भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में दबाव-समूहों की भूमिका का विवेचन कीजिए।

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में दबाव-समूहों की भूमिका का विवेचन कीजिए। (Discuss the role of pressure groups in Indian political system.)

                                                      अथवा

भारत के प्रमुख दबाव-समूहों का वर्णन कीजिये। सरकार पर दबाव डालने के लिये उनके साधनों, कार्य-प्रणाली तथा भारतीय राजनीति में उनके महत्त्व और भूमिका की विवेचना कीजिये।(Describe the main pressure groups of India. Discuss their means and working to pressure the government and their importance and role in Indian Politics.)

                                                      अथवा

भारतीय राजनीति में दबाव गुटों की प्रकृति एवं भूमिका पर निबन्ध लिखिए। (Write on essay on nature and role of pressure groups in Indian Politics.)

                                                      अथवा

भारत में प्रमुख हित समूह कौन-कौन से हैं? कृषक हित समूह के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण बताइए। (What are the main interest groups in India? Explain the reasons influence of farmers, interest group.)

                                                      अथवा

भारतीय राजनीति में दबाव-समूह की भूमिका पर लेख लिखिए। (Write an article on role of Pressure-Group in Indian Politics.)

उत्तर- भारत के प्रमुख दबाव-समूह (Main Pressure Groups of India)
भारत में दबाव-समूहों का उदय और विकास पाश्चात्य देशों की भाँति नहीं हुआ; क्योंकि पाश्चात्य देशों में इनके उदय का आधार वर्गीय हित (Class Interests) रहे हैं, परन्तु भारत में इनका उदय और विकास साम्प्रदायिक, क्षेत्रीय, जातीय, भाषायी और वर्गीय आदि विभिन्न आधारों पर हुआ है। वर्तमान भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाले सक्रिय प्रमुख दबाव-समूह निम्नलिखित हैं-

(1) साम्प्रदायिक दबाव-समूह (Communal Pressure Groups)- भारत में हिन्द, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध आदि विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के लोग रहते हैं। इसीलिये भारतीय संविधान द्वारा भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र का स्वरूप दिया गया है, परन्तु अभी तक भारतीय राजनीतिक जीवन से साम्प्रदायिकता का उन्मूलन नहीं हो सका है। विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के लोगों ने उपासना, कर्म-काण्डों, मान्यताओं और प्रथाओं आदि को लेकर मत-मतान्तर और अपने अलग-अलग ‘साम्प्रदायिक संगठन’ खड़े कर लिए हैं। इनमें एंग्लो-इण्डियन एसोसियेशन, पारसी सेण्ट्रल एसोसियेशन, जमायते इस्लामी, मुस्लिम मजलिस, हिन्दू महासभा, राम-राज्य परिषद, आर्य प्रतिनिधि सभा और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक समिति आदि ऐसे संगठन हैं, जो साम्प्रदायिक हितों की रक्षा करने या उन्हें संरक्षण देने के लिये दबाव-समूहों के रूप में शासन को प्रभावित करते हैं, जिन्हें वोट की राजनीति ने और अधिक बढ़ावा दिया है। उदाहरणार्थ, भारत में सर्वाधिक मतदाता हिन्दू सम्प्रदाय के हैं और संख्या की दृष्टि से मुस्लिम सम्प्रदाय के मतदाताओं का दूसरा स्थान है परन्तु मुस्लिम सम्प्रदाय एक दबाव-समूह के रूप में शासन को सदैव से प्रभावित करता रहा है और आज भी शासन इस सम्प्रदाय के प्रभाव से मुक्त नहीं है; क्योंकि प्रत्येक राजनीतिक दल मुस्लिम मतदाताओं के वोट प्राप्त करने के लिए इस सम्प्रदाय को प्रसन्न रखने का यथासम्भव प्रयास करता है। इस प्रकार परिस्थितियों के अनुसार सभी साम्प्रदायिक दबाव-समूह शासन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते रहते हैं।

