गांधीजी के सत्याग्रह पर विचारों की समीक्षा कीजिए।

गांधीजी के सत्याग्रह पर विचारों की समीक्षा कीजिए।
                           अथवा
सत्याग्रह के कौन-कौन से मुख्य लक्षण हैं ? निष्क्रिय प्रतिरोध तथा सत्याग्रह में क्या अंतर है ? स्पष्ट कीजिए।
सत्याग्रह पर गांधीजी के विचार
(Gandhiji’s views regarding Satyagraha)
(1) गांधीजी का सत्याग्रह- गांधीजी राष्ट्रीय आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे। उन्होंने राजनीति में नैतिक मूल्यों का प्रवेश कराकर उसे विशुद्ध बना दिया। उन्होंने धर्म को राजनीति से संबध्द करके उसका आध्यात्मीकरण कर दिया। गांधीजी ने अहिंसा को अपने आंदोलन में विशेष स्थान दिया। उन्होंने आंदोलन को प्रभावशाली बनाने हेतु सत्याग्रह के अस्त्र का आविष्कार किया। उनकी सत्याग्रह की धारणा उनके ‘नैतिक व्यक्तित्व’ (Moral Personality) की अभिव्यक्ति है।
(2) सत्याग्रह के स्त्रोत- गांधीजी प्रारंभ से ही सत्य एवं अहिंसा के पुजारी थे । उन्होंने वैदिक ग्रंथों तथा हिंदू शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था । उनके सत्याग्रह का सिद्धांत इन्हीं ग्रंथों के मूल पर आधारित था । गांधी जी ने सत्याग्रह के विचार को अपने जीवन के कटु एवं विभिन्न अनुभवों के पश्चात् जन्म दिया । उन्होंने महावीर स्वामी तथा महात्मा बुद्ध के उपदेशों से यह शिक्षा ग्रहण की कि “बुराई को भलाई से जीतो, यदि तुम्हारे एक गाल पर कोई थप्पड़ मारे तो तुम दूसरा गाल भी उसके सम्मुख कर दो ।” ईसा मसीह का यह सिद्धांत उन्होंने पूर्ण रूप से ग्रहण कर लिया ।
गांधीजी के मन में ‘सत्याग्रह’ करने का विचार उस समय आया जब उन्होंने अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे भीषण अत्याचारों को देखा और उन्हें मुक्ति दिलाने का विचार किया ।
(3) सत्याग्रह का अर्थ- गांधीजी ने सत्याग्रह का अर्थ स्पष्ट करते हुए ‘यंग इंडिया’ में लिखा है कि’ “सत्याग्रह आत्मा की शक्ति है, सत्य पर आग्रह है । यह सत्य पर आग्रह दूसरों को कष्ट देकर नहीं वरन् अपने ऊपर कष्ट सहन कर हो सकता हो । यह सहानुभूति के लिए एक घटना है ।”
गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह का अर्थ सत्य पर आरूढ़ रहना है । आध्यात्मिक एकता सर्वोच्च सत्य है जिसे केवल अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रकार सत्याग्रह का अर्थ है अहिंसा का पालन करते हुए सत्य पर आरुढ़ रहना । सत्याग्रह सभी को प्रेम जनहित करने का संदेश देता है । सत्याग्रह ‘प्रेमशक्ति’ अथवा ‘आत्मा की शक्ति’ पर आधारित है । सत्याग्रह एक नैतिक अस्त्र है और उसका प्रयोग दूसरों को कष्ट न पहुंचा कर दिया जाता है ।
(4) सत्याग्रह के स्वरूप- गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह कोई नीति न होकर जीवन के लिए एक कार्यक्रम है । इसको भिन्न-भिन्न रूपों में रखा जा सकता है ।
