भारत के निर्वाचन आयोग के संगठन, शक्तियों एवं कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।

भारत के निर्वाचन आयोग के संगठन, शक्तियों एवं कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
भारत का निर्वाचन आयोग(Election Commission of India)

लोकतंत्र की सफलता और उसका भविष्य निर्वाचन-व्यवस्था की निष्पक्षता पर निर्भर करता है। लोकतंत्रीय शासन-व्यवस्था में निर्वाचनों का विशेष महत्व है क्योंकि निर्वाचन ही ऐसा माध्यम है, जिसके माध्यम से सरकार को वैधानिकता प्राप्त होती है और शासन सत्ता का शांतिपूर्ण ढंग से हस्तांतरण होता है। यदि निर्वाचन-व्यवस्था में जनता का विश्वास न रहे तो लोकतंत्र का संपूर्ण आधार ही समाप्त हो जाता है। इसलिए लोकतंत्रीय शासन-व्यवस्था वाले देशों में एक कुशल एवं निष्पक्ष निर्वाचन-तंत्र की व्यवस्था की जाती है। निष्पक्ष निर्वाचन-तंत्र की आवश्यकता पर बल देते हुए पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने संविधान सभा में कहा था, “यदि निर्वाचन तंत्र दोषपूर्ण या अकुशल है या ऐसे लोगों द्वारा संचालित है, जिनकी ईमानदारी संदेहास्पद है, तो लोकतंत्र अपने उद्गम स्थान पर ही विषैला हो जाएगा।” इस संबंध में अपने विचार रखते हुए डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में कहा था, “दलों, प्रत्याशियों और सत्तारूढ़ सरकार के भ्रष्ट आचरणों का हमें सामना करना पड़ सकता है। यह अच्छा रहेगा कि हमारे संविधान में इनसे बचाव का प्रबंध किया जाए। इसके लिए उपबंधों की व्यवस्था की जाए, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन हो सकें। इससे स्पष्ट है कि भारतीय संविधान-निर्माता लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष निर्वाचनों की महती अनिवार्यता से भली-भांति परिचित थे। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए भारत में एक निर्वाचन आयोग (Election Commission) की स्थापना की गई है।

निर्वाचन आयोग का गठन(Composition of the Election Commission)
भारतीय संविधान की व्यवस्था के अनुसार निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन- आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की व्यवस्था है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है। निर्वाचन आयुक्तों की संख्या, समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा निश्चित की जाती है। संविधान के अनुच्छेद 324 (2) में अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान होते हुए भी सन् 1989 तक किसी निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति नहीं की गई और आयोग एक-सदस्यीय ही रहा, परंतु अक्टूबर 1989 में चुनावों के पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अतिरिक्त दो अन्य निर्वाचन आयुक्त को नियुक्त करके आयोग को बहुसदस्यीय बनाया। चुनाव के बाद राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने इस नियुक्ति को निरस्त कर आयोग को एक सदस्यीय बना दिया था।
1 अक्टूबर, 1993 को राष्ट्रपति ने अध्यादेश और अधिसूचना जारी कर श्री एम० एस० गिल तथा जी० वी० जी० कृष्णमूर्ति को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त कर आयोग को तीन सदस्यीय आयोग में बदल दिया। अधिसूचना के अनुसार, आयोग की कार्यपद्धति के नियमों में संशोधन कर सभी आयुक्तों को समान अधिकार दिए गए तथा निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लेने का प्रावधान किया गया। इस प्रकार मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के लिए सेवा शर्त कानून 1991 की व्यवस्था रद्द हो गई, जिसके अनुसार मतभेद की स्थिति में निर्णय लेने का अधिकार बहुमत के आधार पर लेने का निर्णय लिया गया। तात्कालिक मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी० एन० शेषन द्वारा इस अधिसूचना का विरोध किया गया और इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई। न्यायालय ने 14 जुलाई, 1995 को अपने ऐतिहासिक फैसले में निर्वाचन आयोग को बहुसदस्यीय बनाने तथा मुख्य आयुक्त सहित दोनों अन्य आयुक्तों को समकक्ष मानने संबंधी राष्ट्रपति की अधिसूचना को वैध घोषित किया।
नियुक्ति (Appointment)- संविधान के अनुच्छेद 324 (2) में कहा गया है कि “मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा इस हेतु बनाए गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।” संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर क्षेत्रीय आयुक्तों (Regional Commissioners) की नियुक्ति का प्रावधान है। सामान्य निर्वाचनों से पूर्व राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग से परामर्श करके क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति करता है, जो निर्वाचन आयोग के कार्यों में सहायता करते हैं। निर्वाचन आयुक्तों की योग्यता के संबंध में संविधान में उल्लेख नहीं है। भारत में अन्य उच्च पदों पर की जाने वाली नियुक्तियों की भांति ही निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अब तक के सभी मुख्य निर्वाचन आयुक्त भारत सरकार के अधीन उच्च पदों पर अधिकारी थे।
कार्यकाल एवं सेवा-शर्त (Term and Service Conditions)- मुख्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निश्चित किया जाता है। सामान्यतः यह 5 वर्ष होता है। इसे बढ़ाया भी जा सकता है। श्री सुकुमार सेन और श्री सुन्दरता का कार्यकाल बढ़ाकर 8 वर्ष कर दिया गया। अन्य निर्वाचन आयुक्तों का पद अस्थाई होता है। मुख्य तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों के वेतन एवं सेवा-शर्तें राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित होती हैं और नियुक्ति के पश्चात् उसमें कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किए जा सकते । इनके वेतन आदि से संबंधित व्यय भारतीय संचित निधि पर भारित न होकर बजट पर भारित होता है। इस प्रकार उनके द्वारा निष्पक्ष रूप से कार्य करने की व्यवस्था है।
पदच्युति (Removal)- मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसके द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाया जाता है। दूसरे शब्दों में, महाभियोग द्वारा ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है। महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के स्पष्ट बहुमत एवं उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की 2/3 सदस्य-संख्या के अनुमोदन से पारित होना आवश्यक होता है मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अतिरिक्त अन्य निर्वाचन आयुक्तों एवं क्षेत्रीय आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिशों पर ही राष्ट्रपति द्वारा उनके पदों से हटाया जा सकता है।

