भारतीय स्त्रियों की प्रमुख समस्याएं क्या हैं ?इनके समाधान हेतु अपने सुझाव दीजिए।

भारतीय स्त्रियों की प्रमुख समस्याएं क्या हैं ?इनके समाधान हेतु अपने सुझाव दीजिए।
                                      अथवा
भारतीय समाज में स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं की विवेचना कीजिए।

आधुनिक काल में स्त्रियों की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं तथा आज कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां स्त्रियां न हो। आर्थिक निर्भरता से उनके आत्म-विश्वास में भी बढ़ोत्तरी हुई है परंतु अभी भी भारतीय समाज में स्त्रियां अनेक समस्याओं का सामना कर रही हैं तथा वास्तविक रूप में उन्हें आज भी पुरुषों के समकक्ष नहीं माना जाता है।

भारत में स्त्रियों की प्रमुख समस्याएं
(Main Problems of Women in India)
भारतीय समाज में स्त्रियों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, वे इस प्रकार हैं-
1. लिंग भेदभाव- भारतीय समाज पितृसत्तात्मक समाज है । पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों की स्थिति उच्च होती है तथा स्त्रियों की स्थिति निम्न होती है । जन्म से ही पुत्र तथा पुत्री में अंतर किया जाने लगता है । पुत्र जन्म पर उत्सव मनाया जाता है तो पुत्री के जन्म पर शोक । साथ ही पुत्र तथा पुत्री के पालन-पोषण के तरीकें भी भिन्न-भिन्न हैं । सामान्यतः पुत्र की शिक्षा तथा रोजगार पर विशेष बल दिया जाता है । पुत्री को पराया धन माना जाता है । अतः उसकी शिक्षा एवं रोजगार पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है । उसे घर का कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है । अतः परिस्थितिवश वह पराश्रित बन जाती है ।
2. अशिक्षा की समस्या- स्वतंत्रता से पूर्व स्त्रियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लागू थे । यद्यपि अंग्रेजी शासन काल में इन प्रतिबंधों की समाप्ति हेतु विशेष प्रयास किए गए थे फिर भी स्त्रियों में शिक्षा का प्रतिशत पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम बना रहा । स्वतंत्रता के पश्चात् स्त्रियों की शिक्षा में विशेष प्रगति हुई लेकिन अभी भी स्त्रियों में साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम हैं । 2001 की जनगणना के अनुसार स्त्रियों में साक्षरता का प्रतिशत 53.7 है जबकि पुरुषों में साक्षरता का प्रतिशत 75.2 हैं । इस तथ्य से यह सरलता से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय समाज में शिक्षा की दृष्टि से स्त्रियां पुरुषों से पिछड़ी हुई हैं । उनकी शिक्षा पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है । बहुत-सी स्त्रियां जो शिक्षा संस्थानों में प्रवेश प्राप्त कर भी लेती हैं , अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ देती हैं ।
3. अज्ञानता तथा अंध-विश्वास की समस्या- अशिक्षित होने के कारण स्त्रियां बहुत आसानी से अंध-विश्वासों के चक्कर में आ जाती हैं । उनमें अशिक्षा के कारण ही अज्ञानता पाई जाती है । इस अज्ञानता तथा अंध-विश्वास के कारण ही स्त्रियां तांत्रिकों, ढोंगी साधुओं तथा पीर -फकीरों के चंगुल में फंस जाती हैं, जो उनका आर्थिक शोषण करने के साथ-साथ कभी-कभी यौन शोषण भी करते हैं । इसी अज्ञानता तथा अंध-विश्वास के कारण ही स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा व्रत- उपवास आदि में अधिक विश्वास व्यक्त करती हैं ।