मशरूवाला इस संबंध में लिखते हैं कि “सत्याग्रह जितनी रीतियों से हो सकता है वे सब गिनाई नहीं जा सकती । सत्याग्रह की पद्धति, प्रकार और मात्रा, धर्म के स्वरूप, उसकी तीव्रता, उसका आचरण, उसका अपना सम्बन्ध, हमारा तथा जिसका पक्ष हमने लिया है, उसके जीवन में उस अधर्म को मिटाने के संबंध में मिली सिद्धि आदि बातों पर आश्रित रहती है । इस प्रकार सत्याग्रह में समझाने-बुझाने से शुरू करके उपवास, असहयोग, सविनय अवज्ञा, उपकुटुंब समाज, राज्य का त्याग, अपने न्याय अधिकार का शांति के साथ उपयोग और उपस्थित संकटों को सह लेना आदि सत्याग्रह के प्रकार होते हैं ।
(5) सत्याग्रह एवं निष्क्रिय प्रतिरोध में अंतर- अधिकतर लोग सत्याग्रह का अर्थ निष्क्रिय प्रतिरोध से लगाते हैं । इन दोनों शब्दों में बड़ी भ्रान्ति सी प्रतीत होती है, परंतु उनमें विशेष अंतर है । सत्याग्रह को मुख्य रूप से दो भागों में- (i) असहयोग (ii)सविनय अवज्ञा, विभक्त किया जाता है । प्रारंभ में गांधीजी ने यद्यपि सत्याग्रह के लिए ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ शब्द का प्रयोग किया था पर इंग्लैंड में 20 वीं शताब्दी में हुए ‘निष्क्रिय प्रतिरोध आंदोलन’ (Passive Resistance Movement) के साथ‌ सत्याग्रह का संबंध जोड़ना उचित नहीं मालूम देता । संभवतया गांधीजी ने सत्याग्रह के शब्द को नवीन तथा अपरिचित समझकर श्री हास्कन के परामर्श के अनुसार इसका नाम प्रतिरोध रख दिया था पर मदन लाल ने उन्हें इसका नाम ‘सत्याग्रह’ रखने का ही सुझाव दिया । इस प्रकार जब गांधीजी ने दक्षिणी अफ्रीका में आंदोलन का प्रारंभ किया तो इसका नाम ‘सत्याग्रह’ रख दिया ।
‘सत्याग्रह’ एवं ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ के मध्य अंतर को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
सत्याग्रह
A. सत्याग्रह सशक्त व्यक्तियों का अस्त्र है ।
B. सत्याग्रह विशुद्ध रूप से ‘आत्मा की शक्ति’ (Soul Force) की सर्वोच्चता पर आधारित एक नैतिक अस्त्र है ।
C. सत्याग्रह का उदेश्य विरोधी को प्रेम, धैर्य एवं आत्म पीड़न के द्वारा गलती से मुक्त करना है ।
D. सत्याग्रह में अहिंसा का पालन तथा हिंसा का पूर्णतया त्याग कर दिया जाता है ।
E. सत्याग्रह में घृणा ईष्र्या एवं प्रतिरोध का कोई स्थान नहीं होता है ।
F. सत्याग्रह ‘नैतिक शक्ति’ एवं ‘आत्मिक शक्ति’ की श्रेष्ठता पर आधारित है ।
G. सत्याग्रह में कृत्रिमता नहीं होती है ।
निष्क्रिय प्रतिरोध
a. निष्क्रिय प्रतिरोध दुर्बल व्यक्तियों का अस्त्र है ।
b. निष्क्रिय प्रतिरोध को इंग्लैंड में नान कन्फर्मिस्ट एवं ‘सफरेजिट्स’ ने तथा जर्मन निवासियों ने फ्रेंचों के प्रति समयानुकूल परिस्थितियों में राजनीतिक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया ।
c. इसके विपरीत निष्क्रिय प्रतिरोध का उद्देश्य विरोधी को पीड़ा पहुंचा कर समर्पण की ओर लाना है ।
d. निष्क्रिय प्रतिरोध में भी हिंसात्मक साधनों का त्याग कर दिया जाता है पर इसका कोई निश्चित सिद्धांत नहीं रहता है ।
e. निष्क्रिय प्रतिरोध को इन्हीं से प्रेरणा प्राप्त होती है ।
f. निष्क्रिय प्रतिरोध भौतिक शक्ति की श्रेष्ठता पर आधारित है ।
g. निष्क्रिय प्रतिरोध में कृत्रिमता रहती है ।

