भारतीय शासन के लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के उद्देश्यों

तृणमूल स्तर पर भारतीय लोकतन्त्र के सन्दर्भ में पंचायती राज व्यवस्था को समझाइए।(Explain the Panchayati Raj System with reference of Indian Democracy at grass root level)
                                                                   अथवा

भारतीय शासन के लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के उद्देश्यों के अनुरूप भारत में स्थापित पंचायती राज व्यवस्था का सूक्ष्म विवेचन कीजिए।(According to the objectives of Democratic Decentralization, discuss in brief the Panchayati Raj System in India.)

उत्तर- पंचायत राज व्यवस्था (Panchayati Raj System) पंचायती राज संस्थाओं को देश में तृणमूल स्तर पर भारतीय लोकतन्त्र की प्रयोगशालाओं के रूप में स्थापित किया गया है। पंचायती राज संस्थायें लोकतन्त्र की तृणमूल स्तर पर गठित प्रथम पाठशालायें हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से ही नागरिकों को विभिन्न शासन कार्यों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। पंचायतें प्रत्येक व्यक्ति के द्वार पर लोकतन्त्र को लाकर खड़ा कर देती हैं।

भारत मूलरूप से गाँवों का देश हैं। आज भी हमारी जनसंख्या का 72.2 प्रतिशत गाँवो में निवास करता है। भारत में प्राचीन पंचायत व्यवस्था का स्वरूप गाँव से कुछ प्रमुख व्यक्तियों को पंच बनाकर सामाजिक समस्याओं का हल करना मात्र था। अंग्रेजों के शासन ने इस पंचायत व्यवस्था को नष्टप्रायः कर दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत की ग्राम्य व्यवस्था के लिए उपयोगी पंचायती व्यवस्था की स्थापना के लिए भारतीय संविधान में प्रावधान किया गया। संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत अनुच्छेद 40 के अनुसार, “राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठायेगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और अधिकार प्रदान करेगा, जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।”
ग्रामीण विकास के लिए एक सुनियोजित कार्यक्रम एवं व्यवस्था पर विचार-विमर्श करने के लिए भारत सरकार ने बलवन्त राय मेहता की अध्यक्षता में 1956 में एक समिति का गठन किया। बलवन्त राय मेहता समिति ने अपनी संस्तुतियाँ 1957 में सरकार को दे दीं। 12 जनवरी, 1958 को राष्ट्रीय विकास परिषद् ने बलवन्त राय मेहता समिति की प्रजातान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए राज्यों से इसे कार्यान्वित करने के लिए कहा। सर्वप्रथम राजस्थान में सम्पूर्ण राज्य में पंचायती राज की व्यवस्था की गई।

सामुदायिक विकास कार्यक्रम (Community Development Programme)

1952 से प्रारम्भ हुए इस कार्यक्रम का प्रारम्भ इस उद्देश्य से किया गया कि आर्थिक नियोजन एवं सामाजिक पुनरुद्धार की राष्ट्रीय योजनाओं के प्रति देश की ग्रामीण जनता में भी सक्रिय रुचि उत्पन्न की जा सके। सरकार के साथ मिलकर ग्रामीण जनता स्वयं सहभागी होकर ग्रामीण एवं सामुदायिक विकास को सफल बनाये। सामुदायिक विकास कार्यक्रम में निम्नलिखित कार्य पूरा करने का उद्देश्य रखा गया-

(1) गाँव में सम्पर्क मार्गों का विकास।
(2) स्वास्थ्य कल्याण कार्यक्रम ।
(3) प्राइमरी शिक्षा का विस्तार करना।
(4) कृषि की उपज बढ़ाने के लिए ग्रामीण किसानों को प्रशिक्षित करना।
(5) ग्रामीणों को विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित कर आय एवं आत्मविश्वास बढ़ाना।
(6) यह प्रयास करना कि स्वयं ग्रामीण जनता, इस विकास एवं कल्याण कार्यक्रम में आगे आये तथा सरकारी तन्त्र के सहयोग से कार्य करे।

