जातिवाद से क्या अभिप्राय है ? भारतीय प्रजातंत्र में जाति की भूमिका की विवेचना कीजिए।

1. जातिवाद से क्या अभिप्राय है ? भारतीय प्रजातंत्र में जाति की भूमिका की विवेचना कीजिए। (What is the meaning of Casteism? Discuss the role of caste in India Democracy.)
                                                                                          अथवा
“भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। (“Caste plays an important role in Indian Politics.” Explain this statement.)
                                                                                         अथवा
भारतीय प्रजातन्त्र के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक के रूप में जाति की विवेचना कीजिए। (Discuss Caste as a Socio-economic determinant of Indian
Democracy.)

उत्तर- भारतीय लोकतन्त्र के सम्मुख न केवल व्यवस्था को बनाये रखने के लिये अपितु जनता को भी एक समुदाय के रूप में सुरक्षित रखने के लिये जो चुनौतियां है उनमें जाति या जातीयता सर्वाधिक गम्भीर है। यह हमारे राष्ट्रीय जीवन तथा सामाजिक सम्बन्धों को ही छिन्न-भिन्न नहीं कर रही है अपितु एकता के बन्धनों व विकास की प्रक्रिया में भी बाधक सिद्ध हो रही है।

जातिवाद या जातीयता (Casteism)
वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग रही है, जिसने सामाजिक और राजनीतिक जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है। ऋग्वेद में भी इस व्यवस्था का उल्लेख होने के आधार पर यह माना जाता है कि यह व्यवस्था वेदों से भी अधिक पुरानी है। प्रारम्भ में भारतीय समाज में व्यक्ति के कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, चार वर्ण थे। व्यक्ति का वर्ण उसके कर्म के आधार पर निर्धारित होता था। व्यक्ति अपनी रुचि के आधार पर जिस प्रकार का कार्य करता था, वह उसी वर्ण का माना जाता था। एक ही परिवार में कई वर्गों के लोग हो सकते थे अर्थात् एक ही पिता के दो पुत्र अलग-अलग वर्णों के हो सकते थे। कोई भी व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार अपना कर्म बदलकर अपना वर्ण बदल सकता था। इस प्रकार वर्ण व्यवस्था का सम्बन्ध मनुष्य के कर्म से था जो व्यक्ति जिस प्रकार का कार्य करता था उसी प्रकार का वर्ण उसे प्राप्त हो जाता था। चारों वर्णों का समान महत्व था, न कोई ऊँचा था और न कोई नीचा। सभी वर्णों की समानता के कारण ही सभी वर्ण अपना-अपना विकास करने में समर्थ थे।
परन्तु धीरे-धीरे प्राचीनकालीन वर्ण व्यवस्था विकृत होती चली गयी और विभिन्न जातियों एवं उप-जातियों में विभाजित हो गयी। इस प्रकार मध्यकाल में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म न रहकर जन्म बन गया। इस व्यवस्था में प्रत्येक जाति, अपने से नीची जाति से श्रेष्ठ और ऊपर की जाति से निकृष्ट समझी जाने लगी प्रत्येक जाति अपनी आचार-विचार सम्बन्धी धारणाओं एवं आदर्शों से नियंत्रित होने लगी। व्यक्ति का सामाजिक अस्तित्व, व्यवसाय, शादी-विवाह, खान-पान और जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित अन्य प्रश्न जाति-व्यवस्था से नियंत्रित होने लगे। इस व्यवस्था को धर्म का समर्थन प्राप्त होने के कारण जातीय नियमों का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति केवल जाति-विरोधी ही नहीं अपितु अधार्मिक भी माना जाने लगा। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का कोई महत्व नहीं रहा और जन्म लेने वाली जाति की प्रतिष्ठा से ही व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा का मूल्यांकन होने लगा। वर्तमान युग में भी व्यक्ति की जाति, जन्म से ही निर्धारित होती है न कि कर्म से। इस प्रकार प्राचीन वर्ण-व्यवस्था की विकृति के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई जाति-व्यवस्था ने ही ‘जातिवाद’ को जन्म दिया है।
जातिवाद या जातीयता एक ही जाति के लोगों की वह भावना है जो अपनी जाति-विशेष के हितों की रक्षा के लिये अन्य जातियों के हितों की अवहेलना और प्रायः उनका हनन करने के लिये प्रेरित करती है। इस भावना के आधार पर एक ही जाति के लोग अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिये या अपेक्षाकृत अधिक लाभ उठाने के लिये अन्य जातियों के लोगों को हानि पहुँचाने के लिये प्रेरित होते हैं। कुछ विद्वानों ने जातिवाद या जातीयता को निम्नवत् परिभाषित किया है-
        डॉ० के० एम० शर्मा – “जातिवाद या जाति-भक्ति, एक ही जाति के व्यक्तियों की वह भावना है, जो देश या समाज के सामान्य हितों का ध्यान न रखते हुए केवल अपनी जाति के सदस्यों के उत्थान, जातीय एकता और जाति की सामाजिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिये प्रेरति करती है।”
        काका कालेलकर- “जातिवाद अन्ध और परिमित समूह-भक्ति है जो न्याय के सामान्य सामाजिक मानदण्डों के औचित्य, नैतिकता तथा सार्वभौमिक भ्रातृत्व की उपेक्षा करती है।”
        डॉ० नर्मदेश्वर प्रसाद-“जातिवाद, राजनीति में परिणित जाति के प्रति निष्ठा है।”
         के० एम० पनिक्कर- “राजनीतिक दृष्टि से उपजाति के प्रति निष्ठा का भाव ही जातिवाद है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जातिवाद मानव-विचारधारा का संकीर्ण रूप है, जिसके कारण वर्तमान युग में समाज में ऊँच-नीच और अस्पृश्यता (छुआछूत) जैसे सामाजिक अभिशाप का जन्म हुआ है।
         भारतीय राजनीति में जातिवाद की भूमिका (Role of Casteism in Indian Politics)
भारत जाति-व्यवस्था वाला एक ऐसा देश है जिसकी जनता विभिन्न जातियों के आधार पर संगठित है। ये जातीय संगठन जहाँ भारत की जातिगत राजनीति से प्रभावित होते हैं वहीं भारतीय राजनीति भी इन जातीय संगठनों से प्रभावित होती है। इन दोनों के पारस्परिक प्रभाव के परिणामस्वरूप भारत में न केवल जाति का ही राजनीतिकरण हुआ है अपितु राजनीति का भी जातिकरण हो गया है तथा इस प्रकार भारतीय राजनीति में जातिवाद का उदय और विकास हुआ है। भारतीय राजनीति में उदित और विकसित हुए इस जातिवाद और इसकी भूमिका का सम्यक् अध्ययन करने के लिये भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का अध्ययन करना आवश्यक है। इस सन्दर्भ में प्रो० रजनी कोठारी के मतानुसार भारत में जाति और राजनीति का परस्पर घनिष्ठ और अपरिहार्य सम्बन्ध है, अतः इस सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न यह है कि जाति प्रथा पर राजनीति का क्या प्रभाव पड़ रहा है और जाति व्यवस्था वाले समाज में राजनीति क्या रूप ले रही है ?


