भारत में संसदीय व्यवस्था या लोकतंत्र के भविष्य की विवेचना कीजिए।

भारत में संसदीय व्यवस्था या लोकतंत्र के भविष्य की विवेचना कीजिए।
                                 अथवा
भारत में संसदीय लोकतंत्र के भविष्य पर एक निबंध लिखिए।

भारत में संसदीय व्यवस्था या लोकतंत्र का भविष्य(Future of Parliamentary System or Democracy in India)
भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। सन् 1952 में प्रथम आम चुनाव के समय यहां मतदाताओं की संख्या 17 करोड़ 30 लाख से कुछ अधिक थी। यह संख्या आज बढ़कर 83 करोड़ से भी अधिक हो गई है। 1952, 1957, 1962, 1967, 1971, 1977, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 तथा 2014 में लोकसभा के लिए आयोजित सोलह उत्तरोत्तर चुनाव एवं राज्य विधानसभाओं के लिए हुए उत्तरोत्तर चुनावों ने हमारी राजनीतिक प्रणाली को शक्ति और स्थायित्व प्रदान किया। इन चुनावों का औचित्य, उनकी निष्पक्षता और सुव्यवस्था संपूर्ण विश्व के लिए उदाहरण हैं।

लोकतंत्र की विशेषताएं(Characteristics of Democracy)
लोकतंत्र में सभी मनुष्यों का समान महत्व होता है। इसी कारण मनुष्यों के अधिकार भी समान होते हैं। समाज की इकाई के रूप में व्यक्ति लोकतंत्र का मूलाधार है। व्यक्ति का अत्यधिक महत्व है। सभी को समता मिलती है। लोकतंत्र वास्तव में केवल शासन चलाने की पद्धति मात्र न होकर एक विकासशील दर्शन है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व लोकतंत्र के आदर्श हैं किंतु स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व उस समय तक स्थाई नहीं हो सकते जब तक कि व्यक्ति अपना सर्वोत्तम समाज को देने का संकल्प नहीं करता। लोकतंत्र के द्वारा व्यक्ति और शासन के मध्य प्रभावशाली संबंध सूत्र की स्थापना होती है। लोकतंत्र में मर्यादित एवं अनुशासित शासन स्थापित होता है। लोकतंत्र के द्वारा नैतिकता, ईमानदारी, आत्मनिर्भरता, दृढ़ता एवं वोट की शक्ति के कारण जनता की प्रतिष्ठा होती है। लोकतंत्र में शासन की व्यवस्था में परिवर्तन का अधिकार केवल जनता को प्राप्त होता है। यह परिवर्तन जनता के मत द्वारा संभव होता है, किन्हीं अन्य तरीकों से नहीं। अतः लोकतंत्र में परिवर्तन के समय रक्तपात की संभावना नहीं होती।
लोकतंत्र की रक्षा का भार विरोधी पक्ष पर होता है। विरोधी पक्ष का दायित्व है कि वह बहुमत का उचित विरोध करें। आलोचना सृजनात्मक एवं सैद्धांतिक हो ।
भारत में संसदीय लोकतंत्र-पृष्ठभूमि (Parliamentary Democracy in India Background)- स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारत ने संसदीय लोकतंत्र को अपनाया है। पं० जवाहरलाल नेहरू ने 14 अगस्त, 1947 की अध्र्दरात्रि में भारत की स्वाधीनता प्राप्ति के समय कहा “बहुत वर्ष हुए हमने भाग्य से एक सौदा किया था और अब अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का समय आया है।” उन्होंने जनवरी, 1938 में लिखा था, “राष्ट्रीय कांग्रेस का उद्देश्य स्वतंत्र तथा लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना करना है।” स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने हेतु हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने संविधान सभा में एक प्रस्ताव प्रस्तुत करके घोषणा कि, “भारत को स्वतंत्र, प्रभुत्वसम्पन्नता गणराज्य उद्द्घोषित किया जाए जिसे समस्त शक्ति और अधिकार जनता से प्राप्त होंगे।”
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है जाता है कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर और ‘एक व्यक्ति, एक मत’ के सिद्धांत के अनुसार भारत में लोकतंत्र की स्थापना की गई। वयस्क मताधिकार द्वारा जाति, लिंग और आर्थिक तथा शिक्षा संबंधी किसी भेदभाव के बिना प्रत्येक वयस्क भारतीय नागरिक लोकतंत्र में सहभागी हो गया। भारत में चुनाव व्यक्ति स्वातंत्रय और विचार स्वातंत्रय के वातावरण में सम्पन्न होते हैं। अन्य लोकतांत्रिक देशों के अनुरूप भारत सरकार का शासन मंत्रिपरिषद् करती हैं। परंतु मंत्रिपरिषद् स्वतंत्र न होकर अपने कार्यों के लिए सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदाई है। उसी से अर्थात् संसद से मंत्रिपरिषद् को शक्तियां प्राप्त होती हैं।

