भारत में प्राचीन तथा आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतन एवं परंपरा के विकास ।

भारत में प्राचीन तथा आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतन एवं परंपरा के विकास ।
                                    अथवा
भारत में प्रजातांत्रिक विचारों के विकास की विवेचना ।

भारत में प्राचीन प्रजातांत्रिक चिंतन तथा परंपरा
(Ancient Democratic Thought and Tradition in India)
प्रत्येक देश को एक राजनीतिक व्यवस्था का चयन करना आवश्यक होता है । शासन करने हेतु जितनी व्यवस्थाएं विश्व में प्रचलित हैं, उनमें ‘लोकतंत्र’ सर्वोपरि है । लोकतन्त्रिक व्यवस्था के अन्य प्रचलित नाम हैं- प्रजातंत्र, जनतंत्र तथा गणतंत्र आदि । प्राचीन भारत में गणतान्त्रिक व्यवस्था थी । राजा का चुनाव होता था, वह वंशानुगत नहीं था । राज्य परिषद के सदस्य राजा का चुनाव करते थे तथा उसे निरंकुश शक्तियां प्राप्त नहीं थी । वी० पी० वर्मा के अनुसार, “उन विद्वानों को, जिन्होंने एशिया के विषय में केवल निरंकुश, धर्मतंत्रात्मक स्वेच्छाचारी शासन की धारण बनाई हुई है, यह जानकार आश्चर्य होगा कि प्राचीन भारत में गणतंत्रीय संस्थाएं थी ।” एन० सी० बन्घोपाध्याय का भी यह विचार है कि, “प्राचीन भारत में एक ही व्यक्ति के हाथों में दैवी सत्ता के स्थान पर बहुलवादी राजनीतिक अनुशासन का क्रमिक रूप से विकास हुआ ।”
प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि पूर्व वैदिक काल में राजतंत्रों का युग था परंतु उत्तर वैदिक काल में प्रचलित पद्धति में कुछ परिवर्तन हुआ । ऋग्वेद, अथव्रवेद तथा महाभारत में भी राजतंत्र को ही प्राथमिकता दी गई परंतु महाभारत काल के अंतिम समय में अनेक गणतन्त्रों का उल्लेख पाया जाता है । इसके बाद बौद्ध काल में भी अनेकों गणतन्त्रों का उल्लेख मिलता है । यूनानी लेखकों के लेखों से भी पता चलता है कि सिकंदर के आक्रमण के समय में अनेक गणराज्य विधमान थे । कौटिल्य तथा पाणिनी ने भी गणराज्यों का उल्लेख किया है ।
देवीदत्त शुक्ल के अनुसार, “भारतीय विद्वानों ने सर्वप्रथम जनतंत्रात्मक शासन की स्थापना की थी । भारत में राज्य की उत्पत्ति ही सर्वप्रथम जनतंत्र के रूप में हुए थी तथा वैदिक काल में जनतंत्र का रूप पूर्णतया विकसित हो चुका था । कलान्तर में जनतंत्र शासन में कुछ दोष उत्पन्न हुए, इसी कारण जनतंत्र के रूप में भी कुछ परिवर्तन करने पड़े तथा शासन का रूप जनतंत्र से राजतन्त्र की ओर झुका ।”
साधारणतया अधिकांश विद्वान जिनमें डॉ० जायसवाल भी सम्मिलित है, यह मानते हैं कि भारत में जनतंत्र प्रणाली वैदिक काल के बाद फलीभूत हुई । आर० सी० शर्मा इस मत से सहमत नहीं । उनका कहना है कि गण शब्द ऋग्वेद में 46 बार तथा अर्थव्र्वेद में 9 बार प्रयुक्त हुआ है । ब्राह्मण ग्रंथों में गण शब्द का प्रयोग बार-बार हुआ है । वैदिक गण प्रारंभिक अवस्था में थे । उस समय आर्य किसी स्थान पर बसे न थे । उस समय आर्यों में कोई पृथक वर्ग न था और न कोई वर्ग अधिकारी होता था । वर्गों के आधार पर गणराज्यों की स्थापना उत्तर वैदिक काल के बाद हुई । वैदिका गण का अध्यक्ष गणस्पति कहलाता था जिसे बाद में राजन कहा जाने लगा ।
यद्यपि गण शब्दों का प्रयोग महाभारत में बार- बार आया है पर बौद्ध और जैन साहित्य में इसका प्रयोग गणतन्त्रात्मक राज्यों के लिए स्पष्ट रूप से हुआ है ।

भारत में आधुनिक प्रजातांत्रिक चिंतन तथा परंपरा (Modern Democratic Thought and Tradition in India)

भारत में आधुनिक प्रजातांत्रिक चिंतन तथा संस्थाओं के विकास में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन तथा उपनिवेश विरोधी स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया । कालान्तर में भारत अंग्रेजों का उपनिवेश बन गया था, किंतु अंग्रेजों ने भारत को ब्रिटिश राज्य की भांति लोकतांत्रिक दिशा में आगे बढ़ाया । औपनिवेशिक शासन के लिए आर्थिक तथा प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता थी, जिसके बाद में उत्पादन की नवीन सामाजिक शक्तियों को सक्रियता प्रदान कीं । इन सामाजिक शक्तियों में से एक नवीन समाजिक गतिशीलता का जन्म हुआ, जिसने सुधारवादी, राष्ट्रवादी, उदारवादी तथा प्रजातांत्रिक चिंतन के लिए एक नई पृष्ठभूमि का निर्माण किया । भारत में आधुनिक प्रजातांत्रिक चिंतन के विकास का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता हैं-

