प्रजातंत्र के प्रकार तथा गुण एवं दोष की आलोचनाएं।

प्रजातंत्र के प्रकार तथा गुण एवं दोष की आलोचनाएं।
प्रजातंत्र के प्रकार(Forms of Democracy)

प्रजातंत्र मुख्य रूप से दो प्रकार का होता हैं-
(1) प्रत्यक्ष प्रजातंत्र (Direct Democracy)- जब जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से शासन कार्यों में भाग लिया जाता है तो उसे प्रत्यक्ष लोकतंत्र कहा जाता है अर्थात् प्रत्यक्ष प्रजातंत्र में राज्य की इच्छा जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से एक सभा में प्रकट की जाती है न कि निर्वाचन प्रतिनिधियों द्वारा। गार्नर लिखता है कि- “प्रत्यक्ष प्रजातंत्र केवल थोड़ी जनसंख्या वाले राज्यों में सफल हो सकता है” क्योंकि बड़ी संख्या के लिए एक स्थान में एकत्र होना असंभव है। प्रत्येक प्रजातंत्र में जनता प्रत्यक्ष रूप से कानून बनाती है, सरकारी कर्मचारियों को नियुक्त करती है तथा युद्ध और सन्धि का निर्णय करती है यह शासन प्राचीन यूनानी नगर-राज्यों में पाया जाता था। आधुनिक युग में प्रथा संभव नहीं है।

(2) अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र (Indirect Democracy)- जब जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन संबंधी कार्यों को करती है तो इसे अप्रत्यक्ष लोकतंत्र कहा जाता है।
(i) इस शासन में राज्य की इच्छा जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा प्रकट की जाती है। नागरिक देश के शासन में प्रत्यक्ष भाग नहीं लेते।
(ii) जनता यथार्थ में विधान मंडलों के सदस्यों को तथा कार्यपालिका के सदस्यों को चुनती है। कर्मचारियों का चुनाव नहीं होता। इनकी नियुक्ति कार्यपालिका करती है।
(iii) प्रत्यक्ष प्रजातंत्र में राज्य तथा शासन में कोई भेद नहीं रहता। परन्तु अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र में राज्य तथा शासन दोनों अलग-अलग रहते हैं। (iv) गार्नर के शब्दों में “अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र में जनता अप्रत्यक्ष रूप से शासन कार्य को चलाती है।” गिलक्राइस्ट के अनुसार, “अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र कुलीन तंत्र तथा प्रजातंत्र के सिद्धांतों का सम्मिश्रण है।”

प्रजातंत्र के गुण(Merits of Democracy)
आधुनिक युग में लोकतंत्र को सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली माना जाता है। इस शासन-व्यवस्था के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

(1) लोक-कल्याणकारी शासन (Welfare Government)- लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में जनता के प्रतिनिधियों द्वारा शासन किया जाता है। जनता के प्रतिनिधि जनता की इच्छाओं, भावनाओं और आवश्यकताओं से पूर्व परिचित होते हैं। साथ ही उन्हें आगामी चुनाव में सफलता के लिए जनता पर निर्भर रहना पड़ता है। अतः उनके द्वारा लोक-कल्याणकारी कानूनों का ही निर्माण किया जाता है। जनता के प्रति उत्तरदाई होने के कारण शासक वर्ग जनता के हितों की उपेक्षा नहीं कर सकता। लोक कल्याणकारी शासन लोकतंत्र का विशिष्ट गुण है।

(2) कुशल शासन (Able Administration)- अन्य शासन-व्यवस्थाओं की अपेक्षा लोकतंत्र सर्वाधिक कुशल शासन है। इसमें सबसे अधिक शीध्रतापूर्वक तथा आवश्यक रूप से जनहित के कार्य किए जाते हैं। गार्नर के शब्दों में, “लोकप्रिय निर्वाचन, लोकप्रिय नियंत्रण और लोकप्रिय उत्तरदायित्व की व्यवस्था के कारण दूसरी किसी भी शासन व्यवस्था की अपेक्षा यह शासन अधिक कार्यकुशल होता है।”

