भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों के संगठन और घोषणा-पत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों के संगठन और घोषणा-पत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
                                                    अथवा
भारतीय राजनीति में किसी एक प्रमुख राष्ट्रीय दल के संगठन, विकास, कार्य एवं राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका पर विवेचनात्मक निबंध लिखिए।
                                                    अथवा
भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों का वर्णन कीजिए।
                                                     अथवा
जनता दल, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस एवं साम्यवादी दलों की रीति-नीति की व्याख्या कीजिए।
                                                     अथवा
भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों की नीतियों एवं कार्यक्रमों की विवेचना कीजिए।

भारत के प्रमुख राजनीतिक दल (Main Political Parties of India)
यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भी भारत में अनेक राजनीतिक दल अस्तित्व में थे, परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् तो भारत में अनेक राजनीतिक दलों का गठन किया गया है। वर्तमान में भारत में अनेक राजनीतिक दल हैं। उनमें से मान्यता प्राप्त दलों को मुख्यत: राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय, दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

भारत के राष्ट्रीय दल (National Political Parties of India)
वर्तमान में जिन प्रमुख राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त है, उनके संक्षिप्त इतिहास तथा उनकी नीतियां एवं कार्यक्रमों का यहां वर्णन किया जा रहा है-

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश का सबसे पुराना और सशक्त राजनीतिक दल है, जिसकी स्थापना सेवा-निवृत्त अंग्रेज अधिकारी श्री ए० ओ० ह्यूम के प्रयासों के परिणाम स्वरुप सन् 1885 में बंबई में हुई। परतंत्र भारत में इस दल का मुख्य उद्देश्य संवैधानिक सुधारों तथा देश के सम्मुख विभिन्न समस्याओं पर जनमत तैयार करने तक सीमित था। ऐसा करते हुए कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में देश की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर विचार करने के लिए एक मंच प्रदान किया, परंतु सन् 1929 के अपने लाहौर अधिवेशन में इसने पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति, अपना लक्ष्य घोषित किया, जिसके परिणाम स्वरुप राष्ट्रीय आंदोलन का जन्म हुआ। राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस के ही हाथों में रहा। कांग्रेस के अनेक नेताओं के कुशल नेतृत्व में लड़े गए स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम स्वरूप 15 अगस्त, सन् 1947 को भारतवासियों ने परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त होकर स्वतंत्रता के वातावरण में सांस ली।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी देश का राजनीतिक नेतृत्व इसी दल के हाथों में बना रहा। सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन से पूर्व तक केंद्र तथा अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का ही शासन रहा, परंतु सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन में पहली बार कांग्रेस को कई राज्यों में पराजय का सामना करना पड़ा, क्योंकि केंद्र में सत्तारूढ़ होने के साथ ही साथ तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा व पंजाब, नौ राज्यों में कांग्रेस की सरकारें नहीं बन सकीं। कांग्रेस की इस पराजय के लिए आतंरिक गुटबंदी प्रमुख रूप से उत्तरदाई थी।
कांग्रेस का विभाजन- कांग्रेस की आंतरिक गुटबंदी ने धीरे-धीरे विकसित होकर ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया, जो सन् 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् राष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रश्न पर स्पष्ट हो गया। कांग्रेस द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी की इच्छा के विरुद्ध श्री नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया गया, परंतु श्रीमती इंदिरा गांधी ने श्री रेड्डी का विरोध करते हुए श्री वी० वी० गिरि को अपना समर्थन प्रदान किया, जिसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी श्री रेड्डी पराजित हुए और श्री गिरि राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित हुए। उन दिनों कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति पर श्रीमती इंदिरा गांधी के विरोधियों का नियंत्रण था, अतः कांग्रेस प्रत्याशी की पराजय तथा श्रीमती इंदिरा गांधी की विभिन्न प्रकार से आलोचना करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्री निजलिंगप्पा ने 12 नवंबर सन् 1969 को श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री जगजीवन राम तथा श्री फखरूद्दीन अली अहमद आदि को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप श्रीमती इंदिरा गांधी ने श्री निजलिंगप्पा को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाकर श्री जगजीवन राम को कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित करा दिया। इस प्रकार कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की समर्थन नई कांग्रेस को ‘सत्ता’ कांग्रेस या ‘इंडीकेट कांग्रेस’ तथा पुरानी कांग्रेस को ‘संगठन कांग्रेस’ या ‘सिंडीकेट कांग्रेस’ के नाम से संबोधित किया गया।

सत्ता कांग्रेस और संगठन कांग्रेस- इन दिनों सत्ता कांग्रेस ने समाजवादी नीतियों में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार पर बल दिया। अपने इस उद्देश्य से प्रेरित होकर उसने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तथा राजा-महाराजाओं के प्रिवीपर्स (Privy-Purse) समाप्त कर दिए। परंतु सत्ता कांग्रेस द्वारा किए गए इन कार्यों को उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया। इन परिस्थितियों में श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकसभा की अवधि (कार्यकाल) पूर्ण होने से पूर्व ही सन् 1971 में पांचवी लोकसभा का मध्यावधि निर्वाचन कराया। इस निर्वाचन में निर्वाचन आयोग द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में मान्यता प्राप्त ‘संगठन कांग्रेस’ और ‘सत्ता कांग्रेस’ ने पृथक्-पृथक् भाग लिया। इस निर्वाचन में सत्ता कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ और ‘बेरोजगारी दूर करो’ का नारा दिया। उधर पुरानी कांग्रेस ने जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और संयुक्त समाजवादी दल के साथ मिलकर ‘चार दलीय मोर्चा’ बनाकर ‘इंदिरा हटाओ और देश बचाओ’ का नारा दिया। परंतु इस निर्वाचन में सत्ता कांग्रेस को अप्रत्याशित विजय प्राप्त हुई और उसने लोकसभा के 518 स्थानों में से 390 स्थान प्राप्त किये; जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उत्तराधिकारी कहने वाली ‘संगठन कांग्रेस’ को केवल 16 स्थान ही प्राप्त हो सके। सन् 1972 के राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन में भी ‘सत्ता कांग्रेस’ को अप्रत्याशित सफलता प्राप्त हुई। अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और जन-साधारण द्वारा कांग्रेस को प्रबल समर्थन दिया गया। इस प्रकार इन निर्वाचनों के पश्चात् ‘सत्ता कांग्रेस’ में श्रीमती गांधी की राजनीतिक शक्ति निर्विवाद और सार्वभौम मानी जाने लगी।
इसके पश्चात् कुछ वर्षों तक ‘सत्ता कांग्रेस’ निर्विघ्न रूप से देश पर शासन करती रही, परंतु सन् 1974 में बढ़ती हुई महंगाई, भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक अकुशलता के विरुद्ध देश के विभिन्न भागों में आंदोलन प्रारंभ हो गया, जिसका नेतृत्व श्री जयप्रकाश नारायण ने किया। इसी क्रम में 12 जून, सन् 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा रायबरेली से श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिए जाने के परिणाम स्वरूप सरकार विरोधी आंदोलन और अधिक तीव्र हो गया तथा सरकार से त्यागपत्र की मांग की जाने लगी। इन बिगड़ती हुई परिस्थितियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने देश में पहले से ही घोषित बाह्य आपातकालीन स्थिति के अतिरिक्त 25 जून, 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल स्थिति की भी घोषणा कर दी। युवक कांग्रेस द्वारा संचालित पांच सूत्री कार्यक्रम, जिसका एक सूत्र नसबंदी भी था, सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से सख्ती के साथ क्रियान्वित किए जाने के कारण जनता में इसके प्रति रोष उत्पन्न हो गया। विरोध करने वाली साधारण जनता या जन-नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया। उन दिनों प्रायः समस्त विरोधी दलों के नेता या तो जेलों में बंद थे या भूमिगत। आपातकालीन स्थिति जहां एक ओर किन्हीं क्षेत्रों में लाभदायक सिद्ध हुई, वहीं दूसरी ओर अत्याचार और स्वेच्छाचारिता का पर्याय बनकर अलोकतांत्रिक भी सिद्ध हुई।
सन् 1977 में आपात स्थिति उठा ली गई और जनवरी, सन् 1977 में पांचवी लोकसभा को भंग करके 16 मार्च से 20 मार्च, सन् 1977 तक छठी लोकसभा का निर्वाचन संपन्न हुआ। सन् 1977 के इस निर्वाचन में कांग्रेस को आंध्र प्रदेश, असम, कर्नाटक और तमिलनाडु में तो भारी बहुमत प्राप्त हुआ परन्तु उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड, चंडीगढ़, मिजोरम और दिल्ली में वह एक भी स्थान प्राप्त नहीं कर सकी। इस प्रकार इन राज्यों में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया और केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार पदारूढ़ हुई। अतः इस निर्वाचन के परिणाम स्वरुप केंद्र में कांग्रेस के तीस वर्षीय (1947-77) शासन के युग का अंत हो गया।
कांग्रेस का पुनर्विभाजन- सन् 1977 के निर्वाचनों की पराजय के प्रश्न को लेकर कांग्रेस के भीतर गम्भीर मतभेद उत्पन्न हो गए, जिनके परिणाम स्वरूप 1 जनवरी, सन् 1978 को श्रीमती गांधी के समर्थकों ने दिल्ली में ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ आयोजित करके नई कांग्रेस बनाने की घोषणा की, जिसका श्रीमती गांधी को अध्यक्ष बनाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पुनः दो भागों में विभाजित हो गई। कांग्रेस के एक भाग को कांग्रेस (रेड्डी) और बाद में अंग्रेज (स्वर्ण सिंह) और अंत में सन् 1978 में विभाजित होने के पश्चात् कांग्रेस (अर्स) के नाम से और दूसरे भाग को अंग्रेज (आई) के नाम से पुकारा जाने लगा।
सन् 1980 के लोकसभा निर्वाचन और कांग्रेस- इसी बीच पारस्परिक मतभेदों के कारण जनता सरकार के पतन के परिणाम स्वरुप जनवरी, सन् 1980 में लोकसभा-निर्वाचन हुए, जिसमें कांग्रेस (अर्स) को केवल 13 स्थान ही प्राप्त हुए, जबकि कांग्रेस (आई) ने 525 स्थानों में से 331 स्थान प्राप्त किए। इनके अतिरिक्त मई, सन् 1980 में हुए नौ राज्य विधानसभाओं के निर्वाचनों में 8 राज्यों में कांग्रेस (आई) की सरकारें बनीं। इस प्रकार कांग्रेस (आई) ने सन् 1980 के लोकसभा निर्वाचन में लोकसभा में 2/3 स्पष्ट बहुमत प्राप्त करके अधिकांश राज्यों में अपनी सरकारें बनाकर एक बार पुनः केन्द्र तथा राज्यों के शासन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया तथा स्वयं को ही वास्तविक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में प्रतिष्ठित कर लिया। इसी आधार पर सन् 1981 में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने भी कांग्रेस (आई) को ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मान्यता प्रदान कर दी।
श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या और कांग्रेस- 31 अक्टूबर, सन् 1984 को श्रीमती इंदिरा गांधी के अंगरक्षकों द्वारा ही उनकी नृशंस हत्या कर दिये जाने के कारण कांग्रेस को भारी धक्का लगा और ऐसा प्रतीत होने लगा कि कांग्रेस अब अपनी एकता और प्रभुत्व को खो देगी, परन्तु तत्कालीन परिस्थितियों में श्री राजीव गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया तथा उनके नेतृत्व में सन् 1984 में आठवीं लोकसभा के निर्वाचन में कांग्रेस ने 503 स्थानों में से 401 स्थान प्राप्त करके अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की । अन्य सभी विरोधी दलों को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा लेकिन सन् 1989 में नवीं लोकसभा के निर्वाचन में पुन: कांग्रेस की पराजय हुई। उसे केवल 193 स्थान ही प्राप्त हुए।
श्री राजीव गांधी की हत्या और कांग्रेस- प्रधान मंत्री श्री चंद्रशेखर द्वारा राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप दिए जाने के बाद 10 वीं लोकसभा के लिए मई, सन् 1991 में निर्वाचन हुए। इस निर्वाचन का पहला दौर समाप्त ही हुआ था कि 21 मई, सन् 1991 को मद्रास से 40 किलोमीटर दूर श्री पेरुम्बुदूर नामक स्थान पर एक मानव-बम- विस्फोट द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष श्री राजीव गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई।
श्री पी० वी० नरसिंह राव और कांग्रेस- श्री गांधी की हत्या के पश्चात् श्री पी० वी० नरसिंह राव को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। सन् 1991 के निर्वाचन में कांग्रेस 511 स्थानों में से 227 स्थान प्राप्त करके सबसे बड़े दल के रूप में लोकसभा में आई और केंद्र में सत्तारूढ़ हुई। दिसंबर 1994 में कर्नाटक और आंध्र तथा फरवरी 1995 में महाराष्ट्र और गुजरात में कांग्रेस की हार इसकी गिरती साख की संकेतक रही।
1996 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मात्र 141 सीटों पर विजय प्राप्त हो सकी। फरवरी-मार्च, 1998 के लोकसभा चुनावों में उसे पुनः141 सीटें ही प्राप्त हुए।
श्रीमती सोनिया गांधी और कांग्रेस- 1999 में तेरहवीं लोकसभा का मध्यावधि चुनाव कांग्रेस ने श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में लड़ा। पिछले वर्ष श्रीमती सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने से पार्टी को एक नया वंशगत उत्तराधिकारी मिल गया । इस चुनाव में कांग्रेस ने लोकसभा में अब तक के सबसे कम स्थान (114 सीटें) प्राप्त किए। चौदहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई, 2004 में हुए चुनावों में कांग्रेस को 145 सीटें प्राप्त हुई तथा कांग्रेस और इसके 14 चुनाव पूर्व सहयोगी दलों ने केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (United Progressive Alliance- UPA) का गठन कर पूर्व वित्तमनी डॉ ० मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपनी सरकार बनाई।
15वीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2009 में हुए चुनावों में कांग्रेस को 206 स्थान प्राप्त हुए तथा कांग्रेस व इसके पूर्व सहयोगी दलों ने केंद्र में डाॅ० मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पुनः अपनी सरकार बनाई।
सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई-2014 में हुए चुनावों में कांग्रेस को अब तक के सबसे कम मात्र 44 स्थान ही प्राप्त हुए तथा उसके नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सीटों की संख्या भी सिमटकर केवल 58 ही रह गई ।
कांग्रेस की नीतियां एवं कार्यक्रम

