भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद के विभिन्न रूपों की उदाहरण सहित विवेचना कीजिये

भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद के विभिन्न रूपों की उदाहरण सहित विवेचना कीजिये।(Discuss with examples the different forms of Regionalism in Indian politics.)

उत्तर- भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद (Regionalism in Indian Politics)
वर्तमान भारतीय संघ में 29 राज्य (States) और 7 संघ-शासित क्षेत्र (Union Territories) हैं जो अपनी पृथक्-पृथक् पहचान बनाये हुए हैं। इतना ही नहीं, इन राज्यों और संघ-शासित क्षेत्रों के भीतर भी कई अन्य ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें अपनी-अपनी भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक परम्पराओं, धार्मिक विश्वासों, भाषा और संस्कृति पर गर्व है। इस प्रकार भारत विविधताओं से परिपूर्ण एक ऐसा देश है, जिसके विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति में भिन्नता के साथ-साथ इन क्षेत्रों के निवासियों की भाषा, जाति, धर्म, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं में भी पर्याप्त अन्तर है, जिनके आधार पर उनमें गहरा मतभेद है और वे अपने-अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत हैं। दूसरे शब्दों में, भारत के विभिन्न क्षेत्रों की इन विभिन्नताओं और असमानताओं ने भारत में ‘क्षेत्रवाद’ को जन्म दिया है।
यद्यपि क्षेत्रवाद की भावना में अपने क्षेत्र के सर्वांगीण विकास की भावना निहित होती है परन्तु इसमें ‘पृथकतावाद’ की भावना भी निहित होती है, जो अनुकूल परिस्थिति आते ही ‘क्षेत्रवाद’ को ‘पृथकतावाद’ में बदलने का प्रयास करती है। यद्यपि स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भी ‘पृथकतावाद’ की भावना विद्यमान थी परन्तु स्वतन्त्र भारत की राजनीति में क्षेत्रवाद के रूप में यह भावना और भी अधिक बलवती हुई है। देश के राजनीतिक दल (विशेष रूप से क्षेत्रीय दल) अपने-अपने क्षेत्रों में रहने वाले विशिष्ट लोगों को अपना समर्थक बनाकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने के उद्देश्य से उस क्षेत्र-विशेष की माँगों को संगठित रूप देते हैं और उन माँगों का नेतृत्व करते हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे एक क्षेत्र के लोग अपने क्षेत्र की अनुचित एवं अवैधानिक माँगों को भी संगठित होकर प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करते हैं और उन्हें मनवाने के लिये आन्दोलन का मार्ग अपनाते हैं। इस प्रकार की माँगे, राजनीतिक दबाव के कारण जैसे-जैसे स्वीकार होती जाती हैं, वैसे ही वैसे वे और भी बढ़ती जाती हैं। इस प्रकार राजनीतिक दलों ने भारत में धर्म, जाति, भाषा, आर्थिक और अन्य क्षेत्रीय हितों की भावनाओं को भड़काकर देश भर में क्षेत्रवाद की भावना को विकसित किया है और  क्षेत्र-विशेष के लिये अधिकार एवं स्वायत्तता सम्बन्धी माँगों में वृद्धि की है, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद की भावना इतना उग्र रूप धारण कर चुकी है कि इससे भारत की एकता तथा अखण्डता के लिये भी खतरा उत्पन्न हो गया है।

भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद के विभिन्न रूप (Different Forms of Regionalism in Indian Politics)
भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद के मुख्य रूप से निम्नलिखित रूप देखने को मिलते हैं-

(1) भारतीय संघ से पृथक होने की माँग ।
(2) पृथक् राज्य का दर्जा प्राप्त करने की माँग ।
(3) पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त करने की माँग ।
(4) राज्यों के पुनर्गठन और पृथक् राज्यों की माँग।
(5) अन्तर्राज्यीय विवाद।
(6) उत्तर-दक्षिण सम्बन्धी भावना ।

(1) भारतीय संघ से पृथक होने की माँग- भारत के कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और संगठनों ने क्षेत्रवाद की भावना से प्रेरित होकर भारतीय संघ से पृथक होने और सम्प्रभु राज्यों के निर्माण पर बल दिया है। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने अपनी इस प्रकार की माँगों को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। ऐसी कुछ प्रमुख माँगों की अग्रवत् विवेचना की जा सकती है-