(6) सत्याग्रह के विभिन्न स्वरूपों की विशद व्याख्या – सत्याग्रह के विभिन्न स्वरूपों की विशद व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है-

(i) समझौते का सिद्धांत- गांधी जी का मत था कि, “सत्याग्रही को चाहिए कि वह विरोधी को समझा बुझाकर उसे उसकी गलती का अनुभव करा दे । यह गलती अज्ञानतावश, स्वार्थवश अथवा दुर्भावना के कारण हो सकती है । फिर भी यदि विरोधी अपनी गलती को नहीं मानता तो सत्याग्रही को चाहिए कि किसी अन्य व्यक्ति को मध्यस्थ बनाकर उसे समझा-बुझाकर रास्ते पर ले आए । फिर भी यदि विरोधी नहीं मानता तो सत्याग्रही को चाहिए कि वह उसके विरुद्ध कोई ठोस कदम उठाए ।
जब गांधी जी ने अफ्रीका में सत्याग्रह प्रारंभ किया तो उन्हें समझौते की बहुत कम आशा थी, पर उन्होंने जनरल स्मट्स के समक्ष समझौते का प्रस्ताव रखा था जिसमें उन्हें सफलता मिली थी ।

(ii) आत्मा-पीड़न- गांधी जी कहते थे कि समझौते से विरोधी न मानें तब सत्याग्रही को कठोर कदम उठाना चाहिए । वे सत्याग्रही को आत्म-पीड़न का मार्ग बताते हैं । सत्याग्रह सत्य की तपस्या है, इस अर्थ में सत्याग्रही के आत्मा-पीड़न से विरोधी व्यक्ति के हृदय पर पर्याप्त प्रभाव पड़ेगा और विरोधी स्वत: ही अपनी गलती स्वीकार कर लेगा । सत्याग्रही को इसके लिए प्रत्येक नुकसान तथा कष्ट को सहन करना होगा ।

(iii) उपवास- ‘उपवास’ को गांधी जी सत्याग्रह का एक प्रभावशाली स्वरूप समझते थे । उनका कहना था कि, ” विशुद्ध एवं प्रिय हृदय की प्रार्थना की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है । इसके द्वारा बुराई करने वाले की अच्छी प्रकृति से अपील की जाती है जिससे कि उसके अंतरंग में छिपी हुई अच्छाई को उभारा जा सके ।”
गांधी जी जनमत को उभारने के लिए उपवास को एक प्रभावशाली साधन समझते थे । उनका विचार था कि जनता लेखों तथा भाषणों से इतनी जल्दी प्रभावित नहीं होती है । गांधी जी का मत था कि, “उपवास का यह तरीका सबसे अच्छा एवं सबसे अधिक स्वीकार करने योग्य है ।”
गांधी जी ने 1934 ई० में एक बार कहा था कि, “मुझे बार-बार होने वाला यहां और अफ्रीका में यह अनुभव हो रहा है कि जब इसका प्रयोग अच्छी तरह से किया जाए तो यह सबसे अधिक सम्भ्रान्त उपचार है- क्योंकि जनता केवल हृदय की भाषा को ही समझती है और उपवास जो कि बिल्कुल नि:स्वार्थ है, हृदय की भाषा है ।”
गांधी जी यह भी कहते थे कि, “उपवास का आश्रय केवल चतुर एवं दक्ष व्यक्ति को ही लेना चाहिए । यदि उपवास का आश्रय बिना पूर्व तैयारी के लिए लिया जाता है अथवा इसका प्रयोग बिना विचार पूर्वक किया जाता है तो वह केवल सत्याग्रह का उपवास न होकर भूख हड़ताल का स्वरूप ले लेता है ।”

