भारत के प्रमुख सामाजिक आन्दोलनों का संक्षिप्त विवरण दीजिये

1. भारत के प्रमुख सामाजिक आन्दोलनों का संक्षिप्त विवरण दीजिये। (Give a brief description of main social movements of India.)
उत्तर – भारत के प्रमुख सामाजिक आन्दोलन (Main Social Movements of India)

भारतीय समाज में सुधार लाने के उद्देश्य से ही अनेक सामाजिक तथा धार्मिक सुधार आन्दोलन आरम्भ किये गये, जो इस प्रकार हैं-

(1) भक्ति आन्दोलन- धार्मिक कट्टरपन व अन्धविश्वास तथा सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिये भक्ति आन्दोलन प्रारम्भ किया गया। कबीर, नानक, रामानन्द, रामानुजाचार्य, चैतन्य एवं बल्लभाचार्य आदि सन्तों ने भक्ति-आन्दोलन चलाया। इस प्रकार भारत में सामाजिक सुधार आन्दोलन के रूप में भक्ति आन्दोलन ही प्रमुख था। किन्तु इसके प्रभाव अस्थायी ही सिद्ध हुए।

(2) ब्रह्म समाज- उन्नीसवी शताब्दी के उदारवादी सुधारकों में राजा राममोहन राय का नाम अग्रणी है जिन्होंने ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना 1828 ई० में की। ब्रह्म समाज के प्रमुख सिद्धान्तों के अन्तर्गत एकेश्वरवाद पर बल दिया गया तथा मूर्ति पूजा का विरोध किया गया। अन्य सामाजिक सुधारों के साथ-साथ नारी वर्ग के उत्थान हेतु भी उन्होंने सराहनीय प्रयास किए। उन्होंने सती-प्रथा का अत्यधिक विरोध किया। अन्ततः उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप सन् 1829 को सती-प्रथा को विधि-विरुद्ध घोषित कर दिया गया। श्री राय ने बहु-विवाह प्रथा, बाल-विवाह एवं अनमेल विवाह का भी विरोध किया तथा विधवा विवाह, अन्तर्जातीय विवाह एवं स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया। नारी सुधार के क्षेत्र में श्री राय ने सर्वप्रथम सर्वाधिक कार्य किए।
श्री राय के साथ-साथ उस समय बंगाल में श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह सम्बन्धी आन्दोलन किया। परिणामस्वरूप सन् 1856 में हिन्दू पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया। सन् 1889 में रमाबाई ने मुम्बई में विधवा स्त्रियों के लिये ‘शारदा सदन’ खोला। वह स्वयं ईसाई होने के कारण विधवा स्त्रियों को भी ईसाई धर्म ग्रहण कराती थीं ।
श्री राय की मृत्योपरान्त महर्षि देवेन्द्र नाथ टैगोर एवं श्री केशव चन्द्र सेन ने ब्रह्म समाज सुधार आन्दोलन को आगे बढ़ाया।

(3) सत्य शोधक समाज- ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना सन् 1873 में महात्मा जोतिबा राव फूले के द्वारा महाराष्ट्र में की गई।उन्होंने पारम्परिक समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं दोषों के उन्मूलन हेतु एक सामाजिक क्रान्ति लाने का प्रयास किया। वह एक कर्मठ समाज सुधारक एवं मानवतावादी थे। उन्होंने हिन्दूधर्म में व्याप्त अन्धविश्वासों एवं आडम्बरों का विरोध किया। साथ ही सामाजिक विषमता एवं सामाजिक अन्याय के विरुद्ध भी आवाज उठाई। अपने इन प्रयासों में उन्हें अत्यधिक अपमान एवं विरोध का सामना करना पड़ा किन्तु वह विचलित नहीं हुये।

(4) आर्य समाज- सन् 1875 में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। आर्य समाज की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य हिन्दू धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करना एवं वैदिक धर्म की स्थापना करना था। आर्य समाज के सिद्धान्तों में वेदों के अध्ययन को परमावश्यक माना गया है तथा कहा गया है कि वेद ही सत्य ज्ञान के स्रोत हैं। हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ स्त्रियों की दशा में सुधार हेतु भी प्रयास किए गए। स्वामी दयानन्द जी ने जाति प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा एवं बहु-विवाह आदि का विरोध किया तथा वैयक्तिक स्वतन्त्रता, सामाजिक समानता, स्त्री-शिक्षा एवं विधवा-विवाह आदि का समर्थन किया। समाज सुधार एवं नारी उत्थान के क्षेत्र में स्वामी दयानन्द सरस्वती के कार्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