(i) द्रविड मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) की माँग- क्षेत्रवाद की भावना को प्रबल रूप देने में तमिलनाडु के राजनीतिक दल द्रमुक की प्रमुख और सक्रिय भूमिका रही है। द्रमुक ने जून 1960 में पृथकतावादी आन्दोलन संगठित करके मद्रास को भारतीय संघ से पृथक करने की माँग की और स्थान-स्थान पर भारत के नक्शों को जलाकर अपनी माँग को प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया। इस दल के नेता श्री अन्नादुरै ने दक्षिण भारत के लोगों को उत्तर-भारत के लोगों से अनेक दृष्टियों से भिन्न निरूपित करते हुए मद्रास, आन्ध्र प्रदेश, केरल और मैसूर राज्यों को भारतीय संघ से पृथक् करके एक पृथक् ‘सम्प्रभु द्रविड़ स्थान’ राज्य का निर्माण किये जाने की माँग की। द्रमुक की इस पृथकतावादी और विघटनकारी मांग को देखते हुए सन् 1963 में संविधान का 16वाँ संशोधन अधिनियम पारित किया गया, जिसके अनुसार कोई भी व्यक्ति कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकेगा, जो भारत की अखण्डता के विरुद्ध हो। इस अधिनियम के पारित हो जाने के परिणामस्वरूप द्रमुक ने भारतीय संघ से पृथक होने सम्बन्धी अपनी माँग को तो त्याग दिया परन्तु सन् 1970 में ‘राज्य स्वायत्तता सम्मेलन’ आयोजित करके भारतीय संघ के अन्तर्गत ही ‘स्वायत्त राज्य’ की माँग रखी। इस माँग को बलवती और प्रभावी रूप देने के लिये राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री करुणानिधि द्वारा यह घोषणा भी की गयी कि यदि यह मांग पूरी नहीं की गयी तो जन-आन्दोलन खड़ा कर दिया जायेगा। इतना ही नहीं, इस माँग के साथ-साथ पृथक् ध्वज की माँग भी की गयी। इस प्रकार अपने गठन के समय द्रमुक ने भारत में क्षेत्रवाद को पनपाने और उसे गति देने का भरसक प्रयास किया। वर्तमान में द्रमुक पृथकतावादी प्रवृत्ति से दूर एक राष्ट्रवादी दल के रूप में सक्रिय है तथा देश और राज्य की समृद्धि और उन्नति के लिए कार्यरत है।

(ii) अकाली दल की माँग- पंजाब का अकाली दल भी भारत का एक ऐसा क्षेत्रीय राजनीतिक दल है, जिसने भारत में क्षेत्रवाद की भावना के आधार पर भारतीय संघ से पृथक होकर सिखों के लिये ‘सिखिस्तान’ राज्य की मांग की। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त पश्चात् ही मास्टर तारासिंह के नेतृत्व में सिख सम्प्रदाय के लोगों ने पृथक ‘सिख राज्य’ की मांग की। सन् 1950 से 1960 के दशक में अपनी मांग को प्रभावी रूप देने के लिये हिंसात्मक आन्दोलन का सहारा लिया गया। नवम्बर 1966 में हुए पंजाब के विभाजन से भी यह दल सन्तुष्ट नहीं हुआ और सिखों के लिये पृथक ‘सिख राज्य’ सम्बन्धी अपनी मांग पर अड़ा रहा। अपने उद्देश्य की प्राप्ति और सिख सम्प्रदाय में जाग्रति उत्पन्न करके उनका सहयोग लेने के उद्देश्य से अकाली दल के तत्कालीन महासचिव डॉ० जगजीत सिंह ने विभिन्न देशों की यात्रायें भी कीं। विगत वर्षों में पंजाब में चले रक्तपात और ‘खालिस्तान’ की प्रबल माँग के पीछे क्षेत्रवादी राजनीति ही कार्य करती रही थी। वर्तमान में भारत से पृथक होने की मांग करने वाले नेता अकाली दल से पृथक है; अकाली दल राष्ट्र की उन्नति और पंजाब की समृद्धि के लिये अग्रसर है।