भारतीय राजनीति में जातिवाद की भूमिका की निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत विवेचना की जा सकती है-
(1) निर्णय-प्रक्रियायें- जातिवाद भारतीय राजनीति का आधार न होकर उसे प्रभावित करने वाला एक सशक्त एवं महत्वपूर्ण तत्व है, क्योंकि भारत में निवास करने वाली विभिन्न जातियाँ संगठित होकर राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया को निरन्तर किसी न किसी रूप में प्रभावित करती रहती हैं। उदाहरणार्थ, भारत के मूल संविधान में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिये लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं में 10 वर्ष के लिये स्थानों के आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी परन्तु ये जातियाँ संगठित होकर इस आरक्षण व्यवस्था की अवधि में वृद्धि के लिये निरन्तर सरकार पर दबाव देती रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न संविधान संशोधनों के द्वारा आरक्षण व्यवस्था की अवधि निरन्तर बढ़ायी जाती रही है। 79वें संविधान संशोधन द्वारा यह अवधि 25 जनवरी, 2010 तक के लिये बढ़ा दी गयी है। उक्त जातियों के विपरीत भारत की अन्य जातियाँ इस आरक्षण व्यवस्था का विरोध करती हैं और इस व्यवस्था को समाप्त करवाना चाहती हैं अथवा इस व्यवस्था का लाभ उठाने के लिये स्वयं को भी आरक्षण की सूची में सम्मिलित कराना चाहती हैं।

(2) निर्वाचनों में प्रत्याशियों के चयन में- भारत में सभी राजनीतिक दल निर्वाचनों के अवसर पर विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों के लिये प्रत्याशियों का चयन करते समय सम्बन्धित निर्वाचन क्षेत्र में जातिगत गणित का विश्लेषण करते हैं तथा विभिन्न जातियों के मतदाताओं की संख्या को आधार मानकर प्रत्याशियों का चयन करते हैं। इसके अतिरिक्त सभी राजनीतिक दलों में जातीय आधार पर अनेक गुट विद्यमान हैं और ये गुट जातिगत आधार पर ही कार्यरत हैं। इस प्रकार राजनीतिक दलों तथा उनकी कार्य-प्रणाली में भी जातिवाद की प्रभावशाली एवं निर्णायक भूमिका रहती है।

(3) मतदान व्यवहार में- भारत में निर्वाचन के समय राजनीतिक दल न केवल जातिगत गणित के आधार पर अपने प्रत्याशियों का चयन करते हैं अपितु चुनाव प्रचार में जातिवादी भावनाएं उकसाकर सम्बन्धित जाति के मतदाताओं को जातिवाद के आधार पर अपने पक्ष में मतदान करने की अपील भी करते हैं। राजनीतिक दल जातिवाद को अपने चुनाव-प्रचार के एक प्रमुख साधन के रूप में अपनाते हुए सम्बन्धित जातियों के मतदाताओं को अपनी और आकर्षित करते हैं और अपनी स्वार्थ-सिद्धी करते हैं। इससे विभिन्न जातियों के मतदाता जातिवाद से प्रभावित होकर अपनी-अपनी जाति के प्रत्याशियों या उन जातियों से सम्बन्धित राजनीतिक दलों के नेतृत्व के पक्ष में मतदान करते हैं। इस प्रकार भारत में जातिवाद की मतदान व्यवहार के आधार के रूप में भूमिका रहती है।