भारत में संसदीय लोकतंत्र की दुर्बलताएं(The Weak Points of Parliamentary Democracy in India)
विचारकों के अनुसार भारत में संसदीय प्रजातंत्र का भविष्य अंधकारपूर्ण है। भारतीय संविधान में संसदीय ढांचे के लोकतंत्र की स्थापना की गई है। यह स्मरणीय है कि सच्चा लोकतंत्र संसदीय लोकतंत्र ही होता है क्योंकि इसमें बिना हिंसात्मक क्रांति के सरकार को परिवर्तित किया जा सकता है तथापि विगत कुछ वर्षों से भारत में लोकतंत्र की जड़ें हिलती प्रतीत हो रही हैं। विगत वर्षों में अनेक स्थानों पर कानून और व्यवस्था की खराब स्थिति, अनियंत्रित हिंसा, उपद्रव, लूटमार, सामान्य बात हो गई। प्राकृतिक प्रकोप, अतिवृष्टि, अकाल और सूखे तथा नौकरशाही और राजनीतिज्ञों के समय पर निर्णय न लिए जाने के आर्थिक विकास का नियोजना छिन्न-भिन्न कर दिया। वर्तमान समय में देश का जनसाधारण निर्धनता, अभाव, बेकारी और महंगाई से त्रस्त हैं। द्रुतगति से मूल्य-वृद्धि की वर्तमान प्रक्रिया ने आर्थिक स्थिति को विस्फोटक स्थिति तक पहुंचा दिया है। सत्तालोलुपता की बढ़ती हुई प्रवृत्ति के कारण राष्ट्रीय जीवन भ्रष्ट और अनुशासन हीन हो गया है। यही कारण है कि वगत कुछ वर्षों से संसदीय लोकतंत्र का विकल्प खोजा जा रहा है। यहां तक कि कुछ क्षेत्रों द्वारा ‘सीमित निरंकुशता’ और ‘अध्यक्षीय लोकतंत्र’ का विकल्प प्रस्तावित भी किया गया है किंतु निरंकुशता का दृष्टिकोण लोकतंत्र का विकल्प संभव नहीं है। अतएव यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
निस्संदेह संसदीय व्यवस्था के सुचारू रूप से न चल पाने के लिए उत्तरदाई हमारी संसदीय प्रणाली में कई कमियां और कुछ संस्थानात्मक विकृतियां हैं, पर वास्तव में इनके लिए उत्तरदाई संसदीय व्यवस्था न होकर नेतृत्व वर्ग ही है। नेतृत्व वर्ग की असफलता के लिए संसदीय प्रणाली को उत्तरदाई नहीं ठहराया जा सकता।
रघुकुल तिलक के अनुसार, “भारत की जनता अपने स्वभाव और मनोवृति के कारण लोकतंत्र को सफल बनाने की क्षमता नहीं रखती। यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं लोगों को भाग्यवादी और सहनशील होना सिखाती हैं और इसलिए वे निरंकुश शासन के अत्याचार को सहज ही सहन कर लेते हैं तथा सत्ताधारियों का विरोध या आलोचना करना पसंद नहीं करते। इसके अतिरिक्त यहां का समाज जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, आदि के आधार पर इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में बटा हुआ है कि कोई भी निरंकुश तंत्र इस फूट से लाभ उठाकर सहज ही अपना आधिपत्य जमा सकता है।”

