महिला सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं ? भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए कौन-कौन से उपाय किए गए हैं ?

महिला सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं ? भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए कौन-कौन से उपाय किए गए हैं ?
महिला सशक्तिकरण के अर्थ
(Meaning of Women Empowerment)
पुरुषों के समान महिलाओं को अधिकार प्रदान करना ही महिला सशक्तिकरण है । भारत में 2001 की जनगणना के अनुसार 48.3% (49.65 करोड़) जनसंख्या महिलाओं की है । वे साक्षरता, श्रम सहभागिता एवं आय के मामले में पुरुषों की तुलना में बहुत लाभों से वंचित है । भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय नीति 2001 में अंगीकार की गई, जिसका मूल उद्देश्य महिलाओं के लिए उनको ‘सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन तथा विकास’ के एजेंट के रूप में शक्तियां प्रदान करके समाज में एक समुचित स्थान सुनिश्चित करना है । ‘महिला सशक्तिकरण’ महिलाओं के विकास के लिए 10वीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) में अपनाया गया एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है ।
महिला सशक्तिकरण के लिए कार्यनीति- महिला सशक्तिकरण की प्रमुख कार्यनीति में सामाजिक अधिकारिता, आर्थिक अधिकारिता तथा लिंग संबंधी न्याय अर्थात् महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेद-भाव को समाप्त करना शामिल है । महिलाओं के विकास के लिए विभिन्न सकारात्मक नीतियों एवं कार्यक्रमों को अपना करके एक समर्थकारी वातावरण का निर्माण करने के लिए महिलाओं की सामाजिक अधिकारिता को निर्मित किया गया है । इसके अलावा उन्हें सभी मूलभूत न्यूनतम सेवाओं को सरल एवं समान तरीके से उपलब्ध कराना है ताकि वह अपनी क्षमता का भरपूर उपयोग कर सकें । चूंकि शिक्षा महिलाओं की सामाजिक अधिकारिता के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है इसलिए शिक्षा, विशेषकर बालिकाओं के मध्य शिक्षा के विकास हेतु प्रोत्साहन देने तथा स्कूल छोड़ने की दर को कम करने के लिए विशेष योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं । इनमें से दो योजनाएं सर्वशिक्षा अभियान तथा महिला समाख्या प्रमुख हैं । इसके अलावा महिला एवं बाल विकास विभाग शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए संक्षिप्त पाठ्यक्रम तथा ‘महिलाओं के लिए सुदूरवर्ती शिक्षा कार्यक्रम’ क्रियान्वित करता है ।

 

महिला सशक्तिकरण के लिए किए गए उपाय
महिला सशक्तिकरण के लिए जो कार्यक्रम चलाए गए हैं उनका विवरण निम्न प्रकार है-
(1) स्वयांसिद्धा- इस योजना के उद्देश्य हैं- आत्मनिर्भर महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाना, इन समूहों के सदस्यों में विश्वास और जागरूकता उत्पन्न करना, आर्थिक संसाधनों पर उनका नियंत्रण, लघु ऋणों तक महिलाओं की पहुंच बढ़ाना, स्थानीय स्तर की योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा अन्य विभागों की सेवाओं को समान रूप देना । मार्च 2001 में यह योजना 650 विकास-खण्डों में शुरू की गई । इस प्रकार स्वयं सिद्धा महिलाओं के विकास एवं सशक्तिकरण हेतु एक समन्वित परियोजना है । इस कार्यक्रम का ध्येय है-
अधिकार संपन्न महिलाओं का विकास करना, जो समाज, समुदाय और सरकार से अपना हक मांगे, जिनकी समान, सामाजिक और राजनीतिक संसाधनों तक पहुंच हो और उन पर जिनका नियंत्रण हो, जिनकी जागरुकता और कौशल बढ़ा हुआ है ।
स्वशक्ति परियोजना- पूर्व में यह ग्रामीण महिला विकास एवं सशक्तिकरण परियोजना के नाम से संबोधित की गई थी, जिसे 16 अक्टूबर, 1998 में लागू किया गया । यह योजना बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल तथा उत्तर-प्रदेश राज्यों के 57 जिलों में चलाई जा रही है । इस परियोजना के उद्देश्य हैं-
(1) आत्मनिर्भर महिलाओं के 16,000 तक स्वयंसेवी समूह गठित करना, प्रत्येक समूह में 15 से 20 सदस्यों होगें, जो संसाधनों का बेहतर ढंग से उपयोग करके अपने जीवन-स्तर में सुधार लाएंगी ।
(2) महिलाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करने वाली एजेंसियों के संस्थागत क्षमता को मजबूत तथा सुग्राही बनाना ।
(3) स्वयं सेवी समूहों और ऋण देने वाले प्रतिष्ठानों के बीच सम्पर्क का विकास करना, ताकि आमदनी अर्जित करने के कार्यों के लिए महिलाओं को ऋण सुविधायें निरन्तर सुनिश्चित कराई जा सकें ।
(4) महिलाओं के बेहतर जीवन-स्तर के लिए, निचले स्तर के कार्यों से मुक्त और समय की बचत करने वाले उपकरणों-सहित संसाधनों को सुलभ कराना,
(5) आमदनी अर्जित करने वाले कार्यों में महिलाओं, विशेषकर गरीब महिलाओं का नियंत्रण बढ़ाना । परियोजना के तहत अब तक 17,647 से स्वयंसेवी समूहों का गठन किया जा चुका है, यह लक्ष्य से अधिक है ।