(iv) असहयोग- सत्याग्रह का एक अन्य अंग ‘अहिंसात्मक असहयोग’ है । वह सत्याग्रही का एक प्रभावशाली हथियार है । गांधी जी के अनुसार यह ‘पीड़ित प्रेम का विस्तार’ (It is expansion of anguished love) है ।गांधी जी ने असहयोग का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “यद्यपि सत्याग्रह के शस्त्रागार में असहयोग मुख्य अस्त्र है परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सत्य एवं न्याय के साथ विरोधी के सहयोग को प्राप्त करने का एक साधन है ।”
गांधी जी के असहयोग कार्यक्रम में निम्नलिखित बातें थीं-
(a) उपाधियों और अवैतनिक पदों से त्याग-पत्र देना
(b) सरकारी अधिकारियों द्वारा या उसके सम्मान में होने वाले दरबारों तथा उत्सवों का बहिष्कार करना ।
(c) अंग्रेजी शिक्षा के स्कूलों तथा अंग्रेजी सरकार द्वारा नियंत्रित स्कूलों का बहिष्कार कर राष्ट्रीय कालेजों की स्थापना करना ।
(d) सरकारी अदालतों का बहिष्कार ।
(e) परिषदों द्वारा चुनाव में खड़े उम्मीदवारों द्वारा नाम वापिस ले लेना ।
(f) सैनिक सरकारी सेवाओं तथा श्रम सेवाओं का बहिष्कार करना ।
(g) स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना ।

(v) सविनय अवज्ञा- असहयोग आंदोलन का व्यापक रूप सविनय अवज्ञा है । यह पूर्णतया जन आंदोलन है । गांधी जी के अनुसार, “सविनय अवज्ञा आंदोलन सशस्त्र क्रांति का पूर्व प्रभावशाली एवं रक्तहीन विकल्प है । इसका अर्थ सरकार के कानून के विरुध्द सविनय अर्थात् अहिंसात्मक आचरण को प्रकट करना है ।”
अवज्ञा शब्द एक विनाशकारी एवं समाज विरोधी शब्द है परंतु गांधी जी ने इसमें ‘सविनय’ जोड़कर इसे अपने अनुकूल बना लिया । वे ‘सविनय अवज्ञा’ को सावधानी पूर्वक प्रयोग करने का उपदेश देते थे । उनका कहना था कि ‘इसका प्रयोग बड़ी सावधानी से एवं सारे विचारणीय प्रतिबंधों को लगाकर किया जाना चाहिए । हिंसा के विस्फोट एवं सामान्य स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध हर पूर्व तैयारी कर लेनी चाहिए । इसके क्षेत्र को भी मामले की अत्यंत आवश्यकताओं से सीमित कर देना चाहिए ।”

(iv) हड़ताल- हड़ताल भी सत्याग्रह का एक अंग है । इसका अर्थ है ‘व्यापार का विरोध’ । इस हथियार से जनता आश्चर्यजनक रूप से प्रभावित होती है परंतु इस हथियार का प्रयोग कभी-कभी ही करना चाहिए क्योंकि इसका बार-बार प्रयोग, इसे प्रभावहीन बना देता है गांधी जी के अनुसार हड़ताल पूर्णतया ऐच्छिक होनी चाहिए तथा इसका स्वरूप पूर्णतया अहिंसात्मक होना चाहिए ।

(vii) सामाजिक बहिष्कार- गांधी जी के अनुसार सामाजिक बहिष्कार भी सत्याग्रह का एक स्वरूप है । यह अहिंसात्मक तथा हिंसात्मक, दोनों प्रकार का हो सकता है । वास्तव में यह एक ‘सामाजिक हथियार’ है । गांधी जी इस हथियार को सीमित रूप में प्रयुक्त करना चाहते थे । वे कहते हैं कि इस अस्त्र का प्रयोग उन लोगों के विरूद्ध करना चाहिए जो जनमत की अवहेलना करते हैं तथा असहयोग में भाग नहीं लेते हैं ।

(viii) धरना- धरना भी सत्याग्रह का एक अंग है । इसका प्रयोग भी अहिंसात्मक रूप से करना चाहिए । गांधी जी ने अपने अहिंसात्मक आंदोलन में शराब एवं अफीम के विरुद्ध तथा विदेशी वस्त्रों के विरुद्ध धरने की अपील की थी । गांधी जी का कहना था कि धरने का अर्थ मार्ग रोकना नहीं, बल्कि उन लोगों की अवहेलना करना है तो सत्याग्रह में सम्मिलित नहीं होते ।