उपर्युक्त उद्देश्यों में अधिक सफलता नहीं मिली, विशेष रूप से जनता का सहयोग इन्हें प्रभावी रूप में नहीं मिल पाया। यह कार्यक्रम सरकारी तन्त्र एवं ग्रामीण जनता से दूरी कम करने में सफल नहीं हुआ, लेकिन सामुदायिक विकास कार्यक्रम ने पंचायती राज के लिए आधार एवं वातावरण तैयार किया।

बलवन्त राय मेहता समिति का प्रतिवेदन (Report of Balwant Roy Mehta Committee) – बलवन्त राय मेहता समिति ने सभी राज्यों के लिए कोई दृढ़ ‘स्वरूप’ लागू करने के लिए नहीं कहा अपितु इसे ‘प्रजातान्त्रिक विकेन्द्रीकरण’ नाम देकर दिशा निर्देश के लिए अग्रलिखित प्रमुख संस्तुतियाँ कीं-

(1) यह स्थानीय स्वशासन की तृणमूल स्तर पर गाँव से लेकर जिला स्तर तक परस्पर सम्बद्ध त्रिस्तरीय रचना होनी चाहिए अर्थात् गांव स्तर पर ग्राम सभा तथा ग्राम पंचायत निम्न स्तर पर, जिला परिषद् उच्चतम स्तर पर तथा इन दोनों स्तरों के मध्य पंचायत समितियां या जनपद पंचायतें ।
(2) स्थानीय स्वशासन की इन संस्थाओं को प्रशासन की वास्तविक शक्तियां तथा उत्तरदायित्व मिलना चाहिए।
(3) इन संस्थाओं को पर्याप्त संसाधन मिलने चाहिए जिससे वह अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह सफलता से कर सकें।
(4) ग्रामीण आर्थिक एवं सामाजिक विकास के कार्यक्रमों को इन संस्थाओं के माध्यम से चलाया जाना चाहिए।
(5) इस नई व्यवस्था को लागू करके देखना चाहिए तथा भविष्य में अधिक कार्य-शक्ति एवं उत्तरदायित्वों को सौंपने का कार्य करना चाहिए।

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का संगठन (Organisation of Triple Panchayati Raj System)

(1) ग्राम पंचायत तथा ग्राम सभा (Gram Panchayat and Gram Sabha)
यह स्थानीय प्रशासन की निम्नतम स्तर की संस्था है। एक गाँव अथवा कुछ छोटे-छोटे गाँवों को मिलाकर पंचायत बनाई जाती है। ग्राम सभा सम्पूर्ण गाँव के वयस्क नागरिकों को मिलाकर बनाई जाती है। गाँव के 18 वर्ष से ऊपर की आयु के नागरिक ग्राम सभा के सदस्य होते हैं। यह ग्राम सभा नियत समय पर ग्राम पंचायत का चुनाव करती है। ग्राम पंचायत में एक प्रधान अथवा सरपंच होता है। सरपंच या प्रधान के अतिरिक्त कुछ पंच होते हैं। इन पंचों की संख्या विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न होती है। इनकी संख्या 5 से लेकर 15 तक होती है। ग्राम पंचायत का कार्यकाल विभिन्न राज्यों में 3 से 5 वर्ष तक हैं।

ग्राम सभा या गाँव सभा तथा ग्राम पंचायत अथवा गाँव पंचायत में अन्तर (Difference Between Gram Sabha and Gram Panchayat)
(1) ग्राम सभा सम्पूर्ण गांव के निवासियों की सभा है जिसके सदस्य सभी वयस्क निवासी होते हैं। ग्राम पंचायत इन्हीं वयस्क व्यक्तियों द्वारा चुनी जाती है।
(2) ग्राम पंचायत का कार्यकाल निश्चित होता है तथा नियत समय पर उसका चुनाव सम्पन्न होता है।