(3) सार्वजनिक शिक्षण (Public Education)- लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में जनता को प्रशासनिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शिक्षण प्राप्त होता है। लोकतंत्र में जनता को मताधिकार प्राप्त होता है तथा जनता का शासन पर नियंत्रण होता है। अतः जनता स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र में रुचि लेने लगती है। बन्र्स के शब्दों में, “सभी साधन शिक्षा के साधन होते हैं किंतु सबसे अच्छी शिक्षा स्वशिक्षा है, इसलिए सबसे अच्छा शासन स्वशासन है, जिसे लोकतंत्र कहते हैं।”

(4) उत्तरदाई शासन (Responsible Government)- लोकतंत्र में शासन जनता के प्रति उत्तरदाई होता है। विरोधी सदस्य, जागरूक प्रेस तथा जनमत का नियंत्रण, उसे सदैव सजग करते रहते हैं। लोकतंत्र में शासन पर संविधान, संसद तथा अन्तिम रूप से जनता का नियंत्रण होता है।

(5) स्वतंत्रता की सुरक्षा (Security of Liberty)- स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। लोकतंत्र इस बात पर विश्वास करता है कि सभी लोगों को विचार, भाषण, लेखन, सम्मेलन, संगठन और आवागमन की अधिक से अधिक स्वतंत्रताएं प्राप्त होनी चाहिए। ये स्वतंत्रताएं मनुष्य के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध होती हैं। अन्य शासन व्यवस्थाओं की अपेक्षा लोकतंत्र में मनुष्यों को सर्वाधिक स्वतंत्रताएं प्राप्त होती हैं।

(6) समानता का पोषण (Developing of Equality)- समानता लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। लोकतंत्र में सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अवसर प्राप्त होते हैं। सभी व्यक्तियों को समान रूप से शासन में भाग दिया जाता है तथा सभी को समान रुप से लाभ प्राप्त होते हैं। लोकतंत्र समानता पर आधारित सर्वाधिक श्रेष्ठ शासन व्यवस्था है।

(7) क्रांति से सुरक्षा (Security from Revolution)- लोकतंत्र में क्रांति का भय नहीं रहता है। यदि शासकवर्ग द्वारा जनता की इच्छाओं के अनुरूप कार्य नहीं किया जाता है या अनुचित आचरण किया जाता है तो जनता उन्हें एक निश्चित समय के बाद और विशेष परिस्थितियों में पहले भी हटा सकती है। अतः क्रांति की संभावना ही नहीं रहती। गिलक्राइस्ट के शब्दों में, “लोकप्रिय शासन सार्वजनिक सहमति का शासन है, अतः स्वभाव से ही वह क्रांतिकारी नहीं हो सकता।”

(8) जनता का नैतिक उत्थान (Moral Rise of Public)- लोकतंत्र व्यक्ति के व्यक्तित्व और उनके नैतिक चरित्र को उच्चता प्रदान करता है। यह जनता को राजनीतिक शक्ति प्रदान करता है। जिससे जनता में आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की भावना उत्पन्न होती हैं। ब्राइस के शब्दों में, “राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व की शान बढ़ जाती है और वह स्वभावत: उस कर्तव्य भावना के उच्चतर स्तर तक उठ जाता है।” मिल के शब्दों में, ” यह किसी भी अन्य शासन की अपेक्षा उच्च ओर श्रेष्ठ राष्ट्रीय चरित्र का विकास करता है।”

(9) देशभक्ति की भावना (Spirit of Patriotism)- लोकतंत्र में सभी व्यक्तियों को शासन कार्यों में भाग लेने का अधिकार होता है। अतः प्रत्येक नागरिक अपने आपको शासन का भागीदार समझता है। फलस्वरूप नागरिकों में शासन तथा देश के प्रति श्रद्धा व लगाव की भावना उत्पन्न होती है, जिससे देशभक्ति की भावना का उदय होता है। मिल के अनुसार, “लोकतंत्र लोगों की देशभक्ति को बढ़ाता है क्योंकि नागरिक यह अनुभव करते हैं कि सरकार उन्हीं की उत्पन्न की हुई वस्तु है और अधिकारी उनके स्वामी न होकर सेवक है।” लेवेलिये के अनुसार, “फ्रांसीसी जनता क्रांति के बाद से ही फ्रांस से प्रेम करने लगी थी जबकि उन्हें देश की शासन-व्यवस्था में भाग मिला।”