(2) क्षेत्रीय दबाव समूह (Regional Pressure Groups) – भारत एक विशाल क्षेत्रफल वाला देश है, जो प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से विभिन्न प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया । इन प्रदेशों अथवा क्षेत्रों के अपने अलग-अलग क्षेत्रीय हित हैं, जिनकी रक्षा के लिए क्षेत्रीय आधार पर गठित विभिन्न संगठन शासन को इस रूप में प्रभावित करते हैं। कि शासन को उनसे समझौता करना ही पड़ता है। शासन में मन्त्रि-परिषद् के गठन पर भी दबाव-समूहों का विशेष प्रभाव रहता है। मन्त्रि-मण्डल में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का अनुपात क्षेत्रीय दबाव-समूहों के प्रभाव पर निर्भर करता है। कभी-कभी तो इनके प्रभाव के कारण शासन को अपने निर्णय तक बदलने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक उद्योगों की स्थापना, बाँध बनाना, अस्पताल, प्रशिक्षण-केन्द्र की स्थापना करना राजनीतिक तथा अराजनीतिक अधिकारियों की नियुक्ति करना आदि से सम्बन्धित निर्णय भी दबाव-समूहों के दबाव पर निर्भर करते हैं।

(3) जातीय दबाव-समूह (Caste Pressure Groups) – भारत में विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं, जिन्होंने अपनी जाति के आधार पर विभिन्न संगठनों का गठन करके प्रारम्भ से ही भारतीय राजनीति को विभिन्न रूपों में प्रभावित किया है। डॉ० रजनी कोठारी के शब्दों में, “प्रत्येक स्तर पर राजनीतिक गुटबन्दी और जाति या वर्ण-सम्बन्धों के कारण नये संगठन जन्म लेते हैं। इनके कारण नेताओं और प्रमुख व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ता है।” महाराष्ट्र में मराठाओं का कृषक मजदूर-दल केरल में नायरों की नायर-सर्विस सोसाइटी, गुजरात में क्षत्रिय-सभा, राजस्थान में जाट-सभा और राजपूत सभा, तमिलनाडु में नाडार वैश्य-सभा आदि ऐसे ही जातीय संगठन हैं जो जातीय दबाव-समूह के रूप में कार्यरत हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल, शासन और प्रशासन तथा कोई भी राजनीतिक संस्था जातीय दबाव-समूहों के प्रभाव से अछूती नहीं है। वर्तमान में राजनीतिक दल भी जातीय आधार पर ही निर्वाचन में अपने प्रत्याशी खड़े करते हैं और जातीय आधार पर ही वोट माँगते हैं। इस प्रकार जातीय दबाव-समूह मन्त्रि-परिषद् के गठन, नीति-निर्धारण और राजनीतिक एवं अराजनीतिक नियुक्तियों को अपने हितों की रक्षा के लिए प्रभावित करते हैं। इसलिए मेयर ने लिखा है कि, “जातीय संगठन राजनीतिक महत्त्व के दबाव-समूह के रूप में प्रवृत्त हैं।”

(4) भाषायी दबाव समूह (Linguistic Pressure Groups) – भारत एक विभिन्न भाषा-भाषी देश है। संविधान द्वारा हिन्दी को राजभाषा के रूप में मान्यता दिये जाने के बाद भी अपनी-अपनी भाषाओं के प्रति लोगों को विशेष लगाव है, उसने भाषा-सम्बन्धी एक प्रकार का विवाद उत्पन्न कर दिया है, जो देश के लिये एक गम्भीर समस्या बन गया है, क्योंकि पंजाब, हरियाणा, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात आदि प्रान्तों का गठन भाषायी दंगों के परिणामस्वरूप ही हुआ । इनके अतिरिक्त, भाषा सम्बन्धी प्रश्न को लेकर तमिलनाडु में हिन्दी का तीव्र विरोध हुआ और वर्तमान में भी दंगे-फसाद होते ही रहते हैं। वी० पी० लैम्ब ने कहा है कि “भाषा-सम्बन्धी समस्या सर्वाधिक जटिल समस्याओं में से एक है, जिसका आधुनिक भारत को सामना करना पड़ रहा है।” भाषायी आधार पर गठित दबाव समूह निरन्तर शक्तिशाली होते जा रहे हैं और अपनी-अपनी भाषाओं को मान्यता देने और विशेष संरक्षण प्रदान करने के लिये शासन पर दबाव डालते रहते हैं। अभी तक शासन द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित न कर पाना भाषायी दबाव-समूहों के प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण है। इस प्रकार जातीय दबाव-समूहों की भाँति ही भाषायी दबाव-समूहों ने भी भारतीय राजनीति में एक शक्तिशाली भूमिका निभाई है। मॉरिस जोन्स ने कहा है कि “भारतीय विविधता का उसके राजनीतिक जीवन पर सर्वाधिक प्रमुख रूप से प्रभाव, क्षेत्रीय समुदायों द्वारा अपने पृथक् भाषायी इकाई-निर्माण-सम्बन्धी आन्दोलनों में ही देखा गया है।” केरल समाज, कन्नड़ समाज, तेलुगु कान्फ्रेन्स, हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा नागरी प्रचारिणी सभा और तमिल संघ आदि ऐसे ही दबाव-समूह हैं। तेलुगुदेशम और द्रमुक पार्टी भी भाषायी आधार पर ही गठित हुई थीं और वर्तमान प्रमुख राजनीतिक दलों में भी भाषायी दबाव-समूह विद्यमान हैं।