(iii) आसाम में मिजो भाँग और नागा आन्दोलन- आसाम राज्य के मिजो नेता भारतीय संघ से पृथक होकर एक स्वाधीन ‘मिजो राज्य की निरन्तर माँग करते चले आ रहे थे, जिसके परिणामस्वरूप सन् 1987 में ‘मिजोरम’ नामक राज्य अस्तित्व में आया। इस प्रकार आसाम राज्य की नागाजाति ने भी भारतीय संघ से पृथक होकर ‘नागा राज्य’ की स्थापना की माँग की। अपनी इस माँग को पूरी कराने के लिये नागाओं ने फीजो के नेतृत्व में ‘राष्ट्रीय परिषद’ की स्थापना की, हिंसात्मक आन्दोलन का सहारा लिया। इतना ही नहीं, सन् 1952 में हुए प्रथम आम चुनाव का नागाओं द्वारा बहिष्कार भी किया गया। नागाओं के इस हिंसात्मक आन्दोलन और संघर्ष के कारण नागाओं और केन्द्र सरकार के मध्य एक समझौता हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सन् 1962 में नागालैण्ड राज्य की स्थापना हुई।

(2) पृथक राज्य का दर्जा प्राप्त करने की माँग- भारतीय संघ के संघ-शासित क्षेत्रों द्वारा भी समय-समय पर पृथक् राज्य का दर्जा प्राप्त करने की माँग की जाती रही है। संघीय इकाइयों द्वारा की गयी इन मांगों के पीछे भी क्षेत्रवाद की भावना ही कार्य करती रही है। इस प्रकार की माँगों के परिणामस्वरूप ही हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मणिपुर पृथक् राज्यों के रूप में अस्तित्व में आये।

(3) राज्य का दर्जा प्राप्त करने की माँग- भारत में संघीय इकाइयों द्वारा न केवल पृथक राज्य का दर्जा प्राप्त करने की माँग ही की गयी है अपितु समय-समय पर इन इकाइयों द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त करने की माँग भी की जाती रही है। इन मांगों के परिणामस्वरूप ही 7 सितम्बर, 1962 को संसद द्वारा 14वाँ संशोधन विधेयक पारित किया गया, जिसके अनुसार संसद ने हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, पाण्डिचेरी, गोआ, दमन तथा दीव में व्यवस्थापिकाओं के गठन हेतु स्वीकृति प्रदान की। अण्डमान, निकोबार, लक्षद्वीप और दिल्ली इस विधेयक में सम्मिलित नहीं किये गये थे। 25 जनवरी, 1971 को हिमाचल प्रदेश तथा जनवरी, 1972 में मणिपुर और त्रिपुरा को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान कर दिया गया। दिल्ली के लिये एक 56 सदस्यीय मैट्रोपोलिटन काउन्सिल बनाने की स्वीकृति प्रदान की गयी। बाद में एक विधान सभा की स्थापना की गयी।

(4) राज्यों का पुनर्गठन और पृथक राज्यों की माँग- राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा भाषायी आधार पर किये गये राज्यों के पुनर्गठन से भी पुनर्गठन सम्बन्धी समस्या का समाधान नहीं हो सका। इससे क्षेत्रवादी प्रवृत्ति और राजनीति को और अधिक प्रोत्साहन मिला। इसी क्रम में राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 द्वारा भारत के विभिन्न राज्यों की सीमाओं में स्थानीय और भाषायी मांगों को पूरा करने के लिये परिवर्तन किया गया। विद्यमान राज्यों के बीच कुछ राज्य क्षेत्रों को अन्तरित किया गया। गुजराती और मराठी भाषा के आधार पर सन् 1960 में मुम्बई राज्य का दो भागों में विभाजन करके गुजरात नया राज्य बनाया गया और मुम्बई तथा बचे हुए भाग को महाराष्ट्र नाम दिया गया। इसी दौरान विदर्भ राज्य की माँग भी उठी। सन् 1966 में पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के द्वारा पंजाब राज्य को पंजाब और हरियाणा राज्यों में विभाजित करके चण्डीगढ़ को संघीय क्षेत्र बनाया गया। सन् 1969 में असम पुनर्गठन अधिनियम द्वारा असम राज्य के भीतर ही मेघालय नामक एक स्वशासी उपराज्य बनाया गया। सन् 1971 में पूर्वोत्तर क्षेत्र अधिनियम द्वारा मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय को राज्य बनाया गया। आन्ध्र राज्य के विभाजन और तेलंगाना की माँग का भी समाधान किया गया। एक लम्बे संघर्ष तथा आन्दोलन के पश्चात् उ० प्र०, मध्य प्रदेश तथा बिहार राज्य का विभाजन कर नवम्बर 2000 में क्रमशः तीन नये राज्यों – उत्तरांचल, छत्तीसगढ़ तथा झारखण्ड का अभ्युदय हुआ।
इतना ही नहीं, भारत के अन्य क्षेत्रों में भी क्षेत्रीयता के आधार पर पृथक राज्यों की मांग की जाती रही है। असम के मैदानी भागों में भी जनजातियों द्वारा पृथक संघीय क्षेत्र की माँग, भूतपूर्व मैसूर राज्य के निवासियों की कर्नाटक से पृथक् होने की मांग, पं० बंगाल में दार्जिलिंग आदि क्षेत्रों में गोरखालैण्ड की मांग आदि क्षेत्रवादी राजनीति के ही विभिन्न रूप हैं।

