टावनी ने सामाजिक लोकतंत्र की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, उसकी व्याख्या कीजिए ।

टावनी ने सामाजिक लोकतंत्र की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है, उसकी व्याख्या कीजिए ।
                                                   अथवा
क्या आप टावनी के इस विचार से सहमत हैं कि “समाजवादी समाज पालतू,खाते-पीते जानवरों का झुंड नहीं है, जो चरवाहे के आदेशों का पालन करता है । यह एक उत्तरदाई व्यक्तियों तथा महिलाओं का संप्रदाय है जो बिना किसी डर के सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक साथी या मित्र के रूप में कार्य करते हैं ।” विवेचना कीजिए ।
टावनी द्वारा प्रस्तुत सामाजिक लोकतंत्र की रूपरेखा
(Tawney’s Concept of Social Democracy
टावनी ने उत्तरदाई लोकतांत्रिक समाज के स्थान पर एक दूसरे समाजवादी समाज का चित्रण किया है जिसमें वास्तविक सामाजिक लोकतंत्र संभव हो सकता है । उसका कहना है कि “समाजवादी समाज पालतू, खाते-पीते जानवरों का झुंड नहीं है, जो चरवाहे के आदेशों का पालन करता है । वह एक उत्तरदाई व्यक्तियों तथा नारियों का संप्रदाय है जो बिना किसी डर के सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक साथी या मित्र के रूप में कार्य करते हैं ।” टावनी के अनुसार इस समाज में सबके सब अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार पूर्ण विकास कर सकते हैं, अपनी विभिन्न क्षमताओं के आधार पर जो प्रकृति द्वारा उन्हें प्रदान कर गए हैं, विकास के चरम बिंदु पर पहुंच सकते हैं ।
समाजवादी समाज का विकास पूंजीवाद की समाप्ति पर निर्भर करता है, जो प्रजातांत्रिक समाज के एकदम विरुद्ध हैं और इससे मेल नहीं खाता । इसके स्थान पर एक ऐसे समाज की स्थापना की आवश्यकता है जिसमें सभी सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संयुक्त रूप से कार्य करें ‌।
टावनी के सिद्धांत में जनता द्वारा सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति ही मुख्य रूप से महत्वपूर्ण केंद्र है । उसके अनुसार ये सामान्य उदेश्य ही व्यक्तियों में पारस्परिक मेल-जोल का आधार होते हैं । इसी के द्वारा व्यक्तियों में एक साथ काम करने से भाई चारे की भावना उत्पन्न होती है ।
सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति एक दूसरे दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है जिसके अनुसार व्यक्ति के अधिकारों का औचित्य इन सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति के आधार पर आंका जाएगा । पावनी का कहना है कि पूंजीवाद का दोष यह है कि वह इन सामान्य उद्देश्यों को नजर अंदाज कर देता है । पूंजीवाद में अधिकारों का दावा करते समय सामान्य उद्देश्यों की उपेक्षा की जाती है । ऐसी स्थिति में टावनी कहता है कि “To talk of rights, where these are unrelated to any any common purpose, is a kind of moral nonsense on stilts.” इस प्रकार टावनी समाज के सामाजिक विकास के मार्ग में एक बाधा को दूर कर देता है ।
टावनी के विचारों से कई बातों का बो होता है । पहली, यह कि वह यह मानकर चलता है कि समाज में कुछ सामान्य उद्देश्य होते हैं जिनके आधार पर अधिकारों की व्याख्या की जा सकती है । दूसरी, इन्हीं की प्राप्ति के लिए व्यक्तियों में पारस्परिक मेलजोल होता है और भाई-चारे की भावना उत्पन्न होती है ।
टावनी यह मानकर चलता है कि समाजवादी समाज की स्थापना के लिए प्राकृतिक अधिकारों की धारणा तथा पूंजीवादी व्यवस्था की समाप्ति अत्यंत आवश्यक है । वह यह भी मानता है कि सामान्य हितों के बारे में व्यक्तियों में मतभेद नहीं होते । उसके विचार में एक उद्योग का मुख्य कार्य भी जनता की भलाई करना है । टावनी ने संस्था में कार्यों के आधार ही अधिकार, कर्त्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों की विवेचना की है । वह यह नहीं समझ पाया कि इस प्रश्न पर एकममता के विकास में या तो उस कार्य के बारे में मतभेद तथा विरोध हो सकता है या उसे किसी प्रकार प्राप्त किया जाए, इस पर भी मतभेद हो सकता है ।
टावनी सामान्य हितों के बारे में एकमतता के पाए जाने के बारे में बहुत आशावादी विचारक था । इस आधार पर उसकी आलोचना करना उचित होगा कि उसने व्यक्तियों के बीच नैतिक विरोधों के महत्व को बहुत कम आंका है ।
टावनी द्वारा सामान्य उद्देश्यों के सिद्धांत का जो विवरण दिया गया है वह न तो उचित है और न ही उसका कोई ठोस आधार है । परंतु फिर भी इस सिद्धांत का अपना एक विशेष महत्व है जिसका संबंध प्रजातंत्र प्रणाली से है क्योंकि इस प्रणाली का सीधा संबंध सरकारी उद्देश्य से है और वह उद्देश्य है जन-हित । टावनी का दृढ़ विश्वास है कि प्रजातंत्र में व्यक्ति जन-उद्देश्यों के प्रति प्रतिबंध होता है और वह यह देखता है कि सत्ता का उपयोग जनहित के लिए किया जा रहा है । इस प्रकार प्रजातंत्र व्यवस्था में व्यक्ति के सक्रिय रूप से भाग लेने की भावना को प्रोत्साहन मिलता है । इसी प्रकार उद्योग में मजदूरों को सुविधाएं प्रदान करके उनकी कार्य क्षमता को बढ़ाया जा सकता है । यह तर्क भी अधिक ठोस नहीं है । यह ठीक उसी प्रकार का तर्क है जैसा कि मिल का तर्क था कि प्रजातंत्र में भागीदार के लिए अवसर दिया जाना नैतिक दृष्टि से उचित हो सकता है । निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी से सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहन मिलता है । प्रजातंत्र एक राजनीतिक शिक्षा का रूप ले लेता है जिसमें वाद-विवाद तथा प्रोत्साहन द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को अपनाया जा सके । इन सबकी प्राप्ति के लिए उचित वातावरण आवश्यक है जो तभी संभव है जब समाज से व्यक्तिगत हितों की समाप्ति, पूंजीवाद तथा सत्ता के असमान बंटवारें को एकदम समाप्त कर दिया जाए ।