(5) वर्गीय दबाव-समूह (Group Pressure Groups) – भारत में उद्योगपति, श्रमिक, व्यापारी, कृषक, शिक्षक एवं छात्र आदि विभिन्न वर्ग हैं। इन विभिन्न वर्गों के विशिष्ट हितों के आधार पर अनेक समूहों का निर्माण हुआ है, जो अपने-अपने हितों के लिये शासन पर दबाव डालते रहते हैं; इनमें से कुछ समूह निम्नलिखित हैं-

(i) श्रमिक-संघ (Labour Unions) – श्रमिक संघ ऐसे दबाव-समूह हैं, जो विभिन्न उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिये कार्य करते हैं। इनकी संख्या भारत में बहुत अधिक है, जो निरन्तर बढ़ती जा रही है। इन संघों का प्रमुख राजनीतिक दलों से सम्बन्ध है और इनका प्रभाव प्राय: नगरीय क्षेत्र तक ही सीमित है। इनमें प्रमुख रूप से इण्डियन नेशनल ट्रेड यूनियन काँग्रेस, हिन्द मजदूर सभा, भारतीय मजदूर संघ और सेण्टर ऑफ इण्डियन ट्रेड यूनियन आदि प्रमुख रूप से सक्रिय हैं।
(ii) वाणिज्यिक, व्यापारिक एवं औद्योगिक संघ (Commercial, Trade & Industrial Unions) – इन संघों का गठन उद्योगपतियों, व्यापारियों द्वारा किया जाता है और ये संघ इन्हीं हितों के संरक्षण के लिये कार्य करते हैं। फेडरेशन ऑफ चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज, उत्तर-प्रदेश व्यापार-वाणिज्य मण्डल, ऐशोचेम, विभिन्न व्यापार संघ और मारवाड़ी चैम्बर ऑफ कॉमर्स आदि उद्योगपतियों के संगठन हैं। मिल मालिक संघ, भारतीय मालिकाना संघ व्यापारिक संघ हैं। इनके अतिरिक्त टाटा, बिड़ला, वालचन्द, डालमिया साहूजैन, गोयनका, थापर, अम्बानी और सिंहानिया आदि ऐसे व्यापार समूह हैं जो स्वयं ही शासकीय नीतियों को पूरी तरह प्रभावित करते हैं। व्यावसायिक समूहों में शिक्षक संघ, भारतीय बार एसोसियेशन, रेलवे कर्मचारी संघ, अखिल भारतीय गोदी संघ, ऑल इण्डिया एयरवेज एसोसियेशन और बैंक व पोस्ट ऑफिस यूनियन आदि ऐसे समूह हैं, जो अपने जन्मदाताओं के हितों के संरक्षण हेतु दबाव-समूह के रूप में कार्य करते हैं।
(iii) कृषक-संघ (Farmer Union)- भारत एक कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहाँ किसानों का अखिल भारतीय स्तर पर कोई संगठन नहीं है, अतः श्रमिक संगठनों की अपेक्षा कृषक संगठनों की स्थिति बहुत दुर्बल रही है। सन् 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई थी, परन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् यह समाप्त हो गयी। आगे चलकर कृषक फोरम की स्थापना की गयी, जिसके द्वारा कृषकों पर आय-कर लगाने का विरोध किया गया। हिन्द-किसान पंचायत जैसे कृषकों के संगठन भी कृषकों का कुछ भला न कर सके। भारतीय किसान यूनियन भी इसी प्रकार का कृषकों का एक दबाव-समूह है।
(iv) छात्र संगठन (Students Union) – प्रायः प्रत्येक विद्यालय और विश्वविद्यालय में छात्रों के संगठन हैं, जो अखिल भारतीय स्तर के हैं और प्रमुख राजनीतिक दलों से सम्बद्ध हैं। ‘राष्ट्रीय छात्र संगठन’ काँग्रेस (आई) से, ‘जनता युवा मोर्चा’ जनता पार्टी से, ‘स्टुडेण्ट फैडरेशन ऑफ इण्डिया’ साम्यवादी दल तथा ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्’ भारतीय जनता पार्टी से सम्बद्ध संगठन हैं।
(v) युवक-संगठन (Youth Organization) – भारत में युवक काँग्रेस, युवा जनता और युवा भारतीय जनता मोर्चा आदि ऐसे युवक-संगठन सक्रिय हैं, जो विभिन्न राजनीतिक दलों से सम्बन्धित हैं।
(vi) महिला संगठन (Women Organization) – भारतीय महिलाओं का सर्वाधिक लोकप्रिय संगठन ‘आल इण्डिया वूमेन्स कांग्रेस’ है। हिन्दू कोड बिल पारित होते समय इस संगठन ने दबाव समूह के रूप में सक्रियता प्रदर्शित की थी। अब यह संगठन कमजोर हो गया है। विभिन्न राजनीतिक दलों की महिला शाखायें महिला संगठन के रूप में सक्रिय हो