निर्वाचन आयोग के कार्य एवं शक्तियां(Functions and Powers of Election Commission)
संविधान के अनुच्छेद 324 (1) के द्वारा निर्वाचन आयोग को देश में होने वाली सभी महत्वपूर्ण निर्वाचनों के आयोजन, उनके अधीक्षण (Superintendence), निर्देशन (Direction) और नियंत्रण (Control) का दायित्व सौंपा गया है। ‘निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन से लेकर मतगणना और परिणामों की घोषणा तक की समस्त निर्वाचन-प्रक्रियाओं का निर्धारित कानूनों की सीमा में संचालन करना, निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है। निर्वाचनों के लिए शान्तिमय और उपयुक्त वातावरण देखना तथा प्रशासनिक तैयारियों को देखना इसी आयोग का कार्य है। इस संबंध में आयोग सभी राज्य इकाइयों को निर्देश देता है। निर्वाचन आयोग के कार्यों एवं शक्तियों का निम्नलिखित शीर्षकों द्वारा अध्ययन किया जा सकता है-

(1) मतदाता सूचियां तैयार करना (To Prepare Electrol Roll)- निर्वाचनों से पूर्व निर्वाचन आयोग निर्वाचन-क्षेत्र स्तर पर मतदाता सूचियां तैयार करता है। इसके लिए आयोग उन सभी वयस्क नागरिकों के नाम मतदाता-सूची में अंकित करने का यथासंभव प्रयास करता है, जो मतदाता बनने की योग्यता रखते हैं। इस संबंध में प्राप्त होने वाली आपत्तियों पर विचार करना भी आयोग का ही कार्य है। प्रत्येक सामान्य निर्वाचन से पूर्व उन मतदाताओं के नाम, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, मतदाता सूची से काटने और नए मतदाताओं के नाम मतदाता-सूची में अंकित कर मतदाता- सूचियों का संशोधन भी निर्वाचन आयोग ही करता है।

(2) संसद व राज्य विधानमंडलों के लिए निर्वाचन करना (To Arrange Election for Parliament and State Assemblies)- संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानमंडलों के लिए निर्वाचन कराना निर्वाचन आयोग का एक महत्वपूर्ण कार्य है। संसद के उच्च सदन राज्यसभा के लिए प्रति दो वर्ष पश्चात् होने वाले या रिक्त स्थानों की पूर्ति हेतु उप-निर्वाचन तथा संसद के निम्न सदन लोकसभा के लिए सामान्य निर्वाचन तथा समय-समय पर होने वाले रिक्त स्थानों की पूर्ति हेतु उपचुनावों का संपादन निर्वाचन आयोग की करता है। इसी प्रकार ऐसा-सदनीय और द्विसदनीय राज्य विधानमंडलों के लिए सामान्य निर्वाचनों और उप-निर्वाचनों का संपादन भी निर्वाचन आयोग ही करता है।

(3) राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति का निर्वाचन कराना (To Arrange Election of President and Vice-President)- राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के रिक्त पदों के लिए निर्वाचन कराने का दायित्व निर्वाचन आयोग का ही है। राष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद और राज्य विधानमंडलों के निर्वाचित सदस्य तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों के सदस्य मतदान करते हैं।