(10) सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व (Representation of All Classes)- लोकतंत्र का यह विशिष्ट गुण है कि इसमें बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है क्योंकि इसमें जनता के प्रतिनिधियों का शासन होता है। लावेल के अनुसार, “पूर्ण लोकतंत्र में कोई भी यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसे अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिला।”

(11) सभी को प्रतिभा के विकास के अवसर (Equal Opportunity, of Development of Ability for All)- लोकतंत्र में सभी व्यक्तियों को मतदान के आधार पर प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित होने और सार्वजनिक पद ग्रहण करने का अधिकार होता है। इसमें सभी व्यक्ति अपनी योग्यताओं का परिचय दे सकते हैं। और अपनी प्रतिभा का विकास कर सकते हैं। लोकतंत्र में सभी को अपनी प्रतिभा के विकास का अवसर प्राप्त होता है। विल्सन के अनुसार, “मैं प्रजातंत्र में इसलिए विश्वास करता हूं कि वह प्रत्येक व्यक्ति की शक्ति को उन्मुक्त कर देता है।”

(12) सामाजिक गुणों का विकास (Development of Social Merits)- किसी देश की शासन व्यवस्था का नागरिकों के व्यवहार पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। शक्ति पर आधारित तानाशाही व्यवस्था लोगों में संघर्ष की भावना उत्पन्न करती है तो जन-इच्छा पर आधारित लोकतंत्र नागरिकों में सहिष्णुता, उदारता, सहानुभूति, स्नेह, व्यवहार कुशलता, विचार विनिमय और समझौते की भावना उत्पन्न करता है। लोकतंत्र में नागरिक पारस्परिक व्यवहार के आधार पर श्रेष्ठ सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

(13) विज्ञान का श्रेष्ठ प्रोत्साहक (Encouragement of Best Science Ability)- स्वतंत्रता के अभाव में विज्ञान का विकास असंभव है। लोकतंत्र में विज्ञान का बहुत अधिक अच्छे रूप में विकास संभव है क्योंकि राजतंत्र और कुलीन तंत्र की अपेक्षा लोकतंत्र में स्वतंत्रता का वातावरण विघमान रहता है। लोकतंत्र और विज्ञान के नैतिक मूल्य एक जैसे होते हैं तथा सत्य के संबंध में इनका दृष्टिकोण भी एक समान ही होता है। दोनों का विचार है कि अभिव्यक्ति और प्रयोग सत्य तक पहुंचने के सर्वश्रेष्ठ साधन हैं। मेयो के अनुसार, “एक स्वतंत्र समाज में वैज्ञानिक विकास की बहुत अधिक सम्भावनाएं हैं।”

(14) विश्व-शांति का समर्थक (Supporter of World Peace)- वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है- विश्व शांति की स्थापना। राजतंत्र, सैनिकतंत्र, फासिस्ट तानाशाही सरकारें तथा साम्यवादी सरकारें शक्ति पर आधारित विस्तारवादी नीति में विश्वास करती हैं जबकि लोकतंत्रीय सरकारें सह-अस्तित्व की नीति में विश्वास करती हैं। विश्व-बंधुत्व पर आधारित लोकतंत्र द्वारा विश्व-शांति की स्थापना की जा सकती है। बर्क के शब्दों में, लोकतंत्रीय आंदोलन शान्ति का आन्दोलन रहा है।”

प्रजातंत्र के दोष(Demerits of Democracy)
लोकतंत्र की आलोचना करते हुए टेलीरेण्ड इसे ‘दुस्टोन का कुलीनतंत्र’ (An Aristocracy of Black Guards) कहते हैं और लुडोविसी के अनुसार, “प्रजातंत्र मृत्यु की ओर ले जाता है।” लोकतंत्र में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