(5) अन्तर्राष्ट्रीय विवाद – भारतीय राजनीति में केन्द्र बनाम राज्य तथा राज्य बनाम राज्य विवादों के रूप में भी क्षेत्रवाद की अभिव्यक्ति होती रही है। क्षेत्रवाद की भावना और क्षेत्रीय हितों की पूर्ति के लिये कई बार राज्यों ने केन्द्र के सुझावों, आदेशों एवं निर्देशों को मानने से इन्कार कर दिया और इस प्रकार अपने सशक्त एवं स्वतन्त्र अस्तित्व का प्रदर्शन किया है। इतना ही नहीं, अनेक विषयों पर राज्यों द्वारा केन्द्र का खुलकर विरोध भी किया गया है। इसी प्रकार क्षेत्रवाद की भावना से प्रेरित होकर क्षेत्रीय हितों को पूर्ति हेतु भारत में कुछ राज्यों के मध्य भी भाषायी आधार पर क्षेत्रों के अन्तरण तथा नदियों के जल बंटवारे आदि से सम्बन्धित विवाद चल रहे हैं। कर्नाटक व तमिलनाडु, मेघालय व असम, पंजाब व हरियाणा के मध्य चलने वाले विवाद क्षेत्रवाद के ही रूप हैं। इस प्रकार अन्तर्राज्यीय विवादों के रूप में भी क्षेत्रवाद की अभिव्यक्ति होती रही है और हो रही है।

(6) उत्तर-दक्षिण सम्बन्धी भावना- भारत में उत्तर-दक्षिण के सन्दर्भ में सोचने सम्बन्धी भावना भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद का ही एक रूप है। उत्तर-दक्षिण के आधार पर भारत को दो भागों में विभाजित करके भारतवासियों में विभेद करके सोचना, भारतीय राजनीति का एक सर्वाधिक दुखद एवं दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है। दक्षिण भारत के लोगों की यह धारणा बन गयी है कि उत्तर-भारत के लोगों द्वारा दक्षिण भारत की सदैव उपेक्षा की गयी है। उनका कहना है कि केन्द्रीय सचिवालय, योजना आयोग, केन्द्रीय मंत्रिमण्डल और भारतीय राजनीति में उत्तर भारत के लोग ही छाये रहे हैं और उन्हीं का इन सब क्षेत्रों में प्रभुत्व और महत्व रहा है, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिण-भारत की अपेक्षा उत्तर भारत का सभी क्षेत्रों में अधिक विकास हुआ है। भाषायी आधार पर भी उत्तर और दक्षिण में विरोध दिखायी दिया है। हिन्दी को उत्तर भारत की भाषा मानते हुए दक्षिण भारत के लोगों ने हिन्दी का विरोध किया है। इसके परिणामस्वरूप हिन्दी-भाषा और हिन्दी-विरोधियों के मध्य न केवल दंगे ही हुए हैं अपितु दक्षिण भारत में हिंसात्मक आन्दोलन भी हये हैं। उत्तर-दक्षिण के सन्दर्भ में सोचने की भावना भारतीय राजनीति में कुछ स्वार्थी राजनीतिक तत्वों तक ही सीमित रही। राज्यों को अधिक स्वायत्तता देने सम्बन्धी सरकारिया कमीशन द्वारा दिये गये सुझावों को कार्यान्वित करके क्षेत्रवादी भावना को समाप्त किया जा सकता है।

 

 

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