पर्यावरणीय मुद्दों के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया का मूल्यांकन कीजिए ।

पर्यावरणीय मुद्दों के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया का मूल्यांकन कीजिए ।
अथवा
पर्यावरणीय मुद्दों पर विचार-विमर्श हेतु संपन्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का उल्लेख कीजिए।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय मुद्दे
(Environmental Issues on International Levels)
मानव द्वारा किए गए वैज्ञानिक अनुसंसाधनों एवं आविष्कारों, तीव्र औद्योगीकरण की प्रक्रिया एवं अतिदोहन के परिणामस्वरूप पर्यावरणीय कारकों यथा- जल, वायु, मृदा, वन एवं सूक्ष्म जैवकीय संसाधनों को भारी क्षति पहुंची है । खतरनाक रसायनों से युक्त औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों के दोषपूर्ण निस्तारण से जल को इस सीमा तक प्रदूषित कर दिया गया है कि वह पीने योग्य नहीं रह गया है । उधोगों, वाहनों से निकलते धुएं एवं जहरीली गैसों से वायुमंडल विषाक्त एवं प्रदूषित हो गया है । एयर कंडीशनरों एवं रेफ्रीजरेटरों से निकलने वाली सी० एफ० सी० गैसों की अधिकता से सूर्य से उत्सर्जित होने वाली पराबैंगनी तरंगों से रक्षात्मक कवच का कार्य करने वाली ओजोन परत में छिद्र हो गए हैं । नाभिकीय परीक्षणों से नाभिकीय उत्सर्जन में वृद्धि हुई है । कारखानों व वाहनों से शोर-प्रदूषण में वृद्धि हुई है । वनों के विनाश से जीव जंतुओं एवं वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां लुप्तप्राय हो गई हैं । परिणामस्वरूप पारिस्थितिकीय असंतुलन बढ़ा है । इससे मानव जाति, जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों के लिए खतरा बढ़ा है ।
आज पर्यावरण की सुरक्षा एक परम महत्व का अंतर्राष्ट्रीय विषय तथा सभी सभ्य राज्यों की झांसी आवश्यकता बन गई है । आधुनिक समय में विश्व स्तरीय एवं सामूहिक प्रयासों के द्वारा पर्यावरण की सुरक्षा करना एक प्रमुख कार्य-क्षेत्र बना हुआ है । अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाकर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं-

1. मानवीय पर्यावरण पर स्टाॅकहोम सम्मेलन, 1972
2. पर्यावरण सुरक्षा पर विश्व समझौतों की पुष्टि 1975
3. रियो-डी जेनेरो का पृथ्वी शिखर सम्मेलन 1992
4. विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक, 1997
5. क्योटा सम्मेलन सन्धि, 1997
6. जलवायु परिवर्तन पर ब्यूनिस एरिस बैठक, 1998
7. द्वितीय पृथ्वी सम्मेलन, 2002

मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972
(Stockholm Conference on Human Environment, 1972)
यह सम्मेलन 5 जून 1972 से 16 जून 1972 तक स्टॉकहोम में संपन्न हुआ । इसमें पर्यावरण की सुरक्षा से संबंधित कार्यवाही हेतु सात क्षेत्रों की घोषणा की गई ।
1. मानवीय पर्यावरण पर घोषणा (The Declaration on Human Environment) – इस घोषणा के प्रथम भाग में साधारण बातें वर्णित हैं । उदाहरणार्थ- पर्यावरण का सृष्टा एवं परिवर्तनकर्ता मनुष्य है; मानवीय पर्यावरण का सुधार आर्थिक विकास को प्रभावित करता है आदि । घोषणा के द्वितीय भाग में 26 सिद्धांत वर्णित है जिनमें पर्यावरण की सुरक्षा के संदर्भ में राज्यों के उत्तरदायित्व को स्पष्ट किया गया है । स्टार्क के शब्दों में- “यह वास्तव में एक घोषणा-पत्र ही था जिसे एक नैतिक आचार संहिता स्तर पर भविष्य की कार्यवाही तथा प्रोग्रामों को प्रमाणित तथा प्रशासित करना ।”

