गांधी जी के अधिकार एवं कर्त्तव्यों की धारणा की व्याख्या कीजिए।

गांधी जी के अधिकार एवं कर्त्तव्यों की धारणा की व्याख्या कीजिए।
गांधी जी की नैतिकता
(Ethics According to Gandhi ji )
गांधी जी ने प्लेटो, अरस्तु, हाब्स, लॉक, रूसो आदि दार्शनिकों के समान विश्व को कोई राजनीतिक दर्शन प्रदान नहीं किया था । वे तो पूर्णतया एक धार्मिक एवं नैतिक महापुरुष थे । उन्होंने अपने नैतिक दृष्टिकोण को लेकर ही राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व किया । अन्ततोगत्वा प्रत्येक स्थान एवं प्रत्येक क्षण नैतिकता उनकी राजनीति का आधार रही । इसी कारण धर्म विहीन अथवा अनैतिक राजनीति उनके दृष्टिकोण से किसी भी प्रकार मनुष्यों के ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर सकती थी, जिसमें नैतिक मनुष्य हों । गांधी जी भारत को ब्रिटिश शासन के पंजे से मुक्त कराना चाहते थे । वे स्वतंत्र भारत में एक आदर्श समाज की स्थापना करना चाहते थे ।
(1) गांधी जी व्यक्तिवादी थे – गांधी जी पाश्चात्य व्यक्तिवादियों की धारणा से बहुत अधिक प्रभावित थे । वे एक प्रमुख व्यक्तिवादी थे और व्यक्ति की स्वतंत्रता के पूर्ण समर्थक थे । वे व्यक्तिवादियों की इस धारणा का समर्थन करते थे कि सबसे अच्छी सरकार वह है जो कि सबसे कम शासन करती है । गांधी जी व्यक्तियों को ऐसा ज्ञान देना चाहते थे कि वे पूर्ण रुप से नैतिकता का पालन करें और वे नैतिकता विहीन किसी व्यक्ति का प्रभाव स्वीकार न करें । सरकार भी ऐसे कार्य संपन्न करे जिनसे व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठाने का पूरा अवसर मिल सके ।
इस संबंध में गांधी जी पर उनके आलोचकों ने एक आरोप लगाया है कि बाध्यकारी शक्ति के अभाव में अराजकता का प्रभुत्व होगा । इस दृष्टिकोण से गांधी जी एक अराजकतावादी हैं परंतु इस संबंध में एक स्मरणीय बात यह है कि अराजकतावादियों के विपरीत गांधी जी के समाज में एक बाध्यकारी तत्व अवश्य होगा क्योंकि गांधी जी व्यक्ति की सम्प्रभुता विशुद्ध नैतिक सत्ता पर आधारित रखना चाहते थे ।
(2) गांधीवादी समाज का प्रत्येक व्यक्ति सत्याग्रही होगा- गांधी जी सत्याग्रह को भौतिक एवं अनैतिक शक्तियों के विरुद्ध एक साधन मानते थे । वे आदर्शवादी होने के साथ-साथ निश्चित सीमा तक एक व्यवहारवादी भी थे । उनका विश्वास था कि पूर्ण रूप से उनके आदर्शों के अनुकूल एक ऐसे आदर्श की स्थापना असंभव है । ऐसे सत्ताविहीन राज्य के संबंध में गांधी जी ने एक बार कहा था कि, “आदर्श को जीवन में कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता ।”
गांधी जी इस बात को स्वीकार करते थे कि अपराध पूर्णतया समाप्त नहीं होंगे क्योंकि अहिंसात्मक समाज में आदर्श व्यक्ति नहीं होंगे बल्कि ऐसे प्रजातंत्र में कुछ समाज विरोधी, परावलम्बी एवं सामाजिक बुराइयों के शिकार व्यक्ति अवश्य होंगे । ये व्यक्ति आत्म नियंत्रण के अभाव में हिंसात्मक कार्य करके कानूनों का उल्लंघन कर सकते हैं । गांधी जी कहते हैं कि ऐसे कतिपय हिंसात्मक व्यक्तियों को तथा संस्थाओं को न तो अहिंसात्मक राज्य ही सहन करेगा और न सत्याग्रही ही । सत्याग्रही इन बुराइयों का अहिंसात्मक साधनों द्वारा प्रबल विरोध करेगा ।
गांधी जी का मत है कि सत्याग्रह का अर्थ सत्य, प्रेम एवं अहिंसा पर आधारित कार्यवाही है और यह वर्तमान की छल, कपट एवं धोखाधड़ी की सहायता से, सफलता के सामान्य विश्वास के विरुद्ध है । गांधी जी का विचार था कि सत्य शाश्वत है अर्थात् इस पर आधारित कार्यवाही भी स्थायी होगी । सत्याग्रही इन व्यक्तियों का विरोध करेगा पर इसका उद्देश्य इनको कष्ट तथा पीड़ा पहुंचाना नहीं होगा और इस प्रकार बाद में सही रास्ते पर आने के पश्चात् वे उसके मित्र बन जाएंगे । गांधी जी का मत था कि सत्याग्रही पाप से तो घृणा करता है, पापी से नहीं । गांधी जी के अनुसार सत्याग्रही के लिए सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अस्तेय, अस्वाद एवं रचनात्मक कार्य प्रमुख नियम हैं ।