(3) ग्राम सभा स्थायी संस्था है जो सदैव बनी रहती है।
(4) ग्राम पंचायत ग्राम सभा की कार्यकारी संस्था है तथा ग्राम सभा ग्राम पंचायत के कार्य का निरीक्षण तथा मूल्यांकन करती है।

ग्राम पंचायत के कार्य (Functions of Gram Panchayat)
(1) नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराना (Providing Civil Facilities)- ग्राम पंचायत नागरिकों के उत्तम स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए सफाई, गंदे पानी के निकास, पीने के लिए

स्वच्छ जल, आवागमन के अच्छे मार्ग तथा प्रकाश की व्यवस्था करती है। बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूलों की समुचित व्यवस्था करना भी ग्राम पंचायत का कार्य है।
(2) समाज कल्याण के कार्य करना (Work of Social Welfare) – ग्राम पंचायत जन्म तथा मृत्यु के आँकड़े रखती है। परिवार नियोजन एवं कल्याण के कार्यों को प्रभावी बनाने के लिये उपाय करती है। कृषि विकास तथा पशुपालन एवं कल्याण के लिए समुचित कार्य करती है। प्रौढ़ शिक्षा के केन्द्रों को सफल बनाने का कार्य भी पंचायत करती है।
(3) विकास कार्य सम्पन्न करना (Complete Development Work) – सड़क, खरंजा तथा नाली, तालाब, स्कूल का निर्माण करना, गाँव में पंचायत घर का निर्माण करवाना तथा पुस्तकालय आदि की व्यवस्था करना जैसे कार्य ग्राम पंचायत करती है।
आय के साधन (Sources of Income)- ग्राम पंचायतों के आय के साधन निश्चित किये गये हैं। विभिन्न राज्यों में यह भिन्न-भिन्न हैं, साधारणतया –
(1) ग्राम पंचायतें कुछ प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर लगा सकती हैं; जैसे—भवन कर, चुंगी कर, वाहन कर, जानवरों के क्रय-विक्रय पर कर तथा स्थानीय कर जैसे किसी नदी पर तट कर आदि।
(2) ग्राम पंचायत, पंचायत की भूमि, तालाब आदि को पट्टे पर उठाने से भी धन प्राप्त कर सकती है।
(3) ग्राम पंचायतों को विभिन्न कार्यों के लिए राज्य सरकारों से अनुदान राशि भी प्राप्त होती है।

ग्राम पंचायतों पर राज्य सरकार का नियन्त्रण (Control of State Government on Gram Panchayats)- राज्य सरकारों का राज्यों में बनाए गए पंचायत अधिनियमों द्वारा ग्राम पंचायतों पर नियन्त्रण सुनिश्चित किया गया है। जिलाधीश को ग्राम पंचायतों के निरीक्षण तथा उन्हें भंग करने तथा बजट आदि के निरीक्षण का अधिकार दिया गया है। कुछ राज्यों में इस कार्य के लिए राज्य स्तर पर पृथक् विभाग खोले गये हैं तथा अन्य राज्यों में जिला स्तर पर पंचायत राज अधिकारी की नियुक्ति की गई है।

                      न्याय पंचायत (Judicial Panchayats) – कुछ गाँवों की ग्राम सभाओं या ग्राम पंचायतों के लिए एक न्याय पंचायत का गठन किया गया है। न्याय पंचायत के संगठन सम्बन्धी नियम राज्यों में पृथक्-पृथक् हैं, साधारणतया सम्बन्धित ग्राम पंचायतें न्याय पंचायत का चुनाव करती हैं।

