भारत में ‘गरीबी’ पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए

भारत में ‘गरीबी’ पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए। (Write an short essay on ‘Poverty in India.)
                                            अथवा
भारतीय प्रजातन्त्र के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक के रूप में गरीबी की विवेचना कीजिए। (Discuss Poverty as a Socio-economic determinant of Indian
Democracy)
उत्तर- अंग्रेजों के उपनिवेशवादी शोषण के फलस्वरूप स्वतन्त्रता के समय भारत विश्व के सर्वाधिक निर्धन देशों में से एक था। यहाँ धनी व निर्धन के मध्य बहुत असमानतायें थी। अतः निर्धनता एक विकराल सामाजिक-राजनीतिक समस्या थी। स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने जनता की आय के स्तर को ऊँचा उठाने के लिये तथा असमानताओं को दूर करने के अनेक प्रयास किये। इन प्रयासों में कुछ सफलता भी मिली लेकिन अभी भी जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निर्धनता की दयनीय अवस्था में जीवनयापन कर रहा है।

भारत में गरीबी या निर्धनता(Poverty in India)
भारत एक विकासशील देश है। यहाँ के निवासियों का जीवन स्तर बहुत ही निम्न है। आज इसकी प्रमुख समस्या व्यापक निर्धनता है। भारत आर्थिक दृष्टि से अब भी पिछड़ा राष्ट है। यद्यपि पंचवर्षीय योजनाओं एवं ग्रामीण विकास कार्यक्रम के माध्यम से गरीबी दूर करने हेतु व्यापक प्रयास किए गए हैं तथापि इन प्रयासों के बावजूद आज भी 30% लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। 1993 में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट ‘ट्रेण्ड्स इन डेवलपिंग इकॉनामीज’ में कहा गया है कि साठ के दशक में भारत में जहाँ 50 प्रतिशत से अधिक लोग निर्धन थे, वहाँ यह अनुपात अस्सी के दशक के अन्त तक घटकर 30 प्रतिशत से भी कम रह गया। ऐसा अनुमान है कि भारत की 23 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या अपने दिन भर में एक समय का भोजन ही जुटा पाती है। देश की 50 प्रतिशत जनसंख्या क्रयशक्ति की न्यूनतता के कारण कुल उत्पादित वस्त्र के केवल 9 प्रतिशत भाग और कुल उत्पादित अनाज के केवल 34 प्रतिशत भाग का ही उपभोग कर पाती है। भारत में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले व्यक्तियों की संख्या सं० रा० अमेरिका, जापान, कनाडा की कुल जनसंख्या से भी अधिक है।
भारत की अधिकांश निर्धन जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण निर्धनों की दो मुख्य श्रेणियों हैं— (i) लघु और सीमान्त कृषक, (ii) भूमिहीन श्रमिक। ये दोनों श्रेणियाँ परस्पर-व्यापी हैं; क्योंकि अनार्थिक जोतों वाले बहुत से किसान भी कृषि-श्रमिकों के रूप में काम करते हैं। ग्रामीण निर्धनता का मुख्य कारण खुली बेरोजगारी न होकर निम्न उत्पादकता वाला रोजगार है। शहरी क्षेत्रों में निर्धनता की समस्या ग्रामीण निर्धनता की बाढ़ का ही परिणाम है। शहरी निर्धन या तो स्वनियोजित व्यक्ति हैं या असंगठित उद्योगों और सेवा-क्षेत्रों में संलग्न व्यक्ति। जहाँ स्वनियोजित निर्धनों का साधन-आधार कमजोर है, वहीं मजदूरी-रोजगार पर आश्रित निर्धनों को मिलने वाले भुगतान का स्तर नीचा है। योजना आयोग ने बेरोजगारी, अल्प-रोजगार और कमजोर साधन-आधार को निर्धनता का मुख्य कारण माना है।
निर्धनता की समस्या पर विकास-नियोजन का प्रभाव- निर्धनता की समस्या यथार्थ में भारत की जनसंख्या और उसके आर्थिक संसाधनों के बीच असन्तुलन की समस्या है। भारत संसार का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। इसके संसाधन (भूमि, खनिज पदार्थ, पूँजी आदि) इतनी विशाल जनसंख्या की आवश्यकतायें पूरी करने के लिए अपर्याप्त हैं। भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ भी रही है, जो हमारे अधिकांश विकास प्रयत्नों को निष्फल बना देती है। इसीलिए भारत में प्रति व्यक्ति आय तथा प्रतिव्यक्ति वस्तुओं एवं सेवाओं की उपलब्धता का स्तर नीचा बना हुआ है।