भारतीय लोकतंत्र के कतिपय दुर्बल तत्व इस प्रकार हैं-
(1) सशक्त प्रतिपक्ष का अभाव (Lack of Strong Opposition)- लगभग 40-42 वर्ष तक सशक्त प्रतिपक्ष का निर्माण नहीं हो सका। एक सशक्त विरोधी दल देश में स्वस्थ संसदीय लोकतंत्रीय व्यवस्था की स्थापना के लिए अति आवश्यक है। 1989 के बाद संसद में सुदृढ़ विपक्ष उभरने लगा। इसका प्रमुख कारण था गैर-कांग्रेसी मंत्रिमंडलों का गठन।
श्री वी० पी० सिंह की सरकार का पतन, श्री चंद्रशेखर की सरकार को लोकसभा में बहुमत न मिलने की संभावना पर लोकसभा को भंग किया जाना, श्री राव की अल्पमतीय सरकार का बना रहना, 176 सदस्यों वाली देवगौड़ा सरकार का 144 सदस्यों वाली कांग्रेस के समर्थन के कारण बना रहना तथा 28 नवंबर, 1997 को अर्थात् कुल मिलाकर 18 माह 11 दिन चलने वाली सरकार का पतन और इसके पश्चात् 26 अप्रैल, 1998 को तेरह माह पुरानी श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का पतन इसके परिणाम हैं।

(2) उत्तरदायी प्रतिपक्ष का अभाव (Lack of Responsible Opposition)- संसदीय लोकतंत्र में आलोचना करना विरोधी पक्ष का कार्य होता है पर आलोचना सृजनात्मक एवं सैद्धांतिक होनी चाहिए। विरोधी पक्ष को चाहिए कि वह जनता को परिवर्तन के लिए प्रशिक्षण दे। किन्तु हमारे देश में ऐसा नहीं है। ग्यारहवी व बारहवीं लोकसभा को भंग कराते समय प्रतिपक्ष का अनुत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार सर्वविदित हो गया।

(3) राजनीतिक-अस्थिरता (Political Instability)- सन् 1967 के निर्वाचनों के उपरांत अनेक राज्यों में संविद सरकारों का गठन हुआ और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। सन् 1972 के निर्वाचनों के उपरांत एक दलीय सरकारों का निर्माण होने के उपरांत भी अनेक मंत्रिमंडलों को गुटबाजी के कारण पदच्युत होना पड़ा। मार्च,1977 के बाद जनता पार्टी के शासनकाल में केन्द्र और राज्य-स्तर पर बढ़ती हुई घटकवादी प्रवृत्ति व्याप्त हो गई।इसका परिणाम यह हुआ कि प्रशासन में शून्यता आने लगी। जुलाई, 1979 से जनवरी, 1980 तक ऐसा प्रतीत हुआ जैसे देश में कोई सरकार ही नहीं हो। इसका कारण यह था कि कामचलाउ चरणसिंह सरकार के अस्तित्व के साथ राष्ट्रपति ने यह शर्त लगा रखी थी कि वह नीति सम्बन्धी निर्णय नहीं ले सकेगी। 1987-88 में भी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री सम्बन्धों तथा शस्त्रों की खरीद के घोटालों (बोफोर्स और पनडुब्बी सौदे में दी गई दलाली) ने नेतृत्व का संकट उत्पन्न कर दिया। दिसंबर 1989 से कार्यरत श्री वी० पी० सिंह की केंद्रीय सरकार एक अल्पमतीय सरकार थी जो साम्यवादियों और भाजपा जैसे परस्पर असंगत विचारधारा वाले दलों के समर्थन पर टिकी हुई थी। यही कारण था कि यह केवल 18 नवंबर, 1989 से 13 मार्च, 1991 तक रह सकी। 10 वीं लोकसभा में गठित राव सरकार किसी न किसी प्रकार समय पूरा कर सकी। ग्यारहवीं लोकसभा में तो स्थिति हास्यास्पद रही। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 16 मार्च, 1996 को सरकार का गठन हुआ पर यह बहुमत सिद्ध न कर सकी तथा 28 मई को श्री वाजपेयी को त्याग पत्र देना पड़ा। कांग्रेस के बाहरी समर्थन से श्री एच० डी० देवगौड़ा के नेतृत्व के संयुक्त मोर्चा सरकार ने 1 जून, 1996 को शपथ ली और 12 जून को बहुमत प्राप्त किया। 30 मार्च,1997 को कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने पर 11 अप्रैल को देवगौड़ा सरकार के समर्थन में विश्वास मत प्राप्त न हो सका। 21 अप्रैल 1977 को कांग्रेस के समर्थन से श्री इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। 28 दिसंबर, 1997 को गुजरात सरकार से कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया तथा गुजराल सरकार ने त्याग-पत्र दिया। बारहवीं लोकसभा की भी यही दुर्गति रही। मार्च, 1998 में गठित लोकसभा में श्री वाजपेयी के नेतृत्व में कई दलों की मिली-जुली सरकार बनी। 17 अप्रैल,1999 को यह सरकार भी एक मत से पराजित हो गई।