                     अधिकार क्षेत्र (Right Area)- न्याय पंचायत ग्रामीणों के लघु, सिविल तथा क्रिमिनल विवादों को सुनती है तथा निर्णय देती है। निर्णय में वह एक निश्चित धनराशि तक जुर्माना भी कर सकती है, लेकिन कारावास का दण्ड नहीं दे सकती। ग्रामीणों के छोटे-छोटे पारस्परिक विवादों को स्थानीय स्तर पर बिना किसी व्यय तथा परेशानी के हल करना ही न्याय पंचायत का उद्देश्य है। न्याय पंचायत में किसी वकील की आवश्यकता नहीं होती। न्याय पंचायत के निर्णय के विरुद्ध साधारणतया अपील नहीं होती, लेकिन कुछ राज्यों में विशेष मामलों में मुन्सिफ अथवा निम्न अदालतों में न्याय पंचायत के निर्णय के विरुद्ध अपील की जा सकती है तथा उपर्युक्त अदालतों को उसके निर्णय को निरस्त करने का अधिकार है।

(2) पंचायत समिति(Panchayat Committee)
ग्राम पंचायत तथा जिला परिषद् के मध्य में स्थानीय निकाय के संगठन को विभिन्न राज्यों में विभिन्न नामों; जैसे-पंचायत समिति, आंचलिक परिषद्, क्षेत्र समिति, आंचलिक पंचायत आदि नाम से जाना जाता है। पंचायत समिति का संगठन विभिन्न राज्यों में वहाँ की आवश्यकताओं और परिस्थतियों के अनुरूप है। इसमें लोकसभा के सदस्य, विधान सभा के सदस्य, प्रखण्ड के सभी प्रधान, सहकारी समितियों और लघु नगरपालिकाओं और नोटीफाइड क्षेत्रों के प्रतिनिधि, प्रखण्ड के निर्वाचित विधान परिषद और राज्य सभा के सदस्य, प्रखण्ड के निर्वाचन जिला परिषद के सदस्य, विकास और योजना में रुचि रखने वाले दो सहयोजित सदस्य एवं महिलाओं और अनुसूचित जातियों के सहयोजित प्रतिनिधि सम्मिलित होते हैं। इस समिति का सचित विकास अधिकारी होता है। अध्यक्ष के पद पर निर्वाचित प्रमुख होता है और इसकी सहायता के लिये उपप्रधान भी निर्वाचित किये जाते हैं। इस सम्पूर्ण व्यवस्था में पंचायत समिति सर्वाधिक महत्व की संस्था है। प्रखण्ड की सभी ग्राम पंचायतों के मध्य समन्वय स्थापित करना और समस्त विकास कार्य को सुचारु रूप से चलाना पंचायत समिति का काम है। अनुदान-राशि का आबंटन भी पंचायत समिति के माध्यम से ही ग्राम पंचायतों को किया जाता है।

पंचायत समिति के कार्य (Functions of Panchayat Committee)

(1) समिति अपने क्षेत्र के विकास के लिए योजना तथा कार्यक्रम तैयार करती है, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित करने के पश्चात् लागू करती है।
(2) समिति सामुदायिक विकास कार्यक्रम को कार्यान्वित करती है।
(3) समिति अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य, प्राइमरी शिक्षा, स्वच्छता तथा संचार एवं सम्पर्क के उत्तरोत्तर विकास के लिए कार्य करती है।
(4) समिति क्षेत्र की ग्राम पंचायतों के कार्य का निरीक्षण करती है। इनके बजट पर भी विचार कर सकती है तथा कार्य में सुधार लाने के लिए बहुमूल्य सुझाव भी दे सकती है। खण्ड विकास अधिकारी (बी० डी० ओ० ) ब्लॉक समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी होते हैं, जो कि पंचायत समिति द्वारा बनाए गए कार्यों को कार्यान्वित करते हैं।
आय के साधन (Sources of Income) – पंचायत समितियों की आय का मुख्य साधन राज्य सरकारों द्वारा किया गया अनुदान है।

