गांधीजी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत।

निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियां लिखिए-
(1)सर्वोदय (2)गांधीजी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत।
(1)सर्वोदय
(Sarvodaya)

जिस समय महात्मा गांधी दक्षिणी अफ्रीका में जोहांसबर्ग से डरबन के लिए रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे, तभी मार्ग में उन्होंने जान रस्किन की ‘अनटू दिस लास्ट’ (Unto this last) नामक पुस्तक पढ़ी । वह पुस्तक गांधी जी को बहुत रुचिकर लगी । इस पुस्तक का अध्ययन करने के पश्चात गांधी जी के मन में सर्वोदय की भावना का उदय हुआ । इस पुस्तक से उन्होंने तीन प्रमुख बातें ग्रहण कीं-

(1) सबके हित में ही व्यक्ति का हित है ।
(2) आजीविका की आवश्यकता सभी को होती है । वकील के कार्य का और नाई के कार्य का मूल्य एक समान है, क्योंकि दोनों को समान रूप से आजीविका कमाने का अधिकार है ।
(3) श्रमिकों का, मजदूरों का तथा कृषकों का जीवन सच्चा है ।
महात्मा गांधी की सर्वोदय की कल्पना वेदांत, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, ईसाई धर्म, रस्किन तथा थोरों के विचारों का एक समन्वय थी । गांधीजी ने गीता तथा उपनिषदों से ‘सर्वोदय’ अर्थात् ‘सर्वहित’ की भावना ग्रहण की । गांधीजी निम्नलिखित श्लोक को बार-बार दुहराया करते थे जिससे ‘सर्वोदय’ शब्द की उत्पत्ति हुई है-
” सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दु:ख भाग्भवेत ।”
गांधी जी की सर्वोदय की भावना तीन मूल तत्वों पर आधारित है । वे तत्व हैं-
(1) अहिंसा (2) राजनीतिक तथा आर्थिक विकेंद्रीयकरण और (3) ग्रामीण स्वावलंबन । गांधीजी ‘सर्वोदय समाज’ में निम्नलिखित प्रकार की व्यवस्था करना चाहते थे-
(1) गांधीजी कहते थे कि ‘समस्त भूमि ईश्वर की है’ अर्थात् भूमि पर किसी का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है । ईश्वर की समस्त भूमि को सभी लोगों में समान रूप से वितरित किया जाएगा । सर्वोदय समाज में जिमींदारों का कोई स्थान नहीं होगा ।
(2) उत्पादकों को ही संपत्ति का अधिकार मिलेगा ।
(3) सर्वोदय समाज में मजदूरों और कृषकों का राज्य होगा