1. पुनर्जागरण काल में प्रजातंत्र- भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रारंभ करने की मांग राजा राममोहन राय तथा भारतीय पुनर्जागरण के समय में बलवती हुई लेकिन पुनर्जागरण के काल में उदार लोकतंत्र की ओर बढ़ने का प्रयास बहुत ही निर्बल था । यह प्रयास एक छोटे शिक्षित वर्ग तक ही सीमित था । अतः इसमें भारतीय समाज के सामाजिक तथा वैचारिक रूपान्तरण हेतु पर्याप्त क्रांतिकारी इच्छा शक्ति नहीं थी । पाश्चात्य देशों में हुई सामंतवाद विरोध क्रान्ति से संबंधित सामाजिक आंदोलनों तथा उनके पूंजीवाद में परिवर्तित होने जैसी परिस्थितियों के विपरीत भारत में लोकतांत्रिक आंदोलन पूंजीवादी विचारों के साथ-साथ ही विकसित हुआ जिसके फलस्वरूप भारत में लोकतंत्र व पूंजीवाद दोनों ही सदा जाति, भाषा, क्षेत्र, धर्म तथा पुनर्रुत्थानवाद जैसी संकीर्ण परम्पराओं से प्रभावित हुए बिनान रह सकें ।

2. प्रारंभिक राष्ट्रवादी तथा प्रजातंत्र- शुरू के राष्ट्रवादियों ने भारतीय जनता को लोकतंत्र तथा राष्ट्रवाद की भावना से सशक्त रूप से अवगत कराया । सर्वप्रथम राष्ट्रवादियों ने भारत पर ब्रिटिश आधिपत्य की संरचना के अंतर्गत ही प्रतिनिधि संस्थाओं के गठन की आवश्यकता पर जोर डाला । हिंदुपुनर्रुत्थान ने राजनीति को हिंदू-मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक विभाजन की ओर अग्रसरित किया । समस्त समुदाय राष्ट्रवाद से संबंधित एक समान सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम को आधार मानकर लोकतांत्रिक सहमति नहीं बना पाए ।

3. विभिन्न जन-आंदोलन तथा लोकतंत्र- बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारत में पर्याप्त राजनीतिक चेतना उत्पन्न हो गई थी । 1909 के मार्ले-मिण्टो सुधारों के अंतर्गत प्रशासन में भारतीयों को प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ । 1919 में भारत में द्वैध शासन प्रणाली का शुभारंभ हुआ । इसी प्रकार खिलाफत आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन के फलस्वरूप 1935 का भारतीय शासन अधिनियम पारित किया गया । यह लड़ाई स्वाधीनता प्राप्त करने के साथ-साथ लोकतंत्र को भी मजबूत बनाने की लड़ाई थी । इसके बाद नवंबर, 1946 की संविधान सभा की स्थापना के साथ ही भारत में लोकतांत्रिक सरकार तथा स्वतंत्रता का संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया । संविधान सभा ने भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं के गठन का मार्ग प्रशस्त किया ।

4. भारत की स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र का विकास- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रचंड रूप, विश्व की तत्कालीन परिस्थितियों तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रति अपनी सहानुभूति के चलते ब्रिटेन ने भारत को सन् 1947 ई० में सत्ता हस्तांतरित कर दीं । सत्ता हस्तांतरण के बाद भारत में उदारवादी लोकतांत्रिक परंपराओं का विकास हुआ तथा भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाते हुए एक ‘गणतंत्र’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित की । संविधान निर्मात्री सभा ने भारतीय संविधान को तैयार किया तथा अन्ततः 26 जनवरी, 1950 को भारत गणतंत्र बन गया ।

5. प्रतिनिधिक लोकतंत्र की ओर बढ़ते कदम- वयस्क मताधिकार पर आधारित भारतीय गणतंत्र में पहले आम चुनाव 1952 में हुए तथा जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनकर संसद व विधानसभाओं में भेजे । इनमें से देश के प्रधानमंत्री तथा राज्यों के मुख्यमंत्रियों का चुनाव हुआ, जिन्होंने भारत को सही अर्थों में एक लोकतंत्र के रूप में स्थापित किया ।
भारतीय नागरिक लोकतंत्रात्मक देश के सुयोग्य नागरिकों के समान आचरण करते हैं । भारतीय नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, साहित्य के प्रकाशन की स्वतंत्रता, सम्मेलन और संगठन की स्वतंत्रता प्राप्त है । भारतीय जनता राजनीतिक दृष्टि से जागरूक है । भारत पहला विकासशील देश है जिसने मतपेटी के आधार पर कई बार सत्ता परिवर्तन किया । इस प्रकार भारत विश्व में प्रजातांत्रिक प्रणाली का सर्वाधिक प्रयोग करने वाले देशों की श्रेणी में आ गया है । अतः उपरोक्त विश्लेषण से यह पूर्णरूप से स्पष्ट है कि भारत में प्रजातंत्र की जड़े अत्यंत गहरी तथा प्राचीन है ।