भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों के संगठन और घोषणा-पत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों के संगठन और घोषणा-पत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
भारतीय राजनीति में किसी एक प्रमुख राष्ट्रीय दल के संगठन, विकास, कार्य एवं राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका पर विवेचनात्मक निबंध लिखिए।
अथवा
भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों का वर्णन कीजिए।
अथवा
जनता दल, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस एवं साम्यवादी दलों की रीति-नीति की व्याख्या कीजिए।
अथवा
भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों की नीतियों एवं कार्यक्रमों की विवेचना कीजिए।

भारत के प्रमुख राजनीतिक दल(Main Political Parties of India)
यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भी भारत में अनेक राजनीतिक दल अस्तित्व में थे, परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् तो भारत में अनेक राजनीतिक दलों का गठन किया गया है। वर्तमान में भारत में अनेक राजनीतिक दल हैं। उनमें से मान्यता प्राप्त दलों को मुख्यत: राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय, दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

भारत के राष्ट्रीय दल(National Political Parties of India)
वर्तमान में जिन प्रमुख राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त है, उनके संक्षिप्त इतिहास तथा उनकी नीतियां एवं कार्यक्रमों का यहां वर्णन किया जा रहा है-

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस(Indian National Congress)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश का सबसे पुराना और सशक्त राजनीतिक दल है, जिसकी स्थापना सेवा-निवृत्त अंग्रेज अधिकारी श्री ए० ओ० ह्यूम के प्रयासों के परिणाम स्वरुप सन् 1885 में बंबई में हुई। परतंत्र भारत में इस दल का मुख्य उद्देश्य संवैधानिक सुधारों तथा देश के सम्मुख विभिन्न समस्याओं पर जनमत तैयार करने तक सीमित था। ऐसा करते हुए कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में देश की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर विचार करने के लिए एक मंच प्रदान किया, परंतु सन् 1929 के अपने लाहौर अधिवेशन में इसने पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति, अपना लक्ष्य घोषित किया, जिसके परिणाम स्वरुप राष्ट्रीय आंदोलन का जन्म हुआ। राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस के ही हाथों में रहा। कांग्रेस के अनेक नेताओं के कुशल नेतृत्व में लड़े गए स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम स्वरूप 15 अगस्त, सन् 1947 को भारतवासियों ने परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त होकर स्वतंत्रता के वातावरण में सांस ली।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी देश का राजनीतिक नेतृत्व इसी दल के हाथों में बना रहा। सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन से पूर्व तक केंद्र तथा अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का ही शासन रहा, परंतु सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन में पहली बार कांग्रेस को कई राज्यों में पराजय का सामना करना पड़ा, क्योंकि केंद्र में सत्तारूढ़ होने के साथ ही साथ तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा व पंजाब, नौ राज्यों में कांग्रेस की सरकारें नहीं बन सकीं। कांग्रेस की इस पराजय के लिए आतंरिक गुटबंदी प्रमुख रूप से उत्तरदाई थी।
कांग्रेस का विभाजन- कांग्रेस की आंतरिक गुटबंदी ने धीरे-धीरे विकसित होकर ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया, जो सन् 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् राष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रश्न पर स्पष्ट हो गया। कांग्रेस द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी की इच्छा के विरुद्ध श्री नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया गया, परंतु श्रीमती इंदिरा गांधी ने श्री रेड्डी का विरोध करते हुए श्री वी० वी० गिरि को अपना समर्थन प्रदान किया, जिसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी श्री रेड्डी पराजित हुए और श्री गिरि राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित हुए। उन दिनों कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति पर श्रीमती इंदिरा गांधी के विरोधियों का नियंत्रण था, अतः कांग्रेस प्रत्याशी की पराजय तथा श्रीमती इंदिरा गांधी की विभिन्न प्रकार से आलोचना करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्री निजलिंगप्पा ने 12 नवंबर सन् 1969 को श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री जगजीवन राम तथा श्री फखरूद्दीन अली अहमद आदि को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप श्रीमती इंदिरा गांधी ने श्री निजलिंगप्पा को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाकर श्री जगजीवन राम को कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित करा दिया। इस प्रकार कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की समर्थन नई कांग्रेस को ‘सत्ता’ कांग्रेस या ‘इंडीकेट कांग्रेस’ तथा पुरानी कांग्रेस को ‘संगठन कांग्रेस’ या ‘सिंडीकेट कांग्रेस’ के नाम से संबोधित किया गया।

