भारतीय लोकतन्त्र के धर्म-निरपेक्ष स्वरूप की विवेचना कीजिये

भारतीय लोकतन्त्र के धर्म-निरपेक्ष स्वरूप की विवेचना कीजिये।(Discuss the secular character of Indian Democracy.)
                                                       अथवा
भारत में धर्म-निरपेक्ष लोकतन्त्र के सिद्धान्त का कहाँ तक पालन किया गया है ? इस सम्बन्ध में भारतीय संविधान से उद्धरण देते हुए धर्म-निरपेक्षता के सकारात्मक तथा नकारात्मक पक्ष की विवेचना कीजिये।(How far the principle of Secular Democracy has been practiced in India? In this regard, give the reference from the Indian constitution and discuss the positive and the negative side of secularism.)
उत्तर- भारतीय लोकतन्त्र में धर्म-निरपेक्षता (Secularism in Indian Democracy)
धर्म-निरपेक्षता राष्ट्रीय नीति के रूप में (Secularism as a National Policy) – भारतीय संविधान के निर्माताओं ने धर्म-निरपेक्षता को संविधान में प्रमुख स्थान देकर भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया। संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 27 एवं 28 के अन्तर्गत सभी व्यक्तियों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। अनुच्छेद 25 के अन्तर्गत लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अन्तःकरण की स्वतन्त्रता का और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का समान अधिकार होगा। परन्तु सार्वजनिक हित में इस स्वतन्त्रता पर कुछ प्रतिबंध लगाये गये हैं। कोई भी धर्म तथा धार्मिक कार्य तथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता एवं सार्वजनिक स्वार्थ के मार्ग में बाधक नहीं होगा, धर्म का प्रयोग राजनीतिक स्वार्थ के लिए नहीं किया जा सकेगा। सरकारी सहायता प्राप्त किसी भी स्कूल में किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं दी जायेगी। समाज सुधार तथा सामाजिक कल्याण के मार्ग में कोई भी बाधक नहीं बनेगा तथा सभी स्थानों पर सभी वर्ग के लोग स्वतन्त्रतापूर्वक आ-जा सकेंगे।

धर्म निरपेक्षता का वास्तविक अर्थ (Real Meaning of Secularism ) – उपरोक्त अध्ययन से यह स्पष्ट है कि सरकार ने धार्मिक स्वतन्त्रता के सिद्धान्त को उसी सीमा तक स्वीकार किया जिस सीमा तक कि यह सार्वजनिक कल्याण के लिए हानिकारक नहीं है। धर्म-निरपेक्षता का वास्तविक अर्थ यह है कि सरकार सभी धर्मों के प्रति समानता का व्यवहार अपनायेगी । अतः न तो किसी धर्म विशेष को प्रोत्साहन ही देगी और न ही किसी धर्म विशेष के मार्ग में बाधा पहुँचायेगी। राज्य किसी धर्म का विरोधी नहीं है। श्री हरि विष्णु कामत ने संविधान सभा में धर्म निरपेक्षता के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा था, “धर्म-निरपेक्षता की नीति के अन्तर्गत राज्य न तो धार्मिक होगा और न अधार्मिक ही और न धर्म का विरोधी ही। वह पूर्ण रूप से सभी धार्मिक सिद्धान्तों और कार्यों से अपने को मुक्त रखेगा तथा धार्मिक विषयों में वह तटस्थता की नीति अपनायेगा ।”

धर्म-निरपेक्षता का सकारात्मक पहलू (Positive Aspect of Secularism ) – वस्तुतः भारत की सामाजिक तथा धार्मिक विविधता के दृष्टिगत धर्म-निरपेक्षता की नीति का अपनाया जाना उचित ही है। सी० एल० एलेक्जेन्ड्रोक्सि के शब्दों में, “धर्म-निरपेक्ष राज्य के रूप में भारत सभी व्यक्तियों को संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतन्त्रता की गारन्टी देता है तथा किसी भी धर्म को विशेष स्थान नहीं देता।” इस दिशा में निम्न सकारात्मक पग उठाये गये हैं-

(i) साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रों की समाप्ति (Abolition of Communal Electorates) – सम्पूर्ण देश में सार्वजनिक मताधिकार क्रियान्वित किया गया है। संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की स्थापना करके धर्म-निरपेक्षता को दृढ़ बनाने का प्रयास किया गया है।
संविधान में सभी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की गारन्टी दी गई है तथा उन्हें विशेष सुविधायें प्रदान की गई हैं। अनु० 29 के अनुसार भारत के राज्य क्षेत्र अथवा उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाये रखने का अधिकार होगा। अल्पसंख्यकों के लिये केन्द्रीय सेवाओं, राज्यों के विधान मण्डलों तथा राज्यों की सेवाओं में स्थान सुरक्षित कर दिये गये हैं।