2. मानव पर्यावरण के लिए कार्य योजना (The Action Plan for the Human Environment) – सम्मेलन की सिफारिशों को तर्कपूर्ण ढंग से कार्य योजना में सम्मिलित किया गया है । पर्यावरण की सुरक्षा से संबंधित इस कार्य योजना को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है-
(i) संभावित पर्यावरण संकटों के प्रति चेतावनी देने के लिए ‘पृथ्वी निगरानी प्रोग्राम’ (Earth Watch Programme)
(ii) पर्यावरण की सुरक्षा से संबंधित आवश्यक एवं वंचित सिफारिशों को व्यवहार में लाना ।
(iii) पर्यावरण की सुरक्षा हेतु शिक्षा, प्रशिक्षण, सार्वजनिक सूचना आदि को महत्व प्रदान करना ।

3. संस्थागत तथा वृत्तीय व्यवस्था पर प्रस्ताव (Resolution on Institutional & Financial Arrangements) – इस प्रस्ताव के द्वारा एक 54 सदस्यीय प्रशासकीय परिषद की स्थापना की सिफारिश की गई । परिषद के सदस्यों को एक समान न्याययुक्त भौगोलिक आधार पर 3 वर्ष के लिए चुना जाना था । किंतु 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने पर्यावरण कार्यक्रमों में संबंधित एक 58 सदस्यीय प्रशासनिक परिषद की स्थापना की ।
परिषद का कार्य विश्व पर्यावरण की स्थिति की समीक्षा करना तथा सरकार को इससे संबंधित सूचनाएं देना था । यह भी व्यवस्था की गई कि परिषद का कार्यकारी निदेशक पर्यावरण की स्थिति पर एक वार्षिक प्रतिवेदन तैयार करेगा । पर्यावरण संबंधी प्रबन्धन के लिए एक लघु सचिवालय की स्थापना की सिफारिश की गई । इसके अतिरिक्त प्रस्ताव में ‘एक स्वैच्छिक कोष’ एवं ‘एक पर्यावरण समन्वय बोर्ड’ की स्थापना की सिफारिश की गई ।

4. विश्व- पर्यावरण दिवस के निर्धारण का प्रस्ताव (Resolution of Designation of World Environment Day)- सम्मेलन में ‘पर्यावरण दिवस’ के संबंध में सर्वसम्मति से एक प्रस्तावित पारित किया गया । यह निश्चित किया गया कि प्रत्येक वर्ष 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा ।

5. परमाणु शस्त्र परीक्षणों पर प्रस्ताव (Resolution on Nuclear Weapons Tests)- इस सम्मेलन में परमाणु परीक्षणों, विशेष रूप से वायुमंडल में किए गए वाले परीक्षणों की निंदा की गई तथा राज्यों से कहा गया कि वे वायुमंडल को प्रदूषित करने वाले परीक्षणों को न करें ।

6. द्वितीय पर्यावरण सम्मेलन’ किए जाने का प्रस्ताव (Recommendations of Governments Conference on environment)- सम्मेलन द्वारा, सरकारों को राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संबंधी कार्यवाही करने की सिफारिशें भेजी गई ।

पर्यावरण सुरक्षा पर विश्व समझौतों की पुष्टि 1975
(Ratification of Global Convention Concerning Environment Protection)
पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह एक महान उपलब्धि थी जबकि 7 महत्वपूर्ण विश्व-स्तरीय समझौतों को अधिकांश राज्यों ने स्वीकार कर लिया । ये समझौते अग्रलिखित विषयों से संबंधित थे- ‘वन्य वनस्पतियों एवं जंतुओं के व्यापार से संबंधित; जलीय जीवों का अंतर्राष्ट्रीय महत्व; विश्व सभ्यता एवं प्राकृतिक विरासत का संरक्षण; तेल प्रदूषित समुद्र; तेल प्रदूषण के लिए राज्यीय उत्तरदायित्व; जहाजों के कारण होने वाले समुद्रीय प्रदूषण की रोकथाम; वज्र्य पदार्थों के कारण होने वाले समुद्री प्रदूषण की रोकथाम ।