सत्ता कांग्रेस और संगठन कांग्रेस- इन दिनों सत्ता कांग्रेस ने समाजवादी नीतियों में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार पर बल दिया। अपने इस उद्देश्य से प्रेरित होकर उसने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तथा राजा-महाराजाओं के   समाप्त कर दिए। परंतु सत्ता कांग्रेस द्वारा किए गए इन कार्यों को उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया। इन परिस्थितियों में श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकसभा की अवधि (कार्यकाल) पूर्ण होने से पूर्व ही सन् 1971 में पांचवी लोकसभा का मध्यावधि निर्वाचन कराया। इस निर्वाचन में निर्वाचन आयोग द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में मान्यता प्राप्त ‘संगठन कांग्रेस’ और ‘सत्ता कांग्रेस’ ने पृथक्-पृथक् भाग लिया। इस निर्वाचन में सत्ता कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ और ‘बेरोजगारी दूर करो’ का नारा दिया। उधर पुरानी कांग्रेस ने जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और संयुक्त समाजवादी दल के साथ मिलकर ‘चार दलीय मोर्चा’ बनाकर ‘इंदिरा हटाओ और देश बचाओ’ का नारा दिया। परंतु इस निर्वाचन में सत्ता कांग्रेस को अप्रत्याशित विजय प्राप्त हुई और उसने लोकसभा के 518 स्थानों में से 390 स्थान प्राप्त किये; जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उत्तराधिकारी कहने वाली ‘संगठन कांग्रेस’ को केवल 16 स्थान ही प्राप्त हो सके। सन् 1972 के राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन में भी ‘सत्ता कांग्रेस’ को अप्रत्याशित सफलता प्राप्त हुई। अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और जन-साधारण द्वारा कांग्रेस को प्रबल समर्थन दिया गया। इस प्रकार इन निर्वाचनों के पश्चात् ‘सत्ता कांग्रेस’ में श्रीमती गांधी की राजनीतिक शक्ति निर्विवाद और सार्वभौम मानी जाने लगी।
इसके पश्चात् कुछ वर्षों तक ‘सत्ता कांग्रेस’ निर्विघ्न रूप से देश पर शासन करती रही, परंतु सन् 1974 में बढ़ती हुई महंगाई, भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक अकुशलता के विरुद्ध देश के विभिन्न भागों में आंदोलन प्रारंभ हो गया, जिसका नेतृत्व श्री जयप्रकाश नारायण ने किया। इसी क्रम में 12 जून, सन् 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा रायबरेली से श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिए जाने के परिणाम स्वरूप सरकार विरोधी आंदोलन और अधिक तीव्र हो गया तथा सरकार से त्यागपत्र की मांग की जाने लगी। इन बिगड़ती हुई परिस्थितियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने देश में पहले से ही घोषित बाह्य आपातकालीन स्थिति के अतिरिक्त 25 जून, 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल स्थिति की भी घोषणा कर दी। युवक कांग्रेस द्वारा संचालित पांच सूत्री कार्यक्रम, जिसका एक सूत्र नसबंदी भी था, सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से सख्ती के साथ क्रियान्वित किए जाने के कारण जनता में इसके प्रति रोष उत्पन्न हो गया। विरोध करने वाली साधारण जनता या जन-नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया। उन दिनों प्रायः समस्त विरोधी दलों के नेता या तो जेलों में बंद थे या भूमिगत। आपातकालीन स्थिति जहां एक ओर किन्हीं क्षेत्रों में लाभदायक सिद्ध हुई, वहीं दूसरी ओर अत्याचार और स्वेच्छाचारिता का पर्याय बनकर अलोकतांत्रिक भी सिद्ध हुई।
सन् 1977 में आपात स्थिति उठा ली गई और जनवरी, सन् 1977 में पांचवी लोकसभा को भंग करके 16 मार्च से 20 मार्च, सन् 1977 तक छठी लोकसभा का निर्वाचन संपन्न हुआ। सन् 1977 के इस निर्वाचन में कांग्रेस को आंध्र प्रदेश, असम, कर्नाटक और तमिलनाडु में तो भारी बहुमत प्राप्त हुआ परन्तु उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड, चंडीगढ़, मिजोरम और दिल्ली में वह एक भी स्थान प्राप्त नहीं कर सकी। इस प्रकार इन राज्यों में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया और केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार पदारूढ़ हुई। अतः इस निर्वाचन के परिणाम स्वरुप केंद्र में कांग्रेस के तीस वर्षीय (1947-77) शासन के युग का अंत हो गया।
कांग्रेस का पुनर्विभाजन- सन् 1977 के निर्वाचनों की पराजय के प्रश्न को लेकर कांग्रेस के भीतर गम्भीर मतभेद उत्पन्न हो गए, जिनके परिणाम स्वरूप 1 जनवरी, सन् 1978 को श्रीमती गांधी के समर्थकों ने दिल्ली में ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ आयोजित करके नई कांग्रेस बनाने की घोषणा की, जिसका श्रीमती गांधी को अध्यक्ष बनाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पुनः दो भागों में विभाजित हो गई। कांग्रेस के एक भाग को कांग्रेस (रेड्डी) और बाद में अंग्रेज (स्वर्ण सिंह) और अंत में सन् 1978 में विभाजित होने के पश्चात् कांग्रेस (अर्स) के नाम से और दूसरे भाग को अंग्रेज (आई) के नाम से पुकारा जाने लगा।
सन् 1980 के लोकसभा निर्वाचन और कांग्रेस- इसी बीच पारस्परिक मतभेदों के कारण जनता सरकार के पतन के परिणाम स्वरुप जनवरी, सन् 1980 में लोकसभा-निर्वाचन हुए, जिसमें कांग्रेस (अर्स) को केवल 13 स्थान ही प्राप्त हुए, जबकि कांग्रेस (आई) ने 525 स्थानों में से 331 स्थान प्राप्त किए। इनके अतिरिक्त मई, सन् 1980 में हुए नौ राज्य विधानसभाओं के निर्वाचनों में 8 राज्यों में कांग्रेस (आई) की सरकारें बनीं। इस प्रकार कांग्रेस (आई) ने सन् 1980 के लोकसभा निर्वाचन में लोकसभा में 2/3 स्पष्ट बहुमत प्राप्त करके अधिकांश राज्यों में अपनी सरकारें बनाकर एक बार पुनः केन्द्र तथा राज्यों के शासन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया तथा स्वयं को ही वास्तविक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में प्रतिष्ठित कर लिया। इसी आधार पर सन् 1981 में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने भी कांग्रेस (आई) को ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मान्यता प्रदान कर दी।