(4) हिंसा और आंदोलन (Violence and Movements)- देश में हिंसा और जन-आंदोलन आम बात हो गई है। निर्वाचित विधानसभाओं को भंग करवाने के लिए केन्द्रीय सरकार पर दबाव डाला गया। विधानसभा के सदस्यों से त्यागपत्र की मांग करते हुए उनके घरों पर प्रदर्शन किए गए। घेराव, बन्द और अनशन का सहारा लेकर ऐसे आंदोलनों का विस्तार किया गया। बिहार इसका ज्वलंत उदाहरण है।

(5) महंगाई और भ्रष्टाचार (Price Rising and Corruption)- महंगाई और भ्रष्टाचार ने मध्यम वर्ग की शक्ति को जर्जर कर दिया। आर्थिक असमानता पराकाष्ठा पर है। एक ओर करोड़ों की संपत्ति के स्वामी दिन-रात विकास और वैभव का अशोभनीय प्रदर्शन करते हैं तो दूसरी ओर लाखों आदमी भुखमरी के शिकार हैं।

(6) सांप्रदायिकता, भाषावाद और प्रादेशिकता (Communalism, Linguism and Provincialism)- साम्प्रदायिकता, प्रादेशिकता और भाषावाद की समस्याएं गत 50 वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के लिए सिरदर्द रही हैैं। इन समस्याओं ने देश में विघटनकारी तत्वों को प्रोत्साहित किया है। इन्होंने अनेक अवसरों पर हिंसात्मक वातावरण का निर्माण किया।

(7) संसदीय वाद-विवाद में गुणात्मक ह्मस (Qualitative Decay in Parliamentary Discussion)- संसद और राज्य-विधान मंडलों की कार्य-प्रणाली में गुणात्मक ह्मस हुआ है। छिद्रान्वेषण, व्यक्ति- दोषारोपण की बढ़ती हुई प्रवृत्ति के कारण संसदीय मंच का अवमूल्यन हुआ है। कुछ राज्यों की विधानसभाओं के अध्यक्षों ने दलीय स्वार्थों की पूर्ति का साधन बनकर अध्यक्षीय कुर्सी की गरिमा तक को ठेस पहुंचाई। राज्यपालों की भूमिका भी निष्पक्ष नहीं रही। अनेक अवसरों पर एक ही समय पर दो-दो व्यक्ति विधिवत मुख्यमंत्री होने का दावा करते रहे। भाजपा के कल्याणसिंह के नेतृत्व वाली सरकार से जगदंबिका पाल के नेतृत्व में लोकतांत्रिक कांग्रेस के कुछ विधायकों द्वारा समर्थन वापसी, कल्याण सरकार के वास्तव में अल्पमत में रहने की पुष्टि कराए बिना राज्यपाल रामेश भंडारी द्वारा उनकी सरकार की बर्खास्तगी तथा आनन-फानन में जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाना, स्वस्थ लोकतांत्रिक परिपाटी के अनुरूप नहीं कहे जा सकते ।

(8) संसद का घटता स्तर (Deteriorating Standard of Parliament)- भारतीय संविधान संसद और कार्यपालिका की सत्तायें भिन्नता होने की अपेक्षा करता था। पर वर्तमान में उसके काम काज का एक विचित्र और अवांछनीय मिलाप हो गया है। सिद्धांतत: संसद स्वामिनी है तथा जब तक संसद की इच्छा हो मंत्रिमंडल सत्तारूढ़ रह सकता है पर व्यवहार में मंत्रिमंडल ने संसद के काम और उसके समस्त अधिकार हस्तगत कर लिए हैं। संसद पंगु रह गई है। कांग्रेस सरकार के शासन काल में संसद में दल पर मंत्रिमंडल की पूरी पकड़ होने के कारण भारतीय संसद के लिए सत्ता संघर्ष की स्थली बने रहना कठिन हो गया। डॉ० सिंघवी के अनुसार, “आज संसद केवल समिति की साधना रही है। नीति के निर्माण और संशोधन में संसद सशक्त मार्ग-दर्शन प्रदान करने में अपने को असमर्थ पाती है।”