कांग्रेस के प्रमुख कार्यक्रमों को निम्नलिखित शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) राजनीतिक कार्यक्रम ( Political Programmes)- निर्वाचनों के समय कांग्रेस के घोषणा पत्रों में कहा गया है कि लोकतंत्र और समाजवाद के आधार पर ही देश का निर्माण किया जाएगा। कांग्रेस के घोषणा-पत्रों में भ्रष्टाचार को दूर करने, राजकीय सेवाओं के राजनीतिकरण को रोकने और स्वच्छ प्रशासन देने का आश्वासन दिया गया है। समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता के प्रति वचनबद्धता व्यक्त की गई है। परिवर्तनों के लिए धीरे-धीरे शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक उपायों के अपनाए जाने के साथ ही साथ देश की एकता और स्थिरता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आश्वासन दिया गया है। जनता की शिकायतों को शीघ्र दूर करने की व्यवस्था करने और विकास कार्यक्रमों की जांच को बढ़ावा देने के साथ ही साथ देश की एकता और स्थिरता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आश्वासन दिया गया है। जनता की शिकायतों को शीघ्र दूर करने की व्यवस्था करने और विकास कार्यक्रमों की जांच को बढ़ावा देने के साथ ही साथ पंजाब, असम और जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का शीघ्र ही समाधान करने का आश्वासन दिया गया है। रामजन्म-भूमि और बाबरी मस्जिद के संवेदनशील मुद्दे पर सांप्रदायिक सद्भाव और सौहार्द बनाए रखने के लिए व्यापक प्रयास किए जाने का आश्वासन दिया गया है। इसके अतिरिक्त सत्ता के विकेंद्रीयकरण करने, पंचायती राज को सुदृढ़ करने तथा लोगों के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की रक्षा करते हुए सभी धर्मों, भाषाओं और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने का भी आश्वासन दिया गया है।

(2) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programmes)- आर्थिक क्षेत्र में कांग्रेस द्वारा समय-समय पर अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की जाती रही है। कांग्रेस सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) के विकास में विश्वास रखती है परंतु साथी ही वह निजी क्षेत्र (Private Sector) के महत्व को भी स्वीकार करती है। कांग्रेस सरकार ने विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं को स्वीकृति प्रदान करते हुए उधोगों को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। किसानों को भू-स्वामी बनाने के लिए भूमि-सुधार कानून बनाए। कांग्रेस ने सन् 1969 में दस सूत्रीय और सन् 1975 में बीस सूत्रीय कार्यक्रमों की घोषणा की। इसके अतिरिक्त कांग्रेस के घोषणा-पत्रों में कृषि- उत्पादन में वृद्धि की दर बढ़ाने का प्रयास, भूमिहीन मजदूरों, अल्प-कालिक बेरोजगारों और शिक्षित बेरोजगारों के लिए राष्ट्रीय बेरोजगार योजना, नये घरों के निर्माण के लिए एक विशाल राष्ट्रीय योजना, शहरों में जल और विद्युत आपूर्ति तथा प्रत्येक गांव को विद्युत और पेयजल की व्यवस्था, ग्रामीण और छोटे उद्योगों के लिए श्रेष्ठ तकनीक, बड़े और मध्यम उद्योगों का तीव्र गति से आधुनिकीकरण, जिससे उन्हें अधिक कार्य-कुशल बनाया जा सके तथा साथ ही साथ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की कार्य-कुशलता तथा उत्पादकता में सुधार करने का आश्वासन दिया गया है। शहरी संपत्ति तथा भूमि की सीमा निश्चित करना, नगरों में बढ़ते हुए भूमि के मूल्यों और अन्य क्षेत्रों में महंगाई में होने वाली वृद्धि को रोकना तथा लोगों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रयास करना, बिगड़ी हुई अर्थव्यवस्था को सुधारना और प्रतिवर्ष एक करोड़ लोगों के लिए नवीन अवसर जुटाना आदि कांग्रेस के आर्थिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हैं।

(3) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)- कांग्रेस द्वारा सामाजिक कल्याण के लिए समय-समय पर अनेक घोषणाएं की गई हैं, जिनमें (i) सभी लोगों को अपने धर्म और विश्वास के अनुसार जीवन व्यतीत करने का अधिकार है। व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य भेद-भाव को कांग्रेस समाप्त करना चाहती है; (ii) सन् 1995 तक सभी बालकों के लिए नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था, माध्यमिक और उच्च-शिक्षा में सार्थक सुधारों की व्यवस्था तथा बालिकाओं और अनुसूचित जातियों के बालकों की शिक्षा- व्यवस्था पर विशेष बल, (iii) अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा, पुलिस, सुरक्षा सेनाओं और राजकीय सेवाओं में अल्पसंख्यकों को रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धि। उर्दू भाषा को बिहार की भांति अन्य राज्यों में भी द्वितीय भाषा का स्तर प्रदान करना आदि कांग्रेस के प्रमुख सामाजिक कार्यक्रम हैं।

(4) विदेश-नीति (Foreign Policy)- विदेश नीति के संबंध में कांग्रेस द्वारा निम्नलिखित बातों पर बल दिया गया है-
(i) दल देश की गरिमा और सुरक्षा को बनाए रखेगा, (ii) अंतरराष्ट्रीय विषयों में शांतिपूर्ण सह अस्तित्व और तटस्थता की नीति का पालन करते हुए आत्म-सम्मान और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा, (iii) आणविक तकनीक के विकास को केवल शांतिपूर्ण क्षेत्र तक ही सीमित रखेगा, परन्तु 7 जुलाई, सन् 1985 को प्रेस कान्फ्रेंस में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा कहे गए ये शब्द भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं कि, “यदि पाकिस्तान अणु बम बनायेगा तो हम भी कुछ करेंगे।”

 

