेचना करते हुए कार्ल मार्क्स के आर्थिक नियतिवाद का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।

मार्क्स के इतिहास की आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए ।
अथवा
ऐतिहासिक भौतिकवाद की विवेचना करते हुए कार्ल मार्क्स के आर्थिक नियतिवाद का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।

मार्क्स का इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धांत (Marx’s Theory of Economic Interpretation of History)
मार्क्स का कहना है कि हमारी आर्थिक परिस्थितियां ही हमारी ऐतिहासिक घटनाओं को प्रभावित करती हैं । जिस प्रकार हमारा आर्थिक संगठन होगा ठीक उसी प्रकार हमारी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक संस्थाएं होंगी । मार्क्स के अनुसार इतिहास मानव जीवन की भौतिक आवश्यकताओं का परिणाम है । उसके अनुसार मनुष्य की आर्थिक परिस्थितियां उसकी प्रगति में एक प्रमुख स्थान रखती हैं । मार्क्स ने मानव जीवन पर आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव के सिद्धांत को ही इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धांत कह कर पुकारा है ।

इतिहास की आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत की प्रमुख बातें(Main Point of the Theory of Economic Interpretation)
(1)  आर्थिक ढांचे के अनुसार सामाजिक संबंधों की स्थापना हुई है-  समाज के राजनीतिक और वैधानिक ढांचे की नींव समाज के आर्थिक ढांचे पर आधारित है । समाज के जो भी सदस्य हैं उनके पारस्परिक संबंध आर्थिक ढांचे पर निर्भर है । पारस्परिक संबंधों का जो भी आधार है, वह आर्थिक ढांचा ही है । जिस प्रकार हमारे समाज के आर्थिक ढांचे का स्वरूप होगा उसी प्रकार समाज के सदस्यों के संबंध पाए जाएंगे ।

(2)  उत्पादन के साधनों के अनुसार परिवर्तन-  समाज के अंदर जो भी सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन होते हैं वे उत्पादन तथा वितरण के साधनों में परिवर्तन के कारण ही होते हैं । व्यक्तित को जीवित रहने के लिए भोजन प्राप्त करना चाहिए किंतु मनुष्य का जीवन इस तत्व पर निर्भर है कि वह उन वस्तुओं का उत्पादन किस प्रकार करे जिनको वह प्रकृति से चाहता है । इसलिए कहा जाता है कि मानवीय क्रियाकलापों की आधारशिला उत्पादन प्रणाली ही है ।

(3)  आर्थिक ढांचे पर योजनाओं का निर्भरता-  समाज की आर्थिक संरचना पर मनुष्य के अन्य कार्य क्षेत्रों की योजनाएं निर्भर हैं । यदि किसी समाज की आर्थिक दशा अच्छी है तो वह समाज अपनी योजनाओं में अधिक सफल हो सकता है और यदि समाज की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है तो समाज संबंधी योजनाओं की असफलता संभव है ।

(4)  अन्य संगठनों के लिए आर्थिक ढांचे का ज्ञान–  समाज के राजनीतिक और वैधानिक ढांचे की नींव उसका तत्कालिक आर्थिक ढांचा होता है । किसी समाज के राजनीतिक संगठनों, न्याय व्यवस्था या धार्मिक विचारों आदि का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम उसके आर्थिक ढांचे को ही समझना चाहिए ।

(5)  आर्थिक ढांचा उत्पादन संबंधों का योग्य-  आर्थिक ढांचे पर समाज के सभी संगठनों का निर्माण होता है तथा आर्थिक ढांचे का निर्माण स्वयं नहीं होता, बल्कि समाज में उत्पादन संबंधों के योग्य से यह आर्थिक ढांचा बनता है । प्रत्येक मनुष्य को अपनी आजीविका के लिए प्रयास करना पड़ता है । उसके लिए उसे आजीविका निर्वाह संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुदाय के सदस्यों से संबंध स्थापित करने पड़ते हैं । इन सब संबंधों को मिलाकर ही आर्थिक ढांचे का निर्माण होता है

(6) उत्पादन की शक्ति का विकास संबंधों का आधार-  सामाजिक संबंधों का विकास मनुष्य की अपनी इच्छा पर निर्भर होता है । मनुष्य की प्राकृतिक पर विजय पाने तथा उत्पादन शक्तियों पर परिवर्तन होने के साथ-साथ समाज के ढांचे में परिवर्तन होना आवश्यक है ।

