मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत की आलोचना।

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत की आलोचना।

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत (Marxian Theory of Surplus Value)
सिद्धांत की व्याख्या (Theory Explained) – इस सिद्धांत में मार्क्स का उद्देश्य यह है कि पूंजीपति श्रमिक वर्ग का शोषण किस प्रकार करता है । इस सिद्धांत से संबंधित दो मुख्य बातें हैं । प्रथम मार्क्स ने मूल्य की संज्ञा दी है और द्वितीय वस्तु के नाम से पुकारा है । मार्क्स का कहना है कि वस्तुओं से जो राशि प्राप्त होती है, उसे मूल्य कहते हैं । दूसरे शब्दों में वस्तुओं का संग्रह पूंजीवादी समाज के लिए मूल्य कहलाते है । मार्क्स के अनुसार वस्तु वह पदार्थ है जिसके द्वारा हमारी किसी वस्तु की पूर्ति की जा सके । जिसमें उपयोगिता निहित है । मार्क्स का कहना है कि रोटी, गांजा, शराब, अफीम आदि सभी पदार्थों से हमारी आवश्यकता होती है इसलिए सब पदार्थ वस्तु की रोटी में आते हैं ।

वस्तु की उपयोगिता(Utility of the Goods) – मार्क्स का कहना है कि वस्तु में दो प्रकार की उपयोगिता क्षमता होती है प्रथम उपयोगिता आंतरिक उपयोगिता कहलाती है और द्वितीय उपयोगिता बाह्म उपयोगिता कहलाती है ।
(A) आंतरिक – एक वस्तु केवल एक ही व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करती है तो वह वस्तु की आंतरिक उपयोगिता के नाम से पुकारा जाता है ।
(B) बाह्म उपयोगिता – कभी-कभी एक वस्तु बहुत से लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है । इस प्रकार वस्तु सामाजिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी होती है तथा एक व्यक्ति का हित न करके सामाजिक हित करती है । सामाजिक दृष्टि से जो वस्तु उपयोगी होती है, उस वस्तु में बाह्म उपयोगी की क्षमता होती है ।

वस्तु का मूल्य (Value of Goods) – प्रत्येक वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता तथा उसके निर्माण में लगने वाले समय के आधार पर आंका जाता है । मार्क्स के शब्दों में, “किसी वस्तु का मूल्य इसलिए होता है कि मानव श्रम का उपयोग हुआ है । मूल्य की सृष्टि करने वाले तत्व श्रम की मात्रा में निहित हैं । श्रम की मात्रा का नाप सप्ताहों, दिवसों और घंटों में होता है ‌। हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि जिसके द्वारा किसी वस्तु का मूल्य निर्धारित होता है, वह है श्रमकाल या श्रम की मात्रा, जो उत्पादन के लिए सामाजिक दृष्टि से आवश्यक है । इस संबंध में प्रत्येक वस्तु उसकी अपनी श्रेणी का औसत नमूना चाहिए । दो वस्तुओं के मूल्य का अनुपात उस पर व्यय किए गए श्रमकाल के अनुसार ही होता है
।”
मार्क्स का कहना है कि वस्तु के निर्माण में श्रम काल के अतिरिक्त कच्चा माल, यंत्र तथा कारखाने आदि सहायक तत्व होते हैं, उसके बिना अकेला श्रम काल वस्तुओं का निर्माण करने में असफल रहेगा । मार्क्स के अनुसार वस्तु सामाजिक दृष्टि से उपयोगी होनी चाहिए । वह उसके निर्माण में श्रम के अतिरिक्त कच्चा माल, यंत्र तथा कारखानों को भी महत्व देता है ।

अतिरिक्त मूल्य की व्याख्या( Surplus Value, Explained) – मार्क्स का कहना है कि समाज का पूंजीपति वर्ग उन साधनों पर नियंत्रण रखते है जिनके द्वारा श्रमिक किसी वस्तु का निर्माण कर सकता है । वस्तु के निर्माण में श्रम का कोई महत्व नहीं । इसलिए श्रमिकों को पूंजीपतियों के आधीन रहना पड़ता है । पूंजीपतियों की सहायता से कच्चा माल और कारखानों की व्यवस्था की जाती है । पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग को कुछ निश्चित घंटों के लिए काम पर लगाता है और एक निश्चित धनराशि श्रम के मूल्य के रूप में चुका देता है । श्रमिक के फलस्वरूप वस्तु का निर्माण होता है । एक वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता तथा समय पर उसके निर्माण में लगा है एक श्रमिक अपने निश्चित काल में वस्तु निर्माण में अधिक से अधिक परिश्रम करता है ।उस परिश्रम के अनुकूल उसे परिश्रमिक नहीं मिलता । वस्तु का निर्माण होने पर पूंजीपति निर्मित वस्तु को बाजार में लाभ पर बेचता है । कच्चा माल तथा वस्तु के निर्माण में लगता है उससे जो धन प्राप्त होता है उसमें अधिक धन पर पूंजी वस्तु को बाजार में बेचता है । वस्तु के निर्माण में साधन श्रम के लिए जो धन पूंजीपति ने लगाया उससे कहीं अधिक धन पूंजीपति वस्तु को बेचने से मिल गया । इस बढें हुए धन में सब कुछ पूंजीपति का ही होता है । इसमें श्रमिक को कुछ नहीं मिलता, यह धन वस्तु का अतिरिक्त मूल्य कहलाता है । इस प्रकार अतिरिक्त मूल्य धन है जो श्रमिक के गाढ़े पसीने से पूंजीपति द्वारा कमाया जाता है । अतिरिक्त मूल्य की परिभाषा करते हुए मार्क्स ने लिखा है कि, ” यह उन दो मुल्यों का अंतर है जिन्हें एक श्रमिक उत्पन्न करता है तथा पाता है । “मार्क्स का कहना है कि यह अतिरिक्त धन ही पूंजीवाद को जन्म देता है।

अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की आलोचना (Criticism of Theory of Surplus Value) – मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत का अग्रलिखित प्रकार से आलोचना की है –
(1) सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार का अभाव – विद्वानों का कहना है कि मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत यथार्थ एवं वास्तविक नहीं है। इसका उपयोग केवल दिखाने के लिए है कि पूंजीवाद में श्रमिकों का शोषण होता है । इसके अतिरिक्त इस सिद्धांत की कोई उपयोगिता नहीं है । यह सिद्धांत किसी सुनिश्चित वैज्ञानिक पर आधारित नहीं है । मैक्स बियर के अनुसार मार्क्स का सिद्धांत आर्थिक सत्य के स्थान पर राजनीतिक और सामाजिक नारेबाजी है ।

(2) उत्पादन के अन्य साधनों की अवहेलना – मार्क्स का कथन आंशिक रूप से सत्य है । वास्तव में मूल्य का उत्पादन करने के लिए पूंजी की आवश्यकता पड़ती है । बिना पूंजी के श्रम का कोई मूल्य नहीं है । श्रम और पूंजी के अतिरिक्त भूमि, प्रबंध और साहस भी उत्पादन के साधन हैं । ‘श्रम’ को उत्पादन का एकमात्र साधन नहीं माना जा सकता ।

(3) श्रम शक्ति पर विशेष बल – मार्क्स ने श्रम शक्ति पर विशेष बल दिया है । उसने यह स्पष्ट किया है कि श्रम शक्ति कितनी व्यव हुई है इस बात का निर्णय करना असंभव है क्योंकि श्रम शक्ति मेज कुर्सी की भांति एक वस्तु नहीं है जिसकी कीमत उसके उत्पादन व्यय से नापी जा सके अथवा निर्धारित की जा सके ।
(4) श्रम शक्ति की भ्रमात्मक व्याख्या – मार्क्स ने श्रम शक्ति की अमूर्त व्याख्या की है, क्योंकि श्रम शक्ति कोई ठोस वस्तु नहीं है । यह एक कल्पना की वस्तु है जिसकी व्याख्या आसानी से नहीं की जा सकती है । अलेक्जेंडर ग्रे के अनुसार, “कोई भी हमें नहीं बता सकता कि मूल्य से मार्क्स का वास्तव में क्या तात्पर्य था ?”

(5) सिद्धातं पारस्परिक विरोधाभासी – वास्तव में मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत परस्पर विरोधी है क्योंकि इस सिद्धांत को समझे बिना ही हम यह भाली-भांति समझ सकते हैं कि पूंजीपति श्रमिक वर्ग का शोषण किस प्रकार करते हैं। मार्क्स ने यह माना है कि पूंजीपति अतिरिक्त मूल्य अथवा लाभ बढ़ाने के लालच में नई मशीनें लगाता है दूसरी और यह भी कहता है कि मशीनें, कच्चे माल आदि से अतिरिक्त मूल्य प्राप्त नहीं होता । अतिरिक्त मूल्य तो केवल परिवर्तनशील पूंजी अथवा श्रमिकों से प्राप्त होता है । मार्क्स दोनों कथन परस्पर विरोधी हैं । यदि अतिरिक्त मूल्य श्रमिकों से ही प्राप्त होता है, तब पूंजीपतियों द्वारा मशीनें लगाकर श्रम को कम करने का प्रयास मूर्खता ही कहा जाएगा ।

(6) क्रांति पर विशेष बल – मार्क्स सिद्धांत और क्रांति को ही श्रमिक वर्ग की समस्या का एकमात्र साधन माना जाता है । मार्क्स का क्रांति संबंधी विचार मान्य नहीं है क्योंकि क्रांति के अतिरिक्त अन्य साधन की समस्या का हल करने के लिए निकाले जा सकते हैं ।

(7) शोषण का सिद्धांत – इस सिद्धांत में केवल यह दिखाया गया है कि पूंजीपति श्रमिकों का शोषण करते हैं । इसलिए कैरयूहण्ट ने लिखा है, “यह मूल्य का सिद्धांत नहीं है । यह वास्तव में शोषण का सिद्धांत है ।” मार्क्स का कहना है कि अंत में पूंजीवादी अपने अन्यायों के कारण ही विनष्ट हो जाएगा । पूंजीपतियों के विनाश के पूर्व सर्वहारा वर्ग संगठित होगा । वे अधिकाधिक सुविधाओं की मांग तथा हड़तालों का अंत उनकी मांगों की पूर्ति के पश्चात हो सकेगा । जब तक उनको अपना उचित स्थान का अधिकार प्राप्त न होंगे, तब तक उनके संघर्षों का अंत नहीं होगा। उनको अधिकार पूंजीवादी व्यवस्था के समाप्त होने के पश्चात ही प्राप्त होंगे । पूंजीपतियों तथा श्रमजीवीयों का संघर्ष तब तक समाप्त नहीं होगा, जब तक उत्पत्ति के उपकरणों पर सर्वहारा वर्ग का एकाधिपत्य नहीं हो जाता ।

निष्कर्ष (Conclusion) – मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत यद्यपि ग्राह्म नहीं है तथा यह स्वीकार करना होगा कि यह सिद्धांत एक ऐसा मूल तत्व है जो पूंजीवाद की हृदय हिलाने वाली विभीषिकाओं का वास्तविक चित्र हमारे समक्ष प्रस्तुत कर देता है।

 

 


 

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