मार्क्सवाद की आलोचनात्मक विवेचना की मूल्यांकन

मार्क्सवाद की आलोचनात्मक विवेचना की मूल्यांकन।
मार्क्सवाद का आलोचनात्मक विवेचन (Critical Evaluation of Karl Marx)
कार्ल मार्क्स एक साम्यवादी नेता था । उसने अपने विचारों को अध्यात्मवाद, द्वन्द्ववाद, भौतिकवाद, इतिहास की आर्थिक व्याख्या, वर्ग संघर्ष, अतिरिक्त मूल्य आदि सिद्धांतों के रूप में व्यक्त किया है जिनका वर्णन गत प्रश्नों में यथा स्थान कर लिया है । आलोचकों ने मार्क्स के दर्शन की निम्नलिखित आधारों पर विवेचना की है –

(1) वैज्ञानिकता का अभाव – मार्क्सवाद को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक माना जाता है । मार्क्स स्वयं को एक महान वैज्ञानिक पुकारा है किंतु मार्क्स का वैज्ञानिक होने का दावा कभी मान्य नहीं हो सकता क्योंकि मार्क्स ने अपना सिद्धांत सामाजिक जीवन के प्रति बनाया है । सामाजिक जीवन में इतनी जटिलता पाई जाती है कि उसके संबंध में कोई कानून वैज्ञानिक तरीकों से अटल तथा सदा सत्य रहने वाला नहीं बन सका । ऐसी दशा में मार्क्स की वैज्ञानिकता में संदेह करना अनुचित बात नहीं होगी ।
(2) दर्शन का भौतिक आधार – मार्क्स के दर्शन का आधार विशुद्ध रूप से भौतिक है । मनुष्य स्वभाव से ही स्वार्थी होता है और वर्ग हितों के अनुसार कार्य करता है । मानव समाज में एक आदर्श एवं सहयोग समाज की व्यवस्था नहीं की जा सकी । इस दृष्टि से मार्क्स का समाजवाद अत्यंत संकुचित दृष्टिकोण की भावनाओं से दूषित है ।
(3) भ्रमात्मक दृष्टिकोण – मार्क्सवादी विचारकों को अपनी योजनाओं में भ्रम पैदा हो गया है । मार्क्सवादियों की धरना है कि वे सारी दुनिया को उसी दिशा में बढ़ा रहे हैं जिसमें उसको बढ़ाना चाहते हैं किंतु धारणा एकदम त्रुटिपूर्ण है ।
(4) भौतिक आवश्यकताओं पर विशेष बल – मार्क्स के आलोचकों का कहना है कि मार्क्सवाद केवल भोजन, वस्त्र अथवा आर्थिक दशाओं पर विशेष बल देता है । व्यक्तियों की आध्यात्मिक प्रवृत्तियों के प्रति उदासीनता रखता है । वह इस बात को जानता है कि मानव के विकास में रोटी, कपड़ा तथा मकान के अतिरिक्त उसकी नैतिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताएं महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं । यह कथन वास्तव में अतिश्योक्तिपूर्ण है की परिवर्तन केवल आर्थिक तथ्यों के कारण ही होते हैं तथा कानून, सदाचार, धर्म आदि समाज के सांस्कृतिक जीवन तथा उसकी संस्थाओं का निर्माण करते हैं, वे समाज के आर्थिक ढांचे के ही प्रतिफल हैं । वास्तविक यह है कि मानवीय कार्य इतने सरल नहीं है कि किसी एक प्रयोजन द्वारा ही कियें जा सकें । मनुष्यों के अच्छे-बुरे विचारों, मनोविकारों तथा सामाजिक वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है ।
(5) द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की अपूर्णता – मार्क्स का कहना है कि बातचीत के संघर्ष द्वारा संसार की सभी बातों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं किंतु द्वन्द्वात्मक प्रणाली के विषय में मार्क्स की धारणा भ्रमपूर्ण है क्योंकि सामाजिक गतिविधियां अत्यंत जटिल हैं और उन्हें द्वंदात्मक भौतिकवाद के सिद्धांत पर नहीं समझा जा सकाता ।