इस समय (1) अन्य सरकारी योजनाओं के साथ समन्वय, (2) लघु-उद्यम विकास, (3) सामुदायिक संपत्ति का सृजन, (4) नेटवर्किंग और (5) ऋण-अनुबंध पर जोर दिया जा रहा है । यह परियोजना संयुक्त रूप से विश्व बैंक तथा कृषि विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय निधि (IFAD) से सहायता प्राप्त है ।
महिलाओं के लिए प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम को समर्थन (STEP) – यह कार्यक्रम गरीब एवं संपत्ति विहीन महिलाओं को रोजगार के आठ परंपरागत क्षेत्रों-कृषि, पशुपालन, डेयरी, मछलीपालन, हथकरघा, हस्तशिल्प, खादी एवं ग्रामोद्योग तथा रेशम कीट पालन के क्षेत्रों में अघतन कौशल एवं नवीन जानकारी उपलब्ध कराने का एक प्रयास है । यह योजना उन सरकारी संगठनों राज्यों निगमों, सहकारी संस्थाओं, संघों व स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से क्रियान्वित की जा रही है जो कम से कम 3 वर्ष की अवधि से अस्तित्व में है । वर्ष 2003 – 04 के दौरान 11 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिनसे 16,350 महिलाओं के लाभान्वित होने का अनुमान है ।
स्वाधार- कठिन परिस्थितियों में पड़ी महिलाओं के लाभ के लिए यह योजना वर्ष 2001-02 में शुरू की गई । इसमें ऐसी दीन-हीन महिलाएं सम्मिलित की जाती हैं, जो अपने परिवार द्वारा काशी, वृंदावन आदि धार्मिक स्थानों में बेसहारा छोड़ दी गई, जेलों से मुक्त की गई महिला कैदी, प्राकृतिक आपदाओं की शिकार ऐसी महिलाएं जो बेघर हैं और उनके पास कोई सामाजिक तथा आर्थिक सहारा नहीं है, वेश्यालयों तथा अन्य स्थानों से भागी हुई लड़कियां अथवा यौन अपराधों की शिकार महिलाएं / लड़कियां जिनको उनके परिवार वालों ने त्याग दिया है अथवा जो विभिन्न कारणों से अपने परिवारों में नहीं लौटना चाहती हैं, आतंकवाद की शिकार महिलाएं, जिन्हें परिवार का सहारा नहीं है तथा जिनके पास जीने के लिए आर्थिक जरिया नहीं है, मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाऐं, जिन्हें परिवार अथवा रिश्तेदारों से कोई मदद नहीं मिलती आदि ।
इस योजना के अंतर्गत उपलब्ध करवाई जा रही सेवाओं के पैकेज में भोजन, कपड़ा, आश्रम, स्वास्थ्य, देखभाल, परामर्श तथा कानूनी सहायता, शिक्षा के माध्यम से सामाजिक व आर्थिक पुनर्वास, जागरूकता उत्पन्न करना, कौशल उन्नयन तथा व्यवहारजन्य प्रशिक्षण का प्रावधान शामिल है । इस योजना में असहाय महिलाओं के लिए एक हेल्प लाइन भी चलाई जा रही है । वर्तमान में इस योजना के अंतर्गत 31 परियोजनाओं को धन उपलब्ध कराया जा रहा है ।
कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास- कामकाजी महिलाओं के लिए दिन में देख-रेख केंद्रों सहित छात्रावास भवनों के निर्माण और विस्तार के लिए सहायता की योजना 1972 से क्रियान्वित की जा रही है । इस योजना के अंतर्गत गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी निकायों और महिला समाज कल्याण तथा महिला शिक्षा के कार्यों में संलगन एजेंसियों, सरकारी उपक्रमों, महिला विकास निगमों, स्थानीय निकायों, विश्वविद्यालयों तथा राज्य सरकारों को कामकाजी महिलाओं के भवनों का निर्माण करने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाई जाती है । यह योजना कामकाजी महिलाओं (अकेली कामकाजी महिलाएं, अपने गृहनगरों से दूर के स्थानों पर काम कर रही महिलाएं, कामकाजी महिलाएं, जिनके पति शहर से बाहर गए हों आदि), रोजगार के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रही महिलाओं तथा विघालयोत्तर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में अध्ययन कर रही छात्राओं के सुरक्षित एवं वहिनीय आवास के प्रावधानों को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं । वर्ष 2003-04 के दौरान, इस योजना के अंतर्गत 1188 महिलाओं को लाभान्वित करते हुए 13 नए छात्रावास स्वीकृत किए गए ।
