आधुनिक पूर्वी यूरोप में स्वातंत्र्यवाद की स्थापना का वर्णन कीजिए।

आधुनिक पूर्वी यूरोप में स्वातंत्र्यवाद की स्थापना का वर्णन कीजिए।
प्रस्तावना  (Introduction)
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात पूर्वी यूरोप के अनेक देशों की स्वतंत्रता का अपहरण हो गया था तथा उन पर साम्यवादी तानाशाही आरोपित कर दी गई थी । किंतु बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में स्वातंत्र्यवाद की ऐसी लहर चली कि पूर्वी यूरोप के देशों ने साम्यवाद की निरंकुशता का जुआ उतार फेंका । ‘पेरेस्त्रोइका’ अर्थात ‘पुनर्गठन’ के सिद्धांत ने लेनिन के मौलिक सिद्धांतों जैसे- ‘सर्वहारा वर्ग की तानाशाही’ , ‘जनलोकतंत्र’ , ‘अनंत क्रांति में राज्य की शाश्वत भूमिका’ के आवरण में लादी गई पराधीनता से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।
गोर्बाच्योव के उदय से पूर्व भी विश्व में बुद्धिजीवियों के एक प्रबल वर्ग का अनुमान था कि एक न एक दिन साम्यवाद के जुए को देश उतार फेंकेंगे तथा स्वतंत्रत हो जाएंगे । पर किसी ने भी यह कल्पना न की थी कि यह कार्य इतनी शीघ्र व अधिकांशत: अहिंसक रुप से संपन्न हो जाएगा । इन देशों की आर्थिक दुर्दशा के दृष्टिगत गोर्बाच्योव ने सोवियत संघ के पेरेस्त्रोइका अर्थात पुनर्गठन का संकल्प कर ‘ग्लासनोस्त’ का द्वार खोला । शीघ्र ही स्वतंत्रता की स्वच्छ वायु के एक ही झोंके ने इन साम्यवादी तानाशाहों को झकझोर दिया तथा वे धूसरित हो गए । कतिपय प्रमुख देशों का वर्णन निम्न प्रकार है-

1. हंगरी (Hungary)- हंगरी में सन 1956 में सोवियत कठपुतली सरकार की अवज्ञा करते हुए लाखों लोग बुडापेस्ट की सड़कों पर निकल आए तथा उन्होंने निम्न मांगें रखीं-
(i) हंगरी से समस्त सोवियत सैनिकों को हटा लिया जाए ।
(ii) हंगरी के आंतरिक विषयों में कोई हस्तक्षेप न किया जाए ।
(iii) हंगरी को सोवियत संघ के साथ पूर्ण आर्थिक व राजनीतिक समता प्रदान की जाए ।
(iv) श्रमिकों के उत्पादन कोटे में संशोधन करने तथा हड़ताल के अधिकार को मान्यता प्रदान की जाए ।
(v) राजनीति में उदार नीति तथा रहन-सहन के स्तर को उच्च करने वाली आर्थिक नीति को अपनाया जाए ।
सोवियत संघ ने फौंजें भेजकर विद्रोह को कुचल दिया ।

जनवरी 1989 में हंगरी की संसद ने एक ऐतिहासिक कदम उठाकर ‘स्वतंत्र राजनीतिक आंदोलनों के गठन की अनुमति प्रदान करने वाला विधेयक पारित कर दिया । नवीन विधान में निम्नलिखित व्यवस्था की गई-
(i) विभिन्न राजनीतिक दलों के संगठन के अधिकार को सैद्धांतिक रूप से मान्यता प्रदान की गई ।
(ii) प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता दी गई ।
(iii) यह स्वीकार कर लिया गया कि देश में एक दलीय समाजवाद का प्रयोग विफल रहा ।
(iv) बहुदलीय पद्धति में परिणति की तैयारी के लिए एक समिति गठित की गई ।

7 नवंबर को मतदान के द्वारा साम्यवादी पराधीनता के अस्तित्व को समाप्त कर स्वातंत्र्यवादी सरकार की स्थापना की गई । कांग्रेस ने पार्टी के भीतर व बाहर लोकतंत्र के पक्ष में भी मतदान किया ।


2. पोलैंड (Poland)- 1956, 1970 तथा 1976 में पोलैंड के सर्वहारा ने साम्यवादी पराधीनता को उतार फेंकने का प्रयास किया पर उन्हें सोवियत सैनिकों की सहायता से कुचल दिया गया । पोलैंड की आर्थिक स्थिति बद से बद्तर होती जा रही थी । 1989 में देश पर विदेशों का ऋण लगभग 39 अरब डालर था ।
जून 1989 में हुए चुनावों में साॅलिडेरिटी (Solidarity) को संसद के केवल एक-तिहाई अर्थात 162 स्थानों के लिए चुनाव लड़ने की अनुमति प्रदान की गई । उसने 161 स्थानों के लिए चुनाव लडा़ तथा सभी पर विजय प्राप्त की । सीनेट में भी साॅलिडेरिटी ने 100 में से 90 स्थानों पर अधिकार स्थापित किया । 24अक्टूबर 1989 को पोलैंड में साॅलिडेरिटी के नेतृत्व में सरकार स्थापित हुई। शीघ्र ही साम्यवादी पराधीनता को उतार फेंक कर स्वतंत्र तथा लोकतांत्रिक चुनावों द्वारा बहुदलीय पद्धति वाले संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की व्यवस्था की गई ।