4. स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं- अशिक्षा, अज्ञानता तथा अंध-विश्वास के साथ-साथ भारतीय स्त्रियों में स्वास्थ्य का निम्न स्तर भी पाया जाता है क्योंकि उनके स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है । परंपरागत रूप से भारतीय स्त्री तब भोजन करती है, जब उसके पति, बच्चे तथा अन्य सदस्य भोजन ग्रहण कर लें ।अक्सर स्त्रियां बाद में बचा-खुचा व बासी खाना ही खाती हैं । छोटी आयु में विवाह होने के कारण वे शीघ्र ही मां बन जाती हैं । इससे स्वयं उनका स्वास्थ्य तो गिरता ही है, साथ में बच्चा भी निर्बल ही पैदा होता है । पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की मृत्युदर अधिक होती है । स्त्रियों में यौन रोग भी पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद सिद्ध होते हैं ।
5. आर्थिक समस्याएं- प्राचीन काल में स्त्रियों का कार्य-क्षेत्र घर तक ही सीमित था । अंग्रेजी शासनकाल में स्त्रियों में शिक्षा के प्रति जागृति के कारण उन्हें घर से बाहर कार्य करने के सीमित अवसर प्राप्त हुए । स्वतंत्रता के बाद स्त्रियों के रोजगार की ओर विशेष ध्यान दिया गया लेकिन फिर भी वर्तमान में स्त्रियों को रोजगार के बहुत कम अवसर उपलब्ध हैं । उन्हें पुरुषों की तुलना में कम वेतन तथा पारिश्रमिक दिया जाता है । निर्धनता, पुरुषों पर निर्भरता, अशिक्षा तथा अज्ञानता आदि के कारण स्त्रियां बहुत कम वेतन तथा पारिश्रमिक पर ही कार्य करने को तैयार हो जाती हैं ।
6. सामाजिक समस्यायें – वेश्यावृत्ति तथा देवदासी प्रथा जैसी सामाजिक समस्याओं को बाल-विवाह, बेमेल विवाह, विधवा पुनर्विवाह को न मानना, दहेज प्रथा, निर्धनता तथा स्त्रियों को उपभोग की वस्तु समझना आदि के कारण बल मिला है । इसके अलावा आज अशिक्षित स्त्रियों के साथ-साथ शिक्षित स्त्रियों को भी बलात्कार तथा यौन उत्पीड़न जैसी हिंसक समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है । पाश्चात्य संस्कृति का प्रचलन, बढ़ता फैशन तथा अश्लीलता, असुरक्षित कार्य-क्षेत्र, आर्थिक तंगी, रोजगार की तलाश में बाहर निकलना आदि कारणों से इस प्रकार की घटनाओं में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है ।
7. वैवाहिक समस्यायें- आज स्त्रियों को अनेक वैवाहिक समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है । बाल-विवाह के प्रचलन के कारण छोटी आयु में ही स्त्रियां मातृत्व का बोझ उठा लेती हैं जिससे उनका शारीरिक तथा मानसिक विकास रुक जाता है । कम आयु में विवाह होने से संतानें अधिक पैदा होती हैं, जिससे उनका तथा उनकी संतानों का स्वास्थ्य-स्तर निम्नतर अवस्था में पहुंच जाता है । बच्चे निर्बल पैदा होते हैं जिससे उनकी मृत्युदर में वृद्धि होती है । विधवा पुनर्विवाह का अधिकार विधवाओं को नहीं दिया गया है, जिससे उनकी सामाजिक स्थिति अत्यंत शोचनीय रही है । यद्यपि वैधानिक रूप से विधवाओं के पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की गई है फिर भी वर्तमान में इसका प्रचलन अधिक नहीं हो पाया है ।
वैवाहिक समस्याओं के अंतर्गत दहेज-प्रथा भी एक प्रमुख समस्या है जो आज विकराल रूप में भारतीय समाज के सम्मुख उपस्थित है । इस समस्या के चलते लड़कियां माता-पिता के लिए अभिशाप बन गई हैं । विवाह की अनिवार्यता, धन का महत्व, जीवन साथी चुनने का सीमित क्षेत्र, झूठी शान प्रतिष्ठान, महंगी शिक्षा आदि कारण मुख्य रूप से दहेज के लिए उत्तरदाई है । इसके परिणामस्वरूप स्त्रियों को प्रताड़नाएं, शारीरिक यातनाएं तथा उन्हें जीवित जला देने की घटनाएं भी घटित हो रही हैैं । दहेज के कारण ही ऋण-भार, बेमेल विवाह, निम्न जीवन स्तर मानसिक रोगों तथा अनैतिकता आदि में तीव्रता से बढ़ोत्तरी हो रही है ।
8. विवाह-विच्छेद की समस्या- आधुनिक युग में भारतीय स्त्रियों में विवाह-विच्छेद की समस्या तेजी से उत्पन्न हो रही है । तलाकशुदा स्त्री आज भी समाज में हीन दृष्टि से देखी जाती है तथा प्रत्येक व्यक्ति उसे ही दोषी ठहराती है चाहे यह उसके शराबी, जुआरी व बदचलन पति के कारण ही क्यों न हुआ हो । तलाकशुदा स्त्री को सभी बुरी नजर से देखते हैं ‌। तलाक के पश्चात् उसके सम्मुख अपने तथा अपने बच्चों के पालन-पोषण की समस्या रहती है । मजबूर होकर वे यौन शोषण की शिकार हो जाती हैं ।

