भारतीय प्रजातन्त्र के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक के रूप में भाषा की विवेचना कीजिये

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“भाषा की समस्या” सर्वाधिक जटिल समस्याओं में से एक है, जिसका आधुनिक भारत को सामना करना पड़ रहा है।” (बी० पी० लैम्ब) टिप्पणी कीजिये ।(“One of the most beffling problems that morden India faces is that of Language.” {B.P. Lamb} Comments).
                                                           अथवा
भारतीय प्रजातन्त्र के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक के रूप में भाषा की विवेचना कीजिये । (Discuss Language as a Socio-economic determinant of Indian Democracy).

उत्तर- भाषा की समस्या (The Problem of Language) भारत एक विस्तृत देश होने के कारण एक ‘विविध भाषा-भाषी राष्ट्र’ (Multi- Lingual Nation) है। यहाँ आज भी कम से 25 प्रमुख भाषायें प्रान्तों में बातचीत का माध्यम हैं।
दुष्प्रभाव (Evil Effects) – देश के इस विविध भाषा-भाषी स्वरूप ने जन-जीवन का प्रत्येक पक्ष गम्भीर रूप से प्रभावित किया है-

(a) इसने धर्म एवं जाति के द्वारा उत्पन्न की गई ‘सामाजिक दरारों’ (Social Cleavages) को अधिक गहरा किया है।
(b) इसने सामाजिक तथा राष्ट्रीय एकता तथा ‘एक रूप शिक्षा प्रणाली’ (Uniform Educational System) के मार्ग में बाधा उपस्थित की है।
(c) इसके कारण व्यक्तियों में राष्ट्रीय निष्ठा का स्थान प्रादेशिक निष्ठा ने ले लिया है।
(d) इसके कारण प्रादेशिक तथा स्थानीय नेताओं को राष्ट्रीय नेताओं के साथ विचार-विनिमय में कठिनाई अनुभव होती है।
संविधान निर्मात्री सभा में भाषा के प्रश्न पर विचार-विमर्श (Discussion in the Constituent Assembly on the Issue of Language)- देश के बहु-भाषा-भाषी स्वरूप ने संविधान निर्मात्री सभा के सदस्यों के समक्ष भी कठिनाई प्रस्तुत की पर संविधान सभा ने इस समस्या का समाधान करने के स्थान पर यह व्यवस्था कर दी कि संसद किसी नवीन राज्य का निर्माण कर सकती है अथवा दो राज्यों को मिलाकर एक नवीन राज्य का निर्माण कर सकती है। किसी राज्य के क्षेत्र को कम भी कर सकती है, या उनके क्षेत्र में वृद्धि कर सकती है तथा उनके नाम को परिवर्तित कर सकती है। इस सम्बन्ध में एक मात्र सीमा यह है कि इच्छुक राज्य अथवा दो राज्य अथवा दो से अधिक राज्य राष्ट्रपति के पास इस आशय का प्रतिवदेन करें कि उनके क्षेत्र में अथवा सीमाओं में अथवा नामों में परिवर्तन किया जाये तो राष्ट्रपति की सिफारिश पर संसद में ऐसा विधेयक लाया जा सकता है।

भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग (Demand for the Re-organization of the States on Linguistic Basis)
स्वतन्त्रता से पूर्व सन् 1938 में नेहरू समिति की रिपोर्ट में यह कहा गया था कि “प्रान्तों में भाषायी आधार पर पुनः वर्गीकरण करना अब रूप से वांछनीय हो गया है। भाषा सामान्यतः संस्कृति, परम्पराओं तथा साहित्य की एक विशेष जाति है।”
स्वतन्त्रता के पश्चात् शीघ्र ही भाषायी आधार पर पुनर्गठन की माँग की जाने लगी।
            समिति (Committee) – काँग्रेस ने अपने जयपुर अधिवेशन में भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के लिये एक समिति नियुक्त की। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाना चाहिये। 22 दिसम्बर सन् 1953 को पं. जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि सरकार ने यह निर्णय किया है कि राज्यों के पुनर्गठन के प्रश्न पर निष्पक्ष रूप से निर्णय करने के लिये एक आयोग की स्थापना की जायेगी। इससे संघ की प्रत्येक इकाई के निवासियों का कल्याण हो सकेगा तथा राष्ट्रोत्थान का मार्ग प्रशस्त होगा।
आयोग (Commission) – आयोग में सर्वश्री फजल अली (अध्यक्ष), सरदार पणिक्कर तथा हृदयनाथ कुंजरु थे। इस आयोग ने राज्यों के पुनर्गठन की समस्या का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट 30 सितम्बर 1955 को प्रकाशित की। इसकी रिपोर्ट में कहा गया कि राज्यों का पुनर्गठन भाषा, संस्कृति आदि सभी पक्षों के दृष्टिगत किया जाना चाहिये। राज्यों के पुनर्गठन के सम्बन्ध में आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये-