कामकाजी एवं बीमार महिलाओं के बच्चों के लिए शिशु सदन/ दिन में देख-रेख केंद्र- इस योजना का उद्देश्य उन माता-पिता के बच्चों (0.5) वर्ष की दिन में देख-रेख सुविधाएं उपलब्ध करवाना है जिनकी मासिक आय 1800 रुपए से अधिक नहीं है । इस योजना के अंतर्गत बच्चों के उपलब्ध कराई गई सुविधाओं में शयन एवं दिन में देख-रेख सेवाऐं, पूरक आहार, टीकाकरण, दवाई और मनोरंजन शामिल हैं । यह योजना केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड और राष्ट्रीयस्तर के स्वैच्छिक संगठनों- भारतीय बाल कल्याण परिषद तथा भारतीय आदिम जाति सेवक संघ के माध्यम से पूरे देश में क्रियान्वित की जा रही है ।
वर्ष 2003-04 के दौरान इस योजना के अंतर्गत 33.11 लाख बच्चे लाभान्वित हुए ।
स्वावलंबन- इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को स्थाई आधार पर रोजगार अथवा स्व-रोजगार प्राप्त करने में सहायता देने की दृष्टि से उन्हें प्रशिक्षण और कौशल उपलब्ध करवाना है । इसके अंतर्गत कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, इलेक्ट्रॉनिक असैम्बलिंग, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक मरम्मत, रेडिया व टी० वी० मरम्मत, वस्त्र निर्माण, हथकरघा बुनाई, हस्तशिल्प, सचिवीय पद्धति, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्य तथा कशीदाकारी के प्रशिक्षण दिए जाते हैं । इस योजना के अंतर्गत वर्ष 2003-04 के दौरान 71240 महिलाओं को लाभान्वित करने वाले 463 प्रस्ताव अनुमोदित किए गए ।
राष्ट्रीय महिला कोष (RMK) – अनौपचारिक क्षेत्र की निर्धन महिलाओं के लिए राष्ट्रीय ऋणनिधि के रूप में इस कोष की स्थापना डेयरी, कृषि, दुकानदारी, फेरी तथा हस्तशिल्प जैसी आय उत्पादक गतिविधियां शुरू करने के लिए निर्धन महिलाओं को ऋण सहायता तथा लघु वित्त की सहायता प्रदान करने की दृष्टि से एक पंजीकृत संस्था के रूप में 30 मार्च, 1993 को की गई । इसके माध्यम से वर्ष 2003-04 में 32,765 महिलाओं को लाभान्वित करते हुए 25 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की गई ।
महिला अधिकारिता वर्ष मानने का निर्णय- विकास की मुख्यधारा में महिलाओं के उचित स्थान के बारे में व्यापक जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 को “महिला अधिकारिता वर्ष” (Women Empowerment Year) के रूप में मनाया गया । इस दौरान एक ऐतिहासिक दस्तावेज “महिला अधिकारिता के लिए राष्ट्रीय नीति” पारित किया गया । योजना आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में गठित कार्य दल ने महिलाओं के जीवन से संबंधित 22 कानूनों की विस्तृत समीक्षा का काम अपने हाथ में लिया ।
महिला समाख्या कार्यक्रम (महिलाओं की समानता के लिए शिक्षा)- ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं, विशेष रूप से सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी महिलाओं की शिक्षा और उनको अधिकार संपन्न करने का यह एक ठोस कार्यक्रम है । इसे आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश तथा असम के 53 जिलों के 9,000 ग्रामों में क्रियान्वित किया जा रहा है ।
इस योजना के उद्देश्य हैं- महिलाओं के आत्म छवि और आत्म-विश्वास को बढ़ाना, ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिसमें महिलाएं वह ज्ञान व सूचना प्राप्त कर सकें जो उन्हें समाज में रचनात्मक भूमिका अदा करने में सहायता प्रदान करें; प्रबंध का विकेंद्रीकृत और भागीदारी वाला तरीका स्थापित करना; महिला संघों को गांवों में शैक्षिक गतिविधियों का मूल्यांकन और निगरानी करने के योग्य बनाना, महिलाओं और किशोर उम्र की लड़कियों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना और महिलाओं व लड़कियों के औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों तरह के शैक्षिक कार्यक्रमों में अधिक भागीदारी संभव बनाना । महिला संघ में दो या अधिक महिलाओं के दल को सरवी या सहायकी कहा जाता है, जिसे उत्प्रेरक के रूप में काम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है । ये दल महिलाओं को एकत्र करने का कार्य करते हैं और संघ में विचार विमर्श को बढ़ावा देते हैं ।

 

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