श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या और कांग्रेस- 31 अक्टूबर, सन् 1984 को श्रीमती इंदिरा गांधी के अंगरक्षकों द्वारा ही उनकी नृशंस हत्या कर दिये जाने के कारण कांग्रेस को भारी धक्का लगा और ऐसा प्रतीत होने लगा कि कांग्रेस अब अपनी एकता और प्रभुत्व को खो देगी, परन्तु तत्कालीन परिस्थितियों में श्री राजीव गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया तथा उनके नेतृत्व में सन् 1984 में आठवीं लोकसभा के निर्वाचन में कांग्रेस ने 503 स्थानों में से 401 स्थान प्राप्त करके अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की । अन्य सभी विरोधी दलों को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा लेकिन सन् 1989 में नवीं लोकसभा के निर्वाचन में पुन: कांग्रेस की पराजय हुई। उसे केवल 193 स्थान ही प्राप्त हुए।
श्री राजीव गांधी की हत्या और कांग्रेस- प्रधान मंत्री श्री चंद्रशेखर द्वारा राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप दिए जाने के बाद 10 वीं लोकसभा के लिए मई, सन् 1991 में निर्वाचन हुए। इस निर्वाचन का पहला दौर समाप्त ही हुआ था कि 21 मई, सन् 1991 को मद्रास से 40 किलोमीटर दूर श्री पेरुम्बुदूर नामक स्थान पर एक मानव-बम- विस्फोट द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष श्री राजीव गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई।
श्री पी० वी० नरसिंह राव और कांग्रेस- श्री गांधी की हत्या के पश्चात् श्री पी० वी० नरसिंह राव को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। सन् 1991 के निर्वाचन में कांग्रेस 511 स्थानों में से 227 स्थान प्राप्त करके सबसे बड़े दल के रूप में लोकसभा में आई और केंद्र में सत्तारूढ़ हुई। दिसंबर 1994 में कर्नाटक और आंध्र तथा फरवरी 1995 में महाराष्ट्र और गुजरात में कांग्रेस की हार इसकी गिरती साख की संकेतक रही।
1996 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मात्र 141 सीटों पर विजय प्राप्त हो सकी। फरवरी-मार्च, 1998 के लोकसभा चुनावों में उसे पुनः141 सीटें ही प्राप्त हुए।
श्रीमती सोनिया गांधी और कांग्रेस- 1999 में तेरहवीं लोकसभा का मध्यावधि चुनाव कांग्रेस ने श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में लड़ा। पिछले वर्ष श्रीमती सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने से पार्टी को एक नया वंशगत उत्तराधिकारी मिल गया । इस चुनाव में कांग्रेस ने लोकसभा में अब तक के सबसे कम स्थान (114 सीटें) प्राप्त किए। चौदहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई, 2004 में हुए चुनावों में कांग्रेस को 145 सीटें प्राप्त हुई तथा कांग्रेस और इसके 14 चुनाव पूर्व सहयोगी दलों ने केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (United Progressive Alliance- UPA) का गठन कर पूर्व वित्तमनी डॉ ० मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपनी सरकार बनाई।
15वीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2009 में हुए चुनावों में कांग्रेस को 206 स्थान प्राप्त हुए तथा कांग्रेस व इसके पूर्व सहयोगी दलों ने केंद्र में डाॅ० मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पुनः अपनी सरकार बनाई।
सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई-2014 में हुए चुनावों में कांग्रेस को अब तक के सबसे कम मात्र 44 स्थान ही प्राप्त हुए तथा उसके नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सीटों की संख्या भी सिमटकर केवल 58 ही रह गई ।
कांग्रेस की नीतियां एवं कार्यक्रम
कांग्रेस के प्रमुख कार्यक्रमों को निम्नलिखित शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) राजनीतिक कार्यक्रम ( Political Programmes)- निर्वाचनों के समय कांग्रेस के घोषणा पत्रों में कहा गया है कि लोकतंत्र और समाजवाद के आधार पर ही देश का निर्माण किया जाएगा। कांग्रेस के घोषणा-पत्रों में भ्रष्टाचार को दूर करने, राजकीय सेवाओं के राजनीतिकरण को रोकने और स्वच्छ प्रशासन देने का आश्वासन दिया गया है। समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता के प्रति वचनबद्धता व्यक्त की गई है। परिवर्तनों के लिए धीरे-धीरे शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक उपायों के अपनाए जाने के साथ ही साथ देश की एकता और स्थिरता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आश्वासन दिया गया है। जनता की शिकायतों को शीघ्र दूर करने की व्यवस्था करने और विकास कार्यक्रमों की जांच को बढ़ावा देने के साथ ही साथ देश की एकता और स्थिरता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आश्वासन दिया गया है। जनता की शिकायतों को शीघ्र दूर करने की व्यवस्था करने और विकास कार्यक्रमों की जांच को बढ़ावा देने के साथ ही साथ पंजाब, असम और जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का शीघ्र ही समाधान करने का आश्वासन दिया गया है। रामजन्म-भूमि और बाबरी मस्जिद के संवेदनशील मुद्दे पर सांप्रदायिक सद्भाव और सौहार्द बनाए रखने के लिए व्यापक प्रयास किए जाने का आश्वासन दिया गया है। इसके अतिरिक्त सत्ता के विकेंद्रीयकरण करने, पंचायती राज को सुदृढ़ करने तथा लोगों के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की रक्षा करते हुए सभी धर्मों, भाषाओं और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने का भी आश्वासन दिया गया है।