(4) मन्त्रिमण्डलों के गठन में- जातिगत आधार पर प्रतिनिधित्व भारत के राजनीतिक जीवन का एक सिद्धान्त बन गया है। चाहे केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल का गठन हो या राज्य- मंत्रिमंडल का, दोनों में ही इस सिद्धान्त को अपनाया जाता है। इतना ही नहीं, ग्राम पंचायतों तक सभी स्तरों पर ब्राह्मणों, जाटों, ठाकुरों, कायस्थों, हरिजनों, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों, मुसलमानों एवं अल्पसंख्यकों को किसी न किसी रूप में प्रतिनिधित्व अवश्य ही प्रदान किया जाता है।

(5) दवाव समूहों के रूप में- भारत में विभिन्न जातियों के लोग निवास करते हैं, जो अपनी-अपनी जातियों के आधार पर विभिन्न संगठनों का गठन करके भारतीय राजनीति में दबाव समूहों के रूप में भूमिका निभाते हैं। प्रो० रजनी कोठारी के शब्दों में, ‘प्रत्येक स्तर पर राजनीतिक गुटबन्दी और जाति या वर्ण सम्बन्धों के कारण नये संगठन जन्म लेते हैं। इनके कारण नेताओं और प्रमुख व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ता है।” महाराष्ट्र में मराठाओं का कृषक मजदूर दल केरल में नायरों का नायर सर्विस सोसायटी, गुजरात की क्षत्रिय सभा, राजस्थान में जाट सभा और राजपूत सभा, तमिलनाडु में नाडार जाति संघ, आन्ध्र प्रदेश में काम्मा और रेड्डी जातीय समुदाय के अतिरिक्त ब्राह्मण सभा और माथुर वैश्य सभा आदि ऐसे ही जातीय संगठन हैं, जो जातीय दबाव समूहों के रूप में राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। कोई भी राजनीतिक दल, शासन एवं प्रशासन तथा राजनीतिक संस्था जातीय दवाव समूहों के प्रभाव से अछूती नहीं है। जातीय दबाव समूह मन्त्रिमण्डल के गठन, नीति निर्धारण तथा राजनीतिक और अराजनीतिक नियुक्तियों में भी प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं और उन्हें अपने हितों की रक्षा के लिये निरन्तर प्रभावित करते रहते हैं। इसीलिये मेयर ने लिखा है, “जातीय संगठन राजनीतिक महत्व के दबाव समूह के रूप में प्रवृत्त हैं।”

(6) आरक्षण के आधार के रूप में- भारत में न केवल लोकसभा, राज्य विधान सभाओं और ग्राम पंचायतों में ही जातिगत आधार पर स्थान आरक्षण की व्यवस्था है अपितु राजकीय सेवाओं, पदोन्नतियों एवं शिक्षण संस्थाओं में भी जातिगत आधार पर स्थान-आरक्षण की व्यवस्था है। अधिकांश राजनीतिज्ञ जातिवादी भावना से प्रेरित होकर इस व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। कुछ प्रभावशाली राजनीतिज्ञ जातिवादी भावना से प्रेरित होकर अपनी जाति को भी इस व्यवस्था का लाभ दिलाने के उद्देश्य से अपनी जाति को भी आरक्षण सूची में स्थान दिलाने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं। इसके लिये वे अपने संगठित जाति के प्रभाव का प्रयोग करते हैं। इतना ही नहीं, कुछ राजनीतिज्ञ और उनके दल जातिगत आधार पर जनता को विभाजित करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं परन्तु वे जातियाँ जो आरक्षण-व्यवस्था की परिधि में नहीं आतीं, वे जातिगत आधार पर की गयी इस व्यवस्था और ऐसे राजनीतिज्ञों का तीव्र विरोध करती हैं। पिछली उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह सरकार द्वारा लागू की गई आरक्षण-व्यवस्था का तीव्र विरोध इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

(7) राज्यों की राजनीति में- भारत में अखिल भारतीय स्तर की राजनीति में जातिवाद का अधिक प्रभाव भले ही न हो परन्तु राज्य स्तर की राजनीति में जातिवाद का प्रभाव बहुत अधिक है। इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि भारत के किसी भी राज्य की राजनीति है जातिवाद के प्रभाव से अछूती नहीं है परन्तु केरल, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश आदि भारत के कुछ ऐसे राज्यकीय जिनकी राजनीति का अध्ययन सम्बन्धित राज्य के जातिगत गणित के विश्लेषण के अभाव में सम्भव ही नहीं हो सकता। इसीलिये कुछ विद्वान ‘राज्यों की राजनीति’ को ‘जातियों की राजनीति’ की संज्ञा देते हैं।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति में जातिवाद की प्रभावशाली, सशक्त एवं निर्णायक भूमिका रही है।

 

 

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