भारत में निर्धनता या गरीबी के कारण (Causes of Poverty in India)
भारत में निर्धनता या गरीबी के लिए प्रमुख रूप से निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं-
(1) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि – देश में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि से भी राष्ट्रीय आर्थिक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कुल उत्पादन में वृद्धि होने पर भी प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में अधिक आय नहीं आती। इससे लोगों का जीवन स्तर ऊपर नहीं उठ पाता, जिससे गरीबी की समस्या दिन-प्रतिदिन गम्भीर रूप धारण करती जा रही है।

(2) आय का असमान वितरण— देश में उत्पादन एवं आय का वितरण भी असमान है। आय का अधिकांश भाग बड़े लोगों के हाथ में पड़ता है। बहुत कम हिस्सा करोड़ों गरीबों को मिलता है। इस कारण निर्धन और निर्धन होता जाता है। आय के वितरण के बारे में कहा जाता है कि 100 रुपया 100 व्यक्तियों को मिलता है पर कैसे ? 33 रु० पूँजीपति को मिलते हैं, 66 रु० 66 मध्यम वर्ग के व्यक्तियों को मिलते हैं और शेष एक रुपया 33 गरीब व्यक्तियों में बंटता है। यही गरीबी का अभिशाप है।

(3) पिछड़ी हुई खेती- देश की 70% जनता कृषि एवं कृषि कार्य में लगी हुई है। दुर्भाग्य से कृषि की दशा अत्यन्त पिछड़ी हुई है। छोटे-छोटे बिखरे खेत, बीज, खाद, सिचाई के साधनों में कमी, दूषित भूमि व्यवस्था, विभिन्न तकनीकी कारणों से खेती की दशा अत्यन्त पिछड़ी हुई है। इस कारण खेती से आय कम होती है और कृषक लोगों की आय अत्यन्त ही कम है।

(4) सन्तुलित अर्थ-व्यवस्था का अभाव — कृषि प्रधान देश होने के नाते देश का पर्याप्त औद्योगिक विकास नहीं हुआ है। यहाँ सन्तुलित अर्थ-व्यवस्था का अभाव है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि कृषि प्रधान देश औद्योगिक देशों की तुलना में अधिक गरीब होता है।

(5) प्रति एकड़ कम उपज- हमारे देश में प्रति एकड़ उपज भी अत्यन्त कम है। इसके प्रमुख कारण – आधुनिक तकनीकी का अभाव, वर्षा की अनिश्चितता, पुराने ढंग के तरीके व औजार, उन्नत बीजों का अभाव, मिट्टी का कटाव, किसानों की ऋणप्रस्तता, पौधों के रोग, आदि हैं। इस कारण उपज कम होती है। किसानों की इससे उन्नति नहीं हो पाती।

(6) कुटीर उद्योगों का विनाश- औद्योगिक क्रान्ति के कारण देश के कुटीर उद्योगों का विनाश हो गया। लोग मिलों की बनी वस्तुयें सस्ती और सुन्दर होने के कारण ज्यादा खरीदने लगे, फलस्वरूप कुटीर उद्योग ठप्प हो गए। उनमें कार्य करने वाले असहाय हो गए। वे काम के अभाव में गरीब से अधिक गरीब होते चले गए।

(7) पूँजी का अभाव – अत्यन्त कम आय होने के कारण देश के निवासी पर्याप्त बचत के नहीं कर पाते। बचत के अभाव में पूँजी का निर्माण नहीं होता। इसके कारण देश के प्राकृतिक साधनों का उचित दोहन नहीं हो पा रहा है।

(8) अशिक्षा – गरीबी का एक महत्वपूर्ण कारण अधिकांश जनता का अशिक्षित होना है। अधिकांश जनता रूढ़िवादी है और भाग्य के भरोसे बैठी रहती है। ये गरीबी के लिए अपने भागय को कोसते हैं, इसलिए अपनी गरीबी को दूर करने का किंचित भी प्रयास नहीं करते। गांवों के लोग अशिक्षा के कारण अनेक अवसरों पर अत्यधिक फिजूलखर्ची भी करते हैं।

(9) कीमतों में लगातार वृद्धि- पिछले दो दशकों से वस्तुओं की कीमतों में अत्यधिक बढ़ोत्तरी हो गई है। गरीब तो क्या मध्यम वर्ग का इन्सान भी मूल्य वृद्धि से अत्यधिक परेशान है। गरीबों की हालत का तो कहना ही क्या ?