सर्वोदय समाज के अंग
(Organs of Sarvodaya Society)
गांधीजी ने अपने सर्वोदय आंदोलन के तीन अंग बताएं, जो इस प्रकार हैं-
(1) भूदान । (2) ग्रामदान तथा (3) संपत्ति दान ।
गांधीजी के सर्वोदय का अर्थ – गांधीजी कहते थे कि मैंने पुस्तकीय ज्ञान कम प्राप्त किया है, पर जितना मैंने ज्ञान प्राप्त किया है, वह ठोस ज्ञान है और मैंने उसे अच्छी तरह ग्रहण कर लिया है, रस्किन की पुस्तक ‘अन्टु दिस लाइट’ से मैं बहुत अधिक प्रभावित हुआ हूं और मैंने उसका गुजराती भाषा में अनुवाद भी किया है । मैं रस्किन के भावों को अपने शब्दों में ‘सर्वोदय’ के रूप में प्रकट कर रहा हूं ।
गांधीजी कहते हैं कि सर्वोदय का अर्थ है, ‘सबके हित में अपना हित ।’ “यह बात मुझे सूर्य के प्रकाश के समान स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है । प्रातः होते ही मैं उसके अनुसार अपने जीवन को बनाने की चिंता में लग जाता हूं ।”
प्रसिद्ध उपयोगितावाद विचारक बेन्थम ने “अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख” (Greatest Good of the Greatest Number) का सिद्धांत प्रतिपादित किया था, पर गांधीजी का सिद्धांत उसके समान नहीं है । गांधीजी का मत है कि मेरा सिद्धांत है कि “अहिंसावादी सदैव मर मिट जाने को तैयार रहेगा, उपयोगितावादी तर्कसंगत बने रहने के लिए कभी अपने को बलि नहीं कर सकता ।”
सर्वोदय का स्वरूप- गांधीजी सर्वोदय का स्वरूप बताते हुए कहते हैं, यदि हम चाहते हैं कि हमारा सर्वोदय अर्थात् सच्चे लोकतंत्र का स्वप्न सही साबित हो तो हम छोटे से छोटे भारतवासी को भी भारत का उतना ही शासक समझेंगे जितना देश के बड़े से बड़े आदमी को । कोई कभी किसी को अछूत नहीं समझेगा- हम मेहनत करने वाले मजदूरों और धनी पूंजीपतियों को समान समझेंगे । सबको अपने पसीने की कमाई से ईमानदारी की रोजी कमाना आता होगा, वे मानसिक और शारीरिक श्रम में कोई परहेज नहीं करेंगे । प्रत्येक व्यक्ति जब जरूरत पड़ेगी, अपने प्राण देने को तैयार होगा, पर दूसरे की जान लेने की इच्छा कभी नहीं करेगा ।
सर्वोदय समाज में राजनीतिक व्यवस्था- गांधीजी एक बड़े व्यक्तिवादी थे । वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बंधन में नहीं देखना चाहते थे । वे राज्य सत्ता का इसलिए विरोध करते थे क्योंकि वह व्यक्ति की स्वतंत्रता में अवरोध उत्पन्न करती है । गांधी जी का मत था कि, मैं राज्य की सत्ता की वृद्धि को बहुत ही भय की दृष्टि से देखता हूं, क्योंकि स्पष्ट रुप में वह शोषक को कम से कम करके लाभ पहुंचाती है, परंतु व्यक्तित्व को नष्ट करके मानव जाति को बड़ी से बड़ी हानि पहुंचाती है, जो सब प्रकार की उन्नति की जड़ है । राज्य केन्द्रित और संगठित रूप से हिंसा का प्रतीक है ।”
स्वराज्य की कल्पना- गांधीजी का ‘स्वराज्य की धारणा’ में दृढ़ विश्वास था । वे स्वराज्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि “स्वराज्य से मेरा तात्पर्य भारत के लोगों की स्वीकृति से होने वाले शासन से है । यह स्वीकृति वयस्क आबादी की बड़ी से बड़ी संख्या द्वारा निश्चित होनी चाहिए और उसमें देश में पैदा हुए या बाहर से आकर बसे हुए वे स्त्री-पुरुष शामिल हैं जिन्होंने शरीर श्रम द्वारा राज्य की सेवा में भाग लिया हो और अपना नाम मतदाताओं की सूची में लिखवाने का कष्ट उठाया हो । दूसरे शब्दों में, स्वराज्य जनसाधारण की सत्ता का नियमन और नियंत्रण करने की शक्ति का ज्ञान कराने से प्राप्त हो ।”
गांधीजी आगे कहते हैं कि, “स्वराज्य वास्तव में आत्म-संयम का नाम है । वह व्यक्ति ही आत्म संयम रख सकेगा जो सदाचारी है, धोखेबाज नहीं तथा सत्य को त्यागने वाला नहीं है । इस प्रकार का व्यक्ति जहां भी रहेगा स्वराज्य का सुख भोगेगा । जिस राज्य में बड़ी संख्या में नागरिक सुख भोगते हैं, वह स्वराज्य होने का दावा कर सकता है- भारत को स्वराज्य अवश्य लेना चाहिए, किंतु शुद्ध एवं पवित्र उपायों से । हमारा स्वराज्य ऐसा होना चाहिए, जो न हिंसा से प्राप्त किया जा सकता है और न औद्योगीकरण से, यदि प्रत्येक व्यक्ति सत्य पर डटा रहे तो स्वराज्य अपने आप हमारे पास चला आएगा ।”

सर्वोदय तथा लोकतंत्र- गांधी जी कहते हैं कि सूर्वोदय ही सच्चा लोकतंत्र होगा। इस लोकतंत्र का रूप इस प्रकार होगा-
(1) वह अगणित ग्रामों का बना होगा ।
(2) व्यक्ति एक ऐसा केंद्र होगा जिसके चारों ओर समुद्र के समान लहरें उठेंगीं ।
(3) व्यक्ति गांव के लिए होगा और गांव ग्राम समूह के लिए मर मिटने को तैयार होगा ।
(4) लोकतंत्र का संचालन अनेक व्यक्तियों के द्वारा केंद्र में न होकर लोगों के द्वारा होगा ।
(5) सर्वोदय में ‘दल’ का स्थान न होगा, प्रतिनिधि शासन में ‘दल’ अथवा मंत्रि-मंडल का अधिनायकतंत्र होता है, जो सर्वोदय की भावना के विरुद्ध कार्य करता है ।
(6) ग्राम पंचायतों की स्थापना होगी ।
(7) चुनाव प्रणाली का अभाव होगा ।
(8) सर्वदलीय सहयोग होगा ।
(9) संसद में ‘दल’ का प्रतिनिधित्व न होकर राष्ट्र का प्रतिनिधित्व होगा ।
(10) सर्वोदय में ‘सर्वहित’ ही सबका ध्येय होगा ।

सर्वोदय के रचनात्मक कार्यक्रम- गांधीजी के अनुसार सर्वोदय के रचनात्मक कार्यक्रम में निम्नलिखित बातें होंगी- (1) साम्प्रदायिक एकता (2) मद्यनिषेध (3) अन्य ग्रामोद्योग (4) ग्रामों की सफाई (5) चांदी का प्रयोग (6) बुनियादी तालीम (7) आर्थिक समानता (8) बड़ों की तालीम (9) किसान, मजदूर तथा आदिवासी की उन्नति ‌। (10) कुष्ट रोगी, विधार्थी और पशु सुधार (11)अस्पृश्यता निवारण (12) स्त्रियों को समान अधिकार (13) आरोग्यता के नियमों की शिक्षा (14) राष्ट्र भाषा और प्रांतीय भाषा का प्रसार ।