इस सिद्धांत के अनुसार समस्त ऐतिहासिक घटनाओं की जीवन की भौतिक अवस्थाओं की दृष्टि से व्याख्या की जा सकती है । मार्क्स के शब्दों में, “वैध संबंधों और साथ ही राज्यों के रूपों न तो स्वत: उनके द्वारा समझा जा सकता है, न ही मानव मस्तिष्क की सामान्य प्रगति द्वारा उनकी व्याख्या की जा सकती है, वरन वह तो जीवन की भौतिक अवस्थाओं के मूल में स्थित होती है । भौतिक जीवन में उत्पादन की विधि जीवन की सामाजिक, राजनीतिक तथा आध्यात्मिक विधियों के सामान्य स्वरूप का निश्चय करती है ।”

उत्पादन के संबंधों के आधार पर इतिहास का विभाजन (Division of History on the Basis of the Means of Production)
मार्क्स का कहना है कि उत्पादन संबंधों में परिवर्तन होने के कारण समाज की अन्य संस्थाओं में परिवर्तन होता जाता है । मार्क्स ने मानव जाति के इतिहास को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है-


(A)  आदिम साम्यवादी समाज( Primitive communism)-   मार्क्स का कथन है कि आदिम समाज में प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और उसकी आवश्यकता के अनुसार खाने पीने की सब चीजें मिलती थीं । इस युग में मनुष्य की आवश्यकताएं बहुत कम थीं । व्यक्तिगत संपत्ति का कोई स्थान नहीं था । प्रकृति की सब वस्तुओं पर सभी व्यक्तियों का समान अधिकार था किंतु इस प्रकार की व्यवस्था ठीक प्रकार न चल सकी और उत्पादन के संबंधों पर व्यक्तियों का स्वामित्व स्थापित होने लगा ।
(B)  दासमूलक समाज( Slave Society)-   लोगों में उत्पादन का ज्ञान होने और उत्पादन के साधनों पर व्यक्तियों का स्वामित्व स्थापित होने के कारण आदिम साम्यवादी समाज दास मूलक समाज में परिवर्तित हो गया । इस समाज में दस मुख्य उत्पादक था तथा दास का स्वामी उसके श्रम का पूर्ण रूप से उपभोक्ता था फ। स्वामी का दास पर पूर्ण अधिकार था । दासों का कार्य स्वामियों के लिए उत्पादन करना था । दास स्वामियों द्वारा दिए गए पुरस्कार पर निर्भर करते थे । इस प्रकार के समाज में स्वामी वर्ग दास वर्ग का शोषण कर सकता था ।
(C)  सामंतवादी समाज (Feudal Society)-  इस समय में कृषि आजीविका का साधन माना जाता था । कुछ शक्तिशाली लोगों ने भूमि पर आधिपत्य कर लिया । ये लोग सामंत कहलाते है । सामान तो ने भूमि को छोटे- छोटे किसानों में बांट दिया । ये किसान सामंतों के आधीनता में रहने लगे और सामान को अपना स्वामी समझने लगे । इस समाज में राजा का स्थान सर्वोपरि था और उसके नीचे घटते हुए क्रम से समाप्त होते थे । सबसे नीचे के स्तर पर छोटे-छोटे किसान होते थे, जिनको सिर्फ कहा जाता था । ये सर्फ अपने स्वामियों को समय-समय पर उपहार भेंट के रूप में भेजते थे । इस प्रकार सामंतवादी समाज में छोटे किसानों की दशा दासों से कहीं अच्छी नहीं थी ।