(3) जिला परिषद्(District Board)
यह स्थानीय प्रशासन की जिला स्तर की संस्था होती है। यह क्षेत्र समिति और ग्राम पंचायतों तथा राज्य सरकार के मध्य तालमेल बैठाने का कार्य करती है।
संगठन (Organisation) – विभिन्न राज्यों में जिला परिषद् का संगठन कुछ अन्तर के साथ लगभग समान है। साधारणतया इसमें- (1) जिले की सभी पंचायत समितियों के प्रधान, (2) निर्वाचित विधान सभा सदस्य, (3) जिले के निर्वाचित संसद सदस्य, (4) जिला विकास अधिकारी, जिसे मत देने का अधिकार नहीं होता, (5) महिलाओं तथा पिछड़े वर्गों के सहयोजित सदस्य, (6) अनुसूचित जाति तथा जन-जातियों के प्रतिनिधि, (7) सहकारी बैंक का अध्यक्ष आदि सह-सदस्य होते हैं, कुछ राज्यों में पंचायत समिति अपने प्रमुख के अतिरिक्त जिला परिषद् के लिए प्रतिनिधि या सदस्यों का भी चुनाव करती है। जिला परिषद अपना एक अध्यक्ष चुनती है जोकि इसके कार्यों को संचालित करता है।

जिला परिषद् कार्य(Functions of District Board)
जिला परिषद् एक समन्वय तथा पर्यवेक्षण करने वाली संस्था है। यह निम्नलिखित कार्य करती है-
(1) पंचायत समितियों के विकास कार्यक्रमों एवं योजनाओं में समन्वय स्थापित करना।
(2) राज्य सरकार से प्राप्त तत्कालीन अनुदान पंचायत समितियों में वितरित करना।
(3) योजना के अनुरूप पंचायत समितियों के बजट का निरीक्षण करना तथा उन्हें निर्देश देना ।
(4) राज्य सरकार के पंचायतों के कार्यों की प्रगति की सूचनायें देना तथा उससे आवश्यक निर्देश प्राप्त करना।
(5) प्रधानों, प्रमुख आदि से सम्पर्क बनाए रखना ।
(6) जनपद क्षेत्र के कृषि तथा उत्पादन के कार्यों को योजनाबद्ध ढंग से पूरा करवाना।
(7) समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा सौंपे गये कार्यों; जैसे-प्राइमरी शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा आदि की प्रगति की समीक्षा करना।
(8) ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के सम्बन्ध में राज्य सरकार को सलाह देना।
आय के साधन (Sources of Income) – इसकी प्रमुख आय का साधन राज्य सरकारों से प्राप्त अनुदान राशि है। कुछ राज्यों में पंचायत समितियों से अंशदान प्राप्त करना तथा कुछ छोटे कर लगाने का अधिकार भी जिला परिषद् को दिया गया है। यह अपना बजट राज्य सरकार को प्रस्तुत करती है।