2. भारतीय साम्यवादी दल (Communist Party of India)
भारतीय साम्यवादी दल देश का दूसरा सबसे पुराना दल है। भारत में एस० ए० डांगे के प्रयासों से सन् 1924 में इसकी स्थापना हुई। इस दल की स्थापना में भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी एम० एन० रॉय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारंभ से ही साम्यवादी दल ने कम्युनिस्ट इंटरनेशनल’ (Commintern) के साथ अपने घनिष्ठ संबंध स्थापित कर लिए थे। देश में साम्यवादी दल ने मजदूर संघों के माध्यम से अपनी विचारधारा का प्रचार प्रसार करके अपने प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास किये परंतु इस दल की क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार ने इस दल को एक अवैध संस्था घोषित कर दिया। इन परिस्थितियों में साम्यवादी दल के सदस्य कांग्रेस के माध्यम से कार्य करने लगे। सन् 1930 के दशक में साम्यवादियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लेना प्रारंभ कर दिया तथा कुछ ही समय में कांग्रेस के समाजवादी संगठन, कांग्रेस समाजवादी दल’ का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। सन् 1930 में साम्यवादी सदस्यों को उनकी दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर कांग्रेस ने निष्कासित कर दिया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय रूस अंग्रेजों की ओर से युद्ध में सम्मिलित हो गया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय साम्यवादी दल ने अंग्रेजों का समर्थन करने की घोषणा करते हुए भारतीय श्रमिकों, कृषकों और आम जनता को युद्ध में अंग्रेजों की सहायता करने की सलाह दी। सन् 1942 में कांग्रेस द्वारा चलाए गए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने से केवल इन्कार ही नहीं किया, अपितु इस आन्दोलन की कड़ी निन्दा भी की। इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस और साम्यवादी दल में गतिरोध बढ़ गया। साम्यवादी दल द्वारा ब्रिटिश शासकों के संकेत पर मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग का समर्थन किए जाने के कारण इसकी छवि को भारी धक्का लगा ।
सन् 1946 में भारत में अंतरिम सरकार के गठन के समय साम्यवादी दल ने स्वयं को अकेला पाया, अतः अपनी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के उद्देश्य से विभिन्न भागों में इस दल ने आंदोलन प्रारंभ कर दिए । इसके अतिरिक्त इस दल के नेताओं ने कांग्रेस पर पूंजीवादी हितों के रक्षक होने का आरोप लगाया। सन् 1952 के पहले लोकसभा निर्वाचन में इस दल ने 29 तथा विधानसभाओं के निर्वाचनों में 193 स्थान प्राप्त किये। सन् 1957 के निर्वाचनों में एक बार पुनः 29 स्थान प्राप्त किए। परन्तु विधानसभा निर्वाचनों में इसकी सदस्य-संख्या घटकर 162 ही रह गई।
दल का विभाजन और देश के निर्वाचन- सन् 1962 में चीन द्वारा भारत पर किये गये आक्रमण के समय इस दल के पी० सी० जोशी, अजय घोष तथा एस० ए० डांगे जैसे कुछ नेता चीन के विरुद्ध कांग्रेस सरकार को पूर्ण समर्थन देने तथा रूस के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने के पक्ष में थे। इनके विपरीत नम्बूदरीपाद, रणदिघे तथा ज्योति बसु जैसे कुछ नेताओं का यह मत था कि कोई भी साम्यवादी देश किसी अन्य देश के क्षेत्र को हथियाने की बात नहीं सोच सकता, अतः इन्होंने चीन को निर्दोष सिद्ध करने का प्रयास किया। इस मतभेद के कारण रूस समर्थकों ने चीन-समर्थकों को दल से निष्कासित कर दिया। निष्कासित साम्यवादियों ने ए० के ० गोपालन के नेतृत्व में ‘साम्यवादी दल (मार्क्सवादी)’ का गठन किया।

सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन में दोनों गुटों ने अपने अलग-अलग घोषणा पत्र जारी किए तथा अलग-अलग प्रत्याशी खड़े किए। सन् 1971 तथा सन् 1977 के लोकसभा निर्वाचनों में भारतीय साम्यवादी दल ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके निर्वाचन में भाग लिया। सन् 1971 में इसे 23 स्थान प्राप्त हुए, परन्तु सन् 1977 में यह दल केवल 7 स्थान ही प्राप्त कर सका। सन् 1977 के निर्वाचन में करारी हार के कारण इस दल का पुनः एक बार विभाजन हुआ। डांगे तथा उसके समर्थकों ने ‘अखिल भारतीय साम्यवादी दल’ का गठन किया तथा अन्य साम्यवादी सदस्य ‘साम्यवादी दल (मार्क्सवादी)’ के निकट आ गए। सन् 1980 के लोकसभा निर्वाचन में साम्यवादी दल ने वामपंथी मोर्चे के सदस्य के रूप में भाग लिया तथा 11 स्थान प्राप्त किए। मई, सन् 1980 के विधानसभा निर्वाचनों में भी इस दल ने बिहार, तमिलनाडु और पंजाब में अच्छी भूमिका का निर्वाह किया। सन् 1984 के लोकसभा निर्वाचन में यह दल मात्र 6 स्थान ही प्राप्त कर सका। सन् 1985 में हुए 11 वे विधानसभाओं के निर्वाचनों में इस दल को कोई विशेष सफलता नहीं मिली। नौवीं लोकसभा के सन् 1989 में हुए निर्वाचनों में इस दल को केवल 12 स्थान प्राप्त हुए। दसवीं लोकसभा के सन् 1991 में हुए निर्वाचनों में इसे 14 स्थान प्राप्त हुए। 1996 में हुए लोकसभा चुनावों में भारतीय साम्यवादी दल को केवल 11 स्थान प्राप्त हुए। केंद्र में पहली बार साम्यवादी दल संयुक्त मोर्चा के एक घटक के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल में सम्मिलित हुआ। फरवरी 1998 में हुए बारहवीं लोकसभा के चुनावों में इस दल को 9 सीटें प्राप्त हुई। तेरहवीं लोकसभा के लिए सितंबर, 1999 में हुए मध्यावधि चुनावों में उसे मात्र 4 स्थान प्राप्त हुए। चौदहवीं लोकसभा के लिए 2004 में हुए चुनावों में भारतीय साम्यवादी दल को 10 स्थान प्राप्त हुए तथा उसने केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में बनी UPA गठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन दिया। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2009 में हुए चुनावों में इस दल को केवल 4 स्थान ही प्राप्त हुए। 16वीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में साम्यवादी दल को 1 स्थान ही प्राप्त हो सका।
संपूर्ण भारत में पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र प्रदेश आदि कुछ राज्य ही इसके महत्वपूर्ण गढ़ रहे हैं, अन्य क्षेत्रों में इसके समर्थकों की संख्या बहुत कम है। इसका चुनाव चिन्ह ‘बाल वह हंसिया’ है।
भारतीय साम्यवादी दल की नीतियां एवं कार्यक्रम
इस दल के कार्यक्रमों को उसके निर्वाचन घोषणा पत्रों के आधार पर निम्नलिखित शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) राजनीतिक कार्यक्रम (Political Programmes)- इस दल के घोषणा पत्रों के अनुसार (i)केंद्र के पास आपातकालीन घोषणा करने की शक्ति नहीं होनी चाहिए अर्थात् आपात स्थिति से संबंधित अनुच्छेद भारतीय संविधान से हटा दिया जाना चाहिए; (ii) आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाई जानी चाहिए तथा उच्च सदनों और राज्यपाल के पदों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए; (iii) उच्च न्यायालयों तथा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदच्युति का अधिकार संसद को दिया जाना चाहिए; (iv) राज्यों को और अधिक शक्तियां प्रदान की जानी चाहिए; (v) दल-बदल पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

(2) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programmes)- घोषणा-पत्रों में कहा गया है कि (i)वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त किया जाए तथा श्रमिकों को कम से कम इतना वेतन अवश्य ही मिलना चाहिए, जिससे उनकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके; (ii) भूमि-सुधारों में तेजी लाई जाए, अर्थात् कृषि- भूमि की सीमा बंदी की जाए और अतिरिक्त भूमि को भूमिहीनों में वितरित किया जाए; (iii) कपड़ा, चीनी, जूट और एकाधिकारवादी, कंपनियों, विदेशी औषधि-उधोगों तथा समस्त बैंकिंग उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया जाए तथा विगत वर्षों में बड़े-बड़े उद्योगपतियों को दी गई सुविधाओं को समाप्त किया जाए, (iv) श्रमिकों को बोनस दिया जाए तथा तालाबंदी व छंटनी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए और (v) र्टेड यूनियन संबंधी अधिकारों को पूर्ण रूप से मान्यता प्राप्त होनी चाहिए।

(3) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)- साम्यवादी दल के सामाजिक कार्यक्रमों में, (i) साम्प्रदायिक शक्तियों का दमन, (ii) धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को प्रोत्साहन, (iii) हरिजनों को अधिक व्यापक अधिकार, तथा (iv) महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाया जाना सम्मिलित है।

(4) विदेश नीति (Foreign Policy)- अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में साम्यवादी दल ‘पंचशील’ और विश्व शान्ति का समर्थक है। दल के घोषणा-पत्र के अनुसार भारत को साम्राज्यवाद का विरोध तथा विदेशी अड्डों के विरुद्ध जनमत संगठित करना चाहिए। भारत को साम्राज्यवादी देशों, विशेषकर रूस से सम्बन्ध सुदृढ़ बनाने चाहिए।