रियो -डी -जेनेरो का पृथ्वी शिखर सम्मेलन, 1992
The Earth Summit/Reo-de-Janero Summit, 1992)

पर्यावरण की सुरक्षा से संबंधित एक सम्मेलन 1992 में रियो-डी- जेनेरो, ब्राजील में संपन्न हुआ । इस सम्मेलन ने विश्व-पर्यावरण तथा पृथ्वी की सुरक्षा हेतु विश्व स्तर पर जागरूकता फैलाने एवं प्रयासों को आरंभ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया । यही कारण है कि इसे ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ भी कहा गया ।
इस सम्मेलन में ‘वैश्विक तापमान’ एक प्रमुख मुद्दा रहा था । इसमें ‘पृथ्वी चार्टर’ के नाम से 21 वीं सदी के लिए जलवायु, जैविक विविधता और वनों को बचाने के बारे में एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम तय किया गया । यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित ‘पर्यावरण और विकास’ की बड़ी उपलब्धि मानी गई । इस शिखर वार्ता में अनेक देशों ने जलवायविक बदलाव के प्रस्ताव पर भी हस्ताक्षर किए ‌।
यदि ग्रीन हाऊस गैसें इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो आने वाले समय में विश्व का तापमान 1. 5-4 .5 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ जाएगा जो वायुमंडल को कुप्रभावित किए बिना नहीं रह सकेगा जिसके कारण भयंकर प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप होता रहेगा, समुद्र जल- स्तर बढ़ जाएगा तथा मौसम व जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन, 1992’ के परिणामस्वरूप ‘वैश्विक तापमान’ के बारे में लोगों में चेतना जागृत हुई है ।
विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक 1997
(Global Climate Change Meet, 1997)
जनवरी 1997 में नई दिल्ली में ‘विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक’ संपन्न हुई । इस बैठक में निर्धनता, पर्यावरण एवं संसाधन प्रबंधन आदि से संबंधित समस्याओं का आकलन किया गया । ‘ग्रीन हाउस गैसों’ पर नियंत्रण की आवश्यकता पर भी विचार विमर्श हुआ । ईंधन में कमी लाने की आवश्यकता को आम सहमति से स्वीकार किया गया ।

क्योटो सम्मेलन संधि अथवा क्योटो प्रोटोकोल, 1997
(Kyota Convention Treaty or Kyoto Protocol, 1997)
1 से 10 दिसंबर, 1997 में, 150 देशों की एक बैठक क्योटो (जापान) में आयोजित की गई । इसमें ‘ग्रीन हाऊस गैसों’ को नियंत्रित करने के संबंध में विचार- विमर्श हुआ । ग्रीन हाउस गैसों को कम करने की दिशा में ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी । यही कारण था कि इस क्योटो बैठक को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया ।
क्योटो बैठक में विकसित एवं विकासशील देशों के मध्य गहरा विवाद उत्पन्न हो गया । पर्याप्त विवाद एवं सौदेबाजी के पश्चात क्योटो प्रोटोकोल को अपना लिया गया । इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

1. अनुसूचित 1 में सम्मिलित देश (OECD के मौलिक 24 देश तथा 11 पूर्वी यूरोपीय देश) 1990 की तुलना में औसतन 5.2 प्रतिशत की कमी ग्रीन हाऊस गैसों के संबंध में करेंगे । मुख्य रूप से अमेरिका ने 2002 तक 7%, यूरोपीय संघ के देशों ने 8 %, कनाडा व जापान ने 6-6% की कमी करने का निश्चय किया ।

2. कटौतियों को सभी ग्रीन हाउस गैसों के संबंध में लागू किया जाना था ।

3. विकासशील देशों को निश्चित मात्राओं से गैसों को छोड़ने की छूट दी गई ।

4. प्रतिबद्धता की अवधि 2008 से 2012 तक निश्चित की गई ।

5. गैसों को छोड़ने के व्यापार तथा गैसों को छोड़ने में कटौती के लिए ‘स्वच्छ विकास संयंत्रो’ को लागू करने की बात स्वीकार की गई ।
प्रोटोकोल की प्रतिबद्धताओं को लागू कराने के संबंध में प्रोटोकोल में कुछ नहीं कहा गया था ।