(i) भाषायी सजातीयता- इसको प्रशासनिक सुविधा तथा दक्षता की दृष्टि से मान्यता दी जाये तथापि यह कार्य इस प्रकार किया जाये कि यह अन्य पक्षों पर हावी न हो जाये ।

(ii) विभिन्न भाषा-भाषी समूहों का स्थान- एक भाषा-भाषी राज्य में विभिन्न भाषा-भाषी समूहों की शैक्षणिक, सांस्कृतिक तथा संचार सम्बन्धी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें महत्वपूर्ण स्थान दिया जाये।

(iii) सुरक्षायें- भाषायी अल्पसंख्यकों (Linguistic Minorities) को पर्याप्त सुरक्षायें दी जायें। कुछ अखिल भारतीय सेवाओं का पुनगर्ठन किया जाये।

(iv) प्रादेशिक भाषायें- हिन्दी के अतिरिक्त अन्य प्रादेशिक भाषाओं के विकास को प्रोत्साहित किया जाये तथा अंग्रेजी को विश्वविद्यालयों तथा अन्य उच्च शिक्षण-संस्थाओं में शिक्षण का माध्यम बनाये रखा जाये।

(v) पृथक् देश को अमान्यता- ‘पृथक् देश’ (Separate Homeland) के विचार तथा एक भाषा एक प्रान्त (One language one province) के विचार को प्रोत्साहन न दिया जाये। इसका कारण यह है कि एक भाषा के बोलने वाले एक से अधिक प्रान्त भी हो सकते हैं तथा एक प्रान्त में विभिन्न भाषा-भाषी समूह भी पाये जा सकते हैं।

(vi) पारस्परिक सहयोग- भारत में विभिन्न भाषा-भाषी प्रान्त है, अतएव ‘एक भाषावाद’ (Unilingualism) के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से देश की एकता को खतरा उत्पन्न होगा तथा पृथकतावादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलेगा।
केन्द्र सरकार ने ‘राज्य पुनर्गठन आयोग’ (State Re-organization Commission) की रिपोर्ट के आधार पर सन् 1956 में ‘राज्य पुनर्गठन विधेयक’ (States Re-organization Act) को संसद में प्रस्तुत किया और इस विधेयक को कुछ संशोधन करने के पश्चात् स्वीकार कर लिया गया।

व्यवस्थायें (Arrangements) – सन् 1956 के राज्य के पुनर्गठन विधेयक के अन्तर्गत सम्पूर्ण देश को 14 राज्यों तथा 5 केन्द्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया। सन् 1960 में ‘बम्बई पुनर्गठन अधिनियम’ (Bombay Re-organization Act) के द्वारा बम्बई राज्य को दो भागों, ‘महाराष्ट्र’ (Maharashtra) तथा ‘गुजरात’ (Gujarat) में विभाजित किया गया। सन् 1961 में एक अन्य अधिनियम पारित कर नागा पहाड़ियों के प्रदेश को मिलाकर नागालैंड का निर्माण किया गया। सन् 1962 में इसे पृथक राज्य का दर्जा प्रदान कर दिया। सन् 1965 में भाषायी आधार पर पंजाब राज्य का पुनर्गठन कर, इसे दो भागों में विभाजित किया गया- पंजाब (Punjab) तथा हरियाणा (Haryana)। पर पंजाब राज्य का समाधान नहीं हो सका। अतः ‘दास आयोग’ की नियुक्ति की गई। दास आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि चण्डीगढ़ पंजाब को दिया जाना चाहिये। केन्द्र सरकार ने आयोग की इस सिफारिश को अस्वीकार कर दिया। सन् 1985 में यह निर्णय किया गया कि चण्डीगढ़ पंजाब को दे दिया जाये तथा हिन्दी भाषी कुछ क्षेत्र हरियाणा को दिये जायें। केन्द्र सरकार हरियाणा सरकार को वित्तीय सहायता अपनी नई राजधानी बनाने के लिये देगी। अभी तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सका है। सन् 1970 में केन्द्र सरकार ने आसाम राज्य के अन्तर्गत मिजो तथा गारो हिल की पहाड़ियों को मिलाकर मेघालय नामक उपराज्य का निर्माण किया। इसी प्रकार अरुणाचल प्रदेश नाम के उपराज्य का भी निर्माण किया गया।

भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दोष (Demerits of the Reorganization of States on Linguistic Basis)
भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन ने प्रमुखतया निम्न समस्याओं को जन्म दिया है-

(a) अल्पसंख्यकों की स्थिति- कुछ राज्यों में अल्पसंख्यक भाषा-भाषी समूहों के लिये खतरा उत्पन्न हो गया ।

(b) पृथकतावाद- प्रादेशिक तथा पृथकतावादी प्रवृत्तियों को इससे प्रोत्साहन मिला है।

(c) दक्षिण राज्यों द्वारा हिन्दी का विरोध- जब संविधान के अनुच्छेद 393 के अनुसार यह घोषणा की गई कि 26 जनवरी, 1965 से हिन्दी सरकारी कामकाज की भाषा होगी तब दक्षिण के कुछ राज्यों ने इसका विरोध किया। मद्रास में हिन्दी विरोधी आन्दोलन चला। इस आन्दोलन को वहाँ की डी० एम० के० सरकार ने अपना समर्थन दिया। जब केन्द्रीय सरकार ने हिन्दी को ‘संघीय लोक सेवा आयोग’ (Union Public Service Commission) की परीक्षाओं का माध्यम बनाया तब दक्षिण के राज्यों ने केन्द्र की इस नीति को ‘हिन्दी साम्राज्यवाद’ (Hindi Imperialism) की संज्ञा देकर इसका विरोध किया तथा प्रान्तीय लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का माध्यम प्रादेशिक भाषाओं को बनाया। केन्द्र सरकार को बाध्य होकर हिन्दी के साथ-साथ अन्य प्रादेशिक भाषाओं को भी केन्द्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का माध्यम बनाना पड़ा।

(d) पृथक राज्य की माँग – सरकार के भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के कारण मद्रास वालों ने पृथक् तमिलनाडु, पंजाब वालों ने पृथक् सिक्ख राज्य तथा आसाम के पहाड़ी प्रदेशों ने भी पृथक् राज्य की माँग आरम्भ कर दी। इसी प्रकार बिहार में पृथक् झारखंड राज्य और उ० प्र० के पृथक् उत्तराखंड राज्य बनाने की माँग उठती रही।
द्विभाषावाद की नीति की असफलता (Failure of Policy of Bilingualism) – सन् 1965 में यह घोषणा की गयी कि हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा है पर जब गैर-हिन्दी भाषा-भाषी राज्यों ने प्रबल विरोध किया तब सरकार को, अपनी नीति को संशोधित कर द्वि-भाषा की नीति अपनानी पड़ी। इस नीति के अनुसार यह व्यवस्था थी कि केन्द्रीय सरकार के कार्यों के लिये हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रयोग उस समय तक जारी रहेगा जब तक कि दक्षिण के राज्य हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार नहीं कर लेते। दक्षिण के राज्यों ने केन्द्र सरकार की ‘द्वि-भाषावाद’ (Bi-lingualism) की नीति का विरोध किया।