(6) मार्क्स के सिद्धांतों की असफलता – मार्क्स का कहना है कि वर्ग संघर्ष के परिणामस्वरूप पूंजीवाद का विनाश होगा और वर्गहीन समाज के स्थापित हो जाने पर न तो पूंजीवाद रहेगा और न राज्य की आवश्यकता होगी किंतु मार्क्स की धारणा काल्पनिक ही रही । आधुनिक युग में पूंजीपतियों और श्रमिकों के बीच संघर्ष है किंतु आज तक कोई परिणाम क्रांति के रूप में सामने नहीं आया । इसके अतिरिक्त मार्क्स का आर्थिक सिद्धांत सत्यता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता । मार्क्स का आर्थिक सिद्धांत इस बात पर विशेष बल देता है कि श्रम ही मूल्य का उत्पादक है । उसकी यह धारणा अत्यंत संकुचित है क्योंकि उत्पादन में श्रम के अतिरिक्त पूंजी, साधन तथा संगठन आदि का विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है ।
(7) पूंजीवाद के विनाश के संबंध में भ्रम – पूंजीवादी व्यवस्था के कारण स्वयं पूंजीवाद अंत हो जाएगा । उत्पादन की वृद्धि के साथ-साथ व्यवसाय में प्रतियोगिता बढ़ेगी और उस प्रतियोगिता में केवल बड़े – बड़े पूंजीपति मैदान में रह पाएंगे, छोटे-छोटे पूंजीपति श्रमिकों में आ मिलते हैं । पूंजीपतियों की संख्या घटेगी और श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होगी और अंत में श्रमिक वर्ग का अधिनायकवाद स्थापित हो जाएगा धीरे-धीर राज्य तिरोहित हो जाएगा, किंतु मार्क्स की यह धारणा सत्य सिद्ध नहीं हुई । आज पूंजीवाद अपने विकास की चरम सीमा पर है किंतु पूंजीपतियों की संख्या में कोई कमी नहीं हुई और न किसी प्रकार की कोई क्रांति हुई । साम्यवादी रूस का विघटन हो गया तथा चीन में भी पूंजीवादी समाजवाद स्थापित हो गया ।
(8) हिंसात्मक साधनों को प्रोत्साहन – श्रमिक वर्ग अपनी क्रांति को सफल बनाने में हिंसात्मक साधनों का आश्रय लेना किंतु मार्क्स की विचारधारा हिंसात्मक साधनों को प्रोत्साहित करती है । मार्क्स हिंसात्मक साधनों को क्रांति की सफलता का साधन समझता है । ऐसा कहने में मार्क्स ने इस बात पर विचार नहीं किया कि यदि हिंसात्मक तरीकों को ही उद्देश्य की सफलता का साधन मानकर चला जाएगा समाज में अन्याय तथा अराजकता फैल जाएगी और समाज की सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाएगा । वर्तमान समय में बिना हिंसा के शांतिपूर्ण उपायों से राज्य में समाजवादी कानून बनाए जा रहे हैं । अनेक राज्यों में समाजवाद पूर्ण अहिंसक रूप से ही तेजी से विकसित होता जा रहा है । द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात ब्रिटेन में श्रमिक दल ने सत्ता हस्तगत की थी, वह किसी क्रांति के कारण अथवा पूंजीपतियों पर श्रमिकों की विजय के कारण नहीं की थी । इसने पूंजीवाद राज्य का विनाश नहीं किया ।