(2) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programmes)- आर्थिक क्षेत्र में कांग्रेस द्वारा समय-समय पर अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की जाती रही है। कांग्रेस सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) के विकास में विश्वास रखती है परंतु साथी ही वह निजी क्षेत्र (Private Sector) के महत्व को भी स्वीकार करती है। कांग्रेस सरकार ने विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं को स्वीकृति प्रदान करते हुए उधोगों को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। किसानों को भू-स्वामी बनाने के लिए भूमि-सुधार कानून बनाए। कांग्रेस ने सन् 1969 में दस सूत्रीय और सन् 1975 में बीस सूत्रीय कार्यक्रमों की घोषणा की। इसके अतिरिक्त कांग्रेस के घोषणा-पत्रों में कृषि- उत्पादन में वृद्धि की दर बढ़ाने का प्रयास, भूमिहीन मजदूरों, अल्प-कालिक बेरोजगारों और शिक्षित बेरोजगारों के लिए राष्ट्रीय बेरोजगार योजना, नये घरों के निर्माण के लिए एक विशाल राष्ट्रीय योजना, शहरों में जल और विद्युत आपूर्ति तथा प्रत्येक गांव को विद्युत और पेयजल की व्यवस्था, ग्रामीण और छोटे उद्योगों के लिए श्रेष्ठ तकनीक, बड़े और मध्यम उद्योगों का तीव्र गति से आधुनिकीकरण, जिससे उन्हें अधिक कार्य-कुशल बनाया जा सके तथा साथ ही साथ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की कार्य-कुशलता तथा उत्पादकता में सुधार करने का आश्वासन दिया गया है। शहरी संपत्ति तथा भूमि की सीमा निश्चित करना, नगरों में बढ़ते हुए भूमि के मूल्यों और अन्य क्षेत्रों में महंगाई में होने वाली वृद्धि को रोकना तथा लोगों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रयास करना, बिगड़ी हुई अर्थव्यवस्था को सुधारना और प्रतिवर्ष एक करोड़ लोगों के लिए नवीन अवसर जुटाना आदि कांग्रेस के आर्थिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हैं।