रही हैं। वर्तमान में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन महिलाओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संगठन है। दहेज प्रथा, बलात्कार, शासन में महिलाओं की भागीदारी आदि समस्याओं के समाधान की ओर ध्यान आकृष्ट करने की दिशा में यह संगठन सराहनीय कार्य कर रहा है।

(6) राजनीतिक दबाव-समूह (Political Pressure Group) – सैद्धान्तिक रूप से राजनीतिक दल दबाव-समूह नहीं हो सकते, क्योंकि दबाव-समूह के पारिभाषिक विवेचन के अनुसार दबाव-समूह का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं होता, जबकि राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने के लिये ही प्रयत्नशील रहते हैं, परन्तु व्यावहारिक रूप में साम्प्रदायिक, धार्मिक, प्रान्तीय, क्षेत्रीय और भाषायी आधारों पर गठित तेलुगुदेशम, अकाली दल, असम गण संग्राम परिषद् नेशनल कॉन्फ्रेन्स और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, उत्तराखण्ड क्रान्ति दल, जी० एन० एल० एफ० आदि दल राजनीतिक दबाव-समूहों के रूप में ही कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त, बड़े राजनीतिक दलों में क्षेत्रीय, जातीय, राजनीतिक, धार्मिक एवं साम्प्रदायिक विचारधाराओं से प्रभावित लोग होते हैं जो दबाव-समूह के रूप में ही कार्य करते हैं।

दबाव समूहों के साधन और कार्य प्रणाली (Means and Working of the Pressure Groups) अपने उद्देश्यों की पूर्ति और स्वयं को प्रभावशाली बनाने के लिये दबाव-समूह जिन साधनों का प्रयोग करते हैं, उनमें से प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं-

(1) प्रचार-प्रसार (Propaganda & Publicity) – दबाव-समूह अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रचार-प्रसार के उन समस्त साधनों का प्रयोग करते हैं, जिनके द्वारा जनमत को अपने पक्ष में किया जा सके। इसके लिये वे समाचार-पत्र, रेडियो, दूरदर्शन, चल-चित्र आदि प्रसार-प्रचार के साधनों का प्रयोग करते हैं और सार्वजनिक सम्बन्धों के विशेषज्ञों की सहायता लेकर, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, विज्ञापन देना, समय-समय पर गोष्ठियों का आयोजन करना और आँकड़ों का प्रकाशन करना उनकी कार्य-प्रणाली होती है।

