गांधी जी की ‘साध्य एवं साधन’ की धारणा पर प्रकाश डालिए।

गांधी जी की ‘साध्य एवं साधन’ की धारणा पर प्रकाश डालिए।
गांधी जी की ‘साध्य एवं साधन’ की धारणा
(1) साध्य एवं साधन- साम्यवादियों एवं भौतिकवादियों की इस धारणा से कि ‘साध्य साधन का उचित मापदण्ड है’ गांधी जी पूर्णतया असहमत थे। वे साध्य को साधन के अनुकूल तथा परस्पर संबन्धित समझते थे। मैकियावली ने यह तर्क प्रस्तुत किया था कि साधन की अपेक्षा साध्य अधिक महत्वपूर्ण है। यदि साध्य शुभ है तो उसे प्राप्त करने के लिए अपनाए ग्रे साधन भी शुभ होंगे। इस मत को वर्तमान समय के अधिकांश विचारक स्वीकार करते हैं परंतु गांधी जी ने इसके विपरीत साध्य एवं साधन को परस्पर संबन्धित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने साम्यवादियों तथा भौतिकवादियों के तर्कों का खण्डन करते हुए साध्य को साधन का औचित्य बताया। अपने मत के समर्थन में उन्होंने निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए-
(i) साध्य का जन्म साधनों से होता है- गांधी जी का मत था कि साधन साध्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि शुध्द साधनों को अपनाया गया तो निश्चय ही साध्य शुभ होगा । उदाहरण के लिए यदि एक मनुष्य अहिंसा का निश्चयपूर्वक पालन करता है, तो यह निश्चय है कि उसके द्वारा लोगों का हित ही होगा । यदि एक व्यक्ति बेईमानी, चोरी, छल-कपट आदि साधनों का प्रयोग करता है तो निश्चय है कि उसके पीछे उसका लक्ष्य दोषयुक्त होगा ।
(ii) साधनों की पवित्रता पर बल- गांधी जी की राजनीतिक नैतिकता पर आधारित थी । अतः वे एक नैतिक साध्य के लिए साधनों की पवित्रता पर बल देते थे । उनका कहना था कि यदि एक व्यक्ति ध्येय के लिए अपवित्र साधनों का प्रयोग करता है, तो निश्चय रूप से उसका ध्येय भी अपवित्र हो जाएगा । गांधी जी एक अन्य उदाहरण देते हुए कहते हैं कि एक डॉक्टर यदि अपने विषाक्त यंत्रों से रोगी का उपचार करता है तो निश्चित रूप से रोगी की हालत सुधारने के बजाय खराब हो जाएगी ।
(2) गांधी जी द्वारा प्रस्तुत विभिन्न परिस्थितियों के लिए विभिन्न साधन- गांधी जी का प्रारम्भिक एवं अंतिम लक्ष्य सत्य की खोज करना था । अतः उन्होंने व्यक्ति के नैतिक शक्ति को प्राथमिकता देते हुए उसे अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए विभिन्न साधन बताएं हैं-
(i) सत्य की खोज में अहिंसा का साधन- गांधी जी सत्य एवं अहिंसा के पुजारी थे । उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मेरी आत्म कथा’ (My Autobiography) जिसका एक नाम ‘मेरे सत्य के साथ अनुभव’ (My Experiments With Truth) भी है, के अंतिम अध्यायों में सत्य के लिए अहिंसा के मार्ग को आवश्यक बताया है । उन्होंने लिखा है कि “यदि इन पुस्तकों के अध्यायों का प्रत्येक पृष्ठ पाठकों के लिए इस बात की घोषणा नहीं करता कि सत्य की अनुभूति के लिए अहिंसा ही केवल मात्र मार्ग है, तो मैं अपने प्रयत्नों को निरर्थक समझूंगा ।”
टालस्टाय के समान गांधी जी सत्य के अन्वेषक थे और सत्य की प्राप्ति के लिए अहिंसात्मक जैसे पवित्र साधन को ही अपनाना उपयुक्त समझते थे । उनका कहना था कि “अहिंसा किसी भी धर्म का प्रथम परिच्छेद है लेकिन यह मेरा धर्म का आखिरी परिच्छेद है ।”
गांधी जी का विचार था कि मानव मात्र का प्रथम उदेश्य आत्मानुभूति अथवा ईश्वर का साक्षात्कार है । गांधी जी ईश्वर को सत्य का रूप समझते थे और आत्मानुभूति को ही मोक्ष मानते थे, जो केवल अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है ।
(ii) व्यक्ति का ध्येय नैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना है- गांधी जी के विचार भौतिकवादियों के विचारों के ठीक विपरीत हैं । साम्यवादी विचारक व्यक्ति का लक्ष्य आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करना बताते हैं जबकि गांधी जी कहते हैं कि व्यक्ति का ध्येय नैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना है । गांधी जी इस ध्येय की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित साधन बताते हैं-