(3) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)- कांग्रेस द्वारा सामाजिक कल्याण के लिए समय-समय पर अनेक घोषणाएं की गई हैं, जिनमें (i) सभी लोगों को अपने धर्म और विश्वास के अनुसार जीवन व्यतीत करने का अधिकार है। व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य भेद-भाव को कांग्रेस समाप्त करना चाहती है; (ii) सन् 1995 तक सभी बालकों के लिए नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था, माध्यमिक और उच्च-शिक्षा में सार्थक सुधारों की व्यवस्था तथा बालिकाओं और अनुसूचित जातियों के बालकों की शिक्षा- व्यवस्था पर विशेष बल, (iii) अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा, पुलिस, सुरक्षा सेनाओं और राजकीय सेवाओं में अल्पसंख्यकों को रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धि। उर्दू भाषा को बिहार की भांति अन्य राज्यों में भी द्वितीय भाषा का स्तर प्रदान करना आदि कांग्रेस के प्रमुख सामाजिक कार्यक्रम हैं।

(4) विदेश-नीति (Foreign Policy)- विदेश नीति के संबंध में कांग्रेस द्वारा निम्नलिखित बातों पर बल दिया गया है-
(i) दल देश की गरिमा और सुरक्षा को बनाए रखेगा, (ii) अंतरराष्ट्रीय विषयों में शांतिपूर्ण सह अस्तित्व और तटस्थता की नीति का पालन करते हुए आत्म-सम्मान और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा, (iii) आणविक तकनीक के विकास को केवल शांतिपूर्ण क्षेत्र तक ही सीमित रखेगा, परन्तु 7 जुलाई, सन् 1985 को प्रेस कान्फ्रेंस में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा कहे गए ये शब्द भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं कि, “यदि पाकिस्तान अणु बम बनायेगा तो हम भी कुछ करेंगे।”

 

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