(1) अयोग्यता की पूजा (Cult of Incompetence)- लोकतंत्र इस मान्यता पर आधारित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को केवल एकमत ही दिया जाना चाहिए। लेकिन सभी व्यक्ति योग्यता की दृष्टि से समान नहीं होते हैं। इस प्रकार लोकतंत्र में गुण की अपेक्षा संख्या को अधिक महत्व दिया जाता है। कार्लाइल के अनुसार, “विश्व में एक योग्य व्यक्ति के साथ लगभग 9 मूर्ख होते हैं। सभी को समान राजनीतिक शक्ति देने का परिणाम मूर्खों की सरकार की स्थापना होता है।”
लैकी ने इसे निर्धनतम,अनभिज्ञता और अयोग्यतम लोगों की सरकार कहां है। इसके अतिरिक्त चिकित्सा, भवन निर्माण तथा शिक्षण के समान ही शासन कार्य भी एक कला है। लेकिन लोकतंत्र में शासन शक्ति ऐसे लोगों के हाथों में आ जाती है जो इस कला से पूर्णतया अनभिज्ञ होते हैं। न्यायाधीश जेम्स स्टीफन के अनुसार, “एक महान देश का अच्छे प्रकार से प्रशासन करने के लिए विशेष ज्ञान और उच्चतम योग्यताओं के निरंतर एवं समस्त प्रयोग की आवश्यकता होती है लेकिन लोकतंत्र तो अज्ञानी, अप्रशिक्षित और अयोग्य व्यक्तियों की सरकार होती है।” फैगेट के अनुसार, “लोकतंत्र अज्ञानता भरा शासन है।” एच० जी० वेल्स के अनुसार, “लोकतंत्र बुद्धिहीन तथा अज्ञानियों का शासन है।” हर्नशा के शब्दों में, “लोकतंत्र के नेताओं की स्थिति उन स्कूल मास्टरों जैसी होती है जिनकी नियुक्ति विद्यार्थियों की इच्छा से की जाती है और उन्हें विद्यार्थियों की ही इच्छा से हटाया भी जा सकता है।”

(2) दल प्रणाली का अहितकर प्रभाव (Harmful Impact of Party System)- यद्यपि राजनीतिक दलों का निर्माण सामान्यतया राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक कार्यक्रम के आधार पर किया जाता है किंतु व्यवहार में ये राजनीतिक दल येन केन प्रकारेण शासन-शक्ति प्राप्त करना ही अपना लक्ष्य निश्चित कर लेते हैं। राजनीतिक दलों ने वर्तमान में चुनावों को भ्रष्ट कर दिया है। चुनावों के समय राजनीतिक दलों के द्वारा किए गए विषैले प्रचार के कारण संपूर्ण देश का वातावरण ही विषाक्त हो जाता है। कार्लाइल के शब्दों में, “राजनीतिक दल कुछ व्यक्तियों के लाभ के लिए अनेक का पागलपन होता है- इन दलों के कारण धूर्त और बकवासी व्यक्तियों के हाथ में शासन-शक्ति आ जाती है।” बाइस के अनुसार, “राजनीतिक दल कपट को उत्साहित करते, स्वाभाविक आदर्शों को हीन बनाते और राष्ट्र के जीवन में फूट डालकर लूट का माल बांट सकते हैं।” राजनीतिक दल प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र के लिए आवश्यक होते हैं और राजनीतिक दलों की ये बुराइयां लोकतंत्र में आ जाती हैं।

(3) भ्रष्ट शासन-व्यवस्था (Corrupt Government System)- सैद्धांतिक स्थिति चाहे कुछ भी हो किंतु व्यवहार में लोकतंत्रीय शासन बहुत अधिक भ्रष्ट होता है। निर्वाचन में सत्तारूढ़ दल के सहायक लोगों को शासन की ओर से अनेक लाभ पहुंचाए जाए जाते हैं। जनता के प्रतिनिधियों द्वारा लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए अनेक अनुचित कार्य किए जाते हैं। ब्राइस ने अपनी पुस्तक ‘मारडन डेमोक्रेसीज’ के अध्याय ‘राजनीति में धन का बल’ में कहा है कि ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि निर्वाचकों, विधायकों, प्रशासकी अधिकारियों और न्यायाधिकारियों तक ने धन के लाभ के सामने सिर झुका दिया।