(5) रामकृष्ण मिशन- सन् 1870 में बंगाल में स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने समाज सुधार आन्दोलन चलाया। आन्दोलन को क्रियात्मक रूप देने के उद्देश्य से उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द जी ने 1897 में ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की। मिशन का अन्तिम लक्ष्य सम्पूर्ण मानवता की सेवा करना था। अन्य सामाजिक सुधार करने के साथ-साथ स्वामी जी ने नारियों के प्रति भी उदार दृष्टिकोण अपनाया। उनका कहना था कि प्रत्येक राष्ट्र को समस्त नारी-जाति का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने स्त्रियों व पुरुषों के मध्य असमानता से सम्बन्धित भ्रान्त मान्यताओं का विरोध किया। उन्होंने भारतीय नारियों को प्राचीन भारत की विदुषी नारियों के पदचिन्हों पर चलने की सलाह दी। उन्होंने स्त्री-शिक्षा को अत्यावश्यक बताया।

(6) भारतीय समाज सम्मेलन- मुम्बई के न्यायाधीश महादेव गोविन्द रानाडे एक महान् समाज सुधारक थे। उन्होंने सन् 1861 में एक ‘विधवा विवाह संघ’ की स्थापना की। सन् 1887 में समाज-सुधार हेतु एक नया संगठन आरम्भ किया जिसका नाम ‘भारतीय समाज सम्मेलन’ रखा गया। इस सम्मेलन का कार्य बाल विवाह एवं दहेज प्रथा आदि बुराइयों को रोकना तथा स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, सामाजिक शुद्धि एवं एकता की भावना आदि को प्रोत्साहित करना था।

(7) थियोसोफिकल सोसाइटी- थियोसोफिकल सोसाइटी के माध्यम से श्रीमती एनी बेसेन्ट ने भारतीय समाज की बुराइयों के उन्मूलन का प्रयास किया। उन्होंने बाल-विवाह, जाति-प्रथा एवं अस्पृश्यता का विरोध किया तथा स्त्री-शिक्षा एवं विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। उन्होंने भारत के अतीत की प्रशंसा की। एक महिला होने के नाते स्त्री-समस्याओं के उन्मूलन में उनकी विशेष रुचि थी।

(8) अलीगढ़ आन्दोलन— सर सैय्यद अहमद खाँ ने मुस्लिम समाज में सुधार तथा आधुनिकीकरण लाने की दृष्टि से उल्लेखनीय सुधार किए तथा मुस्लिम नव-जागरण को महान् प्रोत्साहन दिया। उन्होंने स्त्रियों की स्थिति में भी कतिपय सुधार किए। वह स्त्रियों को पाश्चात्य शिक्षा देने के पक्ष में थे।

(9) केन्द्रीय समाज-सुधार संघ- बीसवीं शताब्दी में आन्दोलन को एक नवीन रूप प्राप्त हुआ। श्री रानाडे की मृत्योपरान्त श्री चन्द्रावरकर ने उनके आन्दोलन को आगे बढ़ाया। सुधार कार्यों को विस्तृत करने के लिये ही संघ की स्थापना की। सन् 1904 में देश भर के सुधार संघों को एकसूत्र में बांधने का निश्चय किया गया। इस काल में देश भर में अनेक सुधार सम्मेलन आयोजित किए गए। सन् 1911 में श्री चन्द्रावरकर ने ‘समाज सेवा संघ’ की स्थापना की। इस दौरान देशभर में व्यापक रूप से अनेक ‘हिन्दू विधवा आश्रमों’ की स्थापना की गई।

(10) अखिल भारतीय महिला सम्मेलन- सन् 1917 में श्रीमती एनी बेसेन्ट एवं श्रीमती काउसिन्स ने मद्रास में ‘महिलाओं के भारतीय संघ’ (Women’s Indian Association) की स्थापना की। तत्पश्चात् सन् 1955 में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की राष्ट्रीय सभा की स्थापना की गई। सन् 1927 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना की गई। इसके द्वारा बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, बहुपत्नी प्रथा आदि का विरोध तथा विधवा विवाह स्त्री-शिक्षा आदि का समर्थन किया गया।

(11) गाँधी जी का हरिजनोद्वार आन्दोलन- हरिजनों की दशा सुधारने में सबसे अधिक योगदान महात्मा गांधी ने दिया। उन्होंने यह अनुभव किया था कि ब्रिटिश सत्ता स्वयं उनकी शक्ति पर इतनी आधारित नहीं जितनी कि उनकी सामाजिक दुर्बलताओं पर आधारित है। भारत में हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों वर्गों के मध्य वैमनस्य उत्पन्न कर अंग्रेज अपनी सत्ता को स्थायी बनाना चाहते थे। अंग्रेज हिन्दुओं के एक अन्य वर्ग ‘हरिजन’ को भी अपनी ओर मिलाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे। अत: गाँधी जी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के साथ हरिजनोद्वार पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने ‘हरिजन’ में लिखा कि “हिन्दुओं को अपने को उच्च और निम्न के भेदभाव से मुक्त कर लेना मात्र ही अन्य जातियों के बीच पारस्परिक वैमनस्य एवं अविश्वास को दूर कर देगा।” उन्होंने इस बात का अनुभव किया कि यदि हरिजनों की आर्थिक और सामाजिक दशा में सुधार किया जाये तथा उन्हें शिक्षा के पर्याप्त अवसर प्रदान किये जाये तो वे उच्च जातियों के समान एक सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकेंगे।

 

 

 

 

 

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