भारतीय संदर्भ में लोकतंत्र में विरोधी दलों की भूमिका।

भारतीय संदर्भ में लोकतंत्र में विरोधी दलों की भूमिका।

भारतीय संदर्भ में लोकतंत्र विरोधी दलों की भूमिका (With Refrence to India the Role of Opposition in Democracy)
लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में राजनीतिक दलों का होना अनिवार्य है। इस व्यवस्था के अंतर्गत होने वाले सामान्य निर्वाचन में जनता एक दल को शासक बनाती है और अन्य राजनीतिक दलों को शासक दल के कार्यों की आलोचना करके उसकी स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण लगाने का कार्य सौंपती है। अतः जिस दल का शासन पर नियंत्रण होता है, उसे सत्तारूढ़ दल या शासक दल और शेष अन्य राजनीतिक दलों को विरोधी दल कहा जाता है। लोकतंत्र में प्राय: सभी देशों में सत्तारूढ़ दल और उनकी नीतियों की आलोचना करने वाले दोनों ही प्रकार के दलों को मान्यता प्राप्त होती है। ब्रिटेन में विरोधी दल को ‘महारानी का विरोधी दल’ (Her Majesty’s Opposition) और संसदीय शासन में विरोधी दल को ‘छाया मंत्रिमंडल’ (Shadow Cabinet) कहा जाता है। विरोधी दल के नेता को कैबिनेट मंत्री का स्तर प्राप्त होता है। अतः यह कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी कि लोकतंत्र की सफलता के लिए न्यूनाधिक विरोधी दल का भी उतना ही महत्व है, जितना कि सत्तारूढ़ दल का क्योंकि विरोधी दल के अभाव में लोकतंत्र कभी भी सफल नहीं हो सकता। लोकतंत्र की इस व्यवस्था के फलस्वरूप ही जन-विरोध कभी भी हिंसक क्रांति का रूप धारण नहीं कर पाता और एक सामान्य परिवर्तन की भांति ही स्वाभाविक रूप से सत्ता-परिवर्तन हो जाता है ।
भारत में भी ब्रिटेन की भांति ही संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गई है, परंतु भारतीय राजनीति के इतिहास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर भारत में एक संगठित एवं सशक्त विपक्ष का अभाव ही रहा है। 1947 के आम चुनाव से पूर्व तक भारतीय राजनीति में संगठित विपक्ष का अभाव था, परंतु इसके पश्चात् 1969 में कांग्रेस के विभाजन के परिणामस्वरुप 65-सदस्यीय ‘संगठन कांग्रेस’ विरोधी दल के रूप में अस्तित्व में आई। 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में तो सत्तारूढ़ कांग्रेस एक बहुत बड़े शक्तिशाली दल के रूप में पुनः सत्तारूढ़ हुई और विरोधी दलों में से कोई भी दल विरोधी दल की मान्यता प्राप्त करने के लिए 50 स्थान भी प्राप्त नहीं कर सका। इस प्रकार 1971 से 1976 तक की अवधि में विरोधी दल का अभाव रहने के कारण उसकी कोई भूमिका नहीं रही। इसके पश्चात् 1977 में हुए लोकसभा चुनाव के परिणामस्वरूप स्थिति में कुछ परिवर्तन आया, क्योंकि उस चुनाव के पश्चात् कांग्रेस विरोधी दल की भूमिका में देखी गई। परंतु 1978 में कांग्रेस के पुनर्विभाजन के फलस्वरूप कांग्रेस विरोधी दल की स्थिति में नहीं रही। 1980 और 1984 के लोकसभा चुनाव में भी संगठित विरोधी दल के अभाव की स्थिति ही देखी गई। 1989 में हुए नवीं लोकसभा के निर्वाचन में कांग्रेस पहली बार शक्तिशाली विरोधी दल के रूप में सामने आई और विरोधी दल के रूप में प्रशंसनीय भूमिका का निर्वाह किया। 1996 में हुए ग्यारहवीं लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सशक्त विरोधी दल के रूप में उभरी और इस रूप में उसने सशक्त एवं प्रभावशाली विरोधी दल की भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वाह किया। 12 वीं तथा 13 वीं लोकसभा में एक बार फिर कांग्रेस सशक्त विरोधी दल के रूप में उभरकर आई। 14 वीं तथा 15 वीं लोकसभा में भाजपा को प्रमुख विरोधी दल के रूप में मान्यता मिली। 16 वीं लोकसभा (2014) में कांग्रेस अब तक की सबसे कम केवल 44 सीटें प्राप्त कर एक कमजोर विरोधी दल के रूप में उभरी।
इस प्रकार संगठित, सशक्त एवं प्रभावशाली विरोधी दल संसदीय लोकतंत्र की सफलता का मूलाधार है। लोकतंत्र में विरोधी दलों की भूमिका की निम्नलिखित शीर्षकोंको के अंतर्गत विवेचना की जा सकती है-

 (1) की निरंकुशता पर प्रतिबंध लगाना (Restriction on Autocracy of Ruling party)- विरोधी दल सत्तारूढ़ या शासक दल को सत्ता का दुरुपयोग करने और निरंकुश बनने से रोकता है। विरोधी दल विधानमंडल और उसके बाहर सरकार की त्रुटियों की आलोचना करते हुए नागरिकों को यह बताने का प्रयास करता है कि मतदाताओं द्वारा शासक दल को जो विश्वास सौंपा गया था, उसका दुरुपयोग हो रहा है। इस प्रकार विरोधी दल, शासक दल को गलत कार्य न करने के लिए विवश कर देता है।