3.भारतीय साम्यवादी दल (मार्क्सवादी) (Communist Party of India -Marxist)
भारतीय साम्यवादी दल के विभाजन के परिणामस्वरूप सितम्बर, सन् 1964 में इस दल की स्थापना हुई। इस दल का झुकाव चीन की ओर है। इस दल की मान्यता है कि संवैधानिक उपायों से कभी भी सुधार नहीं किया जा सकता और न ही अपने उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकती है, अतः अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु यह दल संवैधानिक उपायों का प्रयोग करने में विश्वास नहीं रखता। सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन में इस दल ने एक पृथक् राजनीतिक दल के रूप में भाग लिया। बीच-बीच में भारत के दोनों साम्यवादी दलों के द्वारा पुनः एकीकरण की दिशा में प्रयास किए जाते रहे परन्तु सफलता नहीं मिली।
सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन में इस दल को भारतीय साम्यवादी दल की अपेक्षा अधिक सफलता मिली। इस दल ने लोकसभा में 19 और राज्य विधानसभाओं में 128 स्थान प्राप्त किए। केरल में ई० एस० नंबूदरीपाद के नेतृत्व में संयुक्त सरकार का गठन किया। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी के नेतृत्व में संयुक्त सरकार का गठन किया। सन् 1971 में इस दल ने लोकसभा में 25 स्थान प्राप्त किए परंतु राज्य-विधानसभाओं के निर्वाचन में यह दल अच्छी भूमिका नहीं निभा पाया। सन् 1977 के लोकसभा-निर्वाचन में जनता पार्टी के साथ मिलकर 22 स्थान प्राप्त किए तथा पश्चिमी बंगाल में सरकार का गठन करने के अतिरिक्त अन्य राज्यों में इस दल की स्थिति अच्छी नहीं रही। सन् 1980 के सामान्य निर्वाचन में ‘इन्दिरा लहर’ के चलते हुए भी लोकसभा में इस दल ने 35 स्थान प्राप्त किए परंतु पश्चिमी बंगाल और केरल के अतिरिक्त अन्य राज्यों में इसे अधिक सफलता नहीं मिली।
सन् 1984 के लोकसभा- निर्वाचन में इसकी सदस्य संख्या घटकर 22 ही रह गई। पश्चिमी बंगाल में इस दल का बहुमत कम हो जाने के कारण इस दल को भारी धक्का लगा परंतु वामपंथी मोर्चे की सरकार का गठन करने में इसे एक बार पुन: सफलता प्राप्त हुई। नवीं लोकसभा के लिए सन् 1989 में हुए निर्वाचनों में इस दल को 39 स्थान मिले तथा दसवीं लोकसभा के लिए सन् 1991 में हुए निर्वाचनों में इस दल को 35 स्थान मिले, अतः यह कहा जा सकता है कि भारत के साम्यवादी दल (मार्क्सवादी) के प्रभाव में निरंतर वृद्धि हुई है तथा उसने केरल, त्रिपुरा और पश्चिमी- बंगाल आदि कुछ राज्यों में वामपंथी मोर्चे के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।
1996 के लोकसभा चुनावों में इस दल को 32 स्थान प्राप्त हुए। 1996 में ही हुए विधानसभा चुनावों में पश्चिमी बंगाल तथा केरल में वाम मोर्चा को सफलता प्राप्त हुई तथा दोनों राज्यों में वाम-मोर्चा की सरकार का गठन हुआ। 1998 के लोकसभा चुनावों में इस दल को 32 तथा सितंबर, 1999 के लोकसभा चुनावों में भी 32 स्थान ही प्राप्त हुए। चौदहवीं लोकसभा के लिए 2004 में हुए चुनावों में इस दल को 43 स्थान प्राप्त हुए तथा उसने केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में बनी UPA गठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन दिया। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई, 2009 में हुए चुनावों में इस दल को केवल 16 स्थान प्राप्त हुए। सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई, 2014 में हुए चुनावों में इस दल को केवल 9 स्थान ही प्राप्त हुए।
मुख्यतया पश्चिमी-बंगाल, त्रिपुरा, केरल और उड़ीसा आदि कुछ राज्यों में इसके समर्थक अधिक हैं। अन्य राज्यों में इसके समर्थकों की संख्या बहुत-कम है। इसका चुनाव चिन्ह ‘हथौड़ा दरांती’ है।
साम्यवादी दल (मार्क्सवादी) की नीतियां एवं कार्यक्रम
घोषणा पत्रों के आधार पर इस दल के कार्यक्रमों को निम्नलिखित शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) राजनीतिक कार्यक्रम (Political Programmes)- घोषणा पत्रों के अनुसार (i) दल अधिनायकवाद और सांप्रदायिकता का विरोध जारी रखेगा, (ii) संविधान में इस प्रकार की व्यवस्था की जाए, जिससे आपातकाल की पुनरावृत्ति न हो सके, (iii) मौलिक अधिकारों का हनन न किया जाए तथा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ जैसे लोकतंत्र-विरोधी कानूनों को समाप्त किया जाए तथा राजकीय कर्मचारियों को संध या यूनियन बनाने के निर्बाध अधिकार प्राप्त हों, (iv) संविधान में ऐसे संशोधन किये जाए कि राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के स्थान पर तुरंत निर्वाचन कराए जाएं, (v) अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) राज्यों को दे दी जाए, तथा (vi) न्यायपालिका जनता की इच्छा के अनुरूप कार्य करे। सामाजिक और आर्थिक सुधार लाने के लिए जो भी कानून बनाए जाएं, उन्हें न्यायालय में चुनौती न दिए जा सकने से संबंधित व्यवस्था हो। इस प्रकार यह दल ‘न्यायपालिका की प्रतिबद्धता’ पर बल देता है।

(2) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programmes)- इस दल ने जनता के समक्ष अपना आर्थिक कार्यक्रम इस प्रकार प्रस्तुत किया है-

(i) चीनी, कपड़ा, सीमेंट और अन्य महत्वपूर्ण उद्योगों का तुरंत राष्ट्रीयकरण किया जाए तथा विदेशों में भारतीयों की पूंजी पर सरकारी आधिपत्य स्थापित किया जाए;
(ii) कारखानों और अन्य क्षेत्रों के प्रबंध कार्यों में कर्मचारियों को भाग लेने का अधिकार दिया जाए;
(iii) छोटे किसानों को ऋण प्राप्त करने की सुविधाएं प्राप्त हों;
(iv) निर्धनों से कर न लेकर करों का बोझ धनवानों पर डाला जाए;
(v) ‘जिनका हल उनकी धरती’ के सिद्धांत पर चला जाए तथा ‘जमींदारी प्रथा’ को पूर्णतया समाप्त किया जाए। भूमिहीनों तथा समाज के निर्बल वर्गों के मध्य भूमि वितरण कार्य तेजी से किया जाए। किसानों, खेतिहर मजदूरों और गांव की निर्धन जनता को तुरंत ऋणमुक्त किया जाए। उन्हें मकान बनाने के लिए नि:शुल्क स्थान दिया जाए। निर्धन किसानों से किसी भी दशा में उनका भू-स्वामित्व न छीना जाए।

(3) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)- इस दल के अनुसार जब भूमिहीनों में भूमि बंट जाएगी और गांवों की उन्नति हो जाएगी तो सामाजिक भेद-भाव स्वयं ही समाप्त हो जाएंगे। इस दल के अनुसार (i) हरिजनों, जन-जातियों एवं पिछड़े वर्गों के लिए राजकीय सेवाओं और विद्यालयों में स्थान आरक्षित किए जाएंगे। जिन हरिजनों ने ‘बौद्ध धर्म अपना लिया है, उन्हें भी ये सुविधाएं बराबर मिलती रहेंगी; (ii) समस्त भारतीय भाषाओं को समान आदर दिया जाएगा और अहिंदी भाषा-भाषियों पर हिंदी लादी नहीं जाएगी, तथा (iii) मुसलमानों और उर्दू भाषा के साथ कोई पक्षपात नहीं किया जाएगा।

(4) विदेश नीति (Foreign Policy)- मार्क्सवादियों के अनुसार साम्राज्यवादियों का विरोध करने में भारत का हित निहित है। अतः इसके लिए समाजवादी देशों के साथ अपने संबंध सुदृढ़ किए जाएं। समाजवादी वियतनाम और कम्पूचिया के साथ उनकी विशेष सहानुभूति है तथा अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत देशों का यह दल समर्थन करता है। इस दल की यह मांग है कि भारत-सोवियत मैत्री सन्धि पर पूर्णतया अमल किया जाए और चीन के साथ सम्बन्ध सामान्य बनाए जाएं। गुट निरपेक्षता की नीति को सुदृढ़ किया जाए।

4. भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janta Party)
1 मई, सन् 1977 को जन्मी जनता पार्टी के द्वितीय विभाजन के परिणाम स्वरुप जनता पार्टी के ‘जनसंघ’ घटक ने श्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में 5 अप्रैल, सन् 1980 को ‘भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। यह पार्टी एक कार्यकर्ता-आधारित राजनीतिक संगठन (Cadre-based Political Organisation) है।
सन् 1980 में हुए नौ राज्य-विधानसभाओं के निर्वाचनों में इस दल ने अच्छी भूमिका का निर्वाह किया तथा विरोधी दलों में सर्वाधिक 149 स्थान प्राप्त किए। मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में इनकी सफलता उत्साहजनक रही परंतु पंजाब और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में इसे असफलता का सामना करना पड़ा। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के निर्वाचन में इसने कांग्रेस के बराबर ही स्थान प्राप्त किए परंतु इसे सरकार बनाने का अवसर नहीं मिला। सन् 1983 में आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक विधानसभाओं के निर्वाचन में क्रमशः 3 और 18 स्थान प्राप्त किए। दिल्ली महानगर परिषद के निर्वाचन में इसकी भूमिका निराशाजनक ही रही।
सन् 1984 के लोकसभा निर्वाचन में भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक स्थिति बहुत ही निराशाजनक रही; क्योंकि इस निर्वाचन में यह मात्र 2 स्थान ही प्राप्त कर सकी और पार्टी अध्यक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेई भी पराजित हो गए। मार्च, सन् 1985 में हुए 11 विधानसभा निर्वाचनों में इस दल ने अपनी स्थिति में कुछ सुधार किया। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश तथा गुजरात में इस दल ने पिछली विधानसभाओं की तुलना में अधिक स्थान प्राप्त किए परंतु बिहार, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में इसकी सदस्य संख्या बहुत कम हो गई। हिमाचल प्रदेश तथा बिहार में इस दल को विशेष रूप से धक्का लगा। सन् 1989 में नौवीं लोकसभा निर्वाचनों में यह दल देश के सर्वाधिक संगठित शक्तिशाली दल के रूप में उभरा और इसने 88 स्थान प्राप्त किए तथा सन् 1991 के दसवीं लोकसभा के निर्वाचन में कांग्रेस (आई) के बाद सर्वाधिक 119 स्थान प्राप्त करने वाले दल के रूप में सामने आया; साथ ही उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में भी इस दल ने अपनी सरकारें बनाई। सन् 1993 में हुए विधानसभा निर्वाचनों में इस पार्टी को उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में पराजय का मुंह देखना पड़ा और इन तीन राज्यों में अपनी सरकारों को खोकर केवल दिल्ली और राजस्थान में सरकारें बनाकर ही संतोष करना पड़ा। 1994 में कर्नाटक विधानसभा के चुनावों में इस दल ने अपनी स्थिति मजबूत की तथा मार्च 1995 के विधानसभा चुनावों में गुजरात में 2/3 बहुमत प्राप्त करके और महाराष्ट्र सभा में शिवसेना के साथ मिलकर सरकारों का गठन किया। उड़ीसा तथा बिहार में भी इसने अपनी स्थिति मजबूत की।
1996 के लोकसभा चुनावों में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों को 196 स्थान प्राप्त हुए। लोकसभा में सबसे बड़ा दल होने के कारण राष्ट्रपति ने भाजपा के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेई को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। श्री वाजपेई तथा उनके मंत्रिमंडल के ग्यारह अन्य मंत्रियों ने शपथ ग्रहण की। बहुमत के अभाव में 28 मई 1996 को सायंकाल श्री वाजपेई ने अपनी सरकार का त्यागपत्र राष्ट्रपति को दे दिया। 1998 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 179 सीटें प्राप्त हुई तथा उसने सहयोगी दलों के सहयोग से श्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में सरकार बनाई। अप्रैल 1999 में सरकार एकमत से पराजित हो गई। सितंबर 1999 को हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा को 182 स्थान तथा उसे और उसके सहयोगी दलों को मिलाकर 304 स्थान प्राप्त हुए तथा उसने केंद्र में श्री अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में ‘राजग’ की सरकार बनाई। चौदहवीं लोकसभा के 2004 में हुए चुनावों में भाजपा को केंद्र में सत्ता गंवानी पड़ी तथा उसे लोकसभा में केवल 138 सीटें ही प्राप्त हुई। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2009 में हुए चुनावों में भाजपा को केवल 116 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में भाजपा ने अकेले ही 282 सीटों पर विजय प्राप्त कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया तथा स्वतंत्रता के बाद लोकसभा में पहली बार अकेले ही स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने वाली कोई गैर कांग्रेसी पार्टी भाजपा बनी। दस वर्षों के पश्चात् मई, 2014 में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 337 सीटें प्राप्त कर केंद्र में श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई।