(9) नौकरशाही की शक्ति में वृद्धि (Increase in the Powers of Bureaucracy)- मंत्रिमंडल सचिवालय और प्रधानमंत्री सचिवालय का बढ़ता हुआ महत्व सर्वविदित है। गांवों में आज भी जनता पटवारी, थानेदार तथा तहसीलदार की आश्रित है। नौकरशाही में आज भी जनता के स्वामी बनने की भावना है।

(10) दल-बदल (Floor Crossing)- दल बदल की प्रवृत्ति ने संसदीय वातावरण को दूषित कर दिया है। मुल्यों की राजनीति के स्थान पर सत्तालोलुपता की राजनीति प्रारंभ हुई। इसने राज्यों में संसदीय सरकार का संचालन खतरे में डाला तथा लोकप्रिय सरकारों के संगठन में बाधा डाली है। दल-बदल के परिणाम स्वरुप प्रशासन में नौकरशाही का प्रभुत्व बढ़ने के साथ-साथ जनता पर चुनावों का बोझ बढ़ा है। सरकारों स्थिर प्रशासकीय नीतियों का निर्माण नहीं कर पाई है। अनेक राज्यों का प्रशासन ठप्प हो गया।

(11) बहुदलीय प्रथा (Mutli-Party System)- भारत में राजनीतिक दलों की बहुलता लोकतंत्र के विकास तथा संसदीय शासन के सुचारु संचालन में बड़ी बाधा है। राजनीतिक दलों में सहयोग एवं सामंजस्य की भावना नहीं है। प्रत्येक राजनीतिक दल में फूट और गुटबंदी विद्यमान है। असंतुष्ट गुट के लोग अपना अलग दल बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। जब तक राजनीतिक दलों में ध्रुवीकरण नहीं होता और राजनीतिक गुट दो तीन प्रमुख दलों में संगठित नहीं होते तब तक संसदीय संस्थाएं जीवित नहीं रह सकतीं।

(12) राजनीतिक संघर्ष की उभरती प्रवृत्ति (Rising Tendency of Political Conflict)- केंद्र और राज्यों में पृथक्-पृथक् दलों की सरकारों का निर्माण होने का परिणाम यह हुआ कि तनाव, परस्पर विरोध और विद्रोह प्रबल हुआ। इससे प्रांतीय, संकुचित और पृथकतावादी प्रवृत्तियों को बल मिला।

(13) नैतिक मूल्यों का ह्रास (Decay of Moral Values)- स्वाधीनता के बाद राष्ट्रीय चरित्र निर्माण हेतु कोई प्रयास नहीं किया गया। चोर-बाजारी, जमाखोरी, मिलावट और प्रशासन में भ्रष्टाचार की बुराइयां व्याप्त होने से हमारी आस्थाएं और निष्ठाएं डगमगाने लगीं।

(14) दूषित चुनाव प्रणाली (Spoiled Election System)- हमारी वर्तमान चुनाव प्रणाली बहुमत का शासन स्थापित करने में सफल सिद्ध नहीं हुई। यह प्रणाली उन देशों में सफल होती है जहां की राजनीतिक व्यवस्था द्विदलीय पद्धति के अनुसार संचालित होती हो। चुनाव की वर्तमान प्रणाली से अल्पमत सरकारें ही गठित हो सकती हैं।
इन अल्पमत सरकारों का शीघ्र ही पतन उस समय हो जाता है जबकि कोई भी घटक या कोई असंतुष्ट गुट पृथक हो जाता है। परिणामत: 1977 में गठित जनता पार्टी सरकार का 1980 में, 1989 में गठित जनता दल सरकार का 1991 में, पहली जून, 1996 को श्री देवगौड़ा के नेतृत्व में गठित सरकार का, 21 अप्रैल, 1997 को श्री गुजराल के नेतृत्व में गठित सरकार का तथा 26 अप्रैल, 1999 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का पतन हुआ।
चुनाव केवल औपचारिक बनते जा रहे हैं। धन प्रभाव से चुनाव विकृत हो रहे हैं। कई स्थानों पर चुनावों में अपराधी तत्वों ने जोर-जबर्दस्ती से मतदाताओं के स्वतंत्र रूप से मत देने के अधिकार को भी छीन लिया। बिहार में तो ‘बूथ कैपचरिंग’ सामान्य बात हो गई है।