3. रोमानिया (Rumania)- रोमानिया में दिसंबर 1989 को तिमिसारा में एक पादरी के निष्कासन के मुद्दे पर विरोध प्रारंभ हुआ । इस विरोध ने साम्यवाद की परतंत्रता को उतार फेंक पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने हेतु आंदोलन का रूप धारण कर लिया । सेना ने भी आंदोलनकारियों का साथ दिया । 22 दिसंबर 1989 को रेडियो तथा टेलीविजन केंद्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया गया । राष्ट्रपति के प्रासाद को घेर लिया गया । राष्ट्रपति चाडसंस्क्यू तथा उनकी पत्नी एलिश ने अरबों डालर लेकर भाग निकलने का प्रयास किया, परंतु वे बुखारेस्ट में 100 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में तुर्गविस्ते नगर में पकड़े गए । उन पर सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया तथा मृत्यु दंड दिया गया ।
23 मई 1990 को नेशनल साल्वेशन फ्रंट ने प्रथम स्वतंत्र चुनावों में भारी विजय प्राप्त की । इयान इलिएसक्यू को राष्ट्रपति चुना गया । इस प्रकार रोमानिया को स्वतंत्रता प्राप्त हुई ।

4. पूर्वी जर्मनी (East Germany)- अक्टूबर 1989 में प्राग ने पश्चिमी जर्मनी के साथ लगी अपनी सीमाएं खोल दी । परिणामत: पूर्वी जर्मनी से लोगों का निष्क्रमण बढ़ गया । एरिक होनोकर के राज्य में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर निकल आए । वे स्वतंत्रता व सुधारों की मांग कर रहे थे । इस विशाल ऐतिहासिक प्रदर्शन ने स्वतंत्रता व लोकतंत्र की ज्वाला को प्रज्वलित किया । 18 अक्टूबर 1989 को स्टालिनवादी नेता के रूप में साम्यवादी परतंत्रता उतार फेंकी गई। लगभग आठ लाख विरोध कर्ताओं ने सड़कों पर पद-यात्रा की । उन्होंने स्वतंत्र चुनावों की मांग की । 18 मार्च 1990 को पूर्वी जर्मनी में स्वतंत्र चुनाव हुए । क्रिश्चिचयन डेमोक्रेट तथा संबंध दलों ने 193 स्थान प्राप्त किए । अप्रैल 1990 क्रिश्चिचयन डेमोक्रेटों व सोशल डेमोक्रेटों की मिश्रित सरकार ने पदभार ग्रहण किया । इस प्रकार पूर्वी जर्मनी साम्यवाद से स्वतंत्रता प्राप्त कर सका ।

5. चेकोस्लोवाकिया (Czechoslovakia)- सन 1948 में चेकोस्लोवाकिया की स्वतंत्रता का अपहरण कर उस पर साम्यवाद थोप दिया गया था । साम्यवादी व्यवस्था में देश की आर्थिक समृद्धि का क्षय होने लगा । वहां खादान्न का अभाव हो गया । भारी मुद्रा स्फीति हुई । वस्तु भंडारों पर ग्राहकों की धक्का-मुक्की करने वाली लंबी-लंबी पंक्तियां लगने लगीं ।
जून 1977 में देश के कुछ नेताओं ने एक परिपत्र का परिचालन किया । उस परिपत्र में दमन नीति की समाप्ति के लिए आव्हान किया गया । साथ ही स्वातंत्र्य व लोकतंत्रीय अधिकारों की पुन: स्थापना पर बल दिया गया । इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ‘चार्टर’ नामक दल की स्थापना की गई ‌। इस दल ने उस नागरिक मंच का नेतृत्व किया जिसने 1989 में लोकतंत्र के जन आंदोलन को आगे बढ़ाया । 17 नवंबर 1989 को प्राग में तीस हजार से अधिक व्यक्तियों ने प्रदर्शन किया तथा साम्यवादी सरकार से त्याग पत्र की मांग की । उनके उद्घोष वाक्य निम्न प्रकार थे-
‘स्वतंत्रता दो-स्वतंत्रता दो, स्वतंत्र चुनाव कराओ’………. 40 वर्ष बहुत होते है, अब तुम्हारे दिन लद चुके हैं ।
11 जून 1990 को नागरिक मंच आंदोलन (सिविक फोरम मूवमैंट) ने प्रथम स्वतंत्र चुनाव में डाले गए कुल मतों के 46% से अधिक मत प्राप्त कर विजय प्राप्त की । प्रथम जनवरी 1993 को स्वाधीन चेक व स्लोवाक गणराज्यों का उद्दय हुआ ।

6. बल्गेरिया (Bulgaria)- 16 जनवरी 1990 को बल्गेरिया की संसद ने एक संविधान संशोधन का अनुमोदन करके सत्ता पर साम्यवादी दल के एकाधिकार को समाप्त कर दिया । इसके साथ ही स्वतंत्र चुनावों का द्वार खोल दिया गया । लगभग 4 दशकों के पश्चात प्रथम स्वतंत्र चुनाव सितंबर 1990 में हुआ । इस प्रकार देश को स्वतंत्रता प्राप्ति हो गई ।

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