भारतीय जनता पार्टी की नीतियां एवं कार्यक्रम
चुनाव-घोषणापत्रों के आधार पर इस दल के कार्यक्रमों को निम्नलिखित शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) राजनीतिक कार्यक्रम- (Political Programmes)- भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में व्यापक निर्वाचन सुधारों की बात कही गई है। निर्वाचनों में सूची-प्रणाली प्रारंभ करने पर विचार किया जाएगा। निर्वाचन आयोग को बहुसदस्यीय बनाया जाएगा तथा राजनीतिक दलों के निर्वाचन की सार्वजनिक जांच की जाएगी। घोषणा-पत्र में लोकपाल और लोकायुक्त नियुक्त करने की बात भी कही गई है। सभी मंत्रियों को प्रतिवर्ष अपनी आय-व्यय का विवरण देना अनिवार्य होगा तथा सरकारी ठेकों में राजनीतिक हस्तक्षेप समाप्त किया जाएगा। प्रेस की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार का रूप देने तथा स्वतंत्रता की रक्षा और दूरदर्शन और आकाशवाणी की स्वायत्तता संबंधी कानून बनाने का आश्वासन दिया गया है।

(2) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programmes)- इस दल द्वारा आर्थिक कार्यक्रम संबंधी घोषणाएं इस प्रकार की गई हैं- (i) नागरिकों को काम पाने का अधिकार प्रदान किया जाएगा, जिसके लिए देश में ‘रोजगार गारंटी योजना’ प्रारंभ की जाएगी। निर्धन व्यक्तियों के लिए ‘अन्त्योदय योजना’ चलाई जाएगी, (ii) सार्वजनिक क्षेत्र को उत्पादन और लाभार्जन करने वाला बनाया जाएगा, (iii) कृषि को सब तरह प्रोत्साहित करने के लिए छोटी-छोटी सिंचाई योजनाएं प्रारंभ की जाएंगी तथा किसानों को लाभकारी उपज मूल्य दिए जाएंगे, (iv) उत्पादन और आपूर्ति का कुशलतापूर्वक प्रबंध करके और भ्रष्टाचार को समाप्त करके मुल्यों को स्थिर किया जाएगा, (v) संपूर्ण कर प्रणाली को वैज्ञानिक बनाया जाएगा, (vi) मूल्य वृद्धि पर नियंत्रण रखने के लिए मूल्य आयोग का गठन किया जाएगा, (vii) काले धन के प्रसार को रोकने के लिए दल ने 8 सूत्रीय कार्यक्रम सुझाया है।

(3) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)- यह दल नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। धर्म निरपेक्षता को सामूहिक वोट बटोरने की घृणित राजनीतिक चाल नहीं बनने दिया जाएगा। शिक्षण संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप समाप्त किया जाएगा। पत्नी को पति की संपत्ति में बराबर का भागीदार बनाया जाएगा तथा दहेज के कारण हुई मृत्यु को हत्या माना जाएगा। सभी दंगों की न्यायिक जांच और उसकी रिपोर्ट का प्रकाशन अनिवार्य होगा। पुलिस के काम-काज में राजनीतिक हस्तक्षेप रोकने तथा दोषी व्यक्तियों को कड़ी सजा देने की व्यवस्था होगी। गौ-संरक्षण हेतु गौ-वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाएगा। त्रिभाषा सूत्र लागू किया जाएगा। नेपाली को संविधान में भारतीय भाषाओं को सूची में स्थान देने तथा संस्कृति भाषा की पढ़ाई में रुचि लेने की बात कही गई है।

(4) विदेशी नीति (Foreign Policy)- भारतीय जनता पार्टी ने आंग्ल अमेरिकी या रूसी गुट में सम्मिलित न होने की नीति का समर्थन किया है। यह दल सभी पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध बनाने, राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते हुए सीमा विवाद का सम्मानजनक हल निकालने तथा ‘सार्क आंदोलन’ को मजबूत करने का पक्षधर है। यह दल राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु परमाणु बम बनाने में विश्वास रखता है। इस दल के अनुसार ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ को पुन: गतिशील बनाया जाएगा। पड़ोसी देशों के साथ मैत्री और सहयोग की नीति का अनुसरण किया जाएगा। भारत की पुनः एशियाई पहचान स्थापित की जाएगी।

5. जनता दल (वी० पी० सिंह) और राष्ट्रीय मोर्चा (Janta Dal (V. P. Singh) and National Front)
अक्टूबर, सन् 1986 में श्री वी० पी० सिंह के नेतृत्व में कुछ कांग्रेसी नेताओं ने कांग्रेस (आई) से निकलकर ‘जनमोर्चा’ नामक एक संगठन बना लिया और फिर कांग्रेस-विरोधी दलों को संगठित करके एक मंच पर लाने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। जनता पार्टी, लोकदल तथा कांग्रेस (एस) जैसे दल अपने सीमित प्रभाव छात्रों के कारण अकेले ही कांग्रेस (आई) को चुनौती देने की स्थिति में नहीं थे, अंत ये दल संगठित होकर कांग्रेस (आई) के विकल्प के रूप में एक दल गठित करने का प्रयास करने लगे। वी० पी० सिंह द्वारा ‘जनमोर्चा’ के गठन के पश्चात् ये प्रयास और भी तेज हो गए। एक वर्ष के निरंतर प्रयास के फलस्वरूप 11 अक्टूबर सन् 1988 को बैंगलौर में हुए अधिवेशन में जनता पार्टी, जनमोर्चा तथा देवीलाल के नेतृत्व वाले लोकदल ने एकत्रित होकर अपने-अपने अस्तित्व को समाप्त करके जनता दल नामक एक नए दल गठन किया। जनमोर्चा के नेता श्री वी० पी० सिंह को इसका अध्यक्ष बनाया गया।
इसके पश्चात एक ऐसा मोर्चा गठित करने के लिए प्रयास किए गए, जिसमें समान विचारधारा वाले सभी दलों को एकत्रित किया जा सके। लंबे विचार-विमर्श के पश्चात् जनता दल, असम गण परिषद्, तेलुगुदेशम्, कांग्रेस (एस) और डी० एम० के० ने मिलकर कांग्रेस (आई) के विकल्प के रूप में एक ‘राष्ट्रीय मोर्चा’ (National Front) बनाया, जिसका संयोजक वी० पी० सिंह को और अध्यक्ष एन० टी० रामाराव को बनाया गया। इस मोर्चे में सम्मिलित सभी घटक अपने अलग अस्तित्व को समाप्त करने के लिए सहमत नहीं हुए, अतः यह मोर्चा एक राजनीतिक दल का रूप न ले सका। इस मोर्चे के घटक दलों ने कांग्रेस (आई) के प्रत्याशी के विरुद्ध केवल एक प्रत्याशी खड़ा करने का निश्चय किया। जनवरी, सन् 1989 में हुए तमिलनाडु विधानसभा के निर्वाचनों में इसी आधार पर भाग लिया तथा डी० एम० के० ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

नवीं लोकसभा के लिए नवंबर, सन् 1989 के लिए निर्वाचनों में राष्ट्रीय मोर्चा तथा लगभग सभी विपक्षी दलों ने पारस्परिक सहमति के आधार पर एकजुट होकर भाग लिया, जिसके परिणाम स्वरूप राष्ट्रीय मोर्चे को 144 स्थान मिले, जिनमें जनता दल के 141, तेलुगूदेशम् के 2 और कांग्रेस (एस) का एक सदस्य था। लोकसभा में सबसे बड़ा दल होते हुए भी कांग्रेस (आई) ने अपनी सरकार बनाने का दावा नहीं किया, अत: राष्ट्रीय मोर्चे ने भारतीय जनता पार्टी तथा वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री के रुप में श्री वी० पी० सिंह ने शपथ ग्रहण की। राष्ट्रीय मोर्चे की अल्पमतीय सरकार भारतीय जनता पार्टी तथा वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन पर टिकी हुई थी। नवंबर, सन् 1990 में मोर्चा सरकार का पतन हो गया।
इस बीच जनता दल के वरिष्ठ नेता श्री चंद्रशेखर ने जनता दल का विघटन कर दिया और अपने 58 सदस्यों को लेकर एक नए दल जनता दल (समाजवादी) का गठन कर लिया। इतना ही नहीं, कांग्रेस की शीघ्र निर्वाचन न कराने की विवशता का लाभ उठाते हुए कांग्रेस के 193 सदस्यों के समर्थन से सरकार बना ली और स्वयं प्रधानमंत्री बन गए। इसके पश्चात् राज्यों में भी इसी प्रकार जनता दल का विभाजन हो गया। सन् 1991 के दसवीं लोकसभा के निर्वाचनों में इस दल को 57 स्थान प्राप्त हुए और बिहार में इस दल की सरकार रही। इस दल को एक बार पुन: फरवरी, सन् 1992 में विभाजन का सामना करना पड़ा है, जिसके परिणाम स्वरुप यह दल वी० पी० सिंह या बोम्बई तथा अजीत सिंह दो खेमों में विभाजित हो गया। 1994 में इसका पुनः विभाजन होकर अलग से समता पार्टी बनी। 1994 के विधानसभा चुनावों में जनता दल ने कर्नाटक में सरकार का गठन किया लेकिन मार्च 1995 में उड़ीसा विधानसभा के चुनावों में इसे सरकार से हाथ धोना पड़ा।
मई, 1996 में हुए लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय मोर्चा, वाम मोर्चा तथा उसके सहयोगी दलों को 183 स्थानों पर विजय प्राप्त हुई, जिनमें जनता दल के केवल 46 सदस्य हैं। राष्ट्रीय मोर्चा, वाम मोर्चा तथा उसके सहयोगी दलों ने मिलकर संयुक्त मोर्चे का निर्माण किया तथा श्री एच० डी० देवगौड़ा को अपना नेता चुना। 1 जून 1996 को देवगौड़ा ने प्रधानमंत्री पद संभाल लिया। इनकी सरकार को 141 सदस्यीय कांग्रेस का बाहर से समर्थन प्राप्त है। कांग्रेस द्वारा समर्थन वापिस लेने से अप्रैल, 1997 में देवगौड़ा सरकार का पतन हो गया तथा जनता दल के नेता श्री इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व में 21 अप्रैल 1997 को पुनः संयुक्त मोर्चा सरकार का गठन हो गया। अध्यक्ष के चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाकर जुलाई 1997 में जनता दल के पूर्व अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद यादव ने जनता दल को पुनः विभाजित कर अपने नेतृत्व में अलग से राष्ट्रीय जनता दल का गठन कर लिया। फरवरी, 1998 के लोकसभा चुनावों में जनता दल को मात्र 6 सीटें प्राप्त हुई। अगस्त, 1999 में जनता दल में पुनर्विभाजन हो गया- जनता दल (सेकुलर) तथा जनता दल (यूनाइटेड)। 13वीं लोकसभा के चुनाव लोकशक्ति तथा समता पार्टी ने जनता दल (यूनाइटेड) के चुनाव चिन्ह पर ‘राजग’ के घटक के रूप में लड़े तथा 20 स्थानों पर विजय प्राप्त की। बाद में रामविलास पासवान जनता दल (यूनाइटेड) से अलग हो गए तथा उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी नामक एक नई पार्टी बना ली। वर्तमान में जनता दल (यूनाइटेड) ने राष्ट्रीय दल होने का दर्जा खो दिया है। चौदहवीं लोकसभा के 2004 में हुए चुनावों में जनता दल (यूनाइटेड) को 8 स्थान प्राप्त हुए। पंद्रहवीं लोकसभा के 2009 में हुए चुनावों में जनता दल (यूनाइटेड) को 20 स्थान प्राप्त हुए। सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल -मई 2014 में हुए चुनावों में जनता दल (यूनाइटेड) को केवल 2 स्थान ही प्राप्त हुए।