(2) राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करना (To Present Political Alternative)- लोकतंत्र में विरोधी दल अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि वह भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर राजनीतिक विकल्प अर्थात् वैकल्पिक सरकार के रूप में कार्य कर सके। उसके लिए विरोधी दल एक ओर तो जनता को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि यदि आगामी निर्वाचन में जनता द्वारा उसे विजयी बनाकर सत्ता सौंपी गई तो वह सत्तारूढ़ दल की अपेक्षा अच्छे ढंग से देश का शासन संचालित कर सकता है और दूसरी ओर वह सत्तारूढ़ दल में यह भय उत्पन्न करता है कि यदि उसने जन-विरोधी कार्य किए तो विरोधी दल राजनीतिक विकल्प या वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए तैयार है।

(3) जनहित-विरोधी नीतियों का विरोध करना (To Oppose Policies Against Interest)- यदि शासक दल जनहित विरोधी नीति बनाता है तो विरोधी दल उसका खुलकर विरोध करते हैं और सरकार की उस नीति के दुष्परिणामों से जनता को सचेत करते हुए उस नीति के विरुद्ध जनमत तैयार करते हैं।

(4) प्रशासकीय विभागों के दोषों को उजागर करना (To Expose Defaults of Administrativce Departments)- विरोधी दलों का एक प्रमुख कार्य प्रशासकीय विभागों के जनहित-विरोधी कार्यो और दोषों को जनता के समक्ष उजागर करना है। इसके लिए वे विधानमंडल में संबंधित विभाग के मंत्री से प्रश्न पूछते हैं और विभाग के जनहित विरोधी कार्यों और दोषों की शिकायत करते हैं। विधानमंडल के बाहर जनहित विरोधी कार्यों और दोषों के विरुद्ध प्रदर्शनों तथा धरनों, सभाओं, समाचार-पत्रों एवं पोस्टरों आदि के माध्यम से जन जागरण करके विभाग को ऐसा न करने के लिए बाध्य करते हैं।

(5) जनमत तैयार करना (To Prepare Public Opinion)- विरोधी दल अनेक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों पर जनमत जाग्रत करके अपने-अपने पक्ष को प्रस्तुत करता है। नीति निर्धारण के समय सरकार को इस जनमत का ध्यान रखना ही पड़ता है।

(6) जनमत की अभिव्यक्ति करना (To Express Public Opinion)- विरोधी दलों का एक महत्वपूर्ण कार्य जनमत की अभिव्यक्ति करना होता है। अनेक बार राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक प्रश्नों पर जनता की भावनाएं उत्तेजित हो उठती हैं तथा जनता में तीव्र प्रतिक्रिया होती है। जनता की इन भावनाओं, इच्छाओं, एवं प्रतिक्रियाओं को जनता के प्रतिनिधियों के रूप में शासन तक पहुंचाने में विरोधी दल, जनता तथा शासन के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करते हैं।

(7) जनता की स्वतंत्रताओं की रक्षा करना (To Secure Freedom of Public Liberty)- सत्तारूढ़ दल जब भी जनता की स्वतंत्रता का हनन करने के लिए कोई प्रयास करता है या उनमें कोई हस्तक्षेप करता है तो विरोधी दल सरकार के इस प्रयास के विरुद्ध जनमत तैयार करके जनमत के बल पर सरकार को ऐसा करने से रोकते हैं।

(8) राजनीतिक चेतना (Political Conciousness)- विरोधी दल की सफलता का रहस्य राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने में ही निहित है। राजनीतिक चेतना के अभाव में केवल निर्वाचकों के माध्यम से ही परिवर्तन लाना कठिन है। भारत में 45 वर्ष तक कांग्रेस का लंबा शासन जनता की राजनीतिक प्रश्नों के प्रति उदासीनता तथा कमजोर विपक्ष का ही परिणाम था।

(9) उत्तरदायी विरोधी दल के रूप में कार्य करना (To Work as Responsible Opposition Party)- आज जो विरोधी दल है, वह कल का शासक दल भी बन सकता है। इसलिए वह बड़ी सूझ-बूझ के साथ अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है, क्योंकि विरोधी दल के रूप में उसके द्वारा प्रस्तावित की गई नीतियां एवं कार्यक्रम ऐसे होते हैं, जो उसके सत्तारूढ़ होने पर आसानी से सफलतापूर्वक क्रियान्वित हो सकें। विरोधी दल का उद्देश्य सरकार के कार्यों में रोड़े अटकाना नहीं, वरन् उसके कार्यों की स्वस्थ आलोचना करके जनहित के कार्यों तथा देश के समग्र विकास को निश्चित दिशा देना होता है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि लोकतंत्र में विरोधी दल अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि विरोधी दलों के अभाव में लोकतंत्र की भावना ही नष्ट हो जाती है और शासन तानाशाही की दिशा में बढ़ने लगता है। इस संबंध में हांग क्विण्टिन ने ठीक ही कहा है संगठित विरोधी दल के अभाव और तानाशाही में कोई फासला नहीं होता।”

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