क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता से आप क्या समझते हैं

क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता से आप क्या समझते हैं ? भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद के क्या कारण हैं ?(What do you mean by Regionalism? What are the causes of
regionalism in Indian politics.)
                                                                      अथवा
भारतीय प्रजातन्त्र के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक के रूप में क्षेत्रवाद की विवेचना कीजिए।(Discuss Regionalism as a Socio-economic determinant of Indian
Democracy.)

उत्तर- क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता (Regionalism)

क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता का अर्थ- क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता वह भावना है, जिससे प्रेरित होकर राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करके अपने क्षेत्रीय हितों को पूरा करने का प्रयास किया जाता है। क्षेत्रवाद की भावना से ओत-प्रोत व्यक्ति स्वयं को पहले क्षेत्रीय और बाद में राष्ट्रीय समझते हैं। इस प्रकार क्षेत्रवाद स्वयं में एक ऐसी संकीर्ण विचारधारा है, जो व्यक्तियों में राष्ट्र के प्रति निष्ठा के स्थान पर उस क्षेत्र विशेष के प्रति ही निष्ठा उत्पन्न करती है, जिसमें वे निवास करते हैं। इस प्रकार क्षेत्रवाद एक विघटनकारी एवं पृथकतावादी भावना है, जो राष्ट्रीय विकास के मार्ग को अवरुद्ध करती है और राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के लिये घातक सिद्ध होती है। इस भावना को ‘प्रादेशिकता’ या ‘प्रान्तवाद’ के नाम से भी जाना जाता है।

भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद के कारण(Causes of Regionalism in Indian Politics)
जहाँ एक या एक से अधिक संख्या में भौगोलिक ऐतिहासिक परम्पराएँ, जातीय एवं सांस्कृतिक विशिष्टताएँ तथा स्थानीय आर्थिक एवं वर्ग-हित सम्मिलित हो जाते हैं वहीं क्षेत्रवाद की भावना और समस्या उत्पन्न हो जाती है। आधुनिक राष्ट्रीय राज्यों में जातीय, भाषायी, प्रशासनिक तथा आर्थिक विभिन्नताएँ मिलती हैं और यही तत्व क्षेत्रवाद को जन्म देते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ भाषायी आधार पर राज्यों का वर्गीकरण और सीमांकन किया गया है, जहाँ भौगोलिक, प्राकृतिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक आधारों पर विषमताएँ, धर्म और जाति आदि की विविधता और क्षेत्रीय असन्तुलन है, क्षेत्रवाद की भावना का उदय होना स्वाभाविक हैं। भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(1) भौगोलिक एवं प्राकृतिक कारण- विश्व के अधिकतम जनसंख्या वाले देशों में भारत का दूसरा तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवाँ स्थान है। इस प्रकार भारत एक विशाल जनसंख्या और क्षेत्रफल वाला देश है, जिसके लगभग प्रत्येक क्षेत्र को प्रकृति ने किसी न किसी प्रकार की प्राकृतिक सम्पदा सौंपी है परन्तु फिर भी अपनी-अपनी भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की विषमतायें विद्यमान हैं। इन भौगोलिक एवं प्राकृतिक विषमताओं के कारण पिछड़े क्षेत्रों के लोगों के मन में अपने-अपने क्षेत्रों के बहुमुखी विकास के लिये क्षेत्रवाद की भावना का उदय हुआ और यह भावना निरन्तर विकसित होती जा रही है।

(2) क्षेत्रीय असन्तुलन सम्बन्धी कारण- भारत की भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा देश के विभिन्न क्षेत्रों का सन्तुलित विकास किया जा सकता था परन्तु सरकार की विकास सम्बन्धी त्रुटिपूर्ण नीतियों के कारण ऐसा सम्भव न हो सका और देश में क्षेत्रीय असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी। इसके परिणामस्वरूप अविकसित क्षेत्रों के लोग राष्ट्रीय हितों के स्थान पर अपने-अपने क्षेत्रीय हितों को अधिक महत्व देने लगे और क्षेत्रवाद की भावना का विकास हुआ।

(3) ऐतिहासिक कारण- राज्यों के पुनर्गठन के पश्चात् सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से देशी रियासतों को भारतीय संघ (Indian Union) में विलीन कर दिया गया था, परन्तु इन रियासतों के लोगों के मन में आज भी यह धारणा बनी हुई है कि यदि उनकी रियासत भारतीय संघ में विलीन होकर अपना पृथक अस्तित्व बनाये रखती तो वे अपनी अधिक उन्नति और विकास कर सकते थे। लोगों की इस धारणा ने क्षेत्रवाद की भावना को जन्म दिया और यह भावना निरन्तर विकसित हो रही है। इसके अतिरिक्त भारत के कुछ क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से विकसित हैं और कुछ नहीं। इन अविकसित क्षेत्रों के निवासियों के मन में अपने क्षेत्र के विकास हेतु क्षेत्रवाद की भावना का उदय और विकास हुआ है।

