फासीवाद के गुण-दोषों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।

फासीवाद के गुण-दोषों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।
                                अथवा
फासीवादी विचारधारा के गुण-दोषों का वर्णन कीजिए ।

फासीवाद के गुण
(Merits of Fascism)
फासीवाद के गुण अग्रलिखित हैं-

(1) शासन की कुशलता (Efficiency of Fascism) – फासीवाद एक दृढ़ रीति का समर्थक था इसलिए प्रशासन संबंधी जो भी नियम लागू किया गया उसमें दृढ़ता पर विशेष बल दिया गया । इस बात पर पूर्ण विश्वास किया जाता था कि एक योग्य शासक अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहकर बड़ी सरलता से विरोधियों को नतमस्तक कर सकता है ।

(2) जटिल समस्याओं का समाधान (Solution of Complicated Problems) – फासीवाद अधिनायकवाद में विश्वास करता था । उनमें एक ही दल की स्वेच्छाचारिता थी जिसके कारण लोकतंत्र शासन में पाई जाने वाली समस्याओं का नाम नहीं था । एक दलीय पद्धति के कारण ही जटिलतम समस्याओं का समाधान किया जा सकता था ।

(3) संकटकाल के लिए उपयुक्त (Appropriate for Emergency) – फासीवाद में एकता संभव होती है । वहां पर एक ही व्यक्ति के आदेशों का पालन किया जाता है । उस व्यक्ति की पूजा की जाती है । अतएव संकटकालीन अवस्था में खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि किस व्यक्ति के नेतृत्व में कार्य किया जाए ।

(4) आवश्यकताओं की पूर्ति (Fulfilment of Requirements) – फासीवादी विचारधारा के अनुसार राज्य का प्रथम उद्देश्य रोटी, कपड़ा तथा आवास की व्यवस्था करना है । इस व्यवस्था को करने के बाद वह राज्य की समस्याओं पर विजय पा सकता है तथा क्रांति के मूल कारणों का प्रयोग कर सकता है ।

फासीवाद के दोष
(Demerits of Fascism)
फासीवाद के दोष निम्नलिखित हैं –

(1) शक्ति पर आधारित (Based on Force) – फासीवाद ने अपनी समस्त समस्याओं का समाधान करने के लिए शक्ति का आश्रय लिया । अपने विरोधियों का दमन करने, समाज में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने, आक्रमण को रोकने, राष्ट्रीय गौरव की वृद्धि करने आदि कार्यों के लिए शक्ति एक साधन था । शक्ति द्वारा वास्तविक शांति स्थापित करना असंभव है । भय तथा शक्ति सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का अस्थायी ढंग से सुधार करते हैं । स्थाई आधार तो न्याय और औचित्य की भावना ही हो सकती है । अतः फासिस्टवादियों का शक्ति में पूर्ण विश्वास करना सत्य से परे है ।

(2) लोकतांत्रिक विचारों की उपेक्षा (Democratic Ideas Neglected) – वस्तुत: यह शासन का स्थाई स्वरूप नहीं हो सकता है । यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वअनुशासन, व्यक्तियों के मध्य क्षमता, लोकतंत्र आदि सिद्धांतों को हेय दृष्टि से देखता है । इटली तथा जर्मनी के शासकों ने जनता को क्षणिक गौरव और समृद्धि अवश्य प्रदान की किंतु सर्वाधिकारवादी राज्य में तानाशाही के अधीन व्यक्तित्व को समाप्त कर दिया । व्यक्तियों के विकास में विवेक के लिए स्थान न रह गया । यंत्रवत आज्ञा पालन के अतिरिक्त उनमें विकास की प्रेरणा भी शेष न रह गई । अत्याचार और दमन की भूमिका में कला, साहित्य तथा संस्कृति के विकास की कल्पना निरर्थक ही कही जा सकती है ।

(3) युद्ध का महत्व (Importance Given to War) – फासिज्म युद्ध का समर्थक है । अंतर्राष्ट्रीयता में उसका कोई विश्वास नहीं । युद्ध के द्वारा अन्य राज्यों को आत्मसात करने की प्रवृत्ति ही उसमें रही । परिणामस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध और उसमें स्वयं फासिज्मवाद का विनाश हो गया ।

(4) सर्वाधिकारवादी राज्य (Totalitarian State) – फासीवाद राज्य में प्रत्येक व्यक्ति को एक कार्य सौंपा जाता है तथा उस पर उस बात की कड़ी देख-रेख रखी जाती है कि वह इस कार्य को किस ढंग से तथा कितनी मात्रा में पूरा करता है । समाज में अपराधी तथा गम्भीर दोषयुक्त व्यक्तियों के लिए तो यह व्यवस्था उपयुक्त हो सकती है, किंतु सामान्य एवं उत्कृष्ट योग्यता रखने वाले मनुष्यों के लिए समुचित नहीं है । किसी राष्ट्र के सार्वजनिक और सांस्कृतिक जीवन का यदि इस प्रकार कीसी विशेष केन्द्र से भारी दमन व्यवस्था के साथ संचालन किया जाता है तो यह इसके साहित्य, कला, विज्ञान और विद्या के विकास की संभावना को समाप्त कर देता है । राज्य के हाथों में सारी शक्ति दे देने से मनुष्य का व्यक्तित्व ही नष्ट हो जाता है तथा वह राज्य का अनुचर मात्र ही रह जाता है ।
आइंसटीन ने अपने लेख ‘विज्ञान और अधिनायकवाद’ में अधिनायकवाद के दुष्परिणाम का विवेचन करते हुए लिखा है कि, “एक अधिनायकवाद का तात्पर्य सब दशाओं में प्रतिबंध लगाना है । इसका परिणाम सभी कार्यों को बेकार बनाना है । विज्ञान भाषण की स्वतंत्रता के वातावरण में ही उन्नति कर सकता है ।”