(2) राजनीतिक दलों में सम्पर्क (Contact Within Political Parties) – दबाव-समूह लगभग समस्त प्रभावशाली दलों से सम्पर्क रखते हैं। सामान्य निर्वाचन के समय प्रत्याशियों या दलों को चन्दे के रूप में धन देते हैं। निर्वाचन में अपने हित विरोधी प्रत्याशियों को हराने के लिये अप्रत्यक्ष रूप से प्रयास करते हैं।

(3) प्रत्याशियों के मनोनयन में रुचि (Interest in Nomination of Candidates )- दबाव-समूह सामान्य निर्वाचन में प्रत्याशियों के मनोनयन में विशेष रुचि लेकर अपने हितों की रक्षा करने वाले व्यक्तियों को ही राजनीतिक दलों द्वारा मनोनीत करवाते हैं।

(4) जन-प्रतिनिधियों से सम्पर्क (Contact With Public Representatives) – दबाव समूह जन-प्रतिनिधियों की समस्त गतिविधियों पर अपनी दृष्टि रखते हैं और व्यक्तिगत सम्पर्क करके या अन्य माध्यमों से उनके दृष्टिकोण को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं, जिससे वे उनकी हित रक्षा करने के लिये प्रेरित हो सकें। अपने एजेण्टों के माध्यम से सभा कक्ष में जाकर किसी सरकारी विधेयक पर होने वाले मतदान को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।

(5) विधि निर्माताओं को प्रभावित करना (To Influence Law-making Personnels) – दबाव-समूहों के एजेण्ट इस प्रकार के आँकड़े एवं सूचनायें प्रसारित करते हैं, जो उनके हितों की रक्षा करते हों और राजनीतिक दुष्प्रभावों को स्पष्ट करते हों। इस प्रकार ये एजेण्ट विधि-निर्माताओं को प्रभावित करके अपने वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करने के प्रयास करते हैं।

(6) रिश्वत, बेईमानी एवं अन्य उपाय (Bribe, Dishonesty and Other Means) – अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये दबाव समूह रिश्वत व घूस से भी नहीं कतराते। बेईमानी के तरीकों का भी वे यथासम्भव प्रयोग करते हैं तथा विरुद्ध हितों को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिये बदनाम भी करा देते हैं। कहीं-कहीं तो आवश्यकतानुसार सुरा-सुन्दरी का भी प्रयोग करते हैं। इन साधनों का प्रयोग करने में व्यावसायिक दबाव-समूह अन्य दबाव-समूहों से बहुत आगे रहते हैं। इनके एजेण्ट धन व्यय करके सत्तारूढ़ दल के शीर्षस्थ राजनीतिज्ञों के परिवारजनों और सम्बन्धियों तथा अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारियों को अधिक वेतन पर नियुक्त करके भी अपने हितों की रक्षा के लिये साधन जुटाते हैं।

(7) शान्तिपूर्ण आन्दोलन (Peaceful Movement ) – अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु दबाव समूह प्रायः शान्तिपूर्ण गाँधीवादी आन्दोलन के मार्ग पर चलते हैं। इसके लिये वे सत्याग्रह, अनशन, सांकेतिक हड़ताल, कलमबन्द या चक्का जाम हड़ताल, काली पट्टियाँ बाँधकर विरोध प्रदर्शन, जुलूस निकालना, प्रदर्शन करना और सम्बन्धित प्रमुख अधिकारियों का घेराव करना आदि साधनों को अपनाते हैं।

(8) हिंसा (Violence) – लोकतन्त्र में हिंसा और तोड़-फोड़ करना अवैधानिक है, परन्तु कभी-कभी जब शान्तिपूर्ण आन्दोलनों के द्वारा दबाव -समूहों के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो पाती तो वे हिंसा और तोड़-फोड़ के साधनों को भी अपनाते हैं। सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करना, राजकीय अधिकारियों एवं संसदीय अधिकारियों पर पथराव या उनके साथ मार-पीट करना, आतंक का वातावरण बनाना, विमानों का अपहरण करना, निर्दोषों की हत्या करना आदि अवैधानिक एवं अमानवीय साधनों का दबाव -समूहों द्वारा प्रयोग किया जाता है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी दबाव-समूहों द्वारा की जा रही हिंसात्मक एवं तोड़-फोड़ की गतिविधियों इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं।

 

 

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