धर्म से क्या अभिप्राय है ? भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका की विवेचना कीजिए।

धर्म से क्या अभिप्राय है ? भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका की विवेचना कीजिए।(What is the meaning of Religion? Discuss the role of religion in Indian politics.)

                                                     अथवा

भारतीय प्रजातन्त्र के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक के रूप में धर्म की विवेचना कीजिये। (Discuss Religion as a Socio-economic Determinant of Indian Democracy.)

उत्तर- धर्म का अर्थ (Meaning of Religion)
धर्म शब्द संस्कृत भाषा की ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म का अर्थ है-वे कर्त्तव्य जिनके द्वारा मानव का विकास सम्भव होता है अर्थात् नैतिक आचरण अथवा मानवोचित आचरण। किन्तु आजकल धर्म शब्द का प्रयोग मजहब, पंथ, सम्प्रदाय आदि के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। आजकल धर्म का अर्थ संस्थागत धर्म है जबकि संस्था के साथ धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता है।

भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका (Role of Religion in Indian Politics)
भारतीय संविधान के द्वारा एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई है फिर भी भारतीय राजनीति में धर्म की विशेष भूमिका है। धर्म भारतीय राजनीति को निम्नलिखित रूपों में प्रभावित करता रहा है-

(1) धर्म और राजनीति दल (Religion and Political Parties)- स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में धर्म के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन हुआ है। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा, शिरोमणि अकाली दल आदि राजनीतिक दलों के निर्माण में धर्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ये साम्प्रदायिक दल धर्म को राजनीति में प्रमुखता देते हैं, धर्म के आधार पर चुनावों में प्रत्याशियों का चयन करते हैं तथा वोट माँगते हैं। इनके द्वारा चुनावों में विभिन्न धार्मिक मुद्दों को उठाने का प्रयास किया जाता है।

(2) धर्म और निर्वाचन (Religion and Election ) – भारत में अधिकांश राजनीतिक दलों तथा उनके नेताओं के द्वारा चुनावों में धर्म की दलीलों के आधार पर वोट मांगे जाते हैं। वोट बटोरने के लिए मठाधीशों, पादरियों, इमामों और साधुओं के साथ सांठ-गांठ की जाती है। मतदान के अवसर पर वोट माँगने वाले और मतदान करने वाले व्यक्तियों के आचरण पर धार्मिक तत्त्व अधिक छाये रहते हैं। मार्च 1977 और 80 के लोकसभा चुनावों के दिनों में धार्मिक नेता शाही इमाम ने राजनीतिक नेता की तरह चुनाव सभाओं में भाषण दिये और मुस्लिम मतदाताओं को किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित किया।

(3) धर्म और मन्त्रिमण्डल का निर्माण (Religion and Formulation of Cabinet ) – भारत में मन्त्रिमण्डल के निर्माण में भी धर्म की प्रभावी भूमिका है। केन्द्र तथा राज्यों में मन्त्रिमण्डल का निर्माण करते समय इस बात को ध्यान में रखा जाता है कि प्रमुख सम्प्रदायों और धार्मिक विश्वासों वाले व्यक्तियों को उनमें प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाये। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में अल्पसंख्यकों जैसे—मुसलमानों, ईसाइयों, सिक्खों आदि को सदैव ही प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है।

(4) धर्म के आधार पर पृथक् राज्यों की माँग (Demand of Separate States on Basis of Religion) – भारत में धर्म के आधार पर पृथक् राज्यों की मांग की जाती रही है। पुराने पंजाब का विभाजन वस्तुतः धर्म के आधार पर ही हुआ। नागालैण्ड के ईसाइयों की पृथक् राज्य की माँग का आधार भी धर्मगत निष्ठाएँ ही थीं। धर्म के आधार पर ही खालिस्तान की माँग उठी थी।

(5) राजनीति में धार्मिक दबाव समूह (Religious Pressure Groups in Politics) – भारतीय राजनीति में धार्मिक संगठनों ने सशक्त दबाव समूहों की भूमिका अदा की है। ये धार्मिक दबाव समूह शासन की नीतियों को प्रभावित कर अपने पक्ष में अनुकूल निर्णय भी करवाते हैं। उदाहरण-‘हिन्दू कोड बिल’ हिन्दुओं की आपत्तियों और आलोचनाओं के बावजूद पारित किया गया। मुस्लिम संगठनों ने भी कम से कम तीन बातों के लिए सरकारी नीतियों को प्रभावित कर दबाव समूहों की भूमिका निभाई। ये तीन बातें हैं-

(i) उर्दू को संविधानिक संरक्षण प्रदान किया जाये, (ii) अलीगढ़ विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक स्वरूप बनाया जाये, (iii) मुस्लिम पर्सनल लॉ में कोई परिवर्तन न किया जाए।

(6) धर्म और राज्यों की राजनीति (Religion and Politics of States ) – धर्म ने राज्यों की राजनीति को भी प्रभावित किया है। केरल की राजनीति का अन्तरंग धार्मिक और साम्प्रदायिक गुटों के गंठजोड़ से बनता है। पंजाब की राजनीति सदा ही अकाली दलों की आन्तरिक राजनीति तथा सशक्त और समृद्ध शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्ध समिति के निर्वाचनों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है।

(7) धर्म और राष्ट्रीय एकता (Religion and National Unity ) – धर्म राष्ट्रीय एकता के लिए घातक माना जाता है। धार्मिक मतभेदों के फलस्वरूप ही भारत का विभाजन हुआ और आज भी उसी के कारण विघटनकारी तत्त्व सक्रिय हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)- इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किये जाने के बावजूद धर्म भारतीय राजनीति को निरन्तर प्रभावित करता रहा है। आज भी राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में धर्म के आधार पर भेदभाव किया जाता है। इससे धर्म-निरपेक्ष राजनीति के विकास का मार्ग अवरुद्ध हुआ है।

 

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