जनता दल की नीतियां एवं कार्यक्रम
घोषणा-पत्रों के आधार पर इस दल के कार्यक्रमों को अग्रलिखित शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

 (1) राजनीतिक कार्यक्रम (Political Programmes)- इस दल के राजनीतिक कार्यक्रमों में (i) भ्रष्टाचार, विशेषता: उच्च स्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करना, (ii) निर्वाचन-प्रणाली में सुधार करना,(iii) अत्यधिक केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति को समाप्त करना, (iv) संघीय व्यवस्था को वास्तविक अर्थों में पुन: स्थापित करना, (v) सूचना के अधिकार को संवैधानिक दर्जा देना, (vi) दूरदर्शन तथा आकाशवाणी को स्वायत्तता प्रदान करना, (vii) लोकपाल की नियुक्ति तथा इसके अधिकार-क्षेत्र में वृद्धि करना, (viii) राष्ट्रीय-सहमति तथा वार्ता के द्वारा राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करना, (ix) बातचीत तथा भाई-चारे से सांप्रदायिक समस्या का निवारण करना, आदि सम्मिलित हैं।

(2) आर्थिक कार्यक्रम (Economic Programmes)- आर्थिक कार्यक्रमों में (i) छोटे तथा भूमिहीन किसानों के दस हजार रुपए तक ऋण माफ करना, (ii) किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाना, (iii) लघु उद्योगों तथा रोजगारपरक उद्योगों को बढ़ावा देना, (iv) उद्योगों के ‘प्रबधं में श्रमिकों तथा कर्मचारियों की भागीदारी निश्चित करना, (v) भूमि-सुधारों को लागू करना, (vi) योजना आयोग को संवैधानिक स्तर प्रदान करना, (vii) काम के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करना, (viii) विदेशी ऋण के बोझ को कम करना, (ix) सार्वजनिक उद्योगों को अत्यधिक नौकरशाही तथा राजकीय हस्तक्षेप से मुक्त करना, (x) बेरोजगारी को दूर करना तथा शिक्षित व प्रशिक्षित युवकों को ऋण प्रदान करना आदि सम्मिलित हैं।

(3) सामाजिक कार्यक्रम (Social Programmes)- जनता दल सामाजिक कार्यक्रमों में, (i) दलित, शोषित तथा पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रयास करना, (ii) महिलाओं की समस्याओं के प्रति विशेष ध्यान देना, (iii) अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जन-जातियों के विकास को प्रभावी बनाना तथा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करना, (iv) वृद्धावस्था पेंशन देना, (v) सेवा निवृत्त सैनिकों को एक पद-एक पेंशन के आधार पर पेंशन देने की व्यवस्था करना आदि सम्मिलित हैं।

(4) विदेशी नीति (Foreign Policy)- गुटनिरपेक्षता और राष्ट्रीय सुरक्षा जनता दल की विदेशी-नीति के आधार हैं। यह पड़ोसी देश के साथ परस्पर मैत्री और सहयोगात्मक संबंधों को दृढ़ बनाने में विश्वास रखता है। किसी भी बाहरी जोड़-तोड़ को यह दल अस्वीकार करता हैं। जनता दल की मान्यता है कि भारत के लिए एक ऐसा समग्र सुरक्षा सिद्धांत अपनाया जाए, जो विश्वसनीय रूप से शांति-उन्मुख हो।

6. बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party)
14 अप्रैल, 1984 (डॉ० अंबेडकर के जन्म-दिवस) को उत्तर प्रदेश में एक क्षेत्रीय दल के रूप में इस दल की स्थापना हुई। इस दल के पीछे ‘दलित समाज’ शोषित संघर्ष समिति (D.S.A.) और पिछड़ी जाति एवं अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी संघ (BAMCEF) आदि दबाव समूह हैं। अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियां इस दल से अत्यधिक प्रभावित हैं। कुछ समय पूर्व तक इस दल के अध्यक्ष कांशीराम थे किंतु लंबी बीमारी के बाद हुए उनके निधन से अब पार्टी की अध्यक्षा सुश्री मायावती है। इसके अतिरिक्त अल्पसंख्यकों पर भी इस दल का अच्छा प्रभाव है। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त पंजाब तथा मध्य प्रदेश में भी इस दल के प्रभाव में वृद्धि हुई है। सन् 1989 में हुए लोकसभा निर्वाचन में इस दल को तीन स्थान प्राप्त हुए। परिवर्तनवादी दल के रूप में यह दल वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करके दलित एवं शोषित वर्ग की स्थिति में ठोस सुधार करने के लिए प्रतिबद्ध है। 1996 के लोकसभा चुनावों में बसपा को 11 स्थान प्राप्त हुए। मार्च 1997 में उ० प्र० में भा-बसपा गठजोड़ की सरकार सुश्री मायावती के नेतृत्व में गठित हुई।
बारहवीं लोकसभा के चुनाव के अवसर पर चुनाव आयोग ने बहुजन समाज पार्टी को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता दे दी। इसका चुनाव चिन्ह ‘हाथी’ है। फरवरी, 1998 के लोकसभा चुनावों में इस दल को 4 सीटें प्राप्त हुई तथा सितंबर, 1999 के लोकसभा चुनावों में इसे 14 स्थान प्राप्त हुए। चौदहवीं लोकसभा के 2004 के चुनावों में इस दल को 19 स्थान प्राप्त हुए। पंद्रहवीं लोकसभा के 2009 में हुए चुनावों में बसपा को 21 स्थान प्राप्त हुए। सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में बसपा को कोई भी स्थान प्राप्त नहीं हो सका।
क्षेत्रीय राजनीतिक दल(Regional Political Parties) भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भरमार है अतः उनमें से सक्रिय प्रमुख दलों का यहां वर्णन किया जा रहा है-

1. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (D.K.M)
यह तमिलनाडु का एक प्रमुख राजनीतिक दल है जिसकी स्थापना द्रविड़ों के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास के लिए सन् 1944 में जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष श्री ई० वी० रामास्वामी नायकर ने ‘द्रविड़ कड़गम’ (D.K.) नाम से की। इस दल ने द्रविड़ संस्कृति को सुरक्षित रखने पर विशेष बल देते हुए स्वतंत्र द्रविड़ राज्य की स्थापना को अपना लक्ष्य घोषित किया। इस दल ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज को आवश्यक सम्मान देने तथा भारतीय संविधान को स्वीकार करने से इंकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरुप इस दल के कुछ असंतुष्ट नेताओं ने श्री सी० एम० अन्नादुराई के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (D.M.K.) नामक दल का गठन किया। अपनी स्थापना के कुछ समय पश्चात् ही इस दल ने अपना साम्प्रदायिक स्वरूप त्याग दिया और स्वयं को मद्रास राज्य के निर्धन, अशिक्षित एवं दलित वर्गों के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया, जिसके परिणाम स्वरूप इस दल को इन वर्गों का समर्थन प्राप्त हो गया। सन् 1957 में दल ने पहली बार निर्वाचनों में भाग लेकर राज्य-विधानसभा में 15 स्थान प्राप्त किए। सन् 1962 के राज्य विधानसभा के निर्वाचन में 50 तथा लोकसभा में 7 स्थान प्राप्त किए। सन् 1967 के राज्य विधानसभा के निर्वाचन में 234 में से 138 स्थान प्राप्त करके सरकार का गठन किया और लोकसभा निर्वाचन में से दल के सभी प्रत्याशियों ने विजय प्राप्त करके 25 स्थान प्राप्त किए।
सन् 1971 के मध्यावधि निर्वाचन में इस दल ने एक बार पुनः तीन-चौथाई स्पष्ट बहुमत प्राप्त करके तमिलनाडु में सरकार का गठन किया, परन्तु लोकसभा में इसके सदस्यों की संख्या घटकर 23 रह गई। दल के अध्यक्ष श्री अन्नादुराई की मृत्यु के पश्चात् दल का नेतृत्व श्री करुणानिधि के हाथों में आ गया। सन् 1972 में श्री करूणानिधि तथा दल के कोषाध्यक्ष औ सभा में श्री करुणानिधि तथा दल के कोषाध्यक्ष और प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता श्री एम० जी० रामचंद्रन के मध्य तीव्र मतभेद हो गया। श्री रामचंद्रन के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं दल के नेता पर भ्रष्टाचार आदि के आरोप लगाते हुए ‘अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ‘ (A.D.M.K.) के नाम पर एक नए दल का गठन किया, जिसे बाद में ‘अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ नाम दिया गया।
सन् 1988 के सामान्य निर्वाचन में दोनों दलों ने अलग-अलग भाग लिया, परंतु डी० एम० के० की तुलना में अन्ना डी० एम० के० (A.I.D.M.K.) को सफलता प्राप्त हुई, क्योंकि राज्य-विधानसभा में डी० एम० के० को केवल 48 स्थान ही प्राप्त हो सके। सन् 1980 के लोकसभा-निर्वाचन में डी० एम० के० ने कांग्रेस के सहयोग से 16 स्थान प्राप्त किए। विधानसभा निर्वाचनों में उसे पुनः करारी हार का सामना करना पड़ा, क्योंकि उसे मात्र 38 स्थान ही प्राप्त हो सके। सन् 1984-85 के निर्वाचनों में भी इस दल की स्थिति निराशाजनक ही रही। जनवरी सन् 1989 में डी० एम० के० ने राष्ट्रीय मोर्चे के एक घटक के रूप में विधानसभा निर्वाचन में भाग लिया और अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। श्री करुणानिधि के नेतृत्व में सरकार का गठन किया परंतु नवंबर, सन् 1989 में हुए लोकसभा-निर्वाचन में इसकी घोर पराजय हुई क्योंकि एक दल को एक भी स्थान नहीं मिला। सन् 1991 के दसवीं लोकसभा के निर्वाचन में भी इसे घोर पराजय का मुंह देखना पड़ा।
1996 के लोकसभा चुनावों में डी० एम० के० को 17 स्थानों पर विजय प्राप्त हुई और संयुक्त मोर्चा के एक घटक के रूप में वह केंद्र सरकार में भागीदार बनी। तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में डी० एम० के० -तमिल मनीला कांग्रेस गठबंधन ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की तथा श्री करुणानिधि तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री बने। फरवरी, 1998 के लोकसभा चुनावों में डी० एम० के ० को मात्र 5 सीटें प्राप्त हुई। सितंबर, 1999 में उसने भाजपा गठबंधन के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा और 12 सीटें प्राप्त की। चौदहवीं लोकसभा 2004 तथा पंद्रहवीं लोकसभा, 2009 में हुए चुनावों में इस दल को क्रमशः 16 व 18 स्थान प्राप्त हुए तथा केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में गठित हुए UPA गठबंधन का वह सहयोगी सदस्य बना। सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में द्रमुक को कोई भी सीट प्राप्त नहीं हुई।
डी० एम० के० की स्थापना के समय से इसकी नीतियों में निरंतर परिवर्तन हो रहा है, क्योंकि सन् 1962 के भारत पर चीनी आक्रमण से पूर्व तक यह दल तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मैसूर तथा केरल के क्षेत्रों को मिलाकर एक स्वतंत्र भारतीय द्रविड़ राज्य की स्थापना पर बल देता रहा, परंतु बाद में इस दल ने अपनी इस मांग को छोड़ दिया और भारतीय संघ में रहकर ही राज्य को अधिक स्वायत्तता देने की मांग पर विशेष बल देने लगा। यह दल द्रविड़ संस्कृति को उच्च मानते हुए द्रविड़ भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर विषेश बल देता है। दक्षिण भारत पर उत्तर भारत की प्रधानता की शिकायत करते हुए हिंदी भाषा को राष्ट्र-भाषा बनाए जाने का विरोध तथा अंग्रेजी को राजकीय भाषा बनाए रखने का समर्थक है। समाज के पिछड़े वर्गों को समान अवसर प्रदान किए जाने, अस्पृश्यता और अंधविश्वास को पूर्णतया समाप्त किए जाने तथा राज्यों को अधिक स्वायत्तता एवं आर्थिक स्वतंत्रता दिए जाने की पक्षपाती है ।

2.अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (A.I.D.M.K.)
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के विभाजन के परिणाम स्वरूप अक्टूबर, सन् 1972 में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता एम० जी० रामचंद्रन द्वारा अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (A.I.D.M.K.) की स्थापना की गई। फरवरी, सन् 1974 के निर्वाचनों में एक पृथक् राजनीतिक दल के रूप में पाण्डिचेरी विधानसभा में इसे सर्वाधिक स्थान प्राप्त हुए और साम्यवादी दल के सहयोग से इसने वहां सरकार का गठन किया, परन्तु यह सरकार अधिक समय नहीं चल सकी। सन् 1976 में ‘अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ ने अपने नाम के आगे ‘अखिल भारतीय’ शब्द जोड़कर अपना नाम ‘अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (A.I.D.M.K) रख लिया। सन् 1977 के निर्वाचन में इस दल ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। लोकसभा में 18 तथा तमिलनाडु विधानसभा में 130 स्थान प्राप्त करके श्री एम० जी० रामचंद्रन के नेतृत्व में सरकार का गठन किया। प्रारंभ में श्री एम० जी० रामचंद्रन ने केंद्र में जनता पार्टी की सरकार का पूर्ण समर्थन किया, परंतु जनता सरकार के पतन के पश्चात् हुए निर्वाचन में इसे लोकसभा के केवल दो स्थान ही प्राप्त हुए। इस निर्वाचन में कांग्रेस (आई) को मिली अभूतपूर्व सफलता के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी ने 8 अन्य विधानसभाओं के साथ ही साथ तमिलनाडु विधानसभा को भंग कर दिया, परंतु मई-जून सन् 1980 में हुए विधानसभा निर्वाचनों में इस दल ने एक बार पुनः तमिलनाडु विधानसभा में 243 स्थानों में से 128 प्राप्त करके सरकार का गठन किया। दिसंबर, सन् 1984 के विधानसभा-निर्वाचनों में कांग्रेस (आई) के सहयोग से भाग लिया तथा स्पष्ट बहुमत प्राप्त करके श्री एम० जी० रामचंद्रन के नेतृत्व में पुनः सरकार का गठन किया।
दिसंबर, सन् 1987 में श्री रामचंद्रन की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नी श्रीमती जानकी रामचंद्रन मुख्यमंत्री बनी परंतु दल में फूट पड़ जाने के कारण वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। सन् 1988 में दल दो गुटों में विभाजित हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप जनवरी, सन् 1989 में विधानसभा के निर्वाचन में दोनों गुटों को घोर पराजय का सामना करना पड़ा, परंतु नवीं लोकसभा में इसे आशातीत सफलता प्राप्त हुई। 1991 के दसवीं लोकसभा के निर्वाचन में इसको 11 स्थान प्राप्त हुए तथा राज्य-विधानसभा के निर्वाचन में 163 स्थान प्राप्त करके तमिलनाडु में सुश्री जयललिता के नेतृत्व में सरकार का गठन किया गया।
1996 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में अन्ना-द्रमुक-इंका गठबंधन का पूरी तरह सफाया हो गया। स्वयं जयललिता भी चुनाव नहीं जीत सकीं।
फरवरी, 1998 का लोकसभा चुनाव इस दल ने भाजपा के साथ मिलकर लड़ा और उसे 18 सीटें प्राप्त हुए। सितंबर, 1999 में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनावों में उसने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया तथा केवल 10 स्थान प्राप्त किए। चौदहवीं लोकसभा के 2004 में हुए चुनावों में इस दल को एक भी स्थान प्राप्त नहीं हुआ। पंद्रहवीं लोकसभा के 2009 में हुए चुनावों में इस दल को 9 स्थान प्राप्त हुए। सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में इस दल को 37 स्थान प्राप्त हुए।
इस दल की नीतियां पर्याप्त सीमा तक डी० एम० के० की नीतियों के समान ही हैं। यह दल अवशिष्ट शक्तियों को राज्यों को सौंपे जाने और क्षेत्रीय भाषाओं को राज्यों की भाषा बनाए जाने का समर्थक है। हिंदी को राष्ट्र-भाषा बनाए जाने का विरोध और अंग्रेजी को विभिन्न राज्यों के मध्य संपर्क-भाषा बनाए जाने का समर्थक है। इसके अतिरिक्त संपूर्ण देश में नशाबंदी,आय-सीमा- निर्धारण तथा बड़े उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का समर्थक और भ्रष्टाचार का विरोधी है। साथ ही मतदाताओं की इच्छानुसार कार्य न करने वाले निश्चित प्रतिनिधियों को वापस बुलाए जाने की व्यवस्था की मांग करता है।

3.अकाली दल (Akali Dal)
अकाली दल की स्थापना सिखों की एक श्रेष्ठ संस्था के रूप में सन् 1920 में हुई थी। प्रारंभ में इसका प्रमुख उद्देश्य गुरुद्वारों के प्रबंध-संबंधी कानून बनाने के लिए ब्रिटिश शासन पर दबाव डालना था। इस दबाव के परिणाम स्वरूप सन् 1925 में ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ का गठन किया, जिसने धीरे-धीरे राजनीति में रुचि लेना प्रारंभ कर दिया और भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में भी इसने सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया। साथ ही यह सिखों के हितों की रक्षा के लिए भी कार्य करती रही। स्वतंत्र भारत में अकाली दल ने भाषाई आधार पर ‘पंजाबी सूबे’ की स्थापना की मांग की और गुरुमुखी लिपि में पंजाबी भाषा को राज्य की भाषा बनाए जाने पर विशेष बल दिया। एक लंबे संघर्ष के परिणाम स्वरूप सन् 1966 में पंजाबी-भाषा राज्य स्थापित कराने में दल सफल रहा। पंजाब के कुछ हिन्दी-भाषी-क्षेत्रों को हरियाणा राज्य में परिणित कर दिया गया तथा कुछ हिंदी-भाषी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को सौंप दिए गए। अकाली दल के प्रारंभिक नेताओं में सर्वश्री स्वर्गीय मास्टर तारासिंह, सन्त फतेहसिंह और श्री गुरुनामसिंह के नाम उल्लेखनीय हैं।
सन् 1967 के सामान्य निर्वाचन में अकाली दल ने विधानसभा में सर्वाधिक स्थान प्राप्त करके जनसंघ के सहयोग में मिली-जुली सरकार का गठन किया। सन् 1972 में इसे करारी हार का सामना करना पड़ा। आपातकाल में इस दल के नेताओं को जेलों में बंद कर दिए जाने के कारण इसकी राजनीतिक गतिविधियां बंद ही रही। आपातकाल की समाप्ति पर सन् 1977 के सामान्य निर्वाचन में जनता पार्टी के सहयोग से इसने लोकसभा में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करते हुए विधानसभा में जनता पार्टी के सहयोग से मिली-जुली सरकार का गठन किया, जिसे सन् 1980 मैं कांग्रेस (आई) सरकार ने भंग कर दिया और नए निर्वाचन में कांग्रेस (आई) को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और श्री दरबारा सिंह के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। सन् 1980 के लोकसभा निर्वाचन में इस दल को केवल 1 स्थान प्राप्त हो सका। इस निर्वाचन के पश्चात् ही यह दल ‘बादल’ और ‘तलवंडी’ दो गुटों में विभाजित हो गया। बादल गुट के अध्यक्ष संत हरचंदसिंह लोंगोवाल तथा दूसरे गुट के अध्यक्ष स्वयं श्री जगदेव सिंह तलवंडी बने। 24 जुलाई, 1985 को राजीव-लोंगोवाल समझौते के उपरांत् 25 सितंबर, 1985 को हुए पंजाब विधानसभा निर्वाचन से पूर्व लोंगोवाल की हत्या हो गई तथा 117 स्थानों में से 73 स्थान प्राप्त करके अकाली दल ने श्री सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में सरकार का गठन किया। 1996 के लोकसभा चुनावों में अकाली दल को 8 स्थान प्राप्त हुए तथा इसने लोकसभा में भाजपा सरकार के विश्वासमत के पक्ष में अपना मत दिया। फरवरी 1997 में हुए पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए अकाली दल के भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन करके अभूतपूर्व विजय प्राप्त की तथा श्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में भाजपा के साथ मिल संयुक्त सरकार का गठन किया।
फरवरी, 1998 के लोकसभा चुनावों में उसे 8 तथा सितंबर, 1999 के लोकसभा के मध्यावधि चुनावों में उसे मात्र 2 सीटें प्राप्त हुई। चौदहवीं लोकसभा, 2004 के चुनावों में अकाली दल ने 8 सीटें प्राप्त की। पंद्रहवीं लोकसभा, 2009 में चुनावों में इस दल को 4 स्थान प्राप्त हुए। मार्च, 2012 में हुए पंजाब विधानसभा चुनावों में अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने 68 सीटें प्राप्त कर अपनी सरकार बनाई। सोलहवीं लोकसभा के लिए अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में अकाली दल ने 4 स्थानों पर विजय प्राप्त की।
अकाली दल सिखों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा पर विशेष बल देता है और अधिनायकवाद का विरोधी और शक्ति की स्वतंत्रता का समर्थक है। केंद्र की शक्तियों को कम करके राज्यों को अधिक शक्तियां दिए जाने तथा गुरुमुखी भाषा एवं लिपि के प्रयोग को बढ़ावा देने के पक्ष में है। इसके अतिरिक्त अकाली-दल किसानों के हितों को हर संभव तरीकों से सुरक्षित करने के पक्ष में है। भूमि सुधार कानूनों के आधुनिकीकरण, उर्वरक के दामों में कमी करने तथा ग्रामीण और कुटीर उद्योगों के विकास पर विशेष बल देता है।