(3) सामाजिक अनुशासन- गांधी जी व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षपाती अवश्य थे पर उन्हें व्यक्ति की अनुशासनहीनता से घृणा थी । वे व्यक्ति एवं समाज के मध्य सामंजस्य स्थापित रखना चाहते थे । वे राज्य को एक साध्य न मानकर साधन मानते थे । वे समाज के नियंत्रण में रहकर ही व्यक्तियों को स्वतंत्रता पूर्वक कार्य करने की आज्ञा देते थे ।
(4) अधिकार एवं कर्तव्य- वर्तमान युग अधिकारों के संघर्ष का युग है । प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों पर बल देता है । इसके विपरीत गांधी जी कत्तव्यों पर विशेष बल देते थे । उनका कथन था कि “जो व्यक्ति उचित रूप से अपने कत्तव्यों का पालन करेगा, उसे अधिकार स्वभाविक रूप से प्राप्त हो जाएगा ।” गांधी जी का पूर्ण विश्वास था कि कत्तव्यों के पालन से अधिकारों को सुरक्षा मिलेगी । वे कहते थे कि यदि व्यक्ति दूसरों की सेवा करके अपने कत्तव्यों का पालन करे तो उसे आत्म विश्वास का अधिकार मिलेगा क्योंकि कत्तव्यों से ही अधिकार का जन्म होता है ।
अधिकारों को प्राप्त करने के लिए गांधी जी अहिंसात्मक सत्याग्रह करने के समर्थक थे । वे पशुबल से अधिकारों को प्राप्त करना अनुचित समझते थे । वे लोकतंत्र के समर्थक थे । पर उनका लोकतंत्र सहयोग, सद्भावना एवं अहिंसा पर आधारित था । वे समाज को अधिकारों का संरक्षक तथा कत्तव्यों का पालन करने वाला बनाना चाहते थे ।
(5) गांधी जी का लोकतंत्र पूर्ण जनतंत्र था- गांधी जी राज्य की संपूर्ण शक्ति को जनता के हाथ में दे देना चाहते थे । गांधी जी का लोकतंत्र स्वयंशासी एवं आत्म-निर्भर समाज था । वे शक्ति के केन्द्रीयकरण को वर्तमान संघर्ष का कारण समझते थे । उनके राज्यविहीन लोकतंत्र की निम्नलिखित विशेषताएं थीं-
(अ) सत्ता का विकेंद्रीयकरण, जिससे कि लोगों के अंदर अधिक से अधिक उत्तरदायित्व एवं आत्म निर्भरता की भावना का उदय होगा । व्यक्ति स्वयं ही स्थानीय शासन का संचालन करेंगे जिससे सच्ची नागरिकता को प्रोत्साहन मिलेगा ।
(ब) सभी व्यक्ति वर्ण व्यवस्था के अनुसार अपने-अपने वंशानुगत व्यवसायों को करेंगे परंतु इन वर्गों में ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं रहेगा । प्रत्येक व्यक्ति समाज की आवश्यकता एवं अपने जीविकोपार्जन के लिए व्यवसाय करेगा, धन संग्रह करने के लिए नहीं ।
(स) गांधी जी अस्तेय के सिद्धांत का समर्थन करते थे । फिर भी वे जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं को सबके लिए उपलब्ध कराने के पक्षपाती थे ।
(द) गांधी जी स्वामित्व (Ownership) तथा व्यक्तिगत संपत्ति (Private Property) के समर्थक नहीं थे । मार्क्सवादियों के अनुसार गांधी जी का विचार था कि यदि पूंजीवादी वर्ग को समाप्त कर दिया जाए तो समाज उन लोगों के द्वारा होने वाले लाभ से वंचित हो जाएगा । गांधी जी कहते हैं कि इसके लिए यह आवश्यक है कि उन लोगों में ‘ट्रस्टीशिप’ की भावना को जागृत किया जाए तथा उन्हें यह अनुभव करा दिया जाए कि यह संपूर्ण संपत्ति समाज की है और वे केवल उसके ट्रस्टी मात्र ही हैं ।
(6) शारीरिक श्रम के समर्थक- रस्किन के अनुसार गांधी जी भी शारीरिक श्रम को आवश्यक समझते थे पर ऐसा श्रम उत्पादक होना चाहिए । गांधी जी बुद्धिजीवियों (Intellectual) के लिए भी शारीरिक श्रम करने पर बल देते थे । उनका विश्वास था कि बुद्धिजीवी व्यक्ति के शारीरिक श्रम के समय का अपव्यय नहीं होगा वरन् कार्य के गुण में और भी अधिक वृद्धि हो जाएगी । शारीरिक श्रम से श्रेणियों की प्रतिद्वन्द्विता समाप्त हो जाएगी और लोग परिश्रमी, स्वावलंबी तथा स्वस्थ हो जाएंगे । उनके चरित्र में निर्भीकता एवं आत्मनिर्भरता आदि गुण आ जाएंगे । शारीरिक श्रम के लिए ही गांधी जी प्रत्येक घर में हाथ का चरखा रखवाना चाहते थे ।
इस प्रकार गांधी जी एक ऐसे आदर्श समाज की स्थापना के समर्थक थे जो पूर्ण अहिंसा एवं नैतिकता पर आधारित होगा जिसमें समस्त व्यक्ति प्रेम, सहयोग तथा सद्भावना के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकेंगे ।

 

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