भारत में दल-प्रणाली के विकास और विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

भारत में दल-प्रणाली के विकास और विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
                                   अथवा
“भारतीय राजनीतिक दलीय व्यवस्था राष्ट्रोन्मुखी न होकर व्यक्तिन्मुखी है।” विवेचना कीजिए।

भारत में दलित प्रणाली का विकास(Growth aur Party-System in India)

भारतीय दलीय राजनीति का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सभी आधुनिक राजनीतिक दलों की उत्पत्ति किसी न किसी रूप में कांग्रेस से ही हुई है। स्वतंत्रता के पूर्व कांग्रेस एक व्यापक राष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करती थी जिसमें विभिन्न विचारधाराओं और प्रवृत्तियों में अभिजात्यवर्गीय राजनीतिज्ञ सम्मिलित थे। स्वतंत्रता के पूर्व कांग्रेस में अनेक गुट थे। राजनीतिक मुद्दों पर असहमति के कारण कुछ गुट कांग्रेस से पृथक हो चुके थे। कुछ गुट स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस से पृथक हो गए। वस्तुत: इस पृथक्करण का वास्तविक कारण विचारधारागत नहीं था, बल्कि वैयक्तिक था। आज भी शासक दल के असंतुष्ट गुट और विरोधी दलों के असंतुष्टों का अपने-अपने दल में मतभेद वैचारिक कम, वैयक्तिक अधिक हैं।

भारत में दल प्रणाली की विशेषताएं(Characteristics of Party System in India)
भारत में दल-प्रणाली के विकास में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहे हैं। वर्तमान स्थिति के आधार पर भारत में दल-प्रणाली की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

(1) बहुदलीय पद्धति (Multiple Party System)- भारत में बहुदलीय पध्दति विधमान है। 1977 ई० में कई दलों के जनता पार्टी में सम्मिलित होने के पश्चात राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ गई थी। इसी प्रकार की स्थिति सन 1989 की नौवीं लोकसभा में निर्वाचिनों के समय हो गई थी। उस समय भी राष्ट्रीय मोर्चा और वामपंथी दलों के बाह्य सहयोग से सरकार का निर्माण किया था परंतु कांग्रेस एवं जनता दल में पुनर्विघटन के बाद पुरानी पद्धति लागू हो गई। अतः भारत को बहुदलीय पद्धति वाला प्रजातंत्र ही कहा जा सकता है। अखिल भारतीय राजनीतिक दलों के साथ-साथ हमारे देश में क्षेत्रीय दलों की संख्या भी काफी है। परिणामस्वरूप विभिन्न राज्यों में विभिन्न दलों की सरकारें स्थापित हैं।

(2) एक राजनीतिक दल का वर्चस्व (Domination of One Political Party)- देश के केंद्र में एक दल का ही वर्चस्व बना रहा है। 1952 से लेकर अब तक केंद्र में केवल कुछ समय को छोड़कर अधिकांशतः कांग्रेस ही सत्ता में बनी रही है। गुजराल के नेतृत्व वाली केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार तो कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर ही टिकी हुई थी। वर्तमान में भी केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार पदारूढ़ है जिसे अन्य दलों का समर्थन प्राप्त है।

(3) क्षेत्रीय दलों का निर्माण (Formation of Regional Parties)-
भारत में क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व केंद्र में स्थित सरकार की स्थापना के लिए एक चुनौती है। ऐसे दलों में अकाली दल, डी० एम० के०, अन्ना ० डी० एम० के०, नेशनल कांन्फ्रेंस, सिक्किम संग्राम परिषद्, तेलुगूदेशम्, शिवसेना, असम गण परिषद आदि प्रमुख क्षेत्रीय दल हैं।

(4) सांप्रदायिक दलों का अस्तित्व (Life of Communal Parties)- भारत में सांप्रदायिक दलों का अस्तित्व सदा ही बना रहा है। हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग, जमायते इस्लामी आदि विभिन्न दल देश में अस्तित्व बनाए हुए हैं।

(5) विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों और नीतियों में स्पष्ट अंतर नहीं (Not much Difference in Programmes & Policies of Different Political Parties)- भारत में प्रमुख राजनीतिक दलों की नीतियों और कार्यक्रमों में कोई विशेष और स्पष्ट अंतर नहीं है। सभी दलों का प्रजातंत्र और समाजवाद में विश्वास है। उनके कार्यक्रम भी लगभग समान हैं। सभी दल गरीबी, बेरोजगारी, कीमतों की वृद्धि जैसी समस्याओं को हल करने के लिए अपने को कृतसंकल्प बताते हैं। साम्यवादी दल (मार्क्सवादी) जैसे वामपंथी पार्टियां कुछ भिन्न कार्यक्रम रखती हैं ऐ।

(6) दल-बदल की प्रवृत्ति (Tendency of Defection)- भारत में दलीय पध्दति की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि यहां दल-बदल की प्रवृत्ति गम्भीर रूप से विद्यमान रहती है। सत्ताधारी दल में ही लोग विशेषकर रहना पसंद करते हैं। भारत के राजनीतिक जीवन पर इस प्रवृत्ति का बहुत विघटनकारी प्रभाव पड़ रहा है। 1985 ई० में भारत के संघीय इतिहास में दल-बदल विरोधी अधिनियम पारित हो जाने पर भी इस पर कोई प्रभावी रोक न लग सकी।

(7) व्यक्ति पूजा (Individual Worship)- सभी राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति पूजा पर ही आधारित हैं। दाल के महत्व से अधिक उनके प्रमुख नेता का महत्व है। इससे अवसरवादियों को प्रश्रय मिलता है तथा प्रजातंत्र की बजाय निरंकुशतंत्र की विशेषताओं के विकास का भय उत्पन्न हो जाता है।

(8) विभाजन एवं गुटबंदी (Division & Groupism)- प्रत्येक राजनीतिक दल में गुटबंदी विद्यमान है तथा असंतुष्ट गुट एक नया दल बनाते हैं। यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। कांग्रेस का कोई बार विभाजन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन, लोकदल तथा जनता दल का विभाजन, अकाली दल का विभाजन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

(9) संगठित विपक्ष का अभाव (Absence of Organised Opposition)- संगठित विपक्ष अर्थात् सशक्त एवं प्रभावशाली विरोधी दल संसदीय लोकतंत्र का मूलाधार है परंतु भारतीय राजनीति के इतिहास के आधार पर यह एक निर्विवाद तथ्य है कि कुछ अपवादों को छोड़कर भारत में एक संगठित एक सशक्त विपक्ष का अभाव रहा है।

(10) अवांछनीय सत्ता-लोलुपता (Unwanted Greediness of Power)- यद्यपि सत्ता के लिए संघर्ष’ राजनीतिक दल-प्रणाली का एक प्रमुख लक्षण है परंतु भारतीय दल प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता यह है कि भारत के राजनीतिक दल इतने अधिक सत्ता लोलुप हैं कि वे सत्ता हथियाने के लिए किसी भी प्रकार के अवांछनीय, अनुचित, अशोभनीय एवं अनैतिक साधनों का प्रयोग करने में कोई संकोच नहीं करते।

निष्कर्ष (Conclusion)- भारतीय दल प्रणाली की विशेषताओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें बहुत से महत्वपूर्ण गुणों की कमी है जो दलीय सरकार की सफलता के लिए अनिवार्य है। बहुदलीय प्रणाली, एक दल की प्रधानता, सांप्रदायिकता, दल बदल, अपराधीकरण आदि भारतीय दल प्रणाली की प्रमुख विशेषताएं हैं, जो संसदीय शासन प्रणाली के लिए घातक हैं।

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