(ix) स्वेच्छा से पलायन- पलायन का अर्थ स्वेच्छा से स्थान छोड़ना अर्थात् हिजरत पर जाना है । हमें इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं । रोम के पैट्रीशियन्स ( Patricians) से ‘प्लेबियन्स’ (Plebeians) भी पलायन कर गए थे । इजराइल के लोगों ने अत्याचार के विरुद्ध इजराइल से पलायन कर दिया था । मुहम्मद साहब मक्का से मदीना को चले गए थे । सन् 1930 को बारदोली, बोरसाद एवं जमशेद के लोगों ने सामूहिक पलायन की पद्धति को अपनाया था और बड़ौदा राज्य में जाकर बस गए थे ।

(7) प्रभावपूर्ण सत्याग्रह के लिए शर्ते-
(i) सत्याग्रही को क्रोधी नहीं होना चाहिए ।
(ii) सत्याग्रही को अपने विरोधी के क्रोध को सहन कर लेना चाहिए ।
(iii) सत्याग्रह का प्रयोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं वरन् सामाजिक कल्याण के लिए किया जाना चाहिए ।
(iv) सत्याग्रही को सभी प्रकार का कष्ट तथा अपमान सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए और यहां तक कि उसे अपनी जान तक की परवाह नहीं करनी चाहिए ।
(v) सत्याग्रही को बंदी बनने से नहीं हिचकिचाना चाहिए ।
(vi) यदि सत्याग्रही के पास ट्रस्टी के रूप में कोई संपत्ति है, तो वह उसे समर्पित करने से मना कर देगा, भले ही उसकी रक्षा के लिए अपनी जान तक क्यों न देनी पड़े ।
(vii) सत्याग्रही अपने विरोधी का अपमान नहीं करेगा ।
(viii) सत्याग्रही हिंसात्मक साधनों को कभी भी प्रयुक्त नहीं करेगा ।

(8) सत्याग्रही की योग्यताएं- गांधी जी एक सत्याग्रही की निम्नलिखित योग्यताएं निर्धारित करते हैं-
(i) सत्याग्रही का ईश्वर में अटल विश्वास होना चाहिए ।
(ii) सत्याग्रही का सत्य एवं अहिंसा में अटूट विश्वास होना चाहिए ।
(iii) सत्याग्रही का जीवन पवित्र, सादगी, त्याग तथा बलिदान से पूर्ण होना चाहिए ।
(iv) सत्याग्रही को नियमित रूप से सूत कातना तथा खादी पहिनना चाहिए ।
(v) सत्याग्रही को मादक द्रव्यों के प्रयोग से सर्वथा दूर रहना चाहिए ।
(vi) सत्याग्रही को अनुशासन के सभी नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करना चाहिए ।

(9) सामूहिक सत्याग्रह के लिए आवश्यक शर्तें- मशरूवाला के अनुसार सामूहिक सत्याग्रह की शर्तें इस प्रकार हैं-
(i) सांप्रदायिक एकता होनी चाहिए तथा सत्य एवं अहिंसा के द्वारा स्वराज्य प्राप्ति के प्रयत्न किए जाने चाहिए ।
(ii) अस्पृश्यता का अंत होना चाहिए ।
(iii) खादी का प्रचार तथा मध निषेध के लिए प्रयास करना चाहिए ।
(iv) जब तक निर्देशित परिस्थितियां विघमान न हों तब तक स्वराज की प्राप्ति के लिए लोकहितकारी कार्य तथा रचनात्मक कार्य जारी रखने चाहिए ।

(10) रचनात्मक कार्यक्रम- गांधी जी ने देश-हित के 18 कार्यक्रम प्रस्तुत किए जो इस प्रकार हैं- (i) सांप्रदायिक एकता (ii) अस्पृश्यता निवारण (iii) मघनिषेध (iv) खादी (v) अन्य ग्रामोद्योग (vi) प्रौढ़ शिक्षा (vii) बेसिक शिक्षा (viii) ग्राम्य दान (ix) दलित जातियों का उत्थान (x) नारी उत्थान (xi) स्वास्थ्य रक्षा एवं स्वास्थ्य शिक्षा (xii) राष्ट्र भाषा का प्रचार (xiii) भाषा प्रेम (xiv) आर्थिक समानता के लिए कार्य (xv) कृषकों का संगठन (xvi) विद्यार्थियों का संगठन (xvii) श्रम संगठन (xviii) प्राकृतिक चिकित्सा ।

 

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