टावनी के विचार में प्रजातंत्र प्रणाली दो कार्यों को पूरा करती है । प्रथम यह एक प्रकार का ढांचा तैयार करती है जिसके द्वारा सामान्य उद्देश्यों का समाज में पता लगाया जा सकता है । प्रजातंत्र से इन उद्देश्यों की उत्पत्ति नहीं होती । टावनी का यह विचार मिथ्या जान पड़ता है कि समाज में कुछ अच्छे व्यक्ति होते हैं जो नैतिक तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पूंजीवाद के दोषों के जानकार होते हैं । ऐसे व्यक्ति सामान्य उद्देश्यों को जनता के सामने रखेंगे । दूसरे, यह प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण भाग है जिसके द्वारा व्यक्तियों में गुणों का संचार विकसित होता है । उनमें जनहित की भावना उत्पन्न होती है । इस प्रक्रिया के द्वारा उन्हें पता चलता है कि उन्हें जन सामान्य-हित संबंधी उद्देश्यों को क्यों अपनाना चाहिए ? इन उद्देश्यों की प्राप्ति ही उनका मुख्य ध्येय है ।
टावनी का यह दृढ़ विश्वास है कि प्रजातंत्र व्यवस्था इन कार्यों की पूर्ति में न केवल सहायक हो सकती है बल्कि उनके लिए आवश्यक भी है । इतने पर भी टावनी प्रजातंत्र के प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण को नहीं त्यागता । उसने इसके बचाव में तर्क दिया है कि प्रजातंत्र व्यवस्था कुछ मुल्यों की प्राप्ति हेतु एक यंत्र के समान है ।
राज्य के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए वह लिखता है कि “राज्य एक महत्वपूर्ण यंत्र है । इनको नियंत्रित करने के लिए संघर्ष आवश्यक है । बेवकूफ की आवश्यकता पढ़ने पर बेवकूफी पूर्ण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इसका (राज्य रूपी यंत्र का) प्रयोग करेंगे । अपराधी अपराधपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राज्य रूपी यंत्र का प्रयोग करेंगे । ज्ञानवान तथा उत्तम व्यक्ति राज्य का प्रयोग उत्तम उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु करेंगे । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्ति सामाजिक उद्देश्यों के प्रति प्रतिबंध होते हैं और यदि प्रजातांत्रिक रीति से निर्णयों पर पहुंचा जाता है तो वे सामान्य उद्देश्यों को प्राप्त कर सकते हैं ।”
टावनी के सिद्धांत का मूल्यांकन
(Evalutaion of Towney’s Theory)
टावनी के सिद्धांत में कई महत्वपूर्ण तत्व हैं जो इस प्रकार हैं-
1. टावनी पूंजीवाद का घोर आलोचक है । वह व्यक्तियों के संबंधों पर इसके पड़ने वाले प्रभावों पर प्रकाश डालता है ।
2. वह यह मानता है कि पूंजीवाद के द्वारा ही समाज में असमान शक्ति के संबंधों का जन्म होता हे और जिसके परिणामस्वरूप कुछ पूंजीपति समस्त जनता पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं ।
3. इन संबंधों को समाज का अभिन्न अंग समझा जाता है जिसमें व्यक्ति आर्थिक सत्ता के निरंकुश दबाव के अधीन रहता है । इसलिए नवीन समाज के निर्माण के लिए सत्ता का दोबारा बंटवारा आवश्यक है । इस समाज में व्यक्तियों का आधिपत्य होगा ।
4. नए समाज के लिए एक संगठन आवश्यक है । इस संगठन का रूप प्रजातांत्रिक होना चाहिए ।
5. टावनी के विचार में नवीन समाज के निर्माण के लिए शक्ति का पुनः वितरण तथा प्रजातांत्रिक नियंत्रण आवश्यक है ? अंत में प्रजातंत्र में जनहित-उदेश्यों का होना आवश्यक है । इन उद्देश्यों को तब ही प्राप्त किया जा सकता है जबकि समाज में सहकारिता की भावना का विकास हो । व्यक्ति में यही समुदायिक भावना प्रजातंत्रीय प्रक्रिया को बढ़ावा देती है तथा सामाजिक रूप में लिए गए निर्णयों की रक्षा करती है ।

 

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