(15) जातिवाद और अस्पृश्यता से खतरा (Danger from Casteism and Untoucheability)- जातिवाद और अस्पृश्यता से देश की एकता छिन्न-भिन्न होकर लोकतंत्र को धक्का पहुंच सकता है। जातिवाद और सम्प्रदायवाद को चुनावों में आज भी प्रोत्साहन दिया जाता है। इससे न केवल राष्ट्र की एकता को खतरा है अपितु सामाजिक और राजनीतिक समता का मार्ग भी अवरुद्ध होता है।

(16) आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव (Lack of Economic Freedom)- हमारी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था लाभ के पहिये से बंधी हुई है। अधिक पैदावार के बावजूद औसत भारतीय के आहार की मात्रा और गुण में विशेष वृद्धि नहीं हो सकी है। राजनीतिक लोकतंत्र के अतिरिक्त आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के अभाव में संसदीय शासन कदापि सफल नहीं हो सकता।

(17) अनुशासनहीनता (Indiscipline)- कुछ लोग लोकतंत्र की असफलता से इतने निराश हो चुके हें कि वे हिंसा और अराजकता पर उतर आए हैं, उन्हें ‘वाक आउट’ और प्रदर्शन में विश्वास हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या (1984), दिल्ली में वर्ग विशेष की हत्यायें लोगों का जिन्दा जलाया जाना, पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद, राजीव गांधी की हत्या (1991) संसद तथा विधानसभाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों का अवांछनीय व्यवहार आदि अनुशासनहीनता के उदाहरण हैं।

(18) केन्द्रीयकरण (Centralisation)- लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की चेतना और पद्धति के मूल्यों के विश्वास में निहित होती है पर भारत में नीचे से शक्ति के केन्द्र तक पहुंचना निरंतर कम होता जा रहा है।

(19) केंद्र राज्य संबंधों में तनाव (Tension in Central State Relations)- वर्तमान शासन प्रणाली के अंतर्गत केंद्र राज्य संबंधों में परस्पर अविश्वास बढ़ा है। अनेक राज्य सरकारों की शिकायतें हैं कि अधिक से अधिक अधिकार अपने हाथ में लेकर केंद्र ने प्रदेशों की पूरी राजनीतिक और प्रशासन की व्यवस्था को अपना पराश्रयी बनाने का प्रयास जारी रखा है। फरवरी, 1980 में केंद्र द्वारा नौ राज्यों की विधानसभायें भंग करना प्रजातांत्रिक नहीं कहा जा सकता।

संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने हेतु सुझाव(Suggestions for Making Parliamentary Democracy Strong)
भारत में संसदीय लोकतंत्र को अधिक सार्थक बनाने हेतु राजनीतिक संरचना में अग्रलिखित ठोस सुधार करने आवश्यक है-
(1) दल-बदल को रोकना (To Stop Floor Crossing)- इससे सत्ता हस्तगत करने की विकृत मनोवृति पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।52वाॅं संवैधानिक संशोधन इस दिशा में किया गया सराहनीय प्रयास है।

(2) प्रभावशाली विरोधी दल का एक ‘संस्थागत’ आवश्यकता मानकर विकास (Development of an Effectice Opposition as an Institutional Necessity)- राजनीतिक दलों को ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को योगदान तीव्रतर कर सुदृढ़ प्रतिपक्ष के निर्माण में सहयोग देना चाहिए।

(3) हिंसा का बहिष्कार (Boycott of Violence)- विरोधी पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विरोध का बहाना बनाकर विद्रोह और अराजकता को न भड़काएं।

(4) प्रशासन को अधिक उत्तरदाई और कार्यकुशल बनाना (To Make the Administration More Responsible and Efficient)- शासकीय कर्मचारियों में इस भावना का विकास करना कि वे जनता के सेवक हैं न कि मालिक।

(5) संसदीय परामर्शदात्री समितियों की कार्य क्षमता में वृद्धि (Increase in the Working-Capacity of Parliamentary Advisory Commitees)- इससे प्रशासन पर संसदीय नियंत्रण प्रशिक्षण बन सकेगा।

(6) प्रशिक्षण (Training)- संसद और विधानमंडल के सदस्यों को संसदीय प्रक्रिया और कार्यविधि से संबंधित प्रशिक्षण देना चाहिए।

(7) मतदाताओं में राजनीतिक चेतना जागृत करना (To Pise Political Awareness in Voters)- इससे वे चुनाव के अवसर पर मतदान द्वारा अपनी इच्छा की कभिव्यक्ति दे सकेंगे। यथार्थ में लोकतंत्र का आधार जनता की सहमति है।