(5) प्रगति का ह्रास (Decline of the Progress) – अधिनायकवाद साहित्य और विज्ञान की प्रगति को रोक सकता है । अन्य बहुत सी भीषण बुराइयां उत्पन्न कर देता है । इसमें लोगों को दण्ड के भय से बलपूर्वक कार्य करने की आदत डाली जाती है । इसके परिणामस्वरूप उनमें स्वेच्छापूर्वक कानून पालन करने की तथा अपने ऊपर अनुशासन रखने की वांछनीय मनोवृत्ति लुप्त हो जाती है।

(6) भय तथा दबाव का दुष्परिणाम (Evil Consequences of Terror and Force) – फासीवाद व्यवस्था में भय तथा दबाव के साधनों पर अत्यधिक बल देने से नागरिकों के मन और आत्मा का समुचित विकास नहीं हो पाता । वे डण्डे से हांके जाने वाले पशुओं के समान बन जाते हैं । उनकी स्वाभाविक चेतना, पुरुषार्थ तथा उधम की भावना क्षीण हो जाती है । वे अपनी उन्नति के लिए अधिनायक या नेता पर ही निर्भर हो जाते हैं ।

(7) अधिनायकों का स्वार्थ (Selfish Interest of the Dictators) – फासीवाद व्यवस्था में अधिनायक अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए शांति काल में भी आतंक और भय तथा युद्ध के उन्माद का वातावरण बनाए रखते हैं । देश में अपनी स्थिति सुदृढ़ बनाए रखने के लिए वे युद्धों पर बल देते हैं और देश को सर्वनाश के पथ पर अग्रसर करते हैं ।

(8) व्यक्ति पूजा (Hero Worship) – अधिनायकवाद में नेता को देवता मानने के कारण उसकी भूलों का उस प्रकार संशोधन नहीं हो सकता, जैसा लोकतंत्र द्वारा संभव है । उदाहरणार्थ, युद्ध प्रारंभ होते ही जब इंग्लैंड की कमजोरियां जनता के समक्ष आई तब ब्रिटिश जनता एवं संसद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री चेम्बरलेन को इनके लिए उत्तरदाई ठहराया । इसके परिणामस्वरूप चेम्बरलेन को त्याग पत्र देना पड़ा तथा चर्चिल प्रधानमंत्री बना । उसने युद्ध का कुशलतापूर्वक संचालन करते हुए ब्रिटेन को विजयी बनाया । अधिनायकवादी देशों में ऐसा परिवर्तन संभव नहीं है; उदाहरणार्थ, हिटलर ने रूस पर आक्रमण करके तथा दूसरा मोर्चा खोलकर भारी भूल की, किंतु जर्मनी में उसे अपने पद से हटाने का साहस जर्मनी की जनता में नहीं था । अंत में इसका दुष्परिणाम उसे भोगना पड़ा ।

(9) जर्मनी व इटली में अधिनायकवाद का दुष्परिणाम (Evil Results of Dictatorship in Germany and Italy) – इन दोनों में अधिनायकवाद का अंतिम परिणाम इतना भीषण था कि विध्वंस, विनाश और रक्त-पात के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं रहा । अधिनायकवाद ने इनको जितना लाभ पहुंचाया था उससे कहीं अधिक हानि हुई ।

(10) इतिहास अधिनायकवाद के विरुद्ध (History against Dictatorship) – आलोचकों का मत है कि इतिहास की साक्षी भी अधिनायकवाद के प्रतिकूल है । फ्रेंच राजाओं, रूसी जारों, तुर्की के सुल्तानों तथा चीनी सम्राटों के निरंकुश शासन के विवरणों से यह स्पष्ट है कि इनमें भ्रष्टाचार और कुशासन का प्रभुत्व रहा, प्रजा सदैव पीड़ित और दलित रही । इससे जनता को लाभ कम और हानि अधिक पहुंची । जर्मनी और इटली के अधिनायकवाद शासकों ने यह विस्मृत कर दिया कि युद्ध के बाद सभी देशों में विषम समस्याएं उत्पन्न हो गए थीं । ब्रिटेन, फ्रांस आदि में लोकतंत्रों ने बड़ी सफलतापूर्वक अपनी मुद्रा पद्धतियों को ठीक किया, बाजारों को संतुलित किया तथा सार्वजनिक सुशासन की व्यवस्था की ।

(11) पाशविक शक्ति पर आधारित (Based of Brutal Force) – फासीवाद के द्वारा इटली में स्थापित अधिनायकवाद पाशविक शक्ति पर आधारित था । इटली के दो महान् विचारकों ने उसकी कड़ी आलोचना करते हुए मुसोलिनी के पतन से बहुत पहले 1912 में ही इसके अवश्यम्भावी विध्वंस की धोषणा कर दी थी । यह युक्ति फासीवाद पर पूर्ण रुप से लागू होती है । इसका अभ्युदय और उत्कर्ष हिंसा और शक्ति के बल पर हुआ तथा इसकी समाप्ति भी स्वदेशवासियों द्वारा मुसोलिनी को गोली मार देने से तथा इटली के विश्व युद्ध में पराजित होने से हुई ।

 

 

 

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