(4) सार्वजनिक धन और समय का अपव्यय (Misuse of Public Money and Time)- लोकतंत्र में समय और धन दोनों का अत्यधिक अपव्यय होता है। कानून निर्माण की लम्बी और जटिल प्रक्रिया के कारण कानूनों के निर्माण में वर्षों लग जाते हैं और कई बार तो कानून पारित होने तक कालातीत हो जातें हैं। ब्राइस ने लोकतंत्र की तुलना एक ऐसी समिति से की है जिसके अंतर्गत 7 सदस्यों द्वारा 7 दिनों में उतना ही कार्य किया जाता है जितना एक व्यक्ति एक दिन में करता है। इसके अलावा चुनाव के समय बहुत बड़ी संख्या में सरकारी अधिकारियों को नियुक्त करने, मतदाता सूचियां तैयार करवाने और उन्हें प्रकाशित करवाने में धन का बहुत अधिक अपव्यय होता है।

(5) धनवानों का शासन (Government of Rich Persons)- लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति चुनाव द्वारा प्राप्त की जाती है। वर्तमान समय में चुनाव कार्य बहुत खर्चीला हो गया है जिससे निर्धन व्यक्ति चुनाव जीतने की उम्मीद ही नहीं कर सकता। जब धनी व्यक्ति चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचता है तब उसके द्वारा अपने वर्ग विशेष के हितों के अनुरूप ही कानूनों का निर्माण किया जाता है। लोकमत के साधन जैसे प्रेस आदि पर भी धनवानों का ही अधिकार हो जाता है। इस प्रकार लोकतंत्र धनवानों का ही शासन होता है।

(6) अनुत्तरदायी शासन (Irresponsible Government)- लोकतंत्र की विशेषता है-उत्तरदाई शासन। किंतु व्यवहार में यह संभव नहीं है। सबके प्रति उत्तरदाई होने का अर्थ है- किसी के प्रति उत्तरदाई न होना। लोकतंत्र में शासक अपने उत्तरदायित्वों को एक-दूसरे पर टाल देते हैं। हर्नशा के शब्दों में, “लोकतंत्र की प्रवृत्ति सार्वजनिक मामलों में ऐसे अविचार, एक ऐसे असंयम, एक ऐसे पागलपन के प्रदर्शन की ओर होती है जिन्हें उसका कोई सदस्य अपने व्यक्तिगत मामलों में प्रदर्शित करने का स्वप्न नहीं देख सकता है।”

(7) मतदाताओं की उदासीनता (Indifference of Voters)- लोकतंत्र के अंतर्गत सामान्य मतदाता राजनीतिक विषयों के प्रति उदासीन होता है। मतदान के समय बार-बार प्रेरित करने पर भी केवल 50% मतदाता ही अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। ऐसी स्थिति में जनता की इच्छाओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है। राॅबर्ट ए० डहल के अनुसार, “चुनावों से हमारी अपेक्षा यह होती है कि उनमें कुछ निश्चित विषयों के संबंध में ‘बहुमत की इच्छा’ अथवा ‘वरीयता’ का पता लगा सकेगा। पर चुनावों में ऐसा बहुत कम होता है।”

(8) राजनीतिक शिक्षा का दंभ (Pillar of Political Education)- लोकतंत्र में निर्वाचन के समय मतदाताओं के सामने समस्याओं को अत्यंत विकृत रूप में प्रस्तुत कर जनता को भ्रमित कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप जनता को राजनीतिक शिक्षा प्राप्त नहीं हो पाती तथा नागरिक सार्वजनिक जीवन के लिए हानिकारक बातों को सीखते हैं।

(9) सर्वतोमुखी प्रकृति की असंभावना (Impossibility of Allround Nature)- लोकतंत्र में शासक वर्ग का समस्त ध्यान राजनीति पर ही केंद्रित होता है जिससे साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। विद्वानों को अपने कार्यों में समुचित सम्मान व प्रोत्साहन न मिलने के कारण उनकी उस कार्य में रुचि समाप्त हो जाती है और मानव जीवन का सर्वतोमुखी विकास नहीं हो पाता है।
सर हेनरी मेन के शब्दों में, “लोकतंत्र साहित्य, कला और विज्ञान तथा जीवन के विभिन्न पक्षों की उन्नति के लिए सर्वाधिक अनुपयुक्त है।”