(4) राजनीतिक कारण- भारत में अत्यधिक महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञों की यह सोच रही है कि उनके क्षेत्र के आधार पर पृथक् राज्य बन जाने की स्थिति में ही उनके राजनीतिक उद्देश्यों एवं महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति सरलता से हो सकती है, अतः ऐसे राजनीतिज्ञों ने अपने क्षेत्र के लोगों में क्षेत्रवाद की भावना भड़काकर विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का गठन किया, जिनके मंच से क्षेत्रवाद की भावना का प्रचार प्रसार और क्षेत्रवादी आन्दोलन खड़े करके पृथक राज्यों की माँग की। भारत में आज भी कई राज्यों में कई ऐसे क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं, जिन्होंने भारत में क्षेत्रवाद की भावना को न केवल जन्म ही दिया है अपितु इस राष्ट्रीय एकता विरोधी भावना को निरन्तर बढ़ावा भी दिया है।

(5) आर्थिक कारण- सरकार की त्रुटिपूर्ण आर्थिक नीतियों के कारण सरकार द्वारा देश के कुछ क्षेत्रों में औद्योगीकरण हेतु अत्यधिक मात्रा में पूँजी निवेश किया गया है और कुछ में न के बराबर। परिणामस्वरूप देश के कुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक आर्थिक विकास हुआ है और कुछ में बहुत ही कम। आर्थिक दृष्टि से विकसित क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय अधिक है और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय बहुत कम है। इससे देश में आर्थिक असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। इस स्थिति में आर्थिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों में आर्थिक असन्तोष उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। इस आर्थिक असन्तोष ने लोगों में क्षेत्रवाद की भावना को जन्म दिया, जो निरन्तर विकसित होती जा रही है।

(6) शैक्षिक कारण- भारत में आज भी अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जो शैक्षिक दृष्टि से अत्यधिक पिछड़े हुये हैं। इन क्षेत्रों के लोगों का दृष्टिकोण संकुचित ही रह गया है और ये लोग महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञों तथा विघटनकारी एवं पृथकतावादी शक्तियों के बहकावे में आकर राष्ट्रीय बनने के स्थान पर क्षेत्रीय सरकार मात्र ही रह गये हैं। ये लोग क्षेत्रवाद की भावना के आधार पर ही सोचते-विचारते हैं। इस प्रकार शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ेपन के कारण भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद का उदय और विकास हुआ है।

(7) सांस्कृतिक कारण- भारत में विभिन्न क्षेत्रों की सभ्यता और संस्कृति में विविधता देखने को मिलती है। सभी लोगों को अपनी-अपनी सभ्यता और संस्कृति से लगाव हैं और वे एक-दूसरे की सभ्यता और संस्कृति को हेय दृष्टि से देखते हैं। एक ही संस्कृति के लोग एकत्रित होकर अपनी संस्कृति के आधार पर क्षेत्रवाद की भावना को भड़काते हैं। सांस्कृतिक एकता के आधार पर सामूहिक रूप से आन्दोलन करके भारतीय संघ में एक पृथक् एवं स्वतन्त्र राज्य की माँग करते हैं। इससे क्षेत्रवाद को बढ़ावा मिलता है।

(8) जातीय कारण- जातिवाद अपनी जाति के लोगों को ही विकास के अवसर प्रदान करना चाहता है और जातीय हितों को सर्वोपरि मानते हुए राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करता है। यही कारण है कि भारत के जिन क्षेत्रों में एक ही जाति के लोगों की प्रधानता या बहुलता है, वहाँ क्षेत्रवाद की भावना अपने उग्र और स्पष्ट रूप में दिखायी देती है। बिहार, उ० प्र० और महाराष्ट्र जैसे कुछ क्षेत्रों में क्षेत्रवाद के उदय और विकास में जाति एक प्रभावी तत्व रहा था।

(9) भाषायी कारण – भारत में विभिन्न भाषा-भाषी लोग रहते हैं, अतः भारत में ‘जातिवाद’ की भाँति ‘भाषावाद’ भी एक ऐसी गम्भीर समस्या है, जिसने क्षेत्रवाद और पृथकतावाद को न केवल जन्म ही दिया है अपितु उसे निरन्तर बढ़ावा भी दिया है। राजनीतिक दलों ने समान भाषा-भाषी लोगों को एकत्रित करके उन्हें अपने वोट बैंक और राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया है, जिसके परिणामस्वरूप देश में भाषा को लेकर अनेक संघर्ष हुए हैं। भाषा के नाम पर उत्तर-दक्षिण में विरोध उत्पन्न किया गया। दक्षिण-भारत में तो अनेक राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्र भाषा हिन्दी का विरोध करते हुए अंग्रेजी का पक्ष लिया गया तथा भाषा के नाम पर क्षेत्रवाद की भावना को विकसित किया गया।
इस प्रकार भारत में भाषावाद और क्षेत्रवाद एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप में गुंथे हुए हैं, अतः यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि क्षेत्रवाद की भावना के विकास की जड़ में भले ही अन्य अनेक कारण विद्यमान है, परन्तु भाषावाद क्षेत्रवाद की भावना के उदय और उसे विकसित करने में एक प्रमुख तत्व रहा है और इसके कारण आज भारत की राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के लिये भी खतरा उत्पन्न हो गया है तथा भारतीय लोकतन्त्र की सफलता का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है।

 

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