जलवायु परिवर्तन पर ब्यूनिस एरिस बैठक, 1998
(Buenos Aires Convention on Climate Change, 1998)
जलवायु परिवर्तन पर 1998 में एक बैठक ब्यूनिस एरिस (अरजेंण्टाइना) में आयोजित की गई । बैठक का प्रमुख विषय था- क्योटो प्रोटोकोल को लागू करना । इस सम्मेलन में विभिन्न राज्यों द्वारा राष्ट्रीय स्तरों पर ग्रीन हाउस गैसों को छोड़ने के संबंध में कार्यों की समीक्षा की गई । साथ ही नई ऊर्जा तकनीकों को विकसित करने के संबंध में भी विचार-विमर्श किया गया ।
भारत एवं चीन के मतानुसार विकसित देशों द्वारा अपनी विलासिता के लिए वातावरण में छोड़ी गई गैसों तथा विकासशील देशों द्वारा स्वयं को जीवित रखने की क्रियाओं के लिए छोड़ी गई गैसों में अंतर किया जाना चाहिए ।
पर्यावरण की सुरक्षा के लिए मानवीय चेतना में निरंतर वृद्धि हो रही है तथा पर्यावरणीय मुद्दा आज भी एक ज्वलंत समस्या के रूप में विश्व के समक्ष है ।

द्वितीय पृथ्वी शिखर सम्मेलन, 2002
(Second Earth Conference, 2002)
सन् 1992 में रियो- डी- जेनेरो में हुऐ पृथ्वी सम्मेलन के निर्णयों की प्रगति की समीक्षा हेतु द्वितीय पृथ्वी सम्मेलन 26 अगस्त से 4 सितंबर, 2002 तक दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में सम्पन्न हुआ । विश्व के इस सबसे विशाल सम्मेलन में लगभग 200 राष्ट्रों के साठ हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया । 106 राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी इस सम्मेलन में भाग लिया । दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति थाबो म्बेकी ने सम्मेलन का उदघाटन करते हुए कहा कि रियो -डी -जेनेरो में हुए पृथ्वी सम्मेलन के दस वर्ष बाद भी विश्व निर्धनता, युद्ध, संघर्ष तथा आतंकवाद जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है । विश्व इस सम्मेलन से यह अपेक्षा करता है कि एक दशक से उनकी गगनचुंबी इच्छाओं को पूरा करने के आश्वासनों को मूर्त रूप प्रदान किया जाए । पर्यावरण की सुरक्षा करते हुए सतत् विकास को प्राप्त करना इस सम्मेलन का प्रमुख विषय था । इसके लिए रियो- डी- जेनेरो सम्मेलन में स्वीकार किए गए ‘एजेंडा 21’ पर भी इस द्वितीय सम्मेलन में विचार-विमर्श हुआ । विकसित राष्ट्रों ने जहां इसमें ढील की आवश्यकता पर बल दिया, वहीं भारत सहित विकासशील राष्ट्रों ने विकसित राष्ट्रों की इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि विकसित राष्ट्रों ने अपने सकल राष्ट्रीय उत्पादन (GNP) का 0.7 % विकासशील राष्ट्रों को उपलब्ध कराने की बात कही थी, किंतु इस बात का पालन नहीं हुआ ।
इस सम्मेलन के लक्ष्य पेयजल तथा स्वच्छता, ऊर्जा, स्वास्थ्य व खाद्य सुरक्षा एवं जैव विविधता आदि से संबंधित है । निर्धनता रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे लोगों तथा स्वच्छता सुविधाओं के अभाव वाले लोगों की संख्या में सन् 2015 तक 50 % की कमी लाने का लक्ष्य भी इस सम्मेलन में निर्धारित किया गया । सन् 2010 तक जैव विविधता के ह्रास पर अंकुश लगाने के लिए विकासशील देशों को अतिरिक्त सहायता उपलब्ध कराने का आव्हान भी इस सम्मेलन की कार्य योजना में शामिल किया गया ।

 

 

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