(10) उत्तेजना की प्रबलता (Power of Exitement)- लोकतंत्रात्मक शासन का एक बहुत बड़ा दोष यह है कि इसमें प्रायः लोग तर्क और विवेक का प्रयोग नहीं करते हैं। लीबाॅन कहते हैं कि “लोकप्रियता सरकार उत्तेलना के हिंडोले में झूलती रहती है और प्रायः भीड़ की सरकार बन जाती है।”

(11) पेशेवर राजनीतिज्ञों का विकास (Development of Professional Politicians)- आलोचकों के अनुसार, लोकतंत्र में परिश्रमी और कार्यकुशल व्यक्ति अपने जीविकोपार्जन में लगे रहने के कारण राजनीति में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले पाते हैं जबकि किसी व्यापार, शिल्प या पेशे को इमानदारी और योग्यता के साथ न कर सकने वाले लोग राजनीति को ही अपना धंधा बना लेते हैं। उनके द्वारा भ्रष्ट तरीकों का प्रयोग करके आर्थिक शक्ति संचित करने का प्रयास किया जाता है। भारत में इस प्रकार की प्रवृत्ति पाई जाती है।

(12) युद्ध और संकट के समय निर्बल (Weak During War and Emergency)- युद्ध तथा संकट के समय अतिशीघ्र निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। लेकिन लोकतंत्रात्मक सरकारें अतिशीघ्र निर्णय लेने में सक्षम नहीं होतीं। अतः ये युद्ध और संकट के समय निर्बल सिद्ध होती हैं।

(13) सच्चा लोकतंत्र संभव नहीं (Real Democracy is not Possible)- इन सबसे अतिरिक्त लोकतंत्र सैद्धांतिक रूप में चाहे कितना श्रेष्ठ क्यों न हो, व्यवहार में सच्चा लोकतंत्र संभव ही नहीं है। व्यवहार में लोकतंत्र के नाम पर या तो बहुमत का निरंकुश शासन’ स्थापित हो जाता है या यह ‘गिने-चुने नेताओं’ के शासन में बदल जाता है।

निष्कर्ष: लोकतंत्र सर्वोत्तम शासन व्यवस्था (Conclusion: Democracy is the Best Government System)- उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि लोकतंत्र में जनता प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से शासन कार्यों में भाग लेती है। लोकतंत्र की विविध प्रकार से जो आलोचनाएं की गई हैं वे लोकतंत्र की नहीं वरन् उन व्यक्तियों की हैं जो लोकतंत्रीय व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करते हैं। व्यक्तियों को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करके, उनकी नैतिक उन्नति के प्रयास करके इन दोषों को सरलता से दूर किया जा सकता है। लोकतंत्र ने मानवीय दोषों को कम करने का ही प्रयास किया है। लावेल के अनुसार, “कोई भी शासन व्यवस्था सभी मानवीय दोषों के लिए रामबाण औषधि नहीं है।”

इसके अतिरिक्त, कोई भी शासन व्यवस्था ऐसी नहीं है जिसे लोकतंत्र से श्रेष्ठ व्यवस्था कहा जाए। ब्राइस के शब्दों में, लोकतंत्र पर अनेक आक्षेप किए जा सकते हैं लेकिन लोकतंत्र से अच्छी शासन-व्यवस्था की खोज मानव जाति ने अब तक नहीं की है।”
लोकतंत्र वर्तमान समय की परिस्थितियों और विचारों के अनुकूल है। मिल के शब्दों में, “लोकतंत्र के विरोध में दी जाने वाली युक्तियों में जो कुछ भी आधार प्रतीत हुआ, उसको पूरा महत्त्व देते हुए मैंने सहर्ष उसके पक्ष में ही निश्चय किया।”

वास्तव में लोकतंत्र से बढ़कर ‘आत्म सुधारवादी’ सरकार या राजनीतिक व्यवस्था कोई नहीं है। अतः कहा जा सकता है कि लोकतंत्र वर्तमान समय की सर्वोत्तम शासन व्यवस्था है।

Leave a Comment