स्त्रियों की समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास/सुझाव
(Efforts/Suggestions for Sloving the Problems of Women)
भारतीय स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं को हल करने हेतु केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा अनेक योजनाएं लागू की गई है, जिनमें उनकी शिक्षा, रोजगार, आवास आदि पर विशेष ध्यान दिया गया है । स्त्रियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए यह कानूनी प्रावधान किया गया है कि उन्हें पुरुषों के समकक्ष पारिश्रमिक की प्राप्ति हो । इस हेतु ‘समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 ई० ‘ पारित किया गया । 1961 में बने दहेज अधिनियम को 1986 में और अधिक कठोर बनाया गया । महिला अभद्र चित्रण (निषेध) अधिनियम 1986 में पारित हुआ । 1948 के कारखाना अधिनियम को 1976 में संशोधित किया गया । इसी प्रकार 1956 के अनैतिक व्यापार-निरोधक अधिनियम को भी 1986 में संशोधित किया गया । उपरोक्त अधिनियमों के कारण स्त्रियों को सामाजिक, आर्थिक, वैवाहिक, व्यावसायिक, पारिवारिक आदि सभी क्षेत्रों में सुरक्षा प्राप्त हुई है । इन सभी अधिनियमों के लागू होने से स्त्रियों की प्रस्थिति में उल्लेखनीय प्रगति हुई है ।
स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों तथा अन्याय के विरुद्ध कार्यवाही करने हेतु 1992 में राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई । कामकाजी महिलाओं को आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के लिए हॉस्टलों का प्रावधान किया गया है । इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा स्त्रियों के लिए विभिन्न रोजगार प्रशिक्षणों की व्यवस्था की गई है । ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पशुपालन, हस्तशिल्प, हथकरघा, कुटीर तथा रेशम उद्योग से संबंधित विभिन्न प्रशिक्षणों की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है । शहरी क्षेत्रों में भी विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षणों जैसे कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौंदर्य-सुरक्षा, कताई-बुनाई आदि का प्रबंध स्त्रियों के लिए किया गया है । 1993 में महिला समृद्धि योजना तथा 1999 में “स्त्री शक्ति पुरस्कार” योजना शुरू की गई । 2001 में महिला सशक्तिकरण हेतु राष्ट्रीय नीति का निर्माण किया गया ।
उपरोक्त प्रयासों के बाद भी भारतीय स्त्रियों की समस्याओं का समाधान पूर्ण रूप से नहीं हो पाया है, यद्यपि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में पूर्व की अपेक्षा बहुत परिवर्तन हुआ है । भारतीय स्त्रियों की समस्याओं के समाधान के लिए मुख्य सुझाव निम्न प्रकार हैं –
(1) स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए जो विभिन्न अधिनियम बनाए गए हैं, उनका क्रियान्वयन ठीक प्रकार से नहीं हो पाया है । क्रियान्वयन की इस कमी के कारण स्त्रियों की समस्याएं पूर्ववत बनी हुई हैं । अतः इन अधिनियमों का क्रियान्वयन पूरी ईमानदारी तथा निष्ठा के साथ होना चाहिए तथा अधिनियमों के बारे में पूरी जानकारी स्त्रियों को दी जानी चाहिए ।
(2) स्त्रियों के शिक्षा स्तर में सुधार की और अधिक आवश्यकता है । इस दिशा में जो भी सरकारी प्रयास किए गए हैं, वे पूर्णरूपेण समक्ष नहीं है । इस कारण ही आज भी स्त्रियां पुरुषों से शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं । स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाए जो रोजगारपरक हो तथा जो उन्हें आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर बना सकें ।
(3) रोजगार के लिए स्त्रियों को आरक्षण की सुविधाएं उसी प्रकार दी जाए जिस प्रकार की सुविधाएं अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों को प्राप्त हैं । सरकारी स्त्रियों को रोजगार के साधन जुटाने में सहायता दे रही है लेकिन फिर भी बहुत कम स्त्रियां ही रोजगार प्राप्त कर सकी हैं ।
(4) जो गैर-सरकारी संगठन स्त्रियों की समस्याओं को सुलझाने में जी-जान से लगे हैं उन्हें पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त कराई जानी चाहिए जिससे वे और अधिक लगन से स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं का समाधान कर सकें ।
(5) भारतीय समाज में पुरुषों तथा स्त्रियों के विवाह, विवाह-विच्छेद आदि के संबंध में जो दोहरे मापदंड बनाए जाते हैं, उनके विरुद्ध स्वच्छ जनमत का निर्माण किया जाना चाहिए, जिससे स्त्रियां वास्तविक रूप से पुरुषों के समकक्ष समानता का अनुभव कर सकें ।

 

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