मशरूवाला के अनुसार सर्वोदय का कार्यक्रम- मशरूवाला का मत है कि गांधीजी का सर्वोदय का कार्यक्रम अंत:करण की शुद्धता पर आधारित था । उनके सर्वोदय के मूल सिद्धांत इस प्रकार थे-

(1) जीवों के प्रति प्रेम एवं सम्मान ।
(2) प्रत्येक राज्य का प्रथम कर्तव्य अपनी सीमा में रहने वालों को काम देना होगा और प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार तथा परंतु उपलब्ध साधनों के द्वारा प्राप्त कराया जाएगा ।
(3) सर्वोदय कार्यक्रम के अनुसार जीवन-स्तर और रहन-सहन के स्तर में अंतर होगा क्योंकि ऊंचे रहन-सहन के स्तर से जीवन स्तर नीचा भी हो सकता है ।
(4) शासन तंत्र और संपत्ति के उत्पादन में अधिक केन्द्रीयकरण ।
(5) सर्वोदय कार्यक्रम का उद्देश्य मानव जीवन के विकास मार्ग से मानवीकृत बाधाओं को दूर करना है और उसके लिए साधन, प्रशिक्षण और पथ-प्रदर्शन की व्यवस्था करना है ।
गांधीजी की सर्वोदय भावना को आचार्य विनोबा भावे ने भी व्यावहारिक रूप दिया ।

गांधीजी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत(Gandhiji’s Theory of Trusteeship)
गांधीजी पूंजीपतियों के विरुद्ध अवश्य थे पर उन्हें समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे । साम्यवादी पूंजीपतियों को समाप्त करके उनकी संपत्ति पर अधिकार करना चाहते थे । महात्मा गांधी इसके विरुद्ध थे । वे ‘अपरिग्रह’ अर्थात् ‘धन को ग्रहण करने के’ समर्थक थे । उनका यह विचार उपनिषद के श्लोक ‘मागृध कश्चिद् धन’ से प्रभावित था । वे पूंजीपतियों को उपदेश देते थे कि वे अपना धन निजी स्वार्थों में व्यय न करके उसे जनता के हित के लिए व्यय करें । वे एक खजांची के रूप में धन का केवल जनहित के लिए प्रयोग करें । गांधी जी कहते थे कि “पूंजीपतियों को एक ट्रस्टी के रूप में कार्य करना चाहिए, यदि वे ऐसा नहीं करते तो सत्याग्रह करके हमें विपुल धन का विरोध करना चाहिए । ट्रस्ट्री का उत्तराधिकारी जनता के अतिरिक्त कोई नहीं है ।

ट्रस्टीशिप के सिद्धांत की प्रमुख बातें- महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत की प्रमुख बातें इस प्रकार थीं-
(1) ट्रस्टीशिप समाज की वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को समाज अवस्था में बदलने का एक साधन है । वह पूंजीवाद को प्रोत्साहन नहीं देता है अपितु वह वर्तमान पूंजीवाद को सुधारने का अवसर प्रदान करता है और यह इस आधार पर कि व्यक्ति की प्रकृति में अवश्य सुधार होता है ।

(2) यह संपत्ति के किसी वैयक्तिक स्वामित्व को स्वीकार नहीं करता है ।

(3) यह स्वामित्व के नियंत्रित संचालक और संपत्ति के प्रयोग का निषेध नहीं करता है ।

(4) इस प्रकार राज्य द्वारा संचालित ट्रस्टीशिप में एक व्यक्ति अपनी संपत्ति को अपने स्वार्थ के संतोष के लिए बिना समाज के हितों का ध्यान किए प्रयोग करने में स्वतंत्र नहीं होगा ।

(5) समाज में न्यूनतम तथा अधिकतम आय की सीमा निश्चित कर दी जाएगी । इस सीमा का निर्धारण समय-समय पर तथा न्याय के अनुसार परिवर्तित होता रहेगा ।

(6) इस आर्थिक व्यवस्था में उत्पादन को सामाजिक आवश्यकताओं के द्वारा निर्धारित किया जाएगा ।
ट्रस्टीशिप सिद्धांत की आलोचना- वर्तमान समय में गांधीजी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत क्रियान्वित नहीं हो पा रहा है । आधुनिक समाज में आर्थिक असमानता विद्यमान है । एक वर्ग धनिकों तथा पूंजीपतियों का है और दूसरा निर्धन मजदूरों एवं किसानों का । धनी अधिक धनी और गरीब अधिक गरीब होते जा रहे हैं । मशीनी उधोगों ने इस आर्थिक विषमता को और भी अधिक बढ़ा दिया है । वर्तमान भारत आर्थिक असमानता के चंगुल में फंसा है, ईश्वर ही जानता है कि इसका भविष्य क्या होगा ।