(4) कर्मचारियों पर नियंत्रण (Control on Workers)- केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा निर्वाचन कार्य हेतु उपलब्ध कराए गए कर्मचारियों पर नियंत्रण रखना निर्वाचन आयोग का ही कार्य है क्योंकि निर्वाचन के संपूर्ण उत्तरदायित्वों की पूर्ति होने तक ये कर्मचारी निर्वाचन आयोग के प्रत्यक्ष नियंत्रण में होते हैं और निर्वाचन आयोग के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं।

(5) राजनीतिक दलों को मान्यता देना (Recognition to Political Parties)- भारत में राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर के अनेक राजनीतिक दल हैं। इन दलों को राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर के दलों के रूप में मान्यता निर्वाचन आयोग ही देता है। निर्वाचन आयोग कम से कम चार राज्यों में वैध मतों के 4% मत प्राप्त कर लेने वाले दल को राष्ट्रीय स्तर के दल के रूप में मान्यता देता है तथा विभिन्न राज्य में प्राप्त एक निश्चित प्रतिशत के आधार पर राज्यों में क्षेत्रीय दलों के रूप में मान्यता प्राप्त होती है। सामान्य निर्वाचनों के पश्चात् राजनीतिक दलों को इस प्रकार की मान्यता दी जाती है। जब किसी राजनीतिक दल में विभाजन हो जाता है, तो इस विभाजन के परिणामस्वरुप चुनाव चिन्हों और झंडों आदि से संबंधित सभी विवादों का निर्णय निर्वाचन आयोग ही करता है।

(6) दलों व स्वतंत्र प्रत्याशियों को चुनाव चिन्हों देना (To Give Election Symbols to Parties in Independent Candidates)- राजनीतिक दलों व स्वतंत्र या निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनाव चिन्हों और झंडों का आबंटन निर्वाचन आयोग ही करता है। इनसे संबंधित सभी विवादों का अंतिम निर्णय निर्वाचन आयोग द्वारा ही किया जाता है।

(7) निर्वाचन की तिथियां और कार्यक्रम घोषित करना (To Declare Dates and Programme of Election)- निर्वाचन आयोग, सरकार से परामर्श करके सभी निर्वाचनों की तिथियां और कार्यक्रम घोषित करता है। आयोग ही नामांकन पत्र भरने, नामांकन पत्रों की जांच वापसी तथा मतदान की तिथियां घोषित करता है।

(8) अन्य कार्य (Others Functions)- निर्वाचन आयोग लोकसभा एवं राज्य विधानमंडल के निर्वाचन में अनुसूचित जातियों और जन-जातियों के लिए संवैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्रों का निर्धारण करता है। प्रत्येक निर्वाचन से पूर्व सभी राजनीतिक दलों से परामर्श करके राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता बनाता है। इसके अतिरिक्त, मतदान केन्द्रों की स्थापना और मतपेटियों की सुरक्षा आदि, ऐसे अन्य कार्य भी निर्वाचन आयोग ही करता है।

निर्वाचन आयोग की आलोचना(Criticism of Election Commission)
भारतीय निर्वाचन आयोग की समय-समय पर आलोचना की जाती है। लोकसभा के 1971 के मध्यावधि चुनावों में निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सर्वाधिक प्रश्न चिन्ह लगाए गए। निर्वाचन आयोग की आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती हैं-

(1) भारतीय संविधान में निर्वाचन आयुक्तों की योग्यता के संबंध में कोई उल्लेख नहीं है। इसी कारण सरकार द्वारा निर्वाचन आयुक्त के पद पर उन वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है जो सरकार के प्रति निष्ठा रखते है, जिससे निष्पक्ष चुनाव कराने की बात निर्थक हो जाती है।

(2) निर्वाचन आयोग सामान्य रूप में सत्ताधारी दल के प्रभाव में कार्य करता है।

(3) निर्वाचन आयोग का अपना कोई प्रशासन- तंत्र नहीं है; जबकि उस पर निष्पक्ष चुनाव कराने का एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है ।

(4) चुनाव में हुई गड़बड़ियों के संबंध में निर्वाचन आयोग प्रभावशाली तरीके से कार्रवाही नहीं कर पता है।
यद्यपि भारत की निर्वाचन प्रणाली में अनेक दोष हैं, जिसको निर्वाचन आयोग भी स्वीकार करता है। निर्वाचन आयोग का यह उत्तरदायित्व है कि वह निर्वाचन की कमियों को दूर करके भारतीय लोकतंत्र की सफलता का मार्ग प्रशस्त करें।

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