गांधी जी के स्वदेशी पर विचार प्रकट कीजिए।

गांधी जी के स्वदेशी पर विचार प्रकट कीजिए।
                           अथवा
“स्वदेशी हमारे अन्तस्तल की भावना है, जो कि हमें सुदूर की अपेक्षा हमारे निकटतम पर्यावरण के प्रयोग के लिए सीमित करती है ।” स्पष्ट कीजिए ।

गांधी जी के स्वदेशी पर विचार (Gandhiji’s Views on Swadeshi)

(1) गांधी जी एक राष्ट्रवादी के रूप में- गांधी जी एक पक्के मानवतावादी थे तथा साथ ही साथ वे एक प्रबल राष्ट्रवादी भी थे। वे पाश्चात्य सभ्यता के कटु आलोचक थे। वे कहते थे कि “पहले मैं भारतीय हूं उसके बाद में और कुछ हूं। यह वाक्य उनकी अगाध देशभक्ति का प्रतीक है। वे अपने देश की दयनीय दशा को देखकर बहुत दु:खी थे। उन्होंने यह अनुभव किया था कि देश को राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ- साथ आर्थिक स्वतंत्रता की भी आवश्यकता है। आर्थिक दासता से देश को मुक्त कराने के लिए गांधी जी ने स्वदेशी आंदोलन चलाया और उसमें पर्याप्त सफलता भी प्राप्त की।

(2) स्वदेशी का अर्थ- गांधी जी के आर्थिक कार्यक्रम का आधार स्वदेशी की भावना है । ‘स्वदेशी की भावना’ आंतरिक अनुभूति है, जिसकी अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में की जा सकती है । ‘हरिजन’ में गांधी जी ने ‘स्वदेशी’ की परिभाषा देते हुए लिखा है कि, “स्वदेशी हमारे अन्तस्तल की वह भावना है जो कि हमें सुदूर की अपेक्षा हमारे निकटतम पर्यावरण के प्रयोग के लिए सीमित करती है ।”

उपर्युक्त परिभाषा के आधार पर स्वदेशी आंदोलन की अग्रलिखित विशेषताएं दृष्टिगोचर होती हैं-
(i) स्वदेशी का अर्थ मुख्य रूप से देश के प्रति राष्ट्रीय प्रेम एवं श्रद्धा की भावना रखना था । स्वदेशी ‘शब्द’ के अर्थानुसार ‘अपने देश से संबन्धित’ का विचार ही स्वदेशी की भावना है ।
(ii) गांधी जी स्वदेशी को न केवल आर्थिक वरन् राजनीतिक एवं धार्मिक क्षेत्र में भी प्रयोग करते थे ।
(iii) धार्मिक क्षेत्र में स्वदेशी का अर्थ है अपने देश की बनी हुई वस्तुओं का प्रयोग करना ।
(iv) धार्मिक क्षेत्र में स्वदेशी का अर्थ अपने वंश परंपरागत धर्म में आस्था रखना है ।
(v)राजनीतिक क्षेत्र में स्वदेशी का अर्थ है अपने देश की राजनीतिक संस्थाओं को स्वीकार करना तथा देश के लिए अपनी प्राचीन परंपराओं पर आधारित विधान का निर्माण करना । गांधी जी के अनुसार स्वदेशी का राजनीतिक क्षेत्र में अर्थ देश में गणराज्यों की स्थापना करना था ।
(vi) गांधी जी स्वदेशी का केवल राजनीतिक उद्देश्य ही नहीं वरन आध्यात्मिक उद्देश्य भी समझते थे अर्थात् आध्यात्मिक क्षेत्र में स्वदेशी का अर्थ मनुष्य को उसकी अन्य प्रणालियों के साथ आत्मिक एकता की अनुभूति कराना है ।
(vii) स्वदेशी का विचार बड़े उद्योगों एवं लाभ कमाने के उद्देश्य को समाप्त करना है तथा समाज को आत्मनिर्भर बनाना है ।
(viii) स्वदेशी का अर्थ देश के धन को देश में ही रखना है, विदेशों में नहीं जाने देना है ।
(ix) स्वदेशी का उद्देश्य लोगों में आत्म विश्वास, साहस एवं निर्भीकता उत्पन्न करता है ।
(x) स्वदेशी का उद्देश्य धन के असमान वितरण को समाप्त करना है ।

(3) गांधी जी द्वारा स्वदेशी का प्रचार- गांधी जी ने स्वदेशी के प्रचार के लिए स्वदेशी आंदोलन चलाया जो कि उनके असहयोग आंदोलन का ही एक अंग है । जिस समय उन्होंने सरकार के विरुद्ध असहयोग करने की घोषणा की, तो उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर बल दिया । शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया गया और उनके स्थान पर राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई । दिल्ली, पटना, अलीगढ़, मुंबई, अहमदाबाद, बनारस में राष्ट्रीय कालेजों की स्थापना की गई । विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार तथा खादी वस्त्रों के प्रयोग का प्रचार किया गया ।