अशोक मेहता समिति(Ashok Mehta Committee)
पंचायती राज को अधिक प्रभावी बनाने के लिए जनता सरकार ने 1977 में अशोक मेहता समिति का गठन किया था। इसने निम्नलिखित संस्तुतियाँ कीं—
(1) पंचायत राज संस्थाओं में त्रिस्तरीय संगठन के स्थान पर द्विस्तरीय संगठन होना चाहिए। अशोक मेहता समिति ने ग्राम पंचायत को समाप्त करने की संस्तुति की।
(2) मण्डल पंचायत में 15 सदस्य होंगे जो गाँव की जनगणना के आधार पर ग्रामीणों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जायेंगे। इसमें दो महिलायें तथा कृषक-मजदूरों के प्रतिनिधि होंगे। अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए जनसंख्या के आधार पर स्थान सुरक्षित होंगे। इसका अध्यक्ष चुने गये सदस्यों द्वारा इन्हीं में से चार वर्ष के लिए चुना जायेगा। मण्डल पंचायत कई गाँवों को मिलाकर लगभग 15,000 से 20,000 तक की जनसंख्या पर होगी।
(3) जिला परिषद में छः प्रकार के सदस्य होंगे, जिसमें पंचायत समिति के अध्यक्ष, सहकारी समितियों एवं नगरपालिकाओं के प्रतिनिधि, 2 महिला सदस्य, अनुसूचित जाति तथा जन-जाति के सदस्य, 2 को-आप्टेड सदस्य, जिनमें से एक स्थानीय शिक्षक तथा दूसरा ग्रामीण विकास में रुचि रखने वाला व्यक्ति हो। क्षेत्र के निर्वाचित एम० एल० ए० तथा एम० पी० जिला परिषद् के पदेन सदस्य होंगे। जिला परिषद् के अध्यक्ष का चुनाव उसके सदस्यों द्वारा 4 वर्ष के लिए किया जायेगा।
(4) पंचायती राज संस्थाओं को करारोपण की अनिवार्य रूप से शक्ति प्रदान करनी चाहिए, जिससे वह राज्य सरकार के अनुदान पर निर्भर न रहें तथा स्वयं अपनी आय के स्त्रोत बना सकें।
(5) यह भी वांछनीय है कि राज्य सरकारें राजनीतिक आधार पर पंचायती राज संस्थाओं का विघटन करें। यदि ऐसा होता भी हो, तो उन संस्थाओं के चुनाव छः माह के अन्दर हो जाने चाहिए।
(6) पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में राजनीतिक दलों को भाग लेना चाहिए।
(7) सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा तथा सम्वर्द्धन के लिए सामाजिक न्याय समितियों का गठन प्रत्येक जिला परिषद् में करना चाहिए जिससे इनका कल्याण सुनिश्चित हो सके।
अशोक मेहता समिति ने बलवन्त राय मेहता समिति के प्रतिमान में कुछ परिवर्तन किये, लेकिन सरकार ने इसकी एक भी संस्तुति को स्वीकार नहीं किया। आज भी भारत में पंचायती राज व्यवस्था बलवन्तराय मेहता समिति द्वारा सुझाए गए प्रतिमान पर ही कार्य कर रही है।
1993 में पारित पंचायत राज विधेयक (Panchayat Raj Bill passed in 1993)- 24 अप्रैल, 1993 में पारित 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायत राज विधेयक पास किया गया। इस विधेयक द्वारा पंचायतों के चुनाव निश्चित समय पर कराने, उनमें महिलाओं, पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जन-जातियों को आरक्षण प्रदान करने, उन्हें स्थानीय स्तर पर संसाधन जुटाने तथा नियोजन के अधिकार प्रदान किये गये हैं।
17 राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों द्वारा इस संविधान संशोधन के अनुसार कानून बनाये गये तथा 24 अप्रैल, 1993 को यह अधिनियम सम्पूर्ण देश में लागू हो गया।

24 अप्रैल, 1993 से लागू पंचायत राज (73वाँ संविधान संशोधन) अधिनियम (Panchayat Raj Act (73th Constitutions Amendment)
संसद ने शहरी और ग्रामीण स्तर पर सत्ता में जनता की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पंचायतों एवं शहरी संस्थाओं से सम्बन्धित दो ऐतिहासिक विधेयक सर्वसम्मति से पारित कर दिए। इस सम्बन्ध में संविधान में दो संशोधन करने को भी लोकसभा ने अपनी मंजूरी दे दी।