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त्रिभावा फार्मूला (Three Language Formnia)
केन्द्र सरकार ने दक्षिणी राज्यों के इस असहयोगपूर्ण रुख के कारण बाध्य होकर ‘त्रिभाषा फार्मूला’ (Three Language Fornaula) निकाला। इस फार्मूले के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अंग्रेजी, हिन्दी तथा एक प्रादेशिक भाषा साथ-साथ सीखने की व्यवस्था की गयी। परन्तु यह फार्मूला भाषावाद की समस्या का समाधान न कर सका। भारत में भाषावाद तथा प्रान्तवाद की समस्या बहुत गम्भीर रूप धारण कर चुकी है।
 भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये सुरक्षा (Safeguards for the Linguistic Minorities) – संविधान के भाग तीन के मूल अधिकारों से सम्बन्धित प्रावधानों में भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों का समावेश है। ये प्रावधान निम्नलिखित हैं-

अनुच्छेद 29 (1) – भारत के किसी भी राज्य के क्षेत्र अथवा उसके किसी भाग के निवासी को, जिनकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाये रखने का अधिकार. होगा।

अनुच्छेद 29 (2) – राज्य द्वारा घोषित अथवा राज्य निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूल, वंश, जाति, भाषा अथवा इनमें से किसी आधार पर वंचित नहीं रखा जायेगा ।

अनुच्छेद (30) (1) – धर्म तथा भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना का अधिकार होगा।

अनुच्छेद 347 – राष्ट्रपति राज्य की जनसंख्या के सम्पूर्ण भाग की माँग पर भाषा के प्रयोग के सम्बन्ध में निर्देश जारी कर सकता है।

अनुच्छेद 350 – प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि वह संघ या राज्य के किसी भी प्राधिकारी को संघ या राज्य की किसी भी भाषा में अपनी शिकायत को दूर करने के लिए आवेदन दे सकता है।
भाषायी अल्पसंख्यकों की समस्या के दृष्टिगत राज्य पुनर्गठन आयोग ने मुख्यतया निम्नलिखित सिफारिशें कीं— (i) मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार, (ii) प्रशासन में अल्पसंख्यकों की भाषाओं का प्रयोग और उनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व ।
भारत सरकार ने आयोग की सिफारिशों के सम्बन्ध में राज्यों के मुख्यमन्त्रियों से मन्त्रणा करके एक स्मृति पत्र निकाला, इस स्मृति पत्र को संसद ने भी स्वीकार कर लिया। अतः इस
उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सन् 1956 में सातवें संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में
निम्नलिखित संशोधन किये गये-

अनुच्छेद 350 (क)- प्रत्येक राज्य और राज्य के अन्दर प्रत्येक अधिकारी का यह प्रयास होगा कि भाषागत अल्पसंख्यकों के बच्चों को शिक्षा के प्राथमिक उपक्रम में मातृ भाषा में शिक्षा देने के लिये पर्याप्त सुविधायें उपलब्ध कराई जायें और राष्ट्रपति किसी भी राज्य को ऐसे निर्देश दे सकेगा जिन्हें कि वह ऐसी सुविधाओं का प्रबन्ध सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक समझता है।

अनुच्छेद 350 (ख) –(1) भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये विशेष पदाधिकारी होगा जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जायेगा।
भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए संविधान के अन्तर्गत निम्न सुविधायें प्राप्त हैं-

(i) सम्बन्धित विषयों का अनुसंधान करना, तथा (ii) सम्बन्धित विषयों के सम्बन्ध में ऐसी अन्तरावधियों (Intervals) पर जिन्हें राष्ट्रपति निर्दिष्ट करें (iii) राष्ट्रपति को प्रतिवेदनों को देना विशेष पदाधिकारी का कर्तव्य होगा।
राष्ट्रपति ऐसे सब प्रतिवेदनों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवायेगा और सम्बन्धित राज्यों की सरकारों को भिजवायेगा।

भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये आयुक्त (Commissioner for Linguistic Minorities) – भाषायी अल्पसंख्यकों हेतु एक आयुक्त की नियुक्ति की गई। इस आयुक्त ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए इस सुविधा की व्यवस्था की जानी चाहिए कि महत्त्वपूर्ण सरकारी अधिसूचनाओं और नियमों को अल्पसंख्यकों की भाषा में भी प्रकाशित किया जाये।

 

 

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