(ii) धर्म-निरपेक्षता तथा सामाजिक सुधार ( Secularism and Social Reforms) – डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में हमारा संविधान कठोर अर्थ में धर्म तथा धर्म से सम्बन्धित-निरपेक्ष कार्यों के मध्य स्पष्ट अन्तर करता है। उनके शब्दों में, “हमें यहाँ धर्म की परिभाषा को इस प्रकार सीमित करना चाहिये कि ये सीमायें धार्मिक विश्वासों, उत्सवों तथा सरकारों के मार्ग में बाधक न बनें। यह आवश्यक नहीं है कि सभी प्रकार के कानून, उदाहरण के लिये काश्तकारी कानून अथवा उत्तराधिकार कानून धर्म के द्वारा क्रियान्वित होने चाहिए।” तथापि न्यायालय को अनेक मामलों में निर्णय देते समय धर्म का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए सरकार ने ‘हिन्दू कोड बिल’ (Hindu Code Bill) रूढ़िवादी हिन्दू जनता के विरोध के कारण वापिस ले लिया था।

धर्म-निरपेक्षता सम्बन्धी अन्य प्रावधान (Other Provisions Concerned with Secularism)
संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रावधान भी हैं, जो राज्य के धर्म-निरपेक्षता सम्बन्धी दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं। ये अग्रलिखित हैं –

(i) राज्य का धर्म- राज्य का अपना कोई धर्म विशेष नहीं है।

(ii) धार्मिक संस्थायें – सभी धर्मावलम्बी विधि के अन्तर्गत धार्मिक संस्थाओं की स्थापना कर सकते हैं तथा उनको चलाने के लिये ट्रस्टों की स्थापना कर सकते हैं। विधि के अन्तर्गत धार्मिक संस्थायें अपना प्रशासन चलाने के लिये स्वतन्त्र हैं। राज्य की ओर से इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

(iii) धर्म के लिये करारोपण- राज्य किसी भी नागरिक को किसी भी धर्म की उन्नति के लिये कर (Tax) देने को विवश नहीं करेगा।

(iv) अल्पसंख्यकों की स्थिति- संविधान सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने धर्म, भाषा, लिपि एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने के अधिकार प्रदान करता है। राज्य द्वारा सहायता प्राप्त शिक्षण-संस्थाओं में प्रवेश के लिये धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा।

(v) भेदभाव का अभाव- राज्य किसी भी धर्म के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण नहीं अपनायेगा और बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मावलम्बियों को समान रूप से रोजागार एवं अन्य सुविधायें प्रदान करेगा।
सी० एल० एलेक्जैन्ड्रोविक्स के शब्दों में, “धर्म-निरपेक्ष राज्य के रूप में भारत सभी व्यक्तियों को संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतन्त्रता की गारण्टी देता है तथा किसी धर्म को विशेष स्थान प्रदान नहीं करता है। ”

अल्पसंख्यकों के प्रति नीति- भारत की धर्म-निरपेक्षता की नीति का एक उदाहरण इसकी अल्पसंख्यकों के प्रति अपनाई गई उदार नीति है-
(i) संविधान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की गारण्टी दी गई है।

(ii) उन्हें विशेष सुविधायें प्रदान की गयी हैं। सरकार ने विभिन्न अल्पसंख्यक वर्गों के हितों के दृष्टिगत सरकारी सेवाओं, केन्द्रीय तथा राज्यों के विधान मण्डलों में उनके लिए विशेष स्थान सुरक्षित कर दिये हैं। अन्य सुविधायें भी अल्पसंख्यकों को दी गई हैं।

डोनाल्ड यूजीन स्मिथ का कथन है कि, “भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है। उसी अर्थ में जिसमें कोई इसे प्रजातन्त्र भी कह सकता है।”

आलोचना (Criticism) – यह आलोचना निराधार है कि भारत की धर्मनिरपेक्षता ईश्वर विरोधी नीति का प्रतीक है। वस्तुतः धर्म-निरपेक्षता की नीति का अर्थ सभी को समान रूप से धार्मिक स्वतन्त्रता के उपभोग का समान अवसर प्रदान करना है। श्री गजेन्द्र गड़कर के शब्दों में, “भारतीय धर्म-निरपेक्षतावाद समस्याओं के प्रति राष्ट्रीय एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है, जो बहुलवादी समाज है, जिसे समस्याओं का सामना करना पड़ता है।”

 

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