इस अधिनियम के पारित हो जाने से संविधान में अब पंचायतों और शहरों के स्थानीय संस्थाओं को भी स्थान मिल जायेगा। इस प्रकार संसद और राज्य विधानसभा के साथ स्थानीय निकाय व पंचायतें भी संवैधानिक मान्यता प्राप्त कर लेंगी और निचले स्तर पर भी लोकतंत्र को मान्यता मिल जायेगी।
इन अधिनियमों में यह व्यवस्था की गई है कि शहरी निकायों व पंचायतों के चुनाव निश्चित समय पर कराये जायेंगे, उनमें महिलाओं, पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति व जनजातियों को आरक्षण प्रदान किया जायेगा तथा उन्हें स्थानीय स्तर पर संसाधन जुटाने व नियोजन के अधिकार भी दिये गये हैं।
अधिनियम में पंचायतों को अवक्रमित किये जाने के छः महीने के भीतर उनका चुनाव अनिवार्य रूप से कराने की व्यवस्था की गई है। इसमें जिला स्तर की समितियों का चुनाव किस ढंग से होगा, यह सम्बन्धित विधानमण्डलों द्वारा तय किया जायेगा।
सरकार ने प्रखण्ड तथा जिला स्तर की समितियों में संसद सदस्यों, विधायकों तथा विधानपरिषद् सदस्यों को शामिल करने और वोट का अधिकार देने के संसदीय समिति के सुझाव को मान लिया है।
इसी प्रकार सरकार ने गाँव स्तर पर पंचायतों के अध्यक्षों का चुनाव सीधे कराने की सिफारिश को भी मान लिया है। विधेयक में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जन-जाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था है। महिलाओं को हर स्तर पर एक-तिहाई स्थान देने की व्यवस्था की गई है।
सरकार ने पंचायत समितियों के सदस्यों की आयु घटाकर 21 वर्ष करने का सुझाव भी मान लिया है
पंचायती राज अधिनियम में पंचायती संस्थाओं को वित्तीय संसाधनों के हस्तान्तरण की एक अनिवार्य व्यवस्था लागू करने तथा इसके लिए उचित कसौटियाँ सुझाने के लिए हर वर्ष एक वित्त आयोग गठित करने का भी प्रावधान है।
इसमें पंचायतों के चुनाव पूरी तरह राज्य निर्वाचन आयोग के नियन्त्रण में कराने का प्रस्ताव सम्मिलित है।
सरकार इस अधिनियम के प्रावधानों को केन्द्र-शासित क्षेत्रों में भी वहाँ की स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधन के साथ लागू करेगी। मेघालय, नागालैण्ड और मिजोरम तथा कुछ पर्वतीय क्षेत्रों के जनजातीय इलाकों तथा अनुसूचित क्षेत्रों को, विशेष रूप से अनुच्छेद 244 के अन्तर्गत इस विधेयक की परिधि से बाहर रखा गया है।

ग्रामीण प्रशासन की समस्यायें (Problems of Village Administration) – ग्रामीण प्रशासन में पंचायतों का एक महत्वपवूर्ण स्थान है किन्तु पंचायती प्रशासन की कुछ समस्यायें निम्नलिखित हैं-
(1) ग्रामीण समुदाय के निवासी रूढ़िवादी तथा जातिवाद से प्रभावित हैं, उनके दृष्टिकोण अत्यन्त ही संकुचित हैं।
(2) ग्रामीण समुदायों के व्यक्ति दलबन्दी का शिकार हैं और राजनीतिक दल भी अपनी इच्छानुसार उन्हें चाहे जिधर मोड़ सकते हैं।
(3) अशिक्षा एवं निर्धनता ग्रामीण समुदाय के लिये घोर अभिशाप है।
(4) ग्रामीण समुदाय की संकीर्णता के कारण ग्रामों में कुछ पेशेवर नेता उत्पन्न हो गये हैं।

प्रशासन संबंधी कतिपय सुझाव (Some Suggestions Regarding Administration) –

(1) ग्राम पंचायतों के विकास को प्रोत्साहन देना चाहिए।
(2) ग्रामीण समुदाय के लिए सामाजिक न्याय तथा उचित आय की व्यवस्था करनी चाहिए।
(3) ग्राम पंचायत के कार्यों में वृद्धि की जाए।
(4) ग्रामीण समुदाय को दलबन्दी से दूर रखना चाहिए।
(5) वयस्क मताधिकार द्वारा ग्राम पंचायतों का निर्वाचन करना चाहिए।
(6) पंचायतों को निष्पक्ष होकर कार्य करना चाहिए।
(7) पंयाचतों में राजनीतिक दलों तथा जातिवाद पर नियन्त्रण रखना चाहिए।

 

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