(9) संबंधी अनुचित विचार – राज्य के संबंध में मार्क्स के विचार अनुचित हैं । राज्य एक आवश्यक बुराई है । वह राज्य को एक ऐसी चक्की मानता है जो वर्ग को पीस डालती है । उसके अनुसार लोकतंत्रीय राज्य भी इसी कष्टकारी चक्की का एक रूप है । राजतंत्र को भी वह एक ऐसी चक्की का रूप मानता है । मार्क्स के एक समर्थक एंजिल्स ने कहा है, “राज्य एक प्राकृतिक संस्था नहीं है ।” मार्क्स राज्य को शोषक वर्ग की एक संस्था समझता है । मार्क्स के राज्य संबंधी विचार अमान्य हैं । राज्य एक आवश्यक बुराई नहीं है । वह एक ऐसी संस्था है जो मनुष्य के लिए आवश्यक है । उसका उदय नागरिकों के कल्याण करने के लिए हुआ है ।
(10) केवल साम्यवाद का ही समर्थक – मार्क्स केवल साम्यवाद का ही समर्थक है । मार्क्स उसके अनुयायी लेनिन तथा स्टालिन केवल साम्यवादी दल को श्रमिक वर्ग का हितैषी दल समझते हैं । वे अन्य दलों को श्रमिक वर्ग का नेतृत्व प्रदान नहीं करते । इस दृष्टि से मार्क्सवाद लोकतंत्रीय विचारधारा के विपरीत मालूम पड़ता है ।
(11) नेताओं के अधिनायकवाद की स्थापना – मार्क्स ने कल्पना की थी कि सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना होगी किंतु व्यवहार में यह देखा गया है । कि रूस जैसे साम्यवादी देशों में सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद के स्थान पर साम्यवादी दल के नेताओं के अधिनायकवाद की स्थापना हुई । इस दृष्टि से मार्क्सवाद केवल स्वपन मात्र बनकर ही रह गया है ।

(12) सिद्धांत की अव्यवहारिकता – यह मार्क्स ने ‘फोरियर’ तथा ‘ओवन’ जैसे विद्वानों के सिद्धांत को कोरे कल्पनावादी कह कर उनकी खिल्ली उड़ाई है, तथापि वह स्वयं भी अपने राज्य सिद्धांत में कुछ कम कल्पनावादी नहीं है । मार्क्स का एक वर्गहीन और राज्यहीन समाज की स्थापना का विचार केवल एक स्वप्निल कल्पना है और ऐसी कल्पनायें कभी साकार नहीं होती । कार्ल मार्क्स एक वर्गहीन समाज की कल्पना करता है जिसमें राज्य का कोई स्थान नहीं होगा । उत्पादन के साधनों पर मिला जुला नियंत्रण होगा और लाभ को सभी में समान रूप से वितरित कर दिया जाएगा । इस समाज में कोई भेद-भाव नहीं रहेगा । ऐसे समाज में शोषण का कोई स्थान नहीं रहेगा । उत्पादन तथा अन्य सभी वस्तुओं पर राज्य का नियंत्रण रहेगा किंतु इस आदर्श समाज के संबंध में मार्क्स के सभी विचार स्वप्नलोकीय है । मार्क्स का यह मत बिल्कुल ही मान्य नहीं कि राज्य तिरोहित हो जाएगा । मार्क्स के इस मत की अमान्यता ऐतिहासिक एवं व्यवहारिक दोनों ही आधारों पर संभव है । प्रथम तो इतिहास में कोई ऐसा समय नहीं आया कि राज्य नागरिकों का रक्षक न रहा हो या राज्य विहीन समाज ही रहा हो । यह बात माननीय नहीं है कि शासक वर्ग अपनी सत्ता को स्वेच्छा से ही सर्वहारा वर्ग के हित में त्याग देंगे ।
        मार्क्स के दर्शन का मूल्यांकन (Evaluation of Marxian Philosophy ) – यद्यपि आलोचकों ने मार्क्स के दर्शन को समाज हित की दृष्टि से अच्छा नहीं माना किंतु फिर भी मार्क्स का दर्शन श्रमिकों के हित में एक क्रांतिकारी दर्शन है । मार्क्स के दर्शन ने पूंजीपतियों द्वारा श्रमिकों के शोषण की मात्रा को कम कर दिया है । इसलिए मार्क्सवाद प्रायः एक धर्म बन गया है और उसमें दीक्षित हो जाना एक धर्म- दीक्षा सी हो गई है ।