(4) स्वदेशी की आलोचना-
(i) स्वदेशी के आलोचकों का मत है कि “गांधी जी की स्वदेशी की धारणा ‘संकुचित राष्ट्रवाद’ पर आधारित है ।’
(ii) स्वदेशी की धारणा अन्य राष्ट्रों के प्रति एक घृणा का भाव उत्पन्न करती है ।
(iii) स्वदेशी की धारणा स्वयं गांधी जी के ‘मानवमात्र हित’ के साथ विरोधाभास उत्पन्न करती है
(iv) स्वदेशी का विचार अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के विरुद्ध है ।
(v) वर्तमान युग में एक देश दूसरे देश पर अपनी अनन्त आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्भर है अतः स्वदेशी की भावना एक निरर्थक धारणा प्रतीत होती है ।
इस प्रकार गांधी जी की स्वदेशी की धारणा पूर्णतया अव्यावहारिक है ।

(5) स्वदेशी भावना के पक्ष में तर्क- स्वदेशी भावना के आलोचकों का उत्तर देते हुए गांधी जी स्वदेशी के पक्ष में अग्रलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं-

(i) आलोचकों ने स्वदेशी की भावना को एक संकुचित भावना कहा है । इसका उत्तर देते हुए गांधी जी कहते हैं कि “स्वदेशी वह भावना है जो संकुचित नहीं है, बल्कि यह तो वह भावना है जिसने कि व्यक्ति को अन्य लोगों की बजाय अपने निकटतम पड़ौसी की सेवा करने का आदेश दिया । शर्त यह थी कि उस सेवा के लिए चुने गए पड़ौसी को अपनी बारी पर अपने पड़ौसी की सेवा करनी थी ।”
(ii) गांधी जी एक आदर्शवादी विचारक थे पर स्वदेशी आंदोलन ने उन्हें एक व्यावहारिक विचारक बना दिया । उन्होंने कहा कि “सेवा करने की हमारी क्षमता स्पष्टत: सीमित है । अपने पड़ौसियों की सेवा करने में भी हमें कुछ कठिनाई होती है ।”
(iii) गांधी जी कहते हैं कि स्वदेशी से आत्म निर्भरता का प्रादुभ्राव होगा, इससे शोषण का अंत होगा और यह एक ‘आर्थिक संतुलन’ स्थापित करेगी । समाज से वर्ग-भेद मिट जाएगा ।
(iv) स्वदेशी का एक राजनीतिक उद्देश्य ही नहीं है वरन् एक आध्यात्मिक उद्देश्य भी है । गांधी जी के शब्दों में, “जिस प्रकार सब जीवधारियों में आध्यात्मिक एकता स्थापित करने के लिए शरीर बाधक है और आत्मा का स्वाभाविक एवं स्थाई निवास स्थान है, उसी प्रकार स्वदेशी भी अपने अन्तिम और आध्यात्मिक अर्थ में आत्मा के लौकिक बंधन से मुक्त है ।”
(v) आलोचकों का यह कहना कि स्वदेशी की भावना से राष्ट्रों में घृणा फैलती है, सर्वथा गलत है क्योंकि गांधी जी ने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर अधिकाधिक बल इसलिए दिया कि इससे धन के अपव्यय को रोका जा सके । गांधी जी द्वारा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की धारणा उनकी विदेशी वस्तुओं के प्रति घृणा के भाव से प्रेरित नहीं थी, वरन् उनका मत था कि ऐसी वस्तुओं का आयात जो देश में उत्पन्न होती हैं, देश के उद्योगों के लिए हानिकारक सिद्ध होगा । उनका स्वदेशी का सिद्धांत “एक नि:स्वार्थ सेवा का सिद्धांत था जिनका मूल विशुद्धतम अहिंसा अथवा प्रेम में है ।”
(vi) गांधी जी ने स्वदेशी प्रचार को ‘विश्व व्यापी सेवा का सर्वोच्च शिखर (Acme of Universal Service) कहा है ।” वे इसे नि:स्वार्थ सेवा कहते थे जो कभी तुच्छ हो ही नहीं सकती । वे तो राष्ट्र प्रेम के लिए आत्म बलिदान की शिक्षा देना चाहते थे ।”
(vii) गांधी जी ने स्वदेशी की महत्ता को बताते हुए कहा कि “आत्म बलिदान का तार्किक परिणाम था कि व्यक्ति ने स्वयं समुदाय के लिए बलिदान किया, समुदाय ने अपने जिले के लिए, जिले ने अपने प्रांत के लिए, प्रांत ने राष्ट्र के लिए और राष्ट्र ने समस्त विश्व के लिए बलिदान किया ।”

 

 

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