(D)  पूंजीवादी समाज(Capitalistic Society)-   शनै: शनै: समाजवादी समाज का अंत होने लगा और उद्योग-धंधों में विकास आरंभ हुआ । भाप शक्ति का आविष्कार हुआ । इसके फलस्वरूप उत्पादन में मशीनों का प्रवेश हो गया । कृषि का महत्व घटने लगा और उसका स्थान कारखाना उधोग ने लिया । इसी युग में औद्योगिक क्रांति हुई, जिसके फलस्वरूप उद्योग पर पूंजीपतियों का ही एकाधिपत्य स्थापित हो गया और पूंजीविहीन उद्योगों से बहिष्कृत कर दिए गए । उनको पूंजीपतियों के कारखानों में श्रमिकों के रूप में कार्य करना पड़ा । इस अवस्था में समाज दो अस्पष्ट वर्गों में बंट गया-
* सम्पत्तिशाली व्यक्तियों का पूंजीवादी वर्ग तथा,
* संपत्ति विहीन श्रमजीवीयों का श्रमिक वर्ग । पूंजीवादी वर्ग ने श्रमिकों की अवस्था का अनुचित लाभ उठाया तथा उनका भरसक शोषण किया । परिणाम स्वरूप पूंजीपति दिन- प्रतिदिन अधिक शक्तिशाली बनते गए तथा श्रमिक दिन -प्रतिदिन निर्धन होते गये ।
(E)  समाजवादी समाज(Socialistic Society)-   पूंजीवादी युग की कठिनाइयों और पूंजीपतियों द्वारा अपने शोषण के श्रमिकों में क्रांति के भाव उत्पन्न होने लगे । उन्हें अपनी हीन दशा का ज्ञान हुआ और वे हमारे कष्टों का कारण पूंजीपति है । अतः उन्होंने अपने कष्टों के निवारण के लिए पूंजीपतियों के विरुद्ध क्रांति कर दी । क्रांति के फलस्वरूप समाजवादी समाज की स्थापना हुई, जिसमें श्रमिक अधिनायकत्व स्थापित हुआ । समाजवादी व्यवस्था अभी सब देशों में नहीं आ सकी है । यह रूस, चीन और पूर्वी यूरोपियन देशों में ही अभी आए हैं, लेकिन पश्चिमी यूरोप के देशों और अमेरिका आदि में अभी पूंजीवाद जड़ जमाए हुए हैं ।
(F)  साम्यवादी समाज(Communistic Society)-   अन्तिम युग होगा साम्यवादी समाज का युग । वह युग आदि साम्यवाद की भांति ही होगा । उत्पादन के साधनों पर किसी व्यक्ति विशेष अथवा वर्ग विशेष का स्वामित्व न रहकर महत्वपूर्ण समाज का ही स्वामित्व रहेगा और उत्पादन संपूर्ण समाज के हित में होगा । इस समाज में वर्गों का मतभेद समाप्त हो जाएगा । वस्तुत: यह युग स्वर्णिम होगा । इसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यतानुसार कार्य करेगा और अपनी आवश्यकतानुसार पारिश्रमिक प्राप्त करेगा, लेकिन अभी साम्यवादी युग कल्पना का ही वस्तु है ।