(10) अन्य कारण- अन्य कारणों में यातायात के साधनों का अभाव व अपर्याप्त विकास, प्राकृतिक साधनों का अपर्याप्त होना, बड़े उद्योगों का अपर्याप्त विकास, सरकार की ओर से कम सुविधायें, सामाजिक रीति-रिवाज और राजनीतिक कारण भी सम्मिलित है।

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गरीबी या निर्धनता को दूर करने के उपाय

       गरीबी को दूर करने के हेतु निम्नलिखित उपाएं सुझाये जा सकते हैं या निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहियें-
(1) कृषि का पिछड़ापन दूर करना- विभिन्न कारणों से हमारे देश की कृषि की दशा अत्यन्त पिछड़ी हुई है। इसको दूर करने के लिए हमें सिंचाई को समुचित व्यवस्था करनी होगी। उत्तम बीज, उन्नत किस्म, पर्याप्त रासायनिक खाद, चकबन्दी, सहकारी कृषि, भूमि व्यवस्था में सुधार, कृषि शिक्षा का विस्तार आदि उपाय करने होंगे।
(2) जनसंख्या पर कठोर नियन्त्रण- आज भारत की जनसंख्या एक अरब से अधिक है। हमें इस जनसंख्या वृद्धि पर कठोर नियन्त्रण लगाना अनिवार्य सा हो गया है। इस पर नियन्त्रण न होने से देश में गरीबी का कभी अन्त नहीं हो सकता।
(3) पूँजी निर्माण में वृद्धि- विभिन्न उपायों द्वारा पूंजी के निर्माण की गति देश में तेजी से होनी चाहिए। यह तभी सम्भव होगा जब हम आय का वितरण समानता से करेंगे।
(4) औद्योगिक विकास—उद्योगों की उन्नति हेतु पूँजी की व्यवस्था की जाए तथा आवश्यक कुशल मजदूरों की फौज के लिए औद्योगिक शहरों में ITI खोले जायें, तभी देश के उद्योगों का विकास सम्भव होगा।
(5) योजनाबद्ध कार्यक्रम- गरीबी की समस्या का एक उपाय देश में गरीबी को योजनाबद्ध कार्यक्रम से दूर करना है। सरकार ने इस ओर ध्यान देना शुरू किया है।
(6) कुटीर उद्योगों का विकास— गाँवों की उन्नति का मूल-मन्त्र कुटीर उद्योगों का विस्तार एवं विकास करना है। अगर गांवों में ये उद्योग खोल दिये जावें तो ग्रामीण जीवन उन्नत होगा और देश खुशहाली की ओर बढ़ेगा।
(7) बड़े पैमाने के उद्योगों का विकास- देश में औद्योगीकरण की गति बढ़ानी होगी जिससे हम उद्योगों की वस्तुओं का निर्यात कर विदेशी मुद्रा कमा सकें। उद्योग ऐसे खोले जायें जो रोजगारपरक हों।
(8) अन्य उपाय- अन्य उपायों में प्राकृतिक साधनों का उचित दोहन, यातायात के साधनों का विकास, ग्रामीण उन्नति को प्राथमिकता, परिवार नियोजन, भूमि कानून में सुधार, कृषि शिक्षा आदि उपाय सम्मिलित किए जा सकते हैं।
भारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं तथा ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के माध्यम से भी गरीबी उन्मूलन हेतु व्यापक प्रयास किये जा रहे हैं। ये प्रयास कुछ नगण्य या उपलब्धियाँ नगण्य रही हैं लेकिन ये इस ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि निर्धनता की दिशा में कुछ स्थितियाँ सुधरी हैं।

 

 

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