(अ) सत्य (ब) अहिंसा (स) अस्तेय (द) अपरिग्रह और (य) ब्रह्मचर्य ।
(iii) आत्म पवित्रता द्वारा आत्मानुभूति की प्राप्ति- गांधी जी कहते थे कि व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य आत्मानुभूति है अतः आत्मानुभूति के लिए आत्मा की पवित्रता आवश्यक है जो कि उपरोक्त 5 साधनों के द्वारा प्राप्त की जा सकती है । इस प्रकार आत्मानुशासन की कल्पना गांधी जी फासिस्टवादियों के समान करते थे पर फासिस्टवादी राज्य शक्ति द्वारा यह नियंत्रण लगाना चाहते थे और गांधी जी इसे नैतिक अनुशासन के द्वारा प्राप्त करना चाहते थे ।
(iv) पूर्ण सत्य एवं सापेक्षिक सत्य- गांधी जी सत्य को ईश्वर का रूप मानते थे । वे किसी धर्म को सत्य से श्रेष्ठ नहीं समझते थे । उनका कहना था कि, “जो कि एक विशेष समय पर एक पवित्र ह्रदय महसूस करता है सत्य है तथा उस पर दृढ़ रहकर विशुद्ध सत्य प्राप्त किया जा सकता है । सत्य स्वयं में स्पष्ट है, परंतु व्यक्ति अपूर्ण होने के कारण अज्ञानरूपी मकड़ी के जाले से घिरा हुआ है और ज्यों ही पवित्र करने वाला अनुशासन अशान्त अज्ञान को दूर करता है, सत्य प्रकाश में आ जाता है । इस प्रकार सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है ।”
एक अन्य स्थान पर गांधी जी लिखते हैं कि “मेरा सत्य के सिवाय कोई ईश्वर नहीं, जिसकी मैं सेवा करूं । मैं सिवाय सत्य के किसी अन्य का अनुशासन नहीं मानता ।
(v) गांधी जी का मनसा, वाचा एवं कर्मणा से सत्य के पालन पर जोर- गांधी जी कहते हैं कि सत्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम अपने साधनों का प्रयोग वाणी, विचार एवं कर्म, तीनों क्षेत्रों में करें । गांधी जी का विचार है कि सत्य कोई पुंज नहीं हैं सत्य का प्रयोग जीवन के सभी क्षेत्रों में करना चाहिए ।
(vi) गांधी जी कटु सत्य को स्वीकार नहीं करते थे- गांधी जी को यह श्लोक ‘सत्यम ब्रूयात न ब्रूयात् सत्य प्रियम’ बहुत प्रिय था । इस श्लोक के अनुसार सत्य बोलें । सत्य का अर्थ तो इतना व्यापक है कि उसमें छल, कपट, अतिश्योक्ति का समावेश हो ही नहीं सकता । गांधी जी कहते हैं कि, “यदि कोई व्यक्ति सत्य को नम्र रूप से व्यक्त नहीं कर सकता तो इससे अच्छा है कि वह सत्य न बोले । बिना अहिंसा के सत्य, सत्य नहीं वरन् असत्य है क्योंकि कटु सत्य को भी विनम्रतापूर्वक कहा जा सकता है, परन्तु शब्द कड़े ही होंगे ।”
(3) साध्य और साधनों, दोनों का सह अस्तित्व- गांधी जी की साध्य एवं साधन की धरणा को समझने के लिए आवश्यक है कि उनके इस विचार को समझा जाए कि वे इन दोनों को एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित समझते थे । उनका मत था कि ध्येय की स्पष्ट से स्पष्ट व्याख्या और उसकी कद्रदानी से भी हम उस ध्येय तक नहीं पहुंच सकेंगे,अगर हमें उसे प्राप्त करने के साधन मालूम नहीं होंगे और हम उनका उपयोग नहीं करेंगे । इसलिए तो मुझे चिंता साधनों की रक्षा की है और उनके अधिकाधिक उपयोग की है । मैं जानता हूं कि अगर हम साधनों की चिंता रख सकें, तो ध्येय की प्राप्ति निश्चित है । मैं यह भी अनुभव करता हूं कि ध्येय की ओर हमारी प्रगति ठीक उतनी ही होगी, जितने हमारे साधन शुद्ध होंगे ।”
गांधी जी ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख’ के सिद्धांत की आलोचना करते थे । वे अधिकतम के स्थान पर ‘समस्त’ शब्द को प्रयुक्त करते थे । वे साध्य और साधन, दोनों को परिवर्तनीय मानते थे ।
गांधी जी नैतिकता को विशेष महत्व देते थे । उनका मत था, व्यक्ति तभी सुखी रह सकता है, जब वह नैतिक कानून का पालन करे । दुनिया के सभी धर्मों में सदाचार एक आवश्यक अंग माना जाता है, परंतु धर्मों के अतिरिक्त हमारी साधारण समझ भी नैतिक नियमों के पालन की आवश्यकता बताती है । उनका पालन करके ही हम सुखी रह सकते हैं ।

 

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