इतिहास की आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत की आलोचना
(Criticism of the Theory of Economic interpretation of History)
(1)  आकस्मिकता की उपेक्षा-    मार्क्स अपने सिद्धांत में आकस्मिकताओं को कोई महत्व नहीं देता । इस दृष्टि से उसका यह सिद्धांत ठीक नहीं है क्योंकि आकस्मिकताए इतिहास पर अधिक प्रभाव डालती हैं । आकस्मिक घटनाएं इतिहास में मोड़ ला सकती हैं ।
(2)  मार्क्स ने उत्पादन शक्तियों और उत्पादन संबंधों को ही उत्पादन का विशेष तत्व मना है, किंतु उसकी यह बात सत्य नहीं मानी जाती क्योंकि समाज की संरचना केवल उत्पादन शक्तियों तथा उत्पादन संबंधों पर ही निर्भर नहीं है । मार्क्स ने अपनी उत्पादन शक्तियों का अंतिम उद्देश्य साम्यवाद को माना है, जिसकी प्रगति होते ही विकास का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है । वास्तविकता यह है कि सृष्टि का विकास न रुकने वाला है और न किसी ओर मुड़ने वाला है ।
(3)  आर्थिक तत्वों को विशेष महत्व-  यह सिद्धांत इतिहास के विकास में आर्थिक तत्वों को विशेष महत्व देता है किंतु यह बात ठीक मालूम नहीं पड़ती, क्योंकि देश की भौगोलिक अवस्था और जलवायु आदि का देश की राजनीतिक अवस्था पर प्रभाव पड़ता है ।
(4)  जटिल मानवीय कार्य- मानवीय कार्य इतने जटिल होते हैं कि उन्हें केवल आर्थिक परिस्थितियों का आधार नहीं समझा जा सकता ।
(5)  मार्क्स उत्पादन की प्रणाली के आधार पर समाज के संबंधों की व्याख्या करता है किंतु उसकी व्याख्या अपूर्ण है क्योंकि आज के विकासशील देशों की उत्पादन प्रणाली प्रायः एक सी ही है, परंतु समाज के संबंध विभिन्न प्रकार के हैं ।
(6)  मार्क्स ने आर्थिक कारणों को ही इतिहास के सारे परिवर्तनों का आधार माना है, किंतु यह बात अधिक सत्य नहीं है क्योंकि व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाओं एवं उनके विचारों ने भी ऐतिहासिक परिवर्तनों को प्रभावित किया है ।
(7)  मार्क्स ने श्रमिकों को पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति करने की सलाह दी है, किंतु उसकी यह विचारधारा स्वयं उसके द्वारा प्रतिपादित द्वन्द्ववाद के विपरीत है । मार्क्स के द्वन्द्वात्मक चक्र के आधार पर पूंजीवादी व्यवस्था को स्वयं ही समाप्त हो जाना चाहिए । इसलिए उसको समाप्त करने के लिए क्रांति की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।
(8)  मार्क्स के कथन में विरोधाभास पाया जाता है-  एक ओर मार्क्स ने कहा है कि इतिहास का क्रम एक प्रांतीय आवश्यकता के कारण स्वत: ही निश्चित होता है और अपने प्रयासों से मनुष्य उसे प्रभावित नहीं कर सकता, तब दूसरी और उसका यह कथन है कि श्रमिक क्रांति के द्वारा ही समाजवाद की स्थापना संभव है ।
(9) धर्म के प्रति विचार तर्कसंगत नहीं –   मार्क्स का कहना है कि धर्म केवल उन व्यक्तियों का आसरा है जो भौतिक बाधाओं से असंतुष्ट हो गए हों किंतु उसका धर्म के प्रति इस प्रकार का विचार तर्क-संगत नहीं क्योंकि यह देखा गया है कि संतुष्ट व्यक्ति भी अत्यंत धार्मिक पाए जाते हैं । मार्क्स ने यह विस्मृत कर दिया है कि मानव में उच्चतम आध्यात्मिक मूल्यों के विकास के लिए धर्म ही एकमात्र आधार है ।
(10)  मार्क्स ने राज्य –   विहीन और तर्क विहीन समाज की कल्पना की है किंतु इस प्रकार के समाज की कल्पना केवल कल्पना ही बनकर रह गई है । इस प्रकार के समाज की स्थापना कभी संभव न हो सकी और न भविष्य में होगी ।
(11) मार्क्स का मत है कि इतिहास की धारा राज्य –  विहीन समाज पर जाकर रुक जाएगी । पर प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि समाज की अंतिम साम्यवादी अवस्था में क्या पदार्थ का अंतर्निहित गुण ‘गतिशीलता’ में बदल जाएगा । यदि पदार्थ में ‘गतिशीलता’ एक स्वाभाविक कारण है तब आवश्यक है कि वाद, प्रतिवाद तथा संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा उसमें उस समय भी परिवर्तन होगा, उत्पादन के साधन बदलेंगे, सामाजिक परिस्थितियां बदलेंगी, फिर वर्ग विहीन समाज का प्रतिवाद (Anti- thesis) उत्पन्न होगा तथा फिर साम्यवाद अस्त-व्यस्त हो जाएगा ।

इतिहास की आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत का मूल्यांकन
(Evaluation of Economic Interpretation of History)
मार्क्स का यह सिद्धांत इतिहास की ऐसी गुत्थियों और घटनाओं को जो असंबध्द मालूम पड़ती है, स्पष्ट कर देता है, किंतु फिर भी हमें मार्क्स की इस बात को सत्य नहीं मान लेना चाहिए कि केवल आर्थिक परिस्थितियां ही व्यक्ति के सामाजिक, राजनीतिक संगठनों को प्रभावित करती हैं, क्योंकि इन संगठनों पर पर्यावरण तथा व्यक्ति के विचारों का भी प्रभाव पड़ता है ।

कैरयूहंट (Carew Hunt) के अनुसार, “सभी आधुनिक समाजशास्त्री मार्क्स के विचारों के ऋणी हैं, यद्यपि वे इसे स्वीकार नहीं करते ।”

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