(8) योग्य और ईमानदार प्रतिनिधियों को चुनावों में सफल बनाना (To Make Able and Honest Representatives Successful in Elections)- डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा की कार्यवाही के समापन भाषण में कहा था, “संविधान में कुछ भी प्रावधान हो या न हो, देश का कल्याण इस पर निर्भर करेगा कि उसका शासन कैसा है और शासन निर्भर करेगा शासकों पर। कहा जाता है किसी देश को वैसी ही सरकार मिलती है जिसका वह अधिकार हो जिन लोगों को चुना गया यदि वे योग्य, ईमानदार तथा चरित्र और निष्ठा वाले व्यक्ति हुए तो वे त्रुटिपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे। यदि उनमें इसकी कमी हुई तो संविधान देश को नहीं बचा सकता।”

(9) चुनाव प्रक्रिया में सुधार (Reforms in Election Process)- खर्चीली और दूषित चुनाव प्रणाली के कारण हमारा लोकतंत्र धनिकतंत्र के रूप में परिवर्तित हो गया है। अल्पमतीय सरकारों के दौर को समाप्त करने के लिए वर्तमान निर्वाचन प्रणाली के स्थान पर बहुमत-प्रणाली तथा सूची-प्रणाली का मिश्रित रूप अपनाया जाना चाहिए। इस प्रणाली के अनुसार व्यवस्थापिका के कुछ सदस्यों के आधे भाग को मतदाताओं के प्रत्यक्ष मतदान द्वारा बहुमत-प्रणाली के अनुसार और आधे भाग को प्रत्यक्ष दलीय जन-समर्थन के आधार पर सूची-प्रणाली के आधार पर निर्वाचित किया जाए। प्रत्येक मतदाता को एक स्थान पर मत प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हो।
निष्कर्षत: आर्थिक दृष्टि से नये कीर्तिमान की स्थापना, महंगाई पर नियंत्रण और बेरोजगारी के लिए काम जुटाना सरकार के लिए आवश्यक हो। भारत में लोकतंत्र का भविष्य उसकी आर्थिक उन्नति और सामाजिक न्याय की व्यवस्थाओं पर भी निर्भर करता है।

भारत में लोकतंत्र का भविष्य(Future of Democracy in India)
लोकतंत्र मूलतः एक नैतिक व्यवस्था है। इसमें निर्णय खुले तौर पर किए जाने चाहिए, जनता को शांतिपूर्ण ढंग से सरकारों को परिवर्तित करने और नमी सरकार को चुनने का अधिकार होना चाहिए। विरोधी पक्ष बहुमत के शासन को माने। यह आवश्यक है कि भारत की जनता और नेता कम महत्वकांक्षी हों। वस्तुत: भारतीय जनतंत्र में महत्वकांक्षा का अभाव है। जनता महत्वकांक्षी है और न ही नेता। नेताओं की महत्वाकांक्षा विधानसभा या संसद तक चुने जाने तक सीमित है, या मंत्री विशेष बनने तक।

भारत में लोकतंत्र को सफल बनाने हेतु कुछ सुझाव निम्न प्रकार हैं-
(i) देश की प्राथमिक आर्थिक समस्याओं का शीघ्रतम समाधान किया जाए।
(ii) स्वच्छ चुनाव की व्यवस्था के लिए प्रयुक्त काले धन की बुराई का सर्वथा निवारण किया जाए।
(iii) निरंकुश और साम्यवादी प्रवृत्तियों को शीघ्रताशीघ्र समाप्त किया जाए।
(iv) विपक्ष के विचारों का शासक दल आदर करे तथा उन पर उचित प्रकार से विचार करे।
(v) भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सर्वदलीय प्रयत्न किए जाएं।
(vi) राजनीति के अपराधीकरण को दृढ़था से रोका जाए।
(vii) किसी भी समुदाय की संतुष्टिकरण की नीति को रोका जाए।
(viii) राष्ट्रीयता और एकता की भावना उत्पन्न करने के सभी आवश्यक प्रयत्न किये जाएं।

हमारा देश आज राजनीतिक और आर्थिक भंवर में है। देश में लोग राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की अनुपयुक्त कार्यवाहियों से ऊब गए हैं। लोकतंत्र में उनकी आस्था ही डगमगा रही है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि हमारे प्रतिनिधि और प्रतिनिधियात्मक समाज अपने कर्तव्यों का भली प्रकार निर्वहन करें।

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