4.तेलुगुदेशम् (Telgu Desham)
तेलुगुदेशम् आंध्र प्रदेश का एक प्रमुख क्षेत्रीय दल है, जिसकी स्थापना दक्षिण-भारत के प्रमुख फिल्म अभिनेता श्री एन० टी० रामाराव ने 29 मार्च, सन् 1982 को की थी। अपनी स्थापना से 9 माह की अवधि में ही इस दल ने सन् 1983 के विधानसभा निर्वाचन में भाग लिया और सन् 1977 की जनता-लहर में भी आंध्र प्रदेश में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने वाली कांग्रेस (आई) को बुरी तरह परास्त करके विधानसभा के 294 स्थानों में से 202 स्थान प्राप्त किए तथा आंध्र प्रदेश में पहली बार श्री एन० टी० रामाराव के नेतृत्व में एक गैर-कांग्रेस सरकार सक्रिय रूप से कार्य करती रही, परंतु इसकी आंतरिक फूट के कारण मंत्रिमंडल को सत्ताच्युत कर दिया गया। इसके कुछ ही समय पश्चात् देशव्यापी आंदोलन के परिणाम स्वरूप रामाराव मंत्रिमंडल को पुनः सत्तारूढ़ कर दिया गया। सन् 1984 के लोकसभा निर्वाचन की घोषणा के पश्चात् श्री रामाराव की सिफारिशों पर विधानसभा को भंग कर दिया गया।
सन् 1984 के लोकसभा निर्वाचन में जहां अन्य विरोधी दलों को करारी हार का सामना करना पड़ा, वहीं तेलुगुदेशम्, लोकसभा में 29 स्थान प्राप्त करके सबसे बड़े विरोधी दल के रूप में उभरकर सामने आया। मार्च, सन् 1985 में हुए आंध्रप्रदेश विधानसभा के निर्वाचन में भी इस दल ने 294 स्थानों में से 202 स्थान प्राप्त करके पुनः सरकार का गठन किया। सन् 1989 में होने वाले नवीं लोकसभा के निर्वाचन में इसे 2 स्थान मिले और आंध्रप्रदेश विधानसभा में इसका प्रभुत्व समाप्त हो गया। सन् 1991 में हुए दसवीं लोकसभा के निर्वाचन में इस दल को 12 स्थान प्राप्त हुए। 1994 में आंध्र प्रदेश विधानसभा के निर्वाचन में अप्रत्याशित विजय प्राप्त करके इस दल ने श्री एन० टी० रामाराव के नेतृत्व में सरकार बनाई लेकिन सत्ताधारी तेलुगुदेशम् पार्टी में एन० टी० रामाराव के विरुद्ध अगस्त 1995 में खुला विद्रोह हो गया। रामाराव के दामाद चन्द्र बाबू नायडू ने तेलुगुदेशम् के 214 विधायकों में से 185 के समर्थन का दावा करते हुए सरकार बनाने का दावा पेश किया। श्री रामाराव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 1 सितंबर 1995 को चंद्रबाबू नायडू ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तेलुगुदेशम् पार्टी दो खेमों- तेलुगुदेशम् (नायडू) तथा तेलुगुदेशम् (पार्वती) में विभाजित हो गई।
1996 के लोकसभा चुनावों में तेलुगुदेशम् (नायडू) को 16 स्थान प्राप्त हुए और वह संयुक्त मोर्चा के घटक के रूप में केंद्रीय सरकार में सम्मिलित हुए। फरवरी, 1998 के चुनावों में तेलुगुदेशम् को 12 सीटें प्राप्त हुई और उसने भाजपा की संयुक्त सरकार का बाहर से समर्थन किया। सितंबर, 1999 को लोकसभा चुनाव इसने भाजपा के साथ मिलकर लड़ा और उसे 30 स्थान प्राप्त हुए। 1999 के ही विधानसभा चुनावों में भी उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और आंध्र प्रदेश में उसने अपनी सरकार बनाई। 2004 के लोकसभा व विधानसभा चुनावों में इस दल को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा और विधानसभा व लोकसभा में उसे क्रमशः 49 तथा 5 स्थानों पर संतोष करना पड़ा। 15वीं लोकसभा के 2009 के चुनावों में इस दल को 6 स्थान प्राप्त हुए।
2014 में सोलहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में तेलुगुदेशम् ने भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन NDA के सहयोगी के रूप में 16 स्थान प्राप्त किए तथा तेलंगाना के 2 जून, 2014 को 29वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद शेष आंध्र प्रदेश (सीमांध्र) के विधानसभा चुनावों में 175 सीटों में से 102 सीटों पर तेलुगुदेशम् पार्टी ने विजय प्राप्त की तथा एन० चंद्रबाबू नायडू ने 8 जून, 2014 को मुख्यमंत्री पद पर वापसी की।
अपने निर्वाचन घोषणा-पत्र में इस दल ने साधारण जनता के जीवन -स्तर में सुधार के लिए ग्रामीण विकास पर विशेष बल दिया है। इसके अतिरिक्त घोषणा-पत्र में नागरिकों, विशेषतया महिलाओं की रक्षा हेतु राज्य में कानून और व्यवस्था में सुधार करना, दो रुपए प्रति किलो की दर से चावल उपलब्ध कराना, प्राथमिक पाठशालाओं में बच्चों को दोपहर का निःशुल्क भोजन प्रदान करना, बेरोजगारी-भत्ता देना तथा अलाभकारी निगमों को समाप्त करना आदि सम्मिलित हैं। साथ ही यह दल राज्यों को अधिक स्वायत्तता देने की मांग करता है तथा तेलुगु भाषा को राज्य की भाषा बनाने और हिंदी को अन्य राज्यों के साथ सम्पर्क भाषा के रूप में अपनाए जाने के पक्ष में है।

5.समाजवादी पार्टी(Samajwadi Party)
सन् 1990 में गठित जनता दल (समाजवादी) के अध्यक्ष श्री चंद्रशेखर से इसी के प्रमुख नेता श्री मुलायम सिंह यादव के मतभेदों के परिणाम स्वरूप समाजवादी पार्टी अस्तित्व में आई। मुलायम सिंह ने जनता दल (समाजवादी) से अलग होकर अक्टूबर, 1992 में ‘समाजवादी पार्टी’ का गठन कर लिया और 4 नवम्बर, 1992 को लखनऊ में एक सम्मेलन आयोजित करके इस पार्टी के गठन की औपचारिक घोषणा कर दी।
समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र इस दल के प्रमुख आदर्श हैं। यह पार्टी स्वयं को अल्पसंख्यकों का प्रबल पक्षधर निरूपित करते हुए भारतीय जनता पार्टी की सक्रिय हिंदू सांप्रदायिकता का सामना करने के लिए अपने को समक्ष मानती है। इस पार्टी का प्रमुख प्रभाव और कार्य-क्षेत्र भी उत्तर प्रदेश ही है। 1993 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा निर्वाचन में इस पार्टी ने पहली बार में ही अच्छा प्रदर्शन किया और श्री मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में बहुजन समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके सरकार बनाई, लेकिन कुछ समय पश्चात् यह गठबंधन टूट गया।
1996 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को 17 स्थानों पर विजय प्राप्त हुई और संयुक्त मोर्चा के घटक के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल में सम्मिलित हुई।
अक्टूबर 1996 में हुए उ० प्र० विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को संयुक्त मोर्चा के एक मुख्य घटक के रूप में 109 स्थान प्राप्त हुए। फरवरी, 1998 में सम्पन्न बारहवीं लोकसभा के चुनावों में समाजवादी पार्टी को 21 स्थान प्राप्त हुए। सितंबर, 1999 में सम्पन्न लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को 26 स्थान प्राप्त हुए। चौदहवीं लोकसभा के 2004 में हुए चुनावों में इस दल को 36 स्थान प्राप्त हुए।
15वीं लोकसभा, 2009 के चुनावों में इस पार्टी को 23 स्थान प्राप्त हुए। मार्च, 2012 में उ० प्र० में हुए विधानसभा चुनावों में सपा ने 225 सीटें प्राप्त कर अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकार बनाई। सोलहवीं लोकसभा के अप्रैल-मई 2014 में हुए चुनावों में समाजवादी पार्टी को बड़ी क्षति पहुंची और उसे केवल 5 स्थान ही प्राप्त हो सकें।
वर्ष 2014 के आम चुनाव के समय निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त 6 राष्ट्रीय दल तथा 39 क्षेत्रीय दल थे।

 

 

 

 

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