नागरिकों के स्वातंत्र्यकरण को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक शर्तों अथवा परिस्थितियों

                                                प्रस्तावना
                                           (Introduction)
डॉ० विबासि का यह कथन सत्य है कि स्वतंत्रता की प्राप्ति से उसकी सुरक्षा करना अधिक कठिन है । सोल्टाऊ ने कहा है कि, “व्यक्ति का राजनीतिक जीवन निरंतर दो शक्तियों के बीच में खिचता रहता है-शासन की अधिक शक्ति की इच्छा और इसके विपरीत शासित का उससे अपने आपको स्वतंत्र रखने का प्रयत्न ।” राज्य के अंतर्गत शासन अधिक से अधिक शक्तिशाली होने का प्रयत्न करता है पर व्यक्ति इस बात के लिए प्रयत्नशील रहते हैं कि किस प्रकार अपने व्यक्तिगत जीवन के कार्यों को तथा अधिकारों के शासन को इस हस्तक्षेप से मुक्त अथवा सुरक्षित रखा जाए । अतः व्यक्ति की स्वतंत्रता की शासन की स्वेच्छाचारिता एवं उदण्डता से किस प्रकार रक्षा की जाए यह महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न है । व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा अनके परिस्थितियों पर निर्भर करती है । इनमें मुख्य शर्त निम्नलिखित हैं –
1. कानून (Law) – व्यक्ति स्वतंत्रताओं का उपभोग राज्य में रहकर करता है । राज्य व्यक्ति को अधिकार प्रदान कर तथा सुरक्षा देकर समाज में स्वतंत्रता स्थापित करता है । इस प्रकार समाज में स्वतंत्रता राज्य के कानूनों द्वारा प्रदान की जाती है तथा उन्हीं के द्वारा सुरक्षित भी होती है । दूसरे शब्दों में, राज्य के कानून स्वतंत्रता की एक महत्वपूर्ण शर्त है । कानून स्वतंत्रता का रक्षक है । कानून समाज में उन अवस्थाओं को उत्पन्न करता है जिसमें रहकर व्यक्ति अपने अधिकार एवं स्वतंत्रताओं का उचित उपभोग कर सके ।

2. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका ( Impartial and independent judiciary)- नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है । अप्पादोराय (Appadorai) के शब्दों में स्वतंत्र न्यायपालिका से अर्थ यह है कि ‘मानवीय दृष्टि से जहां तक संभव हो न्यायाधीशों के अपने कार्य संपादन हेतु कार्यपालिका से सर्वथा स्वतंत्र होना चाहिए ।’
उपरोक्त व्यवस्था इस कारण आवश्यक है कि सरकारी अधिकारियों अथवा व्यक्ति विशेष के द्वारा किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर आक्रमण करने पर उसकी रक्षा करने में केवल न्यायपालिका ही सक्षम साधन है । जब व्यक्ति की स्वतंत्रता का अतिक्रमण होता है तब उसके समक्ष एक ही मार्ग होता है- यह है न्यायपालिका द्वारा सुरक्षा की मांग करना । यदि न्यायाधीश कार्यपालिका के अधीन होगा अथवा उसका समर्थक होगा, उस स्थिति में व्यक्ति न्यायपालिका से न्याय प्राप्ति की आशा नहीं कर सकता । इसका कारण यह है कि कार्यपालिका न्यायपालिका पर अनुचित दबाव डाल सकती है तथा इस दबाव के द्वारा न्याय को अपने पक्ष में करवा सकती है ।
उपरोक्त स्थिति का निवारण उसी दशा में संभव है जब न्यायाधीशों को यह भय न हो कि यदि उन्होंने न्याय कार्यपालिका की इच्छा के अनुरूप नहीं किया तो उन्हें युद्ध पदच्युत किया जा सकता है अथवा उनके वेतन या पदोन्नति में किसी प्रकार की कटोती या बाधा प्रस्तुत की जा सकती है । यही कारण है कि प्रायः निम्न दो बातों पर विशेष बल दिया जाता है-
(a) प्रथम, न्यायाधीशों का वेतन तथा कार्यकाल सुनिश्चित व सुरक्षित हो ताकि वे निर्भयतापूर्वक न्याय दे सकें ।
(b) द्वितीय, कार्यपालिका यदि उनके रूष्ट हो जाए तब उन्हें किसी प्रकार की क्षति न पहुंचा सके ।
विभिन्न प्रजातंत्रात्मक देशों में इस दिशा में आवश्यक व्यवस्था है-
(i) ग्रेट ब्रिटेन में संसद के दोनों सदनों के आग्रह पर ही मुकुट (Crown) न्यायाधीशों को पदच्युत कर सकता है ।
(ii) अमेरिका में न्यायाधीशों को किसी स्थिति में पदच्युत किया जा सकता है तब प्रतिनिधि सभा सीनेट के समक्ष मुकदमा चलाए ।
(iii) भारत में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से उनके कार्यकाल समाप्ति से पूर्व हटाना जटिल व कठिन कार्य है ।
डॉ० विबासी का मत है कि “न्यायपालिका का स्वतंत्र व निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है । यह भी आवश्यक है कि न्याय सस्ता तथा शीघ्र हो ।”

3. लिखित संविधान में मौलिक अधिकारों का समावेश (Inclusion of the Fundamental Rights in Written Constitution )- व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु राज्य के संविधान में व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लेख होना आवश्यक है । अधिकारों की घोषणा वह नियमावली है सामान्य रूप से लिखित संविधान में सम्मिलित रहती है । इस नियमावली में नागरिकों के नागरिक तथा राजनीतिक मौलिक अधिकारों का वर्णन होता है । इसी के साथ सरकार के अधिकारों पर कुछ नियंत्रण होते हैं । इन नियंत्रणों का उद्देश्य निम्न प्रकार होता है-
(i) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके ।
(ii) नागरिकों के अधिकारों पर सरकार के द्वारा अतिक्रमण न किया जा सके ।
(iii) अधिकारों की पवित्रता में वृद्धि हो ।
(iv) शासन के लिए इन अधिकारों का उल्लंघन कठिन हो जाए ।
(v) अधिकारों को मौलिक कानून की मान्यता प्राप्त हो जाए ताकि इन अधिकारों पर अतिक्रमण होने की स्थिति में व्यक्ति न्यायालय में दावा करने का अधिकारी हो सके ।
अमेरिका, रूस, भारत, फ्रांस, स्विटजरलैंड आदि देशों के लिखित संविधानों में इस प्रकार के मौलिक अधिकारों की स्पष्ट घोषणा है ।
इंग्लैंड में चूंकि संविधान अलिखित है, व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा वहां की संवैधानिक परंपराएं तथा रीति रिवाज करते हैं । इसके अतिरिक्त, वहां का सामान्य कानून (Common Law) भी वहां के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है ।

4. लोकतंत्रात्मक शासन (Democratic Government) – वास्तविकता यह है कि शासन अपने स्वभाव से ही अधिकाधिक शक्ति का प्रेमी होता है तथा उसे हस्तगत करने का यथासंभव प्रयास करता है । यह भय राजतंत्र व कुलीनतंत्र में सर्वाधिक होता है । पर यदि शासन लोकतंत्रात्मक हो, अर्थात जनता का जनता के (प्रतिनिधियों के) द्वारा हो तब यह भय पर्याप्त सीमा तक कम हो जाता है । लोकतंत्रात्मक या प्रजातंत्रात्मक शासन की विशेषता यह है कि इसमें जनता केवल शासित ही नहीं होती वरन् स्वयं भी शासक होती है । इस प्रकार की स्थिति में, जैसा की स्वाभाविक है, शासन जनता की इच्छाओं की अवहेलना नहीं कर सकता । यदि वह ऐसा करने का प्रयास करता है, तब जनता उस शासन को समय आने पर परिवर्तित कर सकती है । इसी कारण वर्तमान में प्रजातंत्रात्मक शासन पद्धति को समस्त शासनों में सर्वाधिक आदर्श शासन माना जाता है ।

5. स्वायत्त संस्थाएं (Autonomous Bodies)- स्वायत्त संस्थाएं यदि उचित रूप से विकसित हों, तब स्वतंत्रता की सुरक्षा में सहायता प्रदान करती हैं । लास्की का मत है कि, “राज्य में शक्ति जितनी अधिक वितरित व विकेंद्रित होगी, उतनी ही अधिक उत्सुकता जनता में अपने अधिकार तथा स्वतंत्रता के लिए होगी ।” डॉ० विबासि का मत है कि अधिकतम परामर्श अधिकतम संतोष में सहायता प्रदान करता है ।

6. सतत जागरूकता (Persistent Vigilence)- उपरोक्त स्थितियों के सकारात्मक होने के साथ ही यह भी आवश्यक है कि व्यक्तियों में स्वतंत्रता प्राप्त करने की इच्छा व प्राप्त स्वतंत्रता को बनाए रखने की तत्परता भी हो । वस्तुतः निरंतर सतर्कता दो स्वतंत्रता की सबसे बड़ी पहरेदार की संज्ञा दी जा सकती है ।
यह स्वाभाविक है कि यदि शासन को यह आभास होगा कि व्यक्तियों की स्वतंत्रता का हनन या अपहरण करने का परिणाम निम्न प्रकार होगा तो वह उनकी स्वतंत्रता को अपहरण करने का साहस कदापि नहीं करेगा-

(i) नागरिकों में रोष का उत्पन्न होना ।
(ii) नागरिकों का विद्रोही बन जाना ।
(ii) राजा के उपरोक्त कदम को कदापि स्वीकार न करना ।
उस स्थिति में उनकी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहेगी । लास्की (Laski) का मत है कि, “आकस्मिक अराजकता शासन के अत्याचारों अथवा स्वेच्छाचारी होने पर सबसे बड़ा प्रतिबंध है ।” इसी प्रकार डॉ० विबासि का मत है कि, स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु यह अनिवार्य है कि व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो तथा जैसे ही उन पर शासन के द्वारा अतिक्रमण हो वे उसका विरोध करें । नागरिकों में साहस, दृढ़ता व सतर्कता आने पर उनकी स